सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)
Siddhanta Darpana of Mahamahopadhyaya Samanta Chandrasekhara
सामन्त चन्द्रशेखर सिंह (सम्पादक: प्रो. योगेशचन्द्र राय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभूगोल खगोल वर्णनम् ३२९
उच्चस्थान में स्थित दीप से किसी दिशा में समधरातल पर सम शंकु रख
कर उसकी छाया नाप लेंगे ।
शंकुमन्यं कियद्दूरे निवेश्यान्तर मेतयोः
द्वितीय शंकु भायुक्तं प्रथम प्रभयोज्झितम् । ७२ ।
उसी दिशा में उतना ही ऊंचा एक और शंकु रखर उसकी छाया भी नाप
कर दोनों शंकु के बीच की दूरी भी नापते हैं । उसमें दूसरे शंकु छाया जोड़कर
पहली छाया घटाते हैं ।
पुनस्तयाघ्नं विभजे छाययोरन्तरांगुलैः
लब्धं प्राक् शंकुभा हीनं भवेद्दीप तलस्थलात् । ७३ ।
फल को प्रथम शंकु छाया से गुणा कर उसको घटाने पर दीप मूल से प्रथम
शंकु की दूरी होगी ।
आपूर्व शंकु भूमान मथ लब्धं पुरोदितम्
शंकुघ्न प्रथमच्छाया भक्तं दीपोन्नति र्भवेत् । ७४ ।
भूमान निकालने से पहले जो लब्धि आयी थी उसे शंकु की ऊंचाई से गुणा
कर प्रथम शंकु की छाया से भाग देने पर दीप की उन्नता होगी ।
शंकु दीपान्तरं शंकु गुणितं छाययोद्धृतम्
शकुमानयुतम् दीपोन्नतिः स्यादेक शंकुतः । ७५ ।
शंकु और दीप के बीच की दूरी को शंकु से गुणा कर छाया से भाग देने पर
तथा उसमें शंकु की उन्नता जोड़ने पर दीप की उन्नता होगी ।
आक्रोश पर्वताद् यत्र शृंगतस्य विलोक्यते
तत्र तत्सम सूत्रस्थौ शतदण्डाधिकान्तरौ । ७६ ।
जहां पर एक कोस तक के क्षेत्र से पर्वत का शृंग (चोटी) दीखती है । वहां
शृंग से एक सरल रेखा (सम सूत्र) में परस्पर १०० दण्ड से अधिक दूरी पर
पञ्चहस्तोच्छितौ शंकु निवेशा वक्रितौ दृढम् ।
नवशंक्वग्रयोः साम्यं दृष्ट्वा दर्शे भुवस्थिते । ७७ ।
५ हाथ ऊंचा दृढ़ और सीधा शंकु स्थापित करेंगे । तब पृथ्वी की सतह पर
उसी रेखा में (सम सूत्र) एक दर्पण इस प्रकार रखेंगे जिससे उस दर्पण में पर्वत
(शृंग) और शंकु का अग्रभाग एक विन्दु पर दीखे ।
तद् भागे यत्र निश्चित्य द्विन्मान्मागौच्छ्यौ तथा
दवीयसी गिरौ मार्गैऽनुमिते त्येक शंकुना । ७८ ।
दर्पण स्थिति से दोनों शंकु का छायाग्र भाग स्थिर कर जिस प्रकार दीप की
उन्नता तथा दूरी ज्ञात हुई थी उसी प्रकार पर्वत शृंग की उन्नता तथा दूरी भी ज्ञात