सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)
Siddhanta Darpana of Mahamahopadhyaya Samanta Chandrasekhara
सामन्त चन्द्रशेखर सिंह (सम्पादक: प्रो. योगेशचन्द्र राय) द्वारा
पृष्ठ 432, कुल 609 में से
संदर्भ में पढ़ेंभूगोल खगोल वर्णनम् ३३५
सौरादिवर्ष का अधिपति, मास का अधिपति (सौर) और चान्द्रदिन का
अधिपति वर्षारम्भ काल से होगा ।
प्रोक्तं चान्द्रार्क्षतः सूर्य तेजः शत गुणाधिकम्
दिग् (१०) गुणव्यासतः क्षेत्र फलं शत गुणं भवेत् । १०९ ।
शास्त्रों ने कहा है कि सूर्य का तेज चन्द्र और नक्षत्रों के तेज से १०० गुणा
अधिक है । व्यास १० गुणा होने पर वृत्त का क्षेत्रफल १०० गुणा होता है ।
स्यात्तेजः प्रसरः क्षेत्रफलानुक्रमतो यतः
तद् व्यास दशमांश स्य दृश्य स्याशा गुणे पथि । ११०
तेज का प्रसार क्षेत्रफल के अनुसार होता है । अतः किसी व्यास के दशमांश
द्वारा जितना प्रकाश किसी दूरी पर होगा, पूर्ण व्यास का उतना ही तेज १० गुणा
दूरी पर होगा ।
शतांशस्तेजसोल्लभ्य इतितन्निर्णये स्थिते
द्विसहस्र गुणेदूरे स्वव्यासात्तिग्म दृश्यते । १११ ।
१० गुणा दूरी पर तेज १/१० भाग हो जाता है । अतः सूर्यव्यास से (२,०००)
गुणा दूरी पर सूर्य किरण
उष्ण स्पर्श समाप्तिः स्यात् किरणानानभस्तले
अन्य ग्रहाणा मृक्षाणां शतद्वय गुणे पथि । ११२ ।
की गर्मी प्रायः समाप्त हो जाती है । अतः अन्य ग्रहनक्षत्रों का तेज भी अपने
व्यास से २०० गुणा दूरी पर समाप्त हो जाता है । (क्योंकि उनका तेज सूर्य तेज
का १/१०० है)
शीतोष्ण स्पर्श नाशः स्यात्तथा भौमस्य तेजस
स्पर्शान्ति स्थानतः खां शुव्याप्ति, पञ्चाशता गुणैः । ११३ ।
इसी प्रकार पृथ्वी के तेज की गर्मी भी व्यास से २०० गुणा दूरी पर समाप्त
हो जाती है । किरण की उज्ज्वलता अपने व्यास से ५०० गुणा दूरी तक होती है ।
अधिकाकिरण व्याप्ते मार्गे तत्व (२५) गुणाधिके
दृष्टि सीमेत्यनुमितं दीपार्केन्द्वनुभूतितः । ११४ ।
किरण व्याप्ति की सीमा और २५ गुणा दूरी तक होती है । दृष्टि सीमा का
अनुमान मैने दीप, रवि और चन्द्र के अनुभव से किया है ।
व्यासो हि सूर्य बिम्बस्य ख ख खाक्ष्याद्रि योजनः (७२,०००)
स्पर्श कर्ण तदुष्णाणां प्रयुतघ्नाब्धि वासवाः (१४,४०,००,०००) । ११५ ।
सूर्य बिम्ब का व्यास (७२,०००) योजन है । अतः उसकी गर्मी सीमा कर्ण
(दूरी) १४,४०,००,०००) योजन है ।