श्री हनुमान चालीसा, संकटमोचन हनुमानाष्टक एवं बजरंग बाण (महावीरी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Shri Hanuman Chalisa with Mahaviri Commentary
गोस्वामी तुलसीदास (व्याख्याकार: स्वामी रामचन्द्रदास 'महावीर') द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंचौ. १४: सनकादिक ब्रह्मादि मुनीशा महावीरी व्याख्या
॥ श्रीराम ॥
मूल (चौपाई)—
सनकादिक ब्रह्मादि मुनीशा।
नारद सारद सहित अहीशा ॥ १४ ॥
शब्दार्थ—सनकादिक ▸ सनक, सनन्दन, सनातन, एवं सनत्कुमार
(ये चार ब्रह्माजीके प्रथम ऊर्ध्वरेता पुत्र हैं)।
अर्थ—श्रीराघव प्रशंसाके शब्दोंमें कह रहे हैं, “हे वत्स! तुम्हारे इस
परम पावन यशको न केवल शेष अपितु सनकादिक ऊर्ध्वरेता ऋषि, ब्रह्मादि
देवगण, मुनियोंमें श्रेष्ठ भगवान् नारद, और सरस्वतीके सहित अहीश्वर
(विष्णु व शंकर) भी गाते रहेंगे।”
व्याख्या—इस चौपाईमें भी पूर्व क्रिया गावैँका अन्वय होगा। भाव
यह है कि तुम्हारा लक्ष्मण-जीवनदान-रूप परम पावन यश त्रिलोकविदित
हो जाएगा। अतः पातालमें शेष, मर्त्यलोकमें सनकादि एवं नारद, तथा
स्वर्गलोकमें ब्रह्मादि, शारदा, एवं विष्णु तथा शंकर भी गाएँगे। पूर्वमें
शेषके लिए सहसबदन शब्दका प्रयोग हो चुका है। अतः यहाँ अहीशा
पद अहितल्पवासी विष्णु यद्वा अहिकौपीनधारी श्रीशिवका बोधक है।
यथा विष्णु—जौ अहि सेज शयन हरि करहीं (रा.च.मा. १-६९-५)।
शिव—जटा मुकुट अहि मौर सँवारा (रा.च.मा. १-९२-१), कुंडल
कंकन पहिरे ब्याला (रा.च.मा. १-९२-२), भुजग भूति भूषन त्रिपुरारी
(रा.च.मा. १-१०६-८) आदि।
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