सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)
Siddhanta Darpana of Mahamahopadhyaya Samanta Chandrasekhara
सामन्त चन्द्रशेखर सिंह (सम्पादक: प्रो. योगेशचन्द्र राय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभूगोल खगोल वर्णनम् ३३७
शताब्दा निष्ठायां पुरि परिवृतायां प्रतिदिनं
कयाचिद् व्यक्त्यास्यात् कुपरिधि समस्तद् गति पथः । १२१ ।
अपनी कक्षा में घूम घूम कर ब्रह्माण्ड के भीतर यदि ग्रह आकाश कक्षा के
बराबर योजन चलता है, तो लोग अपने ही घर में प्रतिदिन घूम घूम कर पृथ्वि
की परिधि के बराबर मार्ग क्यों नहीं चलते ?
कोटिघ्नैर्नखनन्द षट्क नख भू
भू भृद् भुजंगेन्दुभि (१८,७१,२०,६९,२०,००,००,००,०००)
स्वत् प्रोक्तस्य च योजनैः ख परिधिस्तत्रापि लक्षांशके
नस्याद्वि द्विशरर्तु (६५२२) योजन रवि व्यासस्य यद्दर्शनं
द्योता व्याप्तिः तमः क्षितिः क्व घटते खान्तेऽपिते तन्मते । १२२ ।
आप आकाश की परिधि का मान (१८,७१,२०,६९,२०,००,००,००,०००) योजन
कहते हैं, इसके एक लाख भाग में भी एक भाग करने पर सूर्य व्यास ६५२२ योजन
नहीं होता है । (उससे बहुत अधिक है) तब आकाश गोल का अन्धकार गोल
परिधि तक सूर्य कैसे नाश करता है ?
सर्वाश्चर्य गहाम्बुधेर्भगवतः स्थूलेविभौधामनि
क्रीडाण्डाणुगणाः स्फुरन्ति कतिधा नो वेत्तिवेधा अपि
तस्माद् वेद पुराण वर्णित जगन्मानादिकं नो मृषा
किन्त्वस्मद् वसते र्भुवोऽन्तिक जुषामेषा स्थिति ज्योतिषाम् । १२३ ।
भगवान् सबसे बड़े आश्चर्य और आश्चर्य के महासमुद्र हैं । उनके विराट् स्थूल
रूप के भीतर कितने प्रकार के विश्व हैं । यह ब्रह्मा भी नहीं जान सकते हैं ।
अतः वेद और पुराणों में जगत का जो परिणाम दिया गया है, वह सब मिथ्या
नहीं होगा। किन्तु सिर्फ हमारी पृथ्वि के आसपास जो ग्रह दीखते हैं, उन्हीं की
स्थिति के विषय में मैं अनेक बातें कहूंगा ।
शंखासुर सुहतिनन्दित देववृन्दः
शंखारि सुन्दर तराग्र कराविन्दः
शंखाकृति क्षितिपतिः प्रतनोतु नित्यं
शंखादि भूतमयकाय निकाय भाजाम् । १२४ ।
जिनके द्वारा शंखासुर का वध होने पर देवगण प्रसन्न हुए थे, जिनका कर
रूपी कमल शंख चिह्न द्वारा और सुन्दर दीखता है, तथा जो शंख क्षेत्र के अधिपति
है । वह (महाप्रभुजगन्नाथ) आकाश आदि पांच भूतों के बने शरीर धारियों का
मंगल करे ।