श्री हनुमान चालीसा, संकटमोचन हनुमानाष्टक एवं बजरंग बाण (महावीरी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Shri Hanuman Chalisa with Mahaviri Commentary
गोस्वामी तुलसीदास (व्याख्याकार: स्वामी रामचन्द्रदास 'महावीर') द्वारा
महावीरी व्याख्या चौ. १०: भीम रूप धरि असुर सँहारे
सनमुख होइ जीव मोहि जबहीं।
जन्म कोटि अघ नासहिं तबहीं॥
—रा.च.मा. ५-४४-२
श्रीरघुनाथजी समस्त प्राणिमात्रके सम्मुख होकर भी, यथा—सन्मुख
सब की ओर (रा.च.मा. ३-१२), जीवकी सम्मुखताके बिना उसका
कल्याण नहीं कर सकते। अतः गोस्वामीजी यह अनुरोध करते हैं कि अनादि
कालसे भगवत्पाद-पद्म-विमुख इस जड़ जीवको श्रीमन्मारुतिके बिना कौन
श्रीराम-सम्मुख कर सकता है? यथा—
आते आञ्जनेय न जो व्याकुल धरा पै आज
क्षुधित जनों को भक्ति-अमिय पिलाता कौन।
कौन दर्शाता रामधाम का पवित्र पंथ
राम-नाम-मञ्जु-मणिदीपक जलाता कौन।
कौन सरसाता उर-भाव-सरसीरुह को
राम-प्रेम मधुर सुमोदक खिलाता कौन।
राम-गुण गायक बनाता कौन गिरिधर को
मुझ-से पतित को पथ सुमति दिलाता कौन॥
आते आञ्जनेय जो न अमल अवनि पै आज
वैष्णवों की विजय-वैजयन्ती फहराता कौन।
कौन लाँघ जाता शतयोजन पयोनिधि को
मैथिली का विरह-दवानल बुझाता कौन।
कौन लिपटाता रघुबीर-पद-पङ्कज में
राजीव-नयन के नयन-नीर से नहाता कौन।
साधन-विहीन दृगहीन मूढ़ गिरिधर को
मानस-मन्दाकिनी में मज्जन कराता कौन॥
३७
चौ. १०: भीम रूप धरि असुर सँहारे महावीरी व्याख्या
इस प्रकार स्पष्ट है कि आञ्जनेयका चरित्र श्रीराघवजीकी लीलाका शृङ्गार
है और यही सँवारे पदका स्वारस्य है। यथा—काज महाराज के समाज
सब साजे हैं (ह.बा. १५) और सकल समाज-साज साजे रघुबर के
(ह.बा. ३३)।
३८
महावीरी व्याख्या चौ. ११: लाय सँजीवनी लखन जियाये
॥ श्रीराम ॥
मूल (चौपाई)—
लाय सँजीवनी लखन जियाये।
श्रीरघुबीर हरषि उर लाये॥ ११ ॥
शब्दार्थ—सँजीवनी ▸ द्रोणाचलसे लाई हुई मृतसंजीवनी।
अर्थ—हे पवननन्दन! आपने द्रोणाचलसे मृतसंजीवनी ले आकर
श्रीलक्ष्मणको जिलाया तथा रघुवीर रामभद्रजूने प्रसन्नतासे आपको अपने
हृदयसे लगा लिया।
व्याख्या—कालके विजेता मेघनादने कालस्वरूप श्रीलक्ष्मणको
वीरघातिनी शक्तिसे मूर्च्छित किया। अनन्तर करालं महाकालकालं
कृपालं (रा.च.मा. ७-१०८-२) श्रीहनुमान्जी मूर्च्छित कालको कालातीत
श्रीराघवके पास ले आए तथा उन्होंने सुषेणके निर्देशानुसार संजीवनी ले
आकर श्रीलक्ष्मणको प्राणदान दिया एवं श्रीराघवके मङ्गलमय परिष्वङ्गका
अनुभव किया। यथा—
हरषि राम भेंटेउ हनुमाना।
अति कृतज्ञ प्रभु परम सुजाना॥
—रा.च.मा. ६-६२-१
३९
चौ. १२: रघुपति कीन्ही बहुत बड़ाई महावीरी व्याख्या
॥ श्रीराम ॥
मूल (चौपाई)—
रघुपति कीन्ही बहुत बड़ाई।
तुम मम प्रिय भरतहिं सम भाई ॥ १२ ॥
शब्दार्थ—रघुपति ▸ रघुवंशके स्वामी, अथवा रघु अर्थात् जीवमात्रके
स्वामी श्रीराम। लङ्घन्ते पापपुण्यानि ये ते रघवो जीवास्तेषां पतिः इति
रघुपतिः।
अर्थ—रघुकुलके स्वामी तथा समस्त प्राणिमात्रके ईश्वर श्रीरामचन्द्रजीने
आपकी बड़ी प्रशंसा की और कहा कि तुम मुझे भाई भरतके समान प्रिय
हो।
व्याख्या—भाई शब्दका अन्वय भरतहि शब्दके साथ ही उचित
होगा, अर्थात् ‘भाई भरतके समान तुम मुझे प्रिय हो’। हनुमान्जीके साथ
भाई शब्दका अन्वय करनेसे सुनु सुत तोहि उरिन मैं नाहीं (रा.च.मा.
५-३२-७)—इस अर्धालीकी एकवाक्यता नहीं संगत होगी क्योंकि यहाँ
श्रीराघवने आञ्जनेयको पुत्र कहा। ध्यान रहे कि श्रीलक्ष्मणसे श्रीहनुमान्जीका
इतना वैशिष्ट्य अवश्य है कि श्रीरघुनाथजी श्रीलक्ष्मणजीको भाई तथा पुत्र
दोनों मानते हैं। भाई, यथा—अस जिय जानि सुनहु सिख भाई (रा.च.मा.
२-७१-१)। पुत्र, यथा—अब अपलोक शोक सुत तोरा (रा.च.मा. ६-६१-
१३)। पर हनुमान्जीको केवल पुत्र-रूपमें ही स्वीकारते हैं, यथा—सिय-
सुखदायक दुलारो रघुनायक को (ह.बा. १०)।
४०
महावीरी व्याख्या चौ. १३: सहसबदन तुम्हरो जस गावैं
॥ श्रीराम ॥
मूल (चौपाई)—
सहसबदन तुम्हरो जस गावैं।
अस कहि श्रीपति कंठ लगावैं॥ १३ ॥
शब्दार्थ—सहसबदन ▸ शेष। श्रीपति ▸ सीतापति श्रीराम।
अर्थ—सहस्र मुख वाले शेष तुम्हारा यश गाते हैं तथा गाते रहेंगे। ऐसा
कहकर श्रीसीताके पति श्रीराम हनुमान्जीको बार-बार गलेसे लगा रहे हैं।
व्याख्या—श्रीहनुमान्जीकी यह ध्यान-झाँकी श्रीलक्ष्मण-मूर्च्छा-
समाप्तिके पश्चात्-कालकी है। श्रीलक्ष्मणजीको मूर्च्छामुक्त देखकर उन्मुक्त
कण्ठसे प्रशंसा कर श्रीराघवजीने हनुमान्जीको गलेसे लगा लिया।
सहसबदन यहाँ श्रीलक्ष्मणजीके लिए अभिप्रेत है। यथा—
शेष सहस्र शीष जग कारन।
जो अवतरेउ भूमि भय दारन॥
—रा.च.मा. १-१७-७
भाव यह है कि आञ्जनेय! तुम्हारे इस परम पावन यशको सहस्रमुख
शेषावतार श्रीलक्ष्मण भी गाते रहेंगे, क्योंकि रणशय्यापर शान्त हुए अनन्तको
भी तुमने जीवनदान दिया।
४१
चौ. १४: सनकादिक ब्रह्मादि मुनीशा महावीरी व्याख्या
॥ श्रीराम ॥
मूल (चौपाई)—
सनकादिक ब्रह्मादि मुनीशा।
नारद सारद सहित अहीशा ॥ १४ ॥
शब्दार्थ—सनकादिक ▸ सनक, सनन्दन, सनातन, एवं सनत्कुमार
(ये चार ब्रह्माजीके प्रथम ऊर्ध्वरेता पुत्र हैं)।
अर्थ—श्रीराघव प्रशंसाके शब्दोंमें कह रहे हैं, “हे वत्स! तुम्हारे इस
परम पावन यशको न केवल शेष अपितु सनकादिक ऊर्ध्वरेता ऋषि, ब्रह्मादि
देवगण, मुनियोंमें श्रेष्ठ भगवान् नारद, और सरस्वतीके सहित अहीश्वर
(विष्णु व शंकर) भी गाते रहेंगे।”
व्याख्या—इस चौपाईमें भी पूर्व क्रिया गावैँका अन्वय होगा। भाव
यह है कि तुम्हारा लक्ष्मण-जीवनदान-रूप परम पावन यश त्रिलोकविदित
हो जाएगा। अतः पातालमें शेष, मर्त्यलोकमें सनकादि एवं नारद, तथा
स्वर्गलोकमें ब्रह्मादि, शारदा, एवं विष्णु तथा शंकर भी गाएँगे। पूर्वमें
शेषके लिए सहसबदन शब्दका प्रयोग हो चुका है। अतः यहाँ अहीशा
पद अहितल्पवासी विष्णु यद्वा अहिकौपीनधारी श्रीशिवका बोधक है।
यथा विष्णु—जौ अहि सेज शयन हरि करहीं (रा.च.मा. १-६९-५)।
शिव—जटा मुकुट अहि मौर सँवारा (रा.च.मा. १-९२-१), कुंडल
कंकन पहिरे ब्याला (रा.च.मा. १-९२-२), भुजग भूति भूषन त्रिपुरारी
(रा.च.मा. १-१०६-८) आदि।
४२
महावीरी व्याख्या चौ. १५: जम कुबेर दिगपाल जहाँ ते
॥ श्रीराम ॥
मूल (चौपाई)—
जम कुबेर दिगपाल जहाँ ते।
कबि कोबिद कहि सकें कहाँ ते॥ १५ ॥
शब्दार्थ—कोबिद (कोविद) ▸ वेदज्ञ। कोर्वेदस्य विदो वेत्ता कोविदः
परिकीर्तितः। को अर्थात् वेदका विद अर्थात् जाननेवाला। इस प्रकार
कोविद=वेदज्ञ।
अर्थ—यम, कुबेर आदि यावन्मात्र दिक्पाल हैं, वे भी तुम्हारा यह यश
गाते रहेंगे। इस अनन्त यशको सामान्य कवि एवं वेदज्ञ विद्वान् कहाँसे कह
सकते हैं?
व्याख्या—यहाँ जहाँ ते शब्दके साथ पूर्व क्रिया गावैंका अन्वय
होगा। श्रीहनुमन्-चालीसाकी प्रथम चौपाईसे लेकर दसवीं चौपाई तक
गोस्वामीजीने श्रीरामजीके वात्सल्य-भाजन श्रीआञ्जनेयके मङ्गलमय स्वरूप
तथा गुणका वर्णन किया। अनन्तर ग्यारहवीं चौपाईसे बीसवीं चौपाई तक
श्रीहनुमन्जीके श्रीराघव-यशोभूमिका रूप चारु चरित्रका वर्णन कर रहे
हैं। जिसमें ग्यारहवीं चौपाईसे पन्द्रहवीं चौपाई तक लक्ष्मणमूर्च्छा-प्रसंगमें
प्रस्तुतकी हुई हनुमान्जीकी महत्तम भूमिकाका वर्णन है। मानो यही पाँच
चौपाइयाँ पञ्चाक्षर महामन्त्रके तात्पर्यके रूपमें कही गई हैं।
लक्ष्मणमूर्च्छा-प्रसंगका दार्शनिक तात्पर्य बड़ा मनोरञ्जक तथा साभिप्राय
है। जैसे मेघनादकी शक्तिसे मूर्च्छित श्रीलक्ष्मणको आञ्जनेयजीने द्रोणाचलसे
संजीवनी लाकर जीवनदान दिया, उसी प्रकार आसक्ति-रूप वीरघातिनीसे
मूर्च्छित हम जीवोंको वैराग्यवान् सन्त रामनाम-रूप हनुमान्जी सद्गुरु
सुषेण वैद्यकी अनुमतिसे वेद-पुराण-रूप द्रोणाचलमें वर्तमान, रामभक्ति-
४३
चौ. १५: जम कुबेर दिगपाल जहाँ ते महावीरी व्याख्या
रूप संजीवनी ले आकर श्रीरामतत्त्व-रूप जीवनदान देते रहें, इसी उद्देश्यसे
श्रीहनुमान्-चालीसामें यह प्रसंग निबद्ध किया गया।
दिक्पाल आठ हैं (इन्द्र, ईशान, कुबेर, अग्नि, वरुण, वायु, यम, और
नैर्ऋत्य)।
४४
महावीरी व्याख्या चौ. १६: तुम उपकार सुग्रीवहिं कीन्हा
॥ श्रीराम ॥
मूल (चौपाई)—
तुम उपकार सुग्रीवहिं कीन्हा।
राम मिलाय राज-पद दीन्हा॥ १६ ॥
शब्दार्थ—उपकार ▸ भलाई।
अर्थ—आपने सुग्रीवका महान् उपकार किया तथा उन्हें श्रीरामजीका
दर्शन कराकर किष्किन्धाका साम्राज्य दे दिया।
व्याख्या—भाव यह है कि आपके बिना सुग्रीव कुछ भी नहीं कर पाते।
पहले उन्हें श्रीरामजीको देखकर भय हुआ, पर उन्होंने जब आपकी पीठपर
बैठे हुए श्रीरामजीको देखा तभी सम्यक् दर्शन हुआ। क्योंकि परमात्माका
सम्यक् दर्शन सन्त-दृष्टिके बिना संभव नहीं है। यथा—
तहँ रह सचिव सहित सुग्रीवा।
आवत देखि अतुल-बल-सींवा॥
अति सभीत कह सुनु हनुमाना।
पुरुष जुगल बल-रूप-निधाना॥
—रा.च.मा. ४-१-२,३
पश्चात् सम्यक् दर्शन—
जब सुग्रीव राम कहँ देखा।
अतिशय जन्म धन्य करि लेखा॥
—रा.च.मा. ४-४-६
राम मिलाय—श्रीरामजीसे मिलनेकी सुग्रीवमें कोई योग्यता नहीं थी,
पर आपने अपनी विशेष कृपाके आधारपर श्रीरामजीको सुग्रीवके पास ले
जाकर उन्हें कृतकृत्य किया। अतः आञ्जनेयको सुग्रीवदुःखैकबन्धु (वि.प.
४५
चौ. १६: तुम उपकार सुग्रीवहिं कीन्हा महावीरी व्याख्या
२७-२) कहा गया है।
राज-पद दीन्हा—भाव यह है कि आपने सुग्रीवको राजपद एवं रामपद
देकर मुक्ति तथा भुक्ति दोनोंका अधिकारी बना दिया है। वैसी ही कृपा हम
असमर्थ जीवोंपर भी करें।
४६
महावीरी व्याख्या चौ. १७: तुम्हरो मंत्र बिभीषन माना
॥ श्रीराम ॥
मूल (चौपाई)—
तुम्हरो मंत्र बिभीषन माना।
लंकेश्वर भए सब जग जाना॥ १७ ॥
शब्दार्थ—मंत्र ▸ भगवत्प्रपत्तिसिद्धान्त।
अर्थ—हे आञ्जनेय! विभीषणने आपके रामप्रेम-रूप मूलमन्त्रको
स्वीकारा। उसके परिणामस्वरूप वे लङ्काके कल्पान्त शासक स्वामी बन
गए। यह सारा संसार जानता है।
व्याख्या—विभीषणने लङ्कामें अपर रात्रिकालके प्रथम साक्षात्कारके
अनन्तर निराशा भरे स्वरमें आञ्जनेयसे कहा—
तात कबहुँ मोहि जानि अनाथा।
करिहैं कृपा भानुकुल-नाथा॥
—रा.च.मा. ५-७-२
अर्थात् भानुकुलनाथ श्रीरामने भानुपुत्र सुग्रीवपर कृपाकी क्योंकि वह उनके
कुलप्रवर्तकका पुत्र है, पर मुझमें कोई पात्रता नहीं है। श्रीआञ्जनेयने कहा,
“विभीषण! भगवत्स्मरण ही उनकी कृपाका एकमात्र असाधारण साधन
है।” यथा—
जानतहूँ अस स्वामि बिसारी।
फिरहिं ते काहे न होहिं दुखारी॥
—रा.च.मा. ५-८-१
इसी मन्त्रने विभीषणको लङ्केश्वर बना दिया। अथवा, श्रीहनुमान्जीने
विभीषणजीसे कहा, “विभीषण! पिताके बिना तुम अधूरे हो और माताके
बिना मैं अधूरा हूँ। तुम मुझे सीता माताके दर्शन करा दो और मैं तुम्हें पिता
४७
चौ. १७: तुम्हरो मंत्र बिभीषन माना महावीरी व्याख्या
श्रीरामके दर्शन करा दूँगा।" यथा—
तब हनुमंत कहा सुनु भ्राता।
देखी चहउँ जानकी माता॥
—रा.च.मा. ५-८-४
तब विभीषणने एक युक्ति बताई कि आप मेरा अर्थात् विभीषणका रूप
धारण करके अशोकवाटिकामें प्रवेश करें। आपको कोई भी राक्षस पहचान
नहीं सकेगा क्योंकि अशोकवाटिकामें मैं अर्थात् विभीषण तथा रावण ये दो
ही पुरुष जा सकते हैं। हनुमान्जीने वैसा ही किया—
जुगुति बिभीषन सकल सुनाई।
चलेउ पवनसुत बिदा कराई॥
धरि सोइ रूप गयउ पुनि तहवाँ।
बन अशोक सीता रह जहवाँ॥
—रा.च.मा. ५-८-५,६
विभीषणके इसी मन्त्रने (जिसे हनुमान्जीने माना) हनुमान्जीको सीताजीके
दर्शन करा दिये। उसके बदले हनुमान्जीने विभीषणको श्रीरामजीके दर्शन
कराकर उन्हें लङ्काधिपति बना दिया। इसीलिए गोस्वामीजीने कहा—जयति
भुवनैकभूषण विभीषणवरद (वि.प. २६-६)।
हनुमान्जीने सुग्रीव तथा विभीषण इन दो महानुभावोंको भगवान्से जोड़ा।
एकके यहाँ प्रभुको ले गए और एकको प्रभुके पास ले आए। सुग्रीवको
प्रभुका प्रभाव सुनाकर एवं विभीषणको प्रभुका स्वभाव समझाकर। उसी
प्रकार हम विषयी साधकोंको भी प्रभु-कृपाका अनुभव कराएँ।
४८
महावीरी व्याख्या चौ. १८: जुग सहस्र जोजन पर भानू
॥ श्रीराम ॥
मूल (चौपाई)—
जुग सहस्र जोजन पर भानू।
लील्यो ताहि मधुर फल जानू ॥ १८ ॥
शब्दार्थ—जुग सहस्र जोजन ‣ जुग अर्थात् अनेक हजार योजन।
भानू ‣ सूर्य।
अर्थ—हे केसरीकुमार! धरातलसे हजारों योजन किंवा अनेकों हजार
योजन दूर ऊपर वर्तमान सूर्यनारायणको आपने अपने जन्मके एक दिन
बाद मधुर फलकी भ्रान्तिसे निगल लिया था।
व्याख्या—युग शब्दका युगल-पर्याय होनेसे ‘दो-दो’ एवं ‘एकसे
अनेक’ अर्थ भी होता है। वस्तुतः संस्कृतमें शतसे ऊपरकी
संख्याएँ अनन्तवाचिका होती हैं। यथा—शताधिकाः समाः संख्या
गेयाश्चानन्त्यवाचिकाः। इस दृष्टिसे जुग सहस्र जोजन का अर्थ होगा
‘अगणित योजन’। यह घटना संभवतः कार्तिक कृष्ण अमावस्याकी है।
अमावस्याको ही अपनी सन्धिमें राहु सूर्यग्रहणकी परिस्थिति प्रस्तुत करता
है। श्रीहनुमन्जीका प्राकट्य कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी मङ्गलवारको प्रभात-
वेलामें मेष लग्न तथा स्वाति नक्षत्रमें श्रीअञ्जनाके गर्भसे हुआ था। यथा—
ऊर्जे कृष्णचतुर्दश्यां भौमे स्वात्यां कपीश्वरः।
मेषलग्नेऽञ्जनागर्भात्प्रादुर्भूतो स्वयं शिवः॥
—अ.सं.
वाल्मीकिके अनुसार सूर्यनारायणपर आञ्जनेयजीके आक्रमण ही की चर्चा
है तथा इन्द्रके द्वारा इनके वाम हनु (ठोड़ी) पर वज्रका प्रहार हुआ, पर उसमें
कोई विकृति नहीं आई। इसलिए प्राशस्त्य अर्थमें मतुप् प्रत्यय करके परम
४९
चौ. १८: जुग सहस्र जोजन पर भानू महावीर व्याख्या
पराक्रमी इन्द्रने इनका नाम हनुमान् रखा। कुछ लोग वामो हनुरभज्यत
(वा.रा. ४-६५-२२) का अर्थ करते हैं कि वामो हनुर्भग्नोऽभवत् अर्थात्
हनुमान्जीका 'वाम हनु किञ्चित् भङ्ग हो गया'। यह अर्थ उन्होंने भञ्ज धातुसे
(भञ्जोँ आमर्दने, धा.पा. १४५३) निष्पन्न अभज्यत शब्दके आधारपर
किया है। पर अभज्यत रूप भज् धातुसे (भजँ सेवायाम्, धा.पा. ९९८)
कर्मवाच्यमें लङ्लकारके प्रथमपुरुषके एकवचनमें भी निष्पन्न होता है।
अभज्यत असेव्यत सेवितोऽभवत्, अर्थात् इन्द्रके वज्रसे हनुमान्जीका वाम
हनु सेवित हुआ, टूटा नहीं, इसलिए इन वानरका आजसे हनुमान् नाम
विख्यात होगा। क्योंकि यदि श्रीहनुमान्का हनु टूट गया होता, तब हनुमान्
शब्दमें मतुप् प्रत्यय कैसे निष्पन्न होता? क्योंकि मतुप् प्रत्यय सत्ता और
प्रशंसा अर्थमें होता है—
भूमनिन्दाप्रशंसासु नित्ययोगेऽतिशायने।
सम्बन्धेऽस्तिविवक्षायां भवन्ति मतुबादयः ॥
—भा.पा.सू. ५-२-९४
भाष्यकारके उदाहरणोंके अनुसार निन्दा अर्थमें इनि प्रत्यय होता है, तथा
प्रशंसा अर्थमें मतुप् ही होता है। जैसे किसी निर्धनको धनवान् नहीं कहा
जा सकता, उसी प्रकार टूटे हुए हनु वाले व्यक्तिको हनुमान् कैसे कहा
जाएगा? विनयपत्रिकामें भी गोस्वामीजी इसी सिद्धान्तकी पुष्टि करते हैं,
यथा—जाकी चिबुक-चोट चूरन किए रद-मद कुलिश कठोर को
(वि.प. ३१-४)।
इस प्रकार स्पष्ट है कि वाल्मीकीय-रामायणके अनुसार हनुमान्जीने
सूर्यको निगला नहीं, पर हनुमान्-चालीसामें लील्यो ताहि मधुर फल
जानू कह रहे हैं। इस पक्षकी पुष्टि गोस्वामीजी विनयपत्रिकामें करते
हैं—चंडकर-मंडल-ग्रासकर्त्ता (वि.प. २५-२)। इस विरोधका समाधान
कल्पभेदसे हो जाता है। वाल्मीकि-कथामें हनुमान्जीने सूर्यनारायणको नहीं
५०
महावीरी व्याख्या चौ. १८: जुग सहस्र जोजन पर भानू
ग्रसा था, विनयपत्रिका तथा हनुमान्-चालीसाके घटना-कल्पमें ग्रस लिया
था। देवताओंकी विनतीपर छोड़ा। सूर्यनारायणको ग्रसना असंभव नहीं है
क्योंकि कार्य कारणमें विलीन होते हैं। अतः तेजस्तत्त्व-रूप सूर्य वायुतत्त्व-
रूप हनुमान्में विलीन हों, यह अत्यन्त उचित है।
विशेष—मनुष्योंका एक चतुर्युग—जिसमें संध्या और संध्यांश
सहित १२,००० देववर्ष होते हैं—देवोंका एक युग कहलाता है।
यथा—एतद्द्वादशसाहस्रं देवानां युगमुच्यते (म.स्मृ. १-७१)।¹ तदनुसार
यहाँ प्रयुक्त जुग (संस्कृत: युग) शब्द ‘देवयुग’ वैकल्पिक अर्थ ग्रहण
करनेपर १२,०००की संख्याका वाचक हुआ। सहस्र शब्द १,०००का
वाचक है ही और जोजन (संस्कृत: योजन) शब्द ८ मीलका परिमाण
है।² इस प्रकार जुग सहस्र जोजनका एक और अर्थ हुआ १२,०००
सहस्र योजन—अर्थात् १,२०,००,००० योजन अथवा ९,६०,००,००० मील।
संभवतः यह ज्योतिषविद् गोस्वामी तुलसीदासजीके द्वारा दी हुई पृथ्वीसे
सूर्यकी दूरीकी गणना है।³ ऐसा भी प्रतीत होता है कि खगोलीय दूरियोंके
मापनमें समयकी इकाई (युग)का सर्वप्रथम प्रयोग गोस्वामीजीने ही किया
है।⁴
¹ इस श्लोकपर अपने मनुभाष्यमें मेधातिथिने मनुष्योंके द्वादश सहस्र चतुर्युगोंको देवोंका एक
युग कहा है, पर कुल्लूकभट्टने इस अर्थका सप्रमाण खण्डन करते हुए द्वादश सहस्र देववर्षों अर्थात्
एक चतुर्युगको ही देवयुग सिद्ध किया है—संपादक।
² Vaman Shivram Apte (1985) [1890]. The Practical Sanskrit-English
Dictionary (4th ed.). Delhi: Motilal Banarsidass, p. 789: “A measure of
distance equal to four Krosas or eight or nine miles.”—संपादक।
³सन् २०१२में पारित अन्ताराष्ट्रिय खगोलीय सङ्घके बी-२ प्रस्ताव के अनुसार सूर्यकी पृथ्वीसे
औसत दूरी ९,२९,५५,८०७ मील है। इस आधुनिक वैज्ञानिक मानसे उपर्युक्त संभावित मान ३.३
प्रतिशत अधिक है—संपादक।
⁴ प्रकाश-वर्ष (light-year) इकाईके सर्वप्रथम प्रयोगका श्रेय जर्मनीके वैज्ञानिक फ्रीड्रिश
बेसेल (१७८४–१८४६)को दिया जाता है—संपादक।
५१
चौ. १९: प्रभु-मुद्रिका मेलि मुख माहीं महावीरी व्याख्या
॥ श्रीराम ॥
मूल (चौपाई)—
प्रभु-मुद्रिका मेलि मुख माहीं।
जलधि लाँघि गये अचरज नाहीं ॥ १९ ॥
शब्दार्थ—मेलि ▸ डालकर। जलधि ▸ समुद्र।
अर्थ—प्रभो! आप श्रीरामजीकी दी हुई रामनामाङ्कित मुद्रिकाको मुखमें
लेकर शतयोजन-विस्तीर्ण समुद्रको लाँघ गए, इसमें कोई आश्चर्य नहीं है।
व्याख्या—दो शरणागतियोंमें प्रधान भूमिकाका निर्देश कर हनुमान्जीमें
तारणत्व गुणका वर्णन किया। अब तरणत्वका वर्णन कर रहे हैं। अर्थात्
हनुमान्जी सुग्रीव एवं विभीषणको सागरसे तारकर स्वयं भी तर जाते हैं।
सुग्रीवके लिए नाम-सेतु तथा विभीषणके लिए कृपा-सेतुकी व्यवस्था करते
हैं, एवं स्वयं प्रभु-मुद्रिकाको मुखमें लेकर राम-नामामृत चूसते हुए कौतुकमें
समुद्रको पार करते हैं। यथा—
कौतुक सिंधु नाघि तव लंका।
आयउ कपि-केहरी अशंका॥
—रा.च.मा. ६-३६-४
५२
महावीरी व्याख्या चौ. २०: दुर्गम काज जगत के जे ते
॥ श्रीराम ॥
मूल (चौपाई)—
दुर्गम काज जगत के जे ते।
सुगम अनुग्रह तुम्हरे ते ते ॥ २० ॥
शब्दार्थ—दुर्गम ▸ कठिन। सुगम ▸ सरल। अनुग्रह ▸ कृपा।
अर्थ—हे महावीरजी! संसारके जितने भी कठिन-से-भी-कठिन कार्य
हैं, वे सब आपकी कृपासे सरल हो जाते हैं।
व्याख्या—क्योंकि आप सुग्रीव तथा विभीषणके लिए तारण एवं स्वयं
तरण हैं तथा जटिल-से-जटिल कार्य आपने किया है। यथा—
मन को अगम तन सुगम किये कपीश
काज महाराज के समाज साज साजे हैं।
देव बंदीछोर रनरोर केसरी-किसोर
जुग जुग जग तेरे बिरद बिराजे हैं।
बीर बरजोर घटि जोर तुलसी की ओर
सुनि सकुचाने साधु खल-गन गाजे हैं।
बिगरी सँवारि अँजनीकुमार कीजे मोहि
जैसे होत आये हनुमान के निवाजे हैं॥
—ह.बा. १५
यहाँ आञ्जनेयके चरित्र-वर्णनका उपसंहार करके अब कृपाकी
आवश्यकताका उपपादन करते हैं।
५३
चौ. २१: राम-दुआरे तुम रखवारे महावीरी व्याख्या
॥ श्रीराम ॥
मूल (चौपाई)—
राम-दुआरे तुम रखवारे।
होत न आज्ञा बिनु पैसारे ॥ २१ ॥
शब्दार्थ—पैसारे ▸ प्रवेश।
अर्थ—हे अञ्जनीपुत्र! आप श्रीरामभद्रजूके राजद्वारके रक्षक, प्रतिहार,
द्वारपाल हैं। आपकी आज्ञाके बिना किसीका भी श्रीरामजीके परमधाममें
प्रवेश नहीं हो सकता।
व्याख्या—श्रीरामोपासनामें श्रीहनुमान्जीकी कृपा परम उपादेय है
क्योंकि ये ही राजाधिराजके जागरूक द्वारपाल हैं। इनकी प्रतिकूलतामें
जीवको श्रीराघवका आनुकूल्य नहीं प्राप्त हो सकता। अन्यत्र द्वारपाल
स्वामीकी आज्ञासे आगन्तुकको भवनमें प्रविष्ट करता है, पर यहाँ तो स्वामी
एवं सेवककी इतनी एकता है कि आञ्जनेयकी आज्ञा ही सर्वोपरि हो जाती
है। सुग्रीव एवं विभीषणकी शरणागतिमें प्रभुसे बिना पूछे ही इन्होंने दोनोंको
प्रवेशपत्र दे दिया; कारण कि वे अपने प्रभुसे इतने एकरूप हो चुके हैं कि
इनके विरुद्ध कभी कोई चेष्टा करते ही नहीं और श्रीरामजी भी आञ्जनेयका
अदब मानते हैं। यथा—सेवक स्योकाई जानि जानकीश मानै कानि
(ह.बा. १२)।
पैसारे शब्द पदसार शब्दका तद्भव है। पदेन पादेन सरणं सारः पदसारः
प्रवेश इत्यर्थः। यह शब्द प्रवेशके अर्थमें श्रीमानसजीमें भी प्रयुक्त हुआ है।
यथा—अति लघु रूप धरौं निशि नगर करौं पैसार (रा.च.मा. ५-३)।
भगवान्के अन्य द्वारपाल श्रीआञ्जनेयके समान नहीं देखे जाते। कहीं-
कहीं तो स्वामीको सूचित किए बिना ही प्रतिहार अपनी उच्छृङ्खलताके
५४
महावीरी व्याख्या चौ. २१: राम-दुआरे तुम रखवारे
कारण आगन्तुकको बहुत क्षुब्ध किया करते हैं। इस विषयकी स्पष्टताके
लिए भागवतके तृतीय स्कन्धका जय-विजय-उपाख्यान द्रष्टव्य है।
सनकादिक एक बार भगवान् मधुसूदनके दर्शनार्थ श्रीवैकुण्ठ धाम पधारे।
छः द्वारोंको सहजतया लाँघकर वे सप्तम द्वारको भी लाँघनेकी चेष्टा कर रहे
थे कि उनका यह स्वतन्त्रतापूर्वक व्यवहार भगवान्के प्रिय द्वारपाल जय-
विजयको नहीं भाया। सन्तोंका व्यक्तित्व चमत्कार-शून्य तथा नमस्कार-
प्रधान हुआ करता है। उनकी रहनीमें संसारका दिखावा तथा आडम्बर नहीं
होता। सनक, सनन्दन, सनातन, सनत्कुमारको यह आशा भी न थी कि
उन जैसे विधि-निषेधसे बहिर्भूत परम अन्तरङ्गतम भगवत्प्रेमी महात्माओंके
साथ भी द्वारपालसे आदेश-रूप निरर्थक सांसारिक औपचारिकताकी अपेक्षा
की जाएगी। जय-विजयने उन पञ्चवर्षीय दिगम्बर मुनिकुमारोंको बिना
अनुमतिके ही भगवन्मन्दिरमें प्रवेश करते देख ईषत् क्रोधजडीभूत होकर
परिहासपूर्वक अपने बेंतका प्रहार कर नीचे गिरा दिया। जय-विजयका
यह स्वभाव भगवान् तथा भगवान्के भक्त दोनोंके लिए प्रतिकूल था।
भागवतकारने वेत्रेण चास्खलयताम्का प्रयोग किया है। स्खलनका अर्थ
होता है गिरना। अस्खलयताम् प्रेरणार्थक णिजन्त रूप है, जिसका अर्थ
होता है 'उन दोनोंने गिरा दिया'। यथा—
तान् वीक्ष्य वातरशनांश्चतुरः कुमारान्
वृद्धान्दशार्धवयसो विदितात्मतत्त्वान्।
वेत्रेण चास्खलयतामतदर्हणांस्तौ
तेजो विहस्य भगवत्प्रतिकूलशीलौ॥
—भा.पु. ३-१५-३०
इस उद्दण्डताकी पराकाष्ठासे वीतराग महर्षियोंका भी हृदयसागर क्रोधकी
लहरसे कुछ क्षुब्ध-सा हो गया। तथा वे बोल पड़े, “तुम सर्वान्तर्यामी परम
कृपालु प्रभु भगवान् विष्णुके पार्षद होनेके योग्य नहीं हो। आज भी तुम्हारा
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चौ. २१: राम-दुआरे तुम रखवारे महावीरी व्याख्या
हृदय महत्त्वाकाङ्क्षाकी आगसे जल रहा है। अतः इस अपराधका उचित
दण्ड ही तुम्हारे लिए उपयुक्त है। तुम काम, क्रोध, लोभ इन तीनोंसे पीड़ित
हो। इसलिए तीन पापिष्ठ लोकोंमें जाओ।” अर्थात् प्रथम जन्ममें क्रोध-प्रधान
दैत्य बनो (हिरण्यकशिपु और हिरण्याक्ष), द्वितीय जन्ममें काम-प्रधान राक्षस
बनो (रावण और कुम्भकर्ण), एवं तृतीय जन्ममें लोभ-प्रधान दानव-रूप
मानवताहीन मानव (शिशुपाल और दन्तवक्र) बनो। यहाँ तीन जन्म पर्यन्त
पापिष्ठ लोकोंमें जानेका शाप भी साभिप्राय था। सनकादि महर्षियोंने जय-
विजयको तीन जन्मके लिए इस कारण शाप दिया कि जय-विजयने उन्हें
तीन-तीन बेंत लगाये थे। यही त्रय इमे शब्दके प्रयोगका कारण प्रतीत होता
है, यथा—
तद्धाममुष्य परमस्य विकुण्ठभर्तुः
कर्तुं प्रकृष्टमिह धीमहि मन्दधीभ्याम्।
लोकानितो व्रजतमन्तरभावदृष्ट्या
पापीयसस्त्रय इमे रिपवोऽस्य यत्र॥
—भा.पु. ३-१५-३४
गोस्वामीजी भी इस प्रसंगकी चर्चा मानसजीमें बड़े ही रोचक ढंगसे करते
हैं—
द्वारपाल हरि के प्रिय दोऊ।
जय अरु विजय जान सब कोऊ॥
बिप्र-शाप तें दूनउ भाई।
तामस असुर-देह तिन पाई॥
—रा.च.मा. १-१२२-४,५
मुक्त न भये हते भगवाना।
तीनि जनम द्विज-बचन प्रमाना॥
— रा.च.मा. १-१२३-१
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