सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)
Siddhanta Darpana of Mahamahopadhyaya Samanta Chandrasekhara
सामन्त चन्द्रशेखर सिंह (सम्पादक: प्रो. योगेशचन्द्र राय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभूगोल खगोल वर्णनम् ३२५
तारा ग्रहों की कक्षा बड़ी है ।
व्यर्क सूक्ष्मेन्दु बाहुज्या चन्द्र कर्णेन ताड़िता
सौराद्युक्तार्क कर्णाप्ता फल लिप्ता युतोनितः । ४४ ।
चन्द्र से रवि (की राशि) घटाकर उसकी भुजज्या निकालें) उसको चन्द्र कर्ण
से गुणा कर सूर्य सिद्धान्त या भास्कर के अनुसार रवि कर्ण मान से भाग देने पर
जो फल आता है उसे चन्द्र में जोड़ने या घटाने से
पक्षयोः शुभ्रभानुश्चेच्छुक्लाष्टम्यादि पादके
कृष्णाष्टम्यन्त पादे च पूर्णार्द्धः स्यान्नदृक् समः । ४५ ।
शुक्ल पक्ष के चन्द्र में जोड़ने या कृष्ण पक्ष के चन्द्र में घटाने से शुक्ल अष्टमी
के प्रथम पाद में (रवि चन्द्र का अन्तर ८४°-८७° के बीच रहने पर ) और कृष्ण
अष्टमी के अन्तिम पाद में (रवि चन्द्र का अन्तर २७३°-२७६° के बीच) पूर्ण चन्द्र
का आधा शुक्ल नहीं होता जो गणना से होना चाहिये ।
यदि द्वितीय पर्वान्त तृतीयाङ्घ्रि प्रवेशयोः
चन्द्रार्द्ध लक्ष्यते साक्षात् सूर्यकर्णोऽधिकस्ततः । ४६ ।
किन्तु शुक्ल अष्टमी के द्वितीय पाद के अन्त में (रवि चन्द्र अन्तर ९०°) तथा
कृष्ण अष्टमी के द्वितीय पाद के अन्त में (रवि चन्द्र अन्तर २७०°) चन्द्र का आधा
बिम्ब शुक्ल दीखता है । अतः मैने सूर्य कर्ण उन ग्रन्थों की तुलना में अधिक लिया
है ।
महत्ता भवतत्कक्षा बिम्बयोर्युक्ति भिः रवेः
इयता कथमानीता प्रश्नश्चेदिति कथ्यते । ४७ ।
सूर्य से आरम्भ कर सभी ग्रहों की कक्षा और बिम्ब का बड़ा मान सूर्य से
आरम्भ कर सभी ग्रहों की कक्षा और बिम्ब का बड़ा मान (सूर्य सिद्धान्त की
तुलना में) तर्क द्वारा सिद्ध होना चाहिये । अतः इन सभी का मान किस प्रकार
इतना हुआ इसका वर्णन कर रहा हूँ ।
नहि, शब्दाखिल त्यागा दनुमानं प्रशंस्य ते
विस्तारोऽकृतो भानो स्तनमया श्रुति सम्मतः । ४८ ।
वेद को न मानकर सिर्फ अनुमान की प्रशंसा नहीं होती है । अतः मैने सूर्य
का वेदोक्त व्यास स्वीकार किया है ।
ब्रह्मविद्योपनिषदि प्रणवार्थ निरूपणे ।
द्विसप्तति सहस्राणि योजनानीति भास्वतः । ४९ ।
ब्रह्मविद्या उपनिषद् में प्रणव (ॐ) के अर्थ की व्याख्या के समय सूर्य का
व्यास ७२,००० योजन कहा है ।