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सर्वकोश
सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)

सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)

Siddhanta Darpana of Mahamahopadhyaya Samanta Chandrasekhara

सामन्त चन्द्रशेखर सिंह (सम्पादक: प्रो. योगेशचन्द्र राय) द्वारा

DevanagariHindipublished609 पृष्ठ

पृष्ठ 420, कुल 609 में से

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पृष्ठ 420

भूगोल खगोल वर्णनम् ३२३
स्वतुंगा कर्षण वशात् कक्षा केन्द्रान्नभः सदाम्
कर्णस्योनाधिकत्वेऽपि समैव प्राग् गतिर्भवेत् । ३० ।
अपने उच्च आकर्षण के कारण ग्रह अपनी कक्षा से ऊपर नीचे होने पर भी
उसकी पूर्व दिशा में योजन गति समान ही रहती है । कर्ण कम या अधिक होने
पर भी पूर्व दिशा में योजनात्मक गति या कलात्मक गति (अपनी कक्षा के अनुपात
में ) समान होती है ।
विक्षिप्तानां स्वकैः पातैः सौम्य याम्य गतिः पुनः
न्यूनाधिकाद् भवेत्येषां मन्दकर्णानुसारतः । ३१ ।
अपने अपने पात द्वारा क्रान्ति वृत्त से उत्तर या दक्षिण दिशा में (शर) गति
ग्रहों के अपने मन्द कर्ण के अनुपात के अनुसार होती है ।
'भूरिन्दु सौम्य शुक्रार्क कुजेज्यार्कि भवृत्तकैः
क्रमायतै वृतेत्युक्तिः प्राच्यां दृष्टि विरोधिनी । ३२ ।
पृथ्वी के चारों ओर क्रमशः बड़ी कक्षाओं में चन्द्र, बुध, शुक्र, रवि, मंगल,
वृहस्पति, तथा शनि हैं,- ऐसा प्राचीन आचार्यों ने कहा है, पर यह दृक् सिद्ध
नहीं है ।
यत्तदुक्ता नभः कक्षा स्वकल्पभगणो दृता
लब्धाभिर्ग्रहकक्षाभिः सिद्धाभिर नुपाततः । ३३ ।
ऊपर जो ग्रहों की कक्षा का योजनात्मक मान कहा गया उसमें ग्रह के कल्प
भगण (अपूर्ण भगण अंश) से भाग देने पर अपनी कक्षा में कितना योजन ग्रहने
पार किया है और अनुपात द्वारा प्राप्त होगा ।
वेष्टिते लिखिते विन्दौ भूमि नाम्नि विपश्चिता
स्व स्व कक्षा सु तुल्याया नान्यायां प्राग्गतौ पुनः । ३४ ।
इस प्रकार ग्रह के कक्षा वृत्त खींचकर उनके केन्द्र बिन्दु को 'भू' नाम देकर
अपनी अपनी कक्षा में ग्रह की स्थिति और उसकी पूर्व गति लिखेंगे ।
शीघ्रोच्चा कर्षणोद् भूत दोः फलाग्रस्थितद् ग्रहः
भूतारास्य च सूत्रस्थश्चक्रार्द्ध नैति वक्रताम् । ३५ ।
इस स्थिति में शीघ्रोच्च आकर्षण के कारण जो भुजफल (शीघ्रफल ) होगा
उसके आगे (उतनी दूरी पर) ग्रह को रखेंगे । पृथ्वी, एक तारा (ग्रह की उस
स्थित के पास नक्षत्र) तथा ग्रह इन तीनों को एक सूत्र में देखेंगे । इसमें देखेंगे
कि चक्रार्द्ध में (उच्च से १८०° या नीच पर) ग्रह वक्र दीखता है या नहीं ।
तदस्मदुक्त मार्गस्थाः क्रमाल्पगतयोऽर्कतः
सूर्यर्क्षसूत्रगाः क्ष्मर्क्ष सूत्रात् स्युर्वक्रिणाः खगाः । ३६ ।