सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)
Siddhanta Darpana of Mahamahopadhyaya Samanta Chandrasekhara
सामन्त चन्द्रशेखर सिंह (सम्पादक: प्रो. योगेशचन्द्र राय) द्वारा
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किरण व्याप्ति कर्णोऽस्य कोटिघ्नख भूधराः (७,२०,००,००००)
ख खा भ्रधृतयः कोटि गुणिता (१,८०,००,००,००,०००) दर्शन श्रुतिः । ११६ ।
सूर्य की किरण का तेज (७,२०,००,०००) योजन तक तथा किरण की दीखने
की सीमा (१,८०,००,००,००,०००) योजन है ।
कालाध्वनोनृमानं यत्तदप्रांगाग्नि (३६०) ताड़ितम्
दिव्यमानं भवेत्तेन व्यासोऽस्य शतकोटिभिः । ११७ ।
मनुष्य के काल और मार्ग मान को ३६० से गुणा करने पर दिव्य काल और
दूरी का मान होता है । दिव्य मान से सौ कोटि योजन
योजनैः सम्मितोऽण्डस्य नृमाने नासुकः पुनः
ख ख खा भ्रा भ्र खा प्रषड् वह्नि भि (३,६०,००,००,००,०००) योजनंमतः । ११८ ।
ब्रह्माण्ड का व्यास है । अतः मनुष्य मान से ब्रह्माण्ड का व्यास
३,६०,००,००,००,००० योजन है ।
ब्रह्माण्डान्त ख कक्षार्क भगण किरण ध्वस्त विभक्त मिस्त्रा
लक्षाघ्ना प्राङ्ग भूम्ननवखगुणशिखै (११,३०,९७,६०,००,०००)
योजनैः सम्मितास्मात्
सेक्षाकक्षैव भानो रवि तनु विकला द्वादशांशोऽपि दृश्यो
ऽन्येषां लिप्ता द्विसप्तां (७२) शक इतर मतव्यञ्जकं वच्मिकिञ्चित् । ११९ ।
जहां पर सूर्य और तारों द्वारा प्रकाश का नाश नहीं हो पाता है । ब्रह्माण्ड
में उस आकाश की कक्षा परिणाम ११,३०,९७,६० ,००,००० योजन है । इसको
सूर्य की दर्शन कक्षा भी कहा जा सकता है । इतनी दूरी पर सूर्य बिम्ब १/१२
विलिप्ता अर्थात् ५ प्रति विकला होता है । अन्य ग्रहों का बिम्ब लिप्ता का १/७२
अंश दीखता है । यहां मैं इससे भिन्न मत भी कुछ कहूंगा ।
श्रीमान् भास्कर दुष्करांक घटना विष्कार वाचस्पते
त्वं चेत् पुष्कर मात्थ भास्कर, कराव स्कन्दितान्तस्तमः
कल्पाद् भूत न भोग भुक्त सरणी तुल्यात्म कक्षं तदा
किं ब्रूमो गुरु वर्ग दुर्घटनया निर्विघ्नचित्ता वयम् । १२० ।
श्री भास्कराचार्य ! आपने कहा है कि सूर्य किरण द्वारा अन्धकार दूर होने के
बाद जहां से काला आरम्भ होता है, वही आकाश कक्षा है । इतना ही योजन
आप के आविष्कार के अनुसार ग्रह एक कल्प में चलते हैं । आपके समान विज्ञ
व्यक्ति यदि ऐसा कहता है, तो हम लोग विषाद् ग्रस्त होकर और क्या कहेंगे ।
स्वकक्षायां खेट भ्रमण गण भुक्ता प्रसरणी
यदि स्याद् ब्रह्माण्डोदर परिमिता का हनितदा