सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)
Siddhanta Darpana of Mahamahopadhyaya Samanta Chandrasekhara
सामन्त चन्द्रशेखर सिंह (सम्पादक: प्रो. योगेशचन्द्र राय) द्वारा
पृष्ठ 423, कुल 609 में से
संदर्भ में पढ़ें३२६ सिद्धान्त दर्पण
श्रीमत्पुरुषेणोक्ता विस्तृति र्यान्तिम् श्रुतौ
दृक् सिद्धा सार्क सिद्धान्त भूव्यासश्च तथा मतः । ५० ।
महापुरुष भगवान् ने अथर्व वेद में भी इतना ही विस्तार (सूर्य व्यास का)
कहा है । सूर्य सिद्धान्त में पृथ्वी का जो व्यास दिया गया है वह भी दृक् सिद्ध
है ।
मध्य बिम्बकला भानो यंत्र वेधेन लक्षिताः
भास्करेणोदिता दन्ताः (३२) सदन्त विकला (३२) यतः ५१ ।
यन्त्रवेध द्वारा भी सूर्य की मध्य बिम्ब कला (३२।३२) है जितना भास्करा
चार्य ने कहा है ।
तावद् दृष्टा नुपातेन कर्णमार्गो मयोदितः
ततः कक्षाः परेषान्तु सशीघ्र फल दर्शनात् । ५२ ।
मैने इस दृश्य बिम्बकला (तथा वास्तविक बिम्ब व्यास योजन) के अनुपात
से रवि कर्ण (सूर्य की दूरी) का मान कहा है । उसके अनुसार कक्षा का मान
कहा है । ग्रहों का अपना शीघ्र फल देखने से
शैघ्राः परिधयः सिद्धास्तद् गुणाद् भांश भाजितात् (३६०)
कक्षा वृत्ताद्रवेः सिद्धे स्व स्व कक्षेज्ञ शुक्रयोः । ५३ ।
अन्य ग्रहों की शीघ्र परिधि भी (अनुपात द्वारा) निकलती हैं । रवि के कक्षा
वृत्त को (बुध और शुक्र की) शीघ्र परिधि के अंश से गुणा कर ३६० से भाग देने
पर क्रमशः बुध और शुक्र की अपनी अपनी कक्षा का मान आता है ।
भू कक्षाया विभक्तायाः शैघ्रैः परिधि भागकैः
कुजेज्य मन्दकक्षाः स्युरिति सर्वं 'समञ्जसम् । ५४ ।
अपनी अपनी शीघ्र परिधि के अंश से भू कक्षा में भाग देने पर मंगल, गुरु
और शनि को कक्षा होगी । इस प्रकार इन मानों का सामञ्जस्य (तर्क संगति)
हुआ ।
नति लम्बन भूयस्थ बिम्ब मानो नतेक्षणात्
भूच्छाया लोकतिश्चन्द्र कक्षा बिम्बाल्यता कृता । ५५ ।
नति और लम्बन की अधिकता बिम्बमानो में अन्तर होने के कारण भूछाया
और चन्द्र बिम्ब का मान कम किया गया है ।
सूर्यान्नक्षत्र सूत्रस्थ ग्रहाणामन्तदोः फलम्
शैघ्रं भूमेरुङ्गत तात् सूत्राद् यद् बुध शुक्रयोः । ५६ ।
सूर्य से नक्षत्र सूत्र में स्थित (नक्षत्र दिशा में) ग्रहों का परम शीघ्रफल, यदि
पृथ्वी से नक्षत्र सूत्र में स्थित बुध और शुक्र से शीघ्र फल से-