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सर्वकोश
सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)

सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)

Siddhanta Darpana of Mahamahopadhyaya Samanta Chandrasekhara

सामन्त चन्द्रशेखर सिंह (सम्पादक: प्रो. योगेशचन्द्र राय) द्वारा

DevanagariHindipublished609 पृष्ठ

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पृष्ठ 424

भूगोल खगोल वर्णनम् ३२७
अधिकं दृश्यते यावद् भौमेज्य रविजन्मनाम्
यावन्न्यूनञ्च तद् बाहु फलान्तर कलायतः । ५७ ।
अधिक होता है तथा मंगल, गुरु शनि का शीघ्र फल कम दीखता है । तो
उन दोनों भुज (रवि नक्षत्र दिशा तथा भूनक्षत्रदिशा) के अन्तर कला
फलं खाङ्गाग्न्यंश (३६०) तुल्या भकक्षा तादृशोततः
दस्राद्येत्यतर भानान्तु न सीमा निश्चिता स्थिते । ५८ ।
३६० कला होने के कारण भ (नक्षत्र) कक्षा को रवि कक्षा से ३६० गुणा माना
गया है । अश्विनी आदि नक्षत्रों के अतिरिक्त अन्य नक्षत्रों की स्थिति सीमा अभी
तक ज्ञात नहीं है ।
बिम्ब ज्ञानात् पुष्पवतोः स्वकर्णः परिचीयते
स्वकर्ण वर्गत भर्नां ज्ञायन्ते मण्डलान्यपि । ५९ ।
सूर्य और चन्द्र की बिम्ब ज्ञान होने से कर्ण ज्ञान होता है । नक्षत्रों का कर्ण
ज्ञात होने से उनका बिम्ब ज्ञान होता है ।
बिम्बात्म चक्षुषोर्मध्यस्थिताच्छादन पट्टका
बिम्बव्यास समायत्र दृश्यान्यस्यात्र निश्चला । ६० ।
नक्षत्र बिम्ब और अपने आंख के बीच आवरण पट्टिका जितनी दूरी पर रखने
से वह जिम्ब व्यास के समान दीखे वह दूरी स्थिर करनी होगी ।
पट्टिकाक्ष्यन्तरं बिम्बव्यास निघ्नं तयोद्धृतम्
रवीन्दु कर्णमानं स्यात् कर्णाद् बिम्बोऽपि सिद्धयते । ६१ ।
पट्टी और आंख के बीच के दूरी को बिम्ब व्यास से गुणा कर पट्टी व्यास
से भाग देने पर रवि और चन्द्र कर्ण मान आयेगा । इसके उल्टे अनुपात द्वारा
कर्ण से बिम्ब निकाला जा सकता है ।
किं वोदयास्त मययोः प्राक् पश्चात् कुड्ययो गृहे ।
तद् वातायन माच्छाद्य तालपर्णेन तत्र च । ६२ ।
अथवा सूर्य उदय या अस्त के समय पूर्व या पश्चिम खिड़की को ताल पत्र
से ढंक कर-
विधाय वर्तुलं सूक्ष्मं छिद्रं तेनाध्वना गतः
अतपोऽपरभित्थ्यो यो बिम्बाकार ईक्ष्यते । ६३ ।
उस में सूक्ष्म छिद्र करने पर दूसरे तरफ की दीवाल में उस छेद से प्रकाश
जाने के कारण बिम्ब आकार का आकाश दीखता है ।
तद् व्यास छिद्रमानोनो हार कुड्य विलान्तरम्
बिम्ब मानाहतं हारं भक्तं कर्णः स्फुटो भवेत् । ६४ ।