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सर्वकोश
श्री हनुमान चालीसा, संकटमोचन हनुमानाष्टक एवं बजरंग बाण (महावीरी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

श्री हनुमान चालीसा, संकटमोचन हनुमानाष्टक एवं बजरंग बाण (महावीरी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Shri Hanuman Chalisa with Mahaviri Commentary

गोस्वामी तुलसीदास (व्याख्याकार: स्वामी रामचन्द्रदास 'महावीर') द्वारा

DevanagariHindipublished110 पृष्ठ

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महावीरी व्याख्या चौ. १५: जम कुबेर दिगपाल जहाँ ते
॥ श्रीराम ॥
मूल (चौपाई)—
जम कुबेर दिगपाल जहाँ ते।
कबि कोबिद कहि सकें कहाँ ते॥ १५ ॥
शब्दार्थ—कोबिद (कोविद) ▸ वेदज्ञ। कोर्वेदस्य विदो वेत्ता कोविदः
परिकीर्तितः। को अर्थात् वेदका विद अर्थात् जाननेवाला। इस प्रकार
कोविद=वेदज्ञ।
अर्थ—यम, कुबेर आदि यावन्मात्र दिक्पाल हैं, वे भी तुम्हारा यह यश
गाते रहेंगे। इस अनन्त यशको सामान्य कवि एवं वेदज्ञ विद्वान् कहाँसे कह
सकते हैं?
व्याख्या—यहाँ जहाँ ते शब्दके साथ पूर्व क्रिया गावैंका अन्वय
होगा। श्रीहनुमन्-चालीसाकी प्रथम चौपाईसे लेकर दसवीं चौपाई तक
गोस्वामीजीने श्रीरामजीके वात्सल्य-भाजन श्रीआञ्जनेयके मङ्गलमय स्वरूप
तथा गुणका वर्णन किया। अनन्तर ग्यारहवीं चौपाईसे बीसवीं चौपाई तक
श्रीहनुमन्जीके श्रीराघव-यशोभूमिका रूप चारु चरित्रका वर्णन कर रहे
हैं। जिसमें ग्यारहवीं चौपाईसे पन्द्रहवीं चौपाई तक लक्ष्मणमूर्च्छा-प्रसंगमें
प्रस्तुतकी हुई हनुमान्जीकी महत्तम भूमिकाका वर्णन है। मानो यही पाँच
चौपाइयाँ पञ्चाक्षर महामन्त्रके तात्पर्यके रूपमें कही गई हैं।
लक्ष्मणमूर्च्छा-प्रसंगका दार्शनिक तात्पर्य बड़ा मनोरञ्जक तथा साभिप्राय
है। जैसे मेघनादकी शक्तिसे मूर्च्छित श्रीलक्ष्मणको आञ्जनेयजीने द्रोणाचलसे
संजीवनी लाकर जीवनदान दिया, उसी प्रकार आसक्ति-रूप वीरघातिनीसे
मूर्च्छित हम जीवोंको वैराग्यवान् सन्त रामनाम-रूप हनुमान्जी सद्गुरु
सुषेण वैद्यकी अनुमतिसे वेद-पुराण-रूप द्रोणाचलमें वर्तमान, रामभक्ति-
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