श्री हनुमान चालीसा, संकटमोचन हनुमानाष्टक एवं बजरंग बाण (महावीरी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Shri Hanuman Chalisa with Mahaviri Commentary
गोस्वामी तुलसीदास (व्याख्याकार: स्वामी रामचन्द्रदास 'महावीर') द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंचौ. १२: रघुपति कीन्ही बहुत बड़ाई महावीरी व्याख्या
॥ श्रीराम ॥
मूल (चौपाई)—
रघुपति कीन्ही बहुत बड़ाई।
तुम मम प्रिय भरतहिं सम भाई ॥ १२ ॥
शब्दार्थ—रघुपति ▸ रघुवंशके स्वामी, अथवा रघु अर्थात् जीवमात्रके
स्वामी श्रीराम। लङ्घन्ते पापपुण्यानि ये ते रघवो जीवास्तेषां पतिः इति
रघुपतिः।
अर्थ—रघुकुलके स्वामी तथा समस्त प्राणिमात्रके ईश्वर श्रीरामचन्द्रजीने
आपकी बड़ी प्रशंसा की और कहा कि तुम मुझे भाई भरतके समान प्रिय
हो।
व्याख्या—भाई शब्दका अन्वय भरतहि शब्दके साथ ही उचित
होगा, अर्थात् ‘भाई भरतके समान तुम मुझे प्रिय हो’। हनुमान्जीके साथ
भाई शब्दका अन्वय करनेसे सुनु सुत तोहि उरिन मैं नाहीं (रा.च.मा.
५-३२-७)—इस अर्धालीकी एकवाक्यता नहीं संगत होगी क्योंकि यहाँ
श्रीराघवने आञ्जनेयको पुत्र कहा। ध्यान रहे कि श्रीलक्ष्मणसे श्रीहनुमान्जीका
इतना वैशिष्ट्य अवश्य है कि श्रीरघुनाथजी श्रीलक्ष्मणजीको भाई तथा पुत्र
दोनों मानते हैं। भाई, यथा—अस जिय जानि सुनहु सिख भाई (रा.च.मा.
२-७१-१)। पुत्र, यथा—अब अपलोक शोक सुत तोरा (रा.च.मा. ६-६१-
१३)। पर हनुमान्जीको केवल पुत्र-रूपमें ही स्वीकारते हैं, यथा—सिय-
सुखदायक दुलारो रघुनायक को (ह.बा. १०)।
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