सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)
Siddhanta Darpana of Mahamahopadhyaya Samanta Chandrasekhara
सामन्त चन्द्रशेखर सिंह (सम्पादक: प्रो. योगेशचन्द्र राय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३३२ सिद्धान्त दर्पण
यदि दो पर्वतों का दृष्टि क्षितिज नहीं मिलता है, तो एक क्षितिज की सीमा
से भी दूसरा पर्वत नहीं दिखायी देगा।
महाद्रिक्षितिजस्यान्तः क्षुद्रादि क्षितिजं यदि।
लीयते तन्महागस्थः क्षुद्रं कौलीन मीक्षते । ९३ ।
बड़े पर्वत के क्षितिज के भीतर ही यदि छोटे पर्वत का क्षितिज वृत्त हो तो
बड़े वृत्त की सीमा से देखने पर सिर्फ बड़ा पर्वत दिखाई देगा। छोटा पर्वत बीच
में रहने पर भी नहीं दीखेगा। वह पृथ्वी में लीन हुआ दीखेगा।
उभयक्षितिजस्पर्शाद् यदि स्यान्मत्स्य रेखिका ।
तदाप्ययतनुं पश्येद् व्योमगं क्षितिजो परि । ९४ ।
बड़े और छोटे पर्वत की क्षितिज वृत्त रेखा स्पर्श करती हो तो स्पर्श रेखा पर
रहकर देखने से बड़ा पर्वत आकाश में ऊंचा दीखता है।
भू पृष्ठं यदि तुल्यं स्याद्दर्पणे च दरत्तदा
उच्चेऽनुच्चोऽपि दूरस्थो दृश्य क्षित्यन्तरेव सः । ९५ ।
भूमि पृष्ठ यदि दर्पण के समान समतल होता तो थोड़ी ऊंचाई पर स्थित होकर
भी कोई दूर के छोटे छोटे पर्वत पृथ्वी की सतह से लगा हुआ देखता ।
यद् गोलता स्फुटा साक्षाद् गिरेः क्षितिज मण्डले ।
यथा तथैव शिखरे ज्योतिश्चक्रस्य दर्शनात् । ९६ ।
पर्वत के क्षितिजवृत्त पर पृथ्वी का गोलाकार स्पष्ट दीखता है। पर्वत शिखर
पर रहकर ऊपर की तरफ देखने से ज्योति चक्र (राशि वृत्तं) की गोलाई स्पष्ट
दीखती है।
प्राक् पश्चाद् दृष्टि सीमोत्थ देशान्तर पलै रविः
उदेति पुरतः पश्चादस्तमेति नगोपरि । ९७ ।
पर्वत के ऊपर स्थित व्यक्ति पर्वत के नीचे भाग पर स्थित व्यक्ति से देशान्तर
लिप्तादि पहले सूर्योदय देखता है। तथा बाद में सूर्यास्त देखता है।
तिष्ठतः समभूस्थल्यां सांघ्रि हस्तत्रयोन्नतेः
पश्यतो नव साहस्र हस्तैः क्षितिज निश्चयात् । ९८ ।
साढ़े तीन हाथ ऊंचा व्यक्ति समतल पर जो क्षितिज देखता उसकी दूरी अपने
स्थान से ९००० हाथ है।
तद्देशान्तर कालस्तु पलोनत्वात् न गण्यते
नव्य वहिय तेचाद्रौ दृक् सिद्धेऽपि क्षणाधिकः । ९९ ।
पर्वत के ऊपर और नीचे के क्षितिज में समय का अन्तर यदि एक पल से
कम हो तो उसकी गणना नहीं होती है। यह दृक् सिद्ध होने पर भी ग्रहण में