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सर्वकोश
सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)

सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)

Siddhanta Darpana of Mahamahopadhyaya Samanta Chandrasekhara

सामन्त चन्द्रशेखर सिंह (सम्पादक: प्रो. योगेशचन्द्र राय) द्वारा

DevanagariHindipublished609 पृष्ठ

पृष्ठ 428, कुल 609 में से

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पृष्ठ 428

भूगोल खगोल वर्णनम् ३३१
आमेघ तल भूमानं स्यात्तन्नृघ्नं प्रभाहृतम्
घनोन्नत्यमिति ज्ञेय मन्यन्त्रैराशिक क्रमात् । ८५ ।
मेघ कर्ण से मेघ तल तक भूमि पर दूरी होगी । इस दूरी को शंकु से गुणा
कर शंकुछाया से भाग देने पर भूमि से मेघ की ऊंचाई होगी । इसी प्रकार त्रैराशिक
गणित द्वारा अन्य (प्रसाद आदि की) भी ऊंचाई निकाली जा सकती है ।
अष्टादश प्रकाशोक्त दृष्टि सीमादि विस्तरात्
विशेषः कथ्यते कश्चिद् गोलता ज्ञापकः क्षिते । ८६ ।
अठारहवें अध्याय में दृष्टि सीमा की दूरी का वर्णन किया गया था । यहां
कुछ और कहा जा रहा है, जिससे पृथिवी का गोलाकार और स्पष्ट हो जायेगा ।
शंकु दर्शन सीमायां परितो मण्डलाकृतिः
भूपृष्ठे साधिता सैव निजक्षितिज मण्डलम् । ८७ ।
भू पृष्ठ के चारों ओर वृत्ताकार में जो शंकु के दर्शन सीमा से निकाली गयी
है । उसी को शंकु का दृश्य क्षितिज मण्डल कहा जाता है ।
तिष्ठताभूविदूरत्वाद यः पुंसा नैव दृश्यते
उच्चस्थानाधिरूढेन स पुनर्द्दश्यते नगः । ८८ ।
जो पर्वत बहुत दूरी के कारण पृथिवी की सतह से नहीं दीखता है वही पर्वत
ऊंचे स्थान पर चढ़ने से दिखाई देता है ।
अन्योन्य विप्रकृष्टाग द्वय क्षितिज वृत्तयोः
यावत् स्यान्मेलनं तावद् दृश्यते भुवि तद् द्वयम् । ८९ ।
दूर पर स्थित दो पर्वतों की दृष्टि सीमा के व्यासार्द्ध से दो क्षितिज वृत्त बनाया
जायेगा । दोनों वृत्तों के मिलन स्थल में स्थित व्यक्ति को दोनों पर्वत दीखेगा ।
यत् शंकोः क्षितिजस्थेन यावान्यंशोऽन्यशंकुतः
पुरतो दृश्यते तावान् स्तदग्रे तिष्ठता यतः । ९० ।
एक पर्वत (शंकु) के क्षितिज (वृत्त के सीमा विन्दु पर) रहने से दूसरे शंकु
का कुछ अंश (चोटी से कुछ नीचे तक) दीखेगा ।
क्षितिजेदृश्य लिप्ताद्याः क्षितिजान्य नरान्तरा
गुणिताः शंकु युग्मान्त मार्गाप्ताः स्युर्नरि स्फुटाः । ९१ ।
क्षितिज से स्थित व्यक्ति को दूसरे शंकु का जितना भाग (कला में ) दीखता
है उसे दोनों शंकु के अन्तर (ऊंचाई के अन्तर) से गुणा कर उनके बीच की दूरी
से भाग देने पर शंकु अग्र की स्फुट दृश्यलिप्ता आदि होगी ।
तयोरति दवीयस्त्वान्न लगेत् क्षितिजद्वयम्
तयोरेकाग्र निष्ठेन नान्यः सन्दृश्यते क्वचित् । ९२ ।