शालिहोत्रम्: अश्वशास्त्र (महर्षि शालिहोत्र - प्राचीन भारतीय अश्व-चिकित्सा एवं लक्षण विज्ञान)
Shalihotram Ashvashastra of Maharshi Shalihotra
महर्षि शालिहोत्र द्वारा
३८ शालिहोत्रम् ।
देती है, स्वस्थावस्था में इसकी गति एक मिनट में ४० वार
होती है, इससे न्यूनाधिक के होने पर इसकी स्वस्थता में अंतर
समझा जाता है।
मूत्रपरीक्षा-मूत्रकी रंगत सफेद हो तो सर्दी, पीली और गाढ़ी
हो तो वात कफकी अधिकता और लालहो तो गर्मीकी अधि-
कता जानी जाती है।
नेत्रपरीक्षा-आंखका रंग देखने से भी घोडे की बीमारी की
परीक्षा होती है। घोडेकी आंखका पलक उंगलीसे उठाकर देखे
जो उसकी रंगत गुलाबी हो तो निरोगी समझना चाहिये सफेद
हो तौ कफकी अधिकता पीली हो तौ वादीकी अधिकता और
ललाई होवै तौ गरमी की अधिकता समझनी चाहिये। जो
ललाई में कालापन भी हो तौ घोडे के बचने की आशा नहीं
रहती है।
मलपरीक्षा-जो घोडेके पतले दस्त आते हैं और दुर्गन्ध भी
उठती हो तौ पशुको अजीर्ण रोग समझना चाहिये और जो
उपाय करने पर भी दस्त जारी रहे तौ दस्तों की बीमारी
समझी जाती है।
आंखके रोग उनकी पहचान और दवा।
जिस घोडेकी आंखमें कोई झटका लग गयाहो जिससे पानी
बहता हो और आंखकी रंगत नारंगीके समान होगई हो तौ
पहिले दिन सायंकालके समय मिट्टी के एक पात्र में त्रिफला को
कूट करके भिगो देवे, दूसरे दिन प्रातःकाल उसे छानकर घोडे
की आंखमें छींटा मारे इस तरह दो तीन दिन करने से आराम
हो जायगा।
शालिहोत्रम् । ३६
जो चोट लगने से आंखमें ललाई आगई हो तो दो तीन
दिन तक नमक और फिटकरीके पानीसे धो डाले ।
अन्य दवा-समंदरफेन, पके हुए चावलों का माढ और शहद
तीनोंको मिलाकर आंखमें अंजन की तरह लगावै ।
आंखकी फूलीका इलाज-आंखकी फूलीके विषय में वे उपाय
काममें लाने चाहिये जो गौके आंखके रोगमें लिखे गएहैं उनके
सिवाय नीचे लिखे उपाय भी करे ।
पहिली दवा-साठी चावलको आकके दूधमें भिगोकर छायामें
सुखाके फिर इन्हें मिट्टीके पात्रमें भर आगपर जलाले, जबराख
होजाय तबनीचे लिखीदवा और मिलाले । सिरसके बीज दोतोले
हरे कांचकी चूड़ी दस माशे, लाहौरी नमक दो तोला इन सब
को बारीक पीस कपड़छन कर फूली पर लगावे ।
दूसरी दवा-फूली हुई फिटकरी और उसके बराबर ही सिंदूर
मिलाकर पीसले । इसमें से पांच वा छः रत्ती प्रतिदिन दो चार
आंख में फूली पर लगाता रहे ।
तीसरी दवा-मनुष्यकामूत्र लेकर घोडेकी आंखपर छींटा मारे
चौथी दवा-सांभर नमक और वंगलापन पीसकर पानी में
घोलकर मुँहमें भर २ कर घोडे की आंख पर दोतीन दिन तक
कुल्ले करे ।
पांचवीं दवा-सिंदूर और चीनी सुर्मे की तरह महीन पीसकर
आंखों में लगावै ।
छटी दवा-पत्थर का नमक शहद में मिलाकर आंखमें अंजन
लगावै ।
४० शालिहोत्रम् ।
सातवीं दवा-पुरानी ईंट को सुरमे के समान बारीक पीसकर
पानी में घोल बार २ छींटे देता रहे ।
आठवीं दवा-एक रोठेको पत्थर पर पीसकर आंख में आंजे ।
नवीं दवा-गेरू और तिगुना शोरा इन दोनोंको बारीक पीस
कर नलीमें भर फूली पर फूंके ।
दसवीं दवा-आदमी की खोपडी का सुर्मा बनाकर तीन दिन
लगावे ।
ग्यारहवीं दवा-घोंघाका चूना, पोली फिटकिरी और कांचकी
चूडी इन तीनों को समान भाग लेकर महीन पीस कर बुकनी
बनावे और नलीमें भरकर आंख में फूंके ।
बारहवीं दवा-गेहूं की मैदा, सांभरनमक और कांच की चूडी
इन तीनोंको पीसकर गोली बांधले और फिर पानी में रिगड
कर आंख में लगावै ।
तेरहवीं दवा-मुर्गी वा कबूतरकी ताजी बीट आंखमें आंजे ।
चौदहवीं दवा-हाथी का नख महीन पीसकर सुर्मे की तरह
आंख में आंजे ।
नाखून या जाले की दवा
यह रोग आंखके कोने में तीन फांक का पतला नोंकदार नि-
कship?कलता है, इसका मांस बढा कडा होता है ।
पहिली दवा-मुर्गीके अंडेके छिलके की राख, उसी के समान
गंधक और नीलाथोथा इन तीनोंको पीसकर आदमी के मूत्र में
गोली बांधे और आदमी के पेशाबमें ही घिसकर लगावै ।
दूसरी दवा-आदमीके बालकी राख, संगबसरेका पत्थर जिसे
शालिहोत्र । १९
मङ्गा दवाई कहते हैं और मस्र्फ़ेन इन तीनों को घिसकर गवा-
रपाठे के रस में घोंट कर दो सप्ताह तक लगावे ।
तीसरी दवा-कालीमिर्च बीजबन्द, भांग, सुहागा, सेंधानमक
फिटकरी फूली हुई, और गूगल इनको बराबर लेकर कड़वे तेल
में मिलाकर तजान लगावे ।
सूजा और लकलककी दवा-यह रोग आंख, अंडकोश वा
लोट में हुआ करता है, इसमें सूत का सा तार निकला करता
है, फिर आंख भी जाती रहती है, इसका काट डालना भी
अच्छा होता है ।
दवा-मेंढक को कुल्हडे में बन्द कर बहुत प्रचंड आगमें देदे
जब जल कर राख होजाय तब उसमें तेल मिलाकर दोनों
समय लगावे ।
नखोली की दवा-रेशमी कपड़े को पानी में आठवार भिगो-
भिगोकर सुखावे फिर शराब में भिगो बत्ती बना पावभर तेल
के दीपक में जलावे ऊपर से तांबे का बर्तन ढाक दे जब तेल
जल जाय तब काजल निकाल शहदमें मिला आंखोंमें लगावे ।
दूसरी दवा-सफेद मूसली को सिरके में घिसकर लगावे ।
नाक से रुधिर बन्द करनेका उपाय ।
जिस घोडे की नाक से रुधिर बहता हो उसकी नाक में हिरन
या भैंस के सींग की राख नली में भर कर फूंक देवे ।
दूसरी दवा-आदमी का मूत्र छः ड्राम और इतना ही तिल
का तेल दोनों को मिलाकर नली में भरकर फूंके ।
तीसरी दवा-गौ का ताजी घी सिर पर मलै और सीने के
किनारे फस्द भी खोले ।
द्वितीय अध्याय: दन्त-परीक्षा द्वारा आयु-निर्णय एवं गति-विज्ञान
४२ शालिहोत्रम् ।
चौथी दवा-काले गधे की लीद और केले की जड़ इन दोनों
का अर्क निकाल घोडे को लिटाकर पैसे पैसे भर दोनों नथनों
में डाल दे ।
दांतों की खटाई और जीभके सूखेपन का उपाय ।
जो घोड़ा दाना घास खाने को चाहे पर खा न सके तौ उस-
के दांतों में खटाई अथवा सूखापन होता है इसमें कनेर की
छाल पीस कर शहद में मिलाकर नीबू के बराबर गोली बना
चार दिन तक खिलावे ।
नासिका के कीड़ों का उपाय-कभी नाक से कीड़े झड़ते हैं
और दुर्गन्धित रुधिर निकला करता है । इसमें वच, त्रिकुटा,
त्रिफला इनको पीस कर इतने ही गुड़ में मिला घी में सानकर
खिलाना चाहिये ।
पानी में फिनाल मिलाकर पिचकारी द्वारा नाक भीतर से
धुलवानी चाहिये ।
रुधिरका वमन का उपाय-जो घोड़ा रुधिरको वमन करताहो
उसके लिये जामनकी छाल छाया में सुखा तीन अंडेकी सफेदी
मिला एक गोली प्रतिदिन प्रातःकाल सात दिनतक खानेको दे ।
दूसरी दवा-शातरा, हरड, आंवला इन तीनों को बराबर ले
पाव पावभर दोनों समय दाना देनेसे घण्टेभर पहिले दिया करे,
पानी ठीक समय पर पिलावे इस रोगको सरसंबूताभी कहतेहैं ।
सिर के रोग का लक्षण-जब घोडे के सिर में वात पित्त वा
कफ से दर्द होता है तौ उसकी कान्ति मन्द पड जाती हैं, चारा
दाना खाना छोड़ देता है, आँखों से पानी और मुख से लार
बहने लगती है ।
शालिहोत्रम् । ५३
सिरके रोगका उपाय-शातरा, सोंठ काली मिरच, पीपल इन
सबको समान भागले पीसकर शराब में मिला सवेरे के समय
खिलावै ।
दूसरी दवा-नौसादर एक भाग, केशर चार भाग इन दोनों
को मिला माजूम बना सात दिन तक खिलावै ।
मुख रोगका लक्षण और दवा-इस रोगमें कफके साथ दुर्गन्ध
निकलती है, मुखकी रंगतकाली पड जाती है, दाने दाने से
निकल आते हैं और लगाम को नहीं चबा सकता है ।
इस रोग में तालूकी फस्द खोलना अच्छा है ।
दूसरा उपाय-सोंठ और पीपलको कूटकर चार सेर पानी में
औटावै जब आध सेर रह जाय तब पिलादे ।
मुखमें कांटोंका इलाज-इस रोगमें मुखके भीतर ऊपर नीचे
कांटे पड जाते हैं ।
पहिली दवा-कलमी शोरा, सैंधानमक, समंदर फेन, रसौत
इन चारोको समान भागले धायके फूलके रसमें मिला घोडे के
मुख में तीन दिन तक मलै ।
दूसरी दवा-धायके फूल, जड, पत्ती और छाल सब दो सेर
पानी में उबालकर घोडेके मुखमें गरम छिडके ।
तीसरा उपाय-किसी चमारसे उसके कांटे कटवा डालै फिर
आंबाहल्दी, कालाजीरा, और काली मिरच बराबर पीसकर
दिनमें दस बार मले ।
लवकामकी दवा-यह रोग दांतकी जडसे मिलकर होठ में
होता है । इसको नश्तरसे चीरकर मवाद निकाल डालै फिर
इसमें हल्दी और नमक पीसकर भरदे ।
४४ शालिहोत्र ।
दूसरा दवा-अदरख, पान, काली मिरच, ये तीनों चारा दाना
खाने से पहिले प्रातःकाल तीन दिन तक देवें ।
बास या तालूका इलाज ।
यह सूजन दांतसे मिलकर तालू तक होती है । इसको दाग
कर हल्दी और नमक मले और लबकामकी दवा पिलावे ।
खांसी जुकाम-इस रोगमें घोडेको बडा कष्ट होता है, जब यह
रोग बढ़ जाता है तो घोडे का मृत्युका कारण भी होजाता है,
जब घोडा परिश्रम करके आता हो और पसीने निकल रहे हों;
अथवा कुसमय पानी पिलाने से अथवा सर्दी लग जाने से यह
रोग उत्पन्न होजाया करता है । इसमें घोडे खांसने लगते हैं,
परन्तु इसमें पहिले उसकी नाक टपकने लगती है। खांसी
उत्पन्न होते ही इलाज करना उचित है क्योंकि जुकाम के बिग-
डने से बडे बडे उपद्रव खडे होजाते हैं ।
पहिली दवा अदरख के एक छोटे से टुकडे में एक वा दो
चनेके बराबर हींग भरकर उसे अग्निमें भूनना चाहिये फिर उसे
मलकर रखले और जौके आटेको माडकर छोटी गेंदके बरा-
बर उसकी गोलीसी बनाकर उसके बीचमें उस अदरखको रखदे,
यह गोली सायंकाल के समय दाना देनेके पीछे चार दिन तक
देनी चाहिये ।
दूसरी दवा-चनेके बराबर हींग लेकर पानी में गाढी गाढी
घोलले उसे कागजपर लपेटले उस कागजको एक टाटके टुकडे
में लपेटकर बत्तीसी बनाकर एक ओर उसमें आग लगादे
और दूसरा सिरा नाकमें लगादे जिससे उसका धुंआ जल्दी
शालिहोत्रम् । ४५
जल्दी नाक में घुमे ऐसा करने से दूसरे नथने में होकर कफ
निकल जायगा तीन चार दिन तक ऐसा करने से घोडा को
आराम होजाता है।
तीसरा उपाय-संभालू के पत्तों का रस निचोड कर तीन तीन
चार चार बूंद दोनों नथनों में टपकाकर उन छिद्रोंको रुईसे बंद
कर देवे फिर चार पांच मिनट पीछे रुई को निकाल लेवे तौ
कफ गिरना आरम्भ होजायगा, इसी तरह पांच चार दिन तक
दिन में दो दो तीन तीन बार करने से पशु को आराम हो-
जाता है।
चौथा उपाय-बडे घोडे को एक बादाम की मिंगी और छोटे
को आधी मिंगी दो तीन दिन तक दिनमें दोतीन बार देवै।
पांचवा उपाय-प्याज आध सेर, घृत पावभर और बकरे का
सिर इन तीनोंको कूटकर ढाई सेर पानी के साथ आगपर चढादे
नीचे मंदी मंदी आग देता रहे, जब बारह घंटे होजाय और
अधसेर जल रह जाय तब इसमें थोडासा नमक अंदाजसे डाल
देवे, और दाना खिलाने के पीछे इस जलसे बेसन के आटे को
मांडकर रोटी बना खिला देवै परन्तु उस दिन पानी न पिलावै
फिर दूसरे दिन घास और दाना खिलाकर पानी पिलाना चाहिए
यह औषधि अत्यन्त बलहीन घोडेको बहुत लाभकारी है ।
छठा उपाय-रोग की दशा में घोडे को पानी पिलाने के पीछे
एक प्याज खिला देनी चाहिए, पीछे बांस की थोडी सी हरी
पत्तियां खाने को देवै।
४६ शालिहोत्रम् ।
सातवां उपाय-अकड़टैया जड, फल, फूल, पत्ते समेत आग
जलावे उसमें से दो छटांक लेकर जौं के आटे में मिला गोली
बना दोनों समय चार पांच दिन तक देवे ।
आठवां उपाय-सेर भर अजवायन को आदमी के मूत्र में तीन
दिनतक भिगोवे फिर सायंकालके समय दाना देनेके पीछे इसमें
से जौंके आटेमें एक पैसे भर मिला गोला सा बना चार पांच
दिन तक खिलाना चाहिये ।
जुखाममें नाक टपकनेकी दवा-रोगी घोडेको दाना देनेके पी-
छे दो दिन तक भुनी हुई अदरक जौंके आटेमें मिलाकर देवे फिर
दो दिन तक दाना देने के पीछे एक छुहारा देवै ।
दूसरा उपाय-जो जुखाम के कारण आंख पीली पड गई हो तो
दस बारह दिनतक पावभर मेथी दाना और पैसे भर कालीमिरच
को पीसकर दोनों को मिला कर देता रहे ।
तीसरा उपाय-हींग छः रत्ती, सोंठ ४ माशे इन दोनों को
पीस जौं के आटे में मिला दाना देने के पीछे चार पांच दिन
तक देता रहे ।
कुरकुरी का वर्णन-यूनानी शालहोत्र वालों ने इस रोग को
सात प्रकार का लिखा है और डाक्टर लोग इसे केवल दो ही
प्रकार का बताते हैं [ १ ] मूत्र बन्द होने से [ २ ] दस्त बन्द
होनेसे यह रोग बहुधा खाने पीने की समता विषमता से हुआ
करता है। इसमें घोडेके मुखसे पानी टपका करता है, और प-
सीना अधिक निकलता है, न वह लेट सकता है न बैठता है
और कभी २ चारों पैरों को फैलाकर लेटता है, उसके पेट में
बहुत पीडा मालूम होती है ।
शालिहोत्र । ५७
पहिलो कुरकुरी मूत्र बन्द होनेसे-इसमें घोडा बारबार तनता
है और मूत्रेन्द्रिय को कभी बाहर और कभी भीतर करताहै।
इसमें लाल मिरच पीसकर सूतमें लपेट बत्तीसी बना मूत्रमार्ग
में प्रवेश करे और जो घोड़ी हो तो केवल पिसी हुई मिरच वा
एक बतासा उसकी योनिमें रखनेसे शीघ्रही पेशाब करेगी। जो
इससे पेशाब न उतरे तो थोडा सा कतीरा खिलादे ।
दूसरा उपाय-छटाकभर शोरा पानीमें घोलकर पिलादे अथवा
शोरे के पानी से कपडा भिगोकर मूत्रमार्ग में रखदे ।
अन्य उपाय-बेर की पत्ती पीसकर उसकी लुगदी मूत्रद्वार में
रक्खे, अथवा नासिकाद्वारा खालिस सरसों का तेल पिलावै अ-
थवा उसके सिर में से दो चार जुंए निकाल कर उसके कानमें
डालदे, अथवा राईको पानीमें पीसकर उसके अण्डकोषोंपर मलै।
अथवा एक सेर पानीमें थोड़ीसी इमली पीसकर पिलादे, अथ-
वा खीरा वा ककड़ीके बीज समान भाग लेकर पानीमें पीसकर
पिलादे, अथवा लोटेमें पानी भरकर घोडोकी योनिके पास टोंटी
द्वारा धीरे २ पृथ्वीपर गिरावे और मुख से सीटी बजाता रहे ।
दूसरी कुरकुरी-इसमें घोडेका मूत्र और लीद दोनों बन्द हो
जाते हैं, बारबार पृथ्वी पर लेटता है और बगलोंकी ओर झांक
ता है पेट में दर्द होता है ।
पहली दवा-सोंठ और काजल समान भाग लेकर गोमूत्र में
रिगडकर बत्ती बनाले और इसको घोडे वा घोडी के मूत्रस्थान
में रख देवे ।
दूसरी दवा-सैंधा नमक, पीपल, नीम की छाल; नागरमोथा
४८ शालिहोत्रम् ।
सिरसों इन सबको तेलमें पीसकर नलीद्वारा गुदामें भर देवे ।
तीसरी दवा-मुर्गीके दो अंडे जौके आटेमें मिलाकर खिलावे
इसी तरह दो दो घंटे पीछे दो दो अंडे देवे ।
चौथी दवा-कंजेका गूदा पैसेभर भुना हुआ, कालानमक पैसे
भर सफेद जीरा पैसे भर इन सबको पीसकर देवे, सूखा तँबाखू
और कंजे का गूदा चने के चून में मिलाकर देवे ।
पांचवीं दवा-सोंठ दो माशे, गुड़ चार माशे, हींग चार माशे
तीनोंको कूटकर गोला बनाकर खिलावे ।
छठा उपाय-हाथीकी लीद और पीपल की छाल दोनों छः सेर
पानी में चढ़ादे, जब तीनसेर रहजाय तब छानकर पिलादे ।
सातवां उपाय-कालाजीरा, काली मिरच, भुना हुआ सुहागा
सज्जी, कुटई, राई, हींग, और अजवायन इन सबको बराबर २
लेकर कूटडाले और अदरख के रस में छटांक २ भर की गोली
बनावे । इनमें से एक एक गोली जब तक दस्त न आवै तब
तक देता रहे ।
दस्त बन्द होजानेसे नीचे लिखे हुए जुलाब देने चाहिए:—
पहिला जुलाब-गुड तीन छटांक, हींग दस रत्ती; सोंफ एक
छटांक अजवायन आधी छटांक सुहागा आधी छटांक, नमक
एक छटांक इन सबको मिलाकर तीन गोलियां बना लेवे और
जबतक दस्त न हो तबतक घंटे २ भर में एक गोली देता रहे
दूसरा जुलाब-पाव भर अलसी का तेल वा सरसों का तेल
पिलाकर कुछ देर तक टहलानेसे दस्त होने पर आराम होजाय
गा । जो बहुत जल्द दस्त कराने की आवश्यकता समझी जाय
तो उसी तेलमें जमाल गोटे के तेलकी दस बूँद मिला देवे ।
शालिहोत्र। ४१
तीसरा जुल्लाब-आधसेर पानी में आधपाव सूरती तमाखू खू-
ब कूटकर मसल डाले और छानकर पानी पिलादे, पिलाने के
पीछे पसीना निकले वा न निकले गद्दो मार देवे जिससे घोडा
बैठने न पावे । और शोरा का पानी मूत्र के स्थान पर लगाना
उचित है ।
चौथा जुलाब-पीपल, पीपला मूल, कसौंदी के बीज, काली-
मिरच और सोंठ इन सबको समान भाग लेकर कूट कर कपड-
छन करले और इसमें से डेढ छटांक लेकर गौ के दूध में मिला
कर पिलाना चाहिये ।
तीसरी कुरकुरी-जब घोड़ा डाभ (दर्भा) खा लेता है तब
वह उसकी आंतो को छीलने लगती है ऐसा होने पर घोडा
अपनी दुम को बार बार मलता है और बार बार बेचैनी से
पृथ्वी पर लेटता है ।
इस रोग में सेर भर गर्म दूध में आधसेर कडवा तेल मिला-
कर नाल में भरकर पिला देवे।
चौथी कुरकुरी-इसमें घोडा होठों को थप थपाकर मलता है
और हवा पी पीकर राह चूकताहै। अपनी स्वाभाविक बातोंको
भूल जाता है, मुख की शक्ति बन्द हो जाती है।
पहिली दवा-घोडे के तालु में गुड की एक चकती
चिपका देवे ।
दूसरा उपाय-ताजे नीमकी लकडीकी लगाम मुखमें लगादे।
तीसरा उपाय-भुना सुहागा छः माशे, गुड आधपाव दोनों
को पावभर पानी में मिला कर पिलादे ।
पांचवी कुरकुरी-इसमें घोडेकी आंतें स्थानसे अलग होजाती
५० शालिहोत्रम् ।
हैं, अण्डकोशोंपर सूजन हो जाती है इसमें उँगुलियों से दबा दबा
कर धीरे २ आंतों को अपने स्थान पर करना चाहिये ।
छठी कुरकुरी-इसके लक्षण पांचवी कुरकुरी के विपरीत होते
हैं, घोडे को बैठने उठने में बडा कष्ट होता है ।
पहली दवा-बकरी के कलेजे को दस सेर पानी में आगपर
चढादे और गाढा २ पिलावे ।
दूसरी दवा-पावभर नरकचूर को मोठ के आटेमें मिला दोनों
समय आधा आधा खिलावे ।
विशेष द्रष्टव्य-कोई चतुर आदमी हाथ को घी से चुपड कर
गुदा में प्रवेश करके लीद निकाल देते हैं, यह काम बहुत बुरा
है, फिर कोई उपाय नहीं चलता है ।
सातवी कुरकुरी-इसमें आंतों में पीडा होती है, पेशाब और
लीद कठिनता से होती हैं, कभी २ होती ही नहीं है, पेट में
गडगडाहट होता है, बेसुध होकर बार बार लेटता है, चेहरा
लाल पड जाता है, इसमें दाग देना अधिक लाभदायक है, जो
न दागे तो नीचे लिखी हुई दवाइयां करे ।
पहली दवा-घोडावच, गेरू हींग, वायविडङ्ग इनको समान
भाग चार चार दिरम लेकर कूट पीस कपडछन करके फिर सेर
भर शराब में मिलाकर नाल में भर भर कर पिलावे, जब तक
अच्छा न हों तब तक प्रतिदिन करता रहे ।
दूसराउपाय-दो सेर दूध और आधसेर कडवा तेल दोनों
को मिला गुनगुना करके पिलावे, जो दस्त न आवे तो फिर
पिलावे ।
शालिहोत्र । ५१
वास्तव में कुरकुरी दो ही प्रकार की हैं अर्थात् एक तो मूत्र
बन्द होने से और दूसरी दस्तबन्द होने से और सब कुरकुरी
इन्हीं दो के अन्तर्गत होती हैं ।
खुजली का वर्णन-इससे सब देहमें घाव से होजाते हैं । यह
रोग संक्रामक होता हैं, एक को होते ही उस अस्तबल के सब
घोड़ों को हो जाता है, इससे पशु को बडी पीड़ा होती हैं ।
पहिली दवा-प्रतिदिन बासी पानी से धो दिया करे ।
दूसरा उपाय-दहीमें बारूद घोलकर पशुकी सब देहपर लगा
देवे और पांच छः घण्टे पीछे साबुनसे धो डाले । और इस दवा
करने के साथ ही धेला २ भर गंधक और सेंधा नमक जौ के
आटे के साथ प्रातःकाल खाने को दे ।
तीसरा उपाय-साबुन और चौथाई नमक दोनों को कूट कर
पोटली बना लेवे, और घोडेको स्नान कराते समय इस पोटली
से मलता रहे फिर जबतक दवा न सूख तबतक धूपमें बैठा रहने
दे । परन्तु उष्ण काल में विचार के रखना ।
चौथा उपाय-आधसेर खट्टा दही और पावभर नमक मिला
कर घोडेकी सब देहपर लगादे और चौबीस घण्टे पीछे धो
डाले, इसी तरह दो तीन दिन करने से आराम होजाता है ।।
पांचवां उपाय-हुक्के के पानी से भी दो दो तीन तीन बार
धोने से आराम होजाता है ।
छटा उपाय-खट्टा दही चार सेर, नीम की पत्ती आधसेर, का
ला जीरा पावभर, लहसन पावभर, काली मिरच आधपाव इन
में से दही को छोड़ सब दवाओं को पीसकर दही में मिला तीन
५२ शालिहोत्रम् ।
दिन रख छोड़ें फिर घोडे को साबुन से धोयकर यह दवा लगा
धूप में खडा रक्खे ।
सातवां उपाय-ग्वार पाठे को नमक मिलाकर खिलादे । अनु-
सार माफिक ।
आठवां उपाय-सफेद सरबैंक एक छटांक, सुरती छटांक भर,
पानी सेर भर, चुनेका पानी डेढ पाव इनमें से पहिली दो दवा-
ओंको पानी में घोटा ले फिर चुनेका पानी मिलाकर घोडे की
देह पर लगादे ।
नवां उपाय-बाकूची, गंधक, मनमिल और वायविडंगइन सब
को बराबर लेकर कूटके और पानीमें रातके समय भिगो देवैं,
प्रातःकाल मथकर थोडासा कडवा तेल मिलाकर मर्दन करै तीन
घंटे धूपमें खडा रखने के पीछे मिट्टी लगाकर धो डाले ।
दसवां उपाय-खट्टे दही में वेद अंजीर मिलाकर तीन दिन
मले तीसरे दिन घोडेके देहपर पीली मिट्टी मलदे और चौथे
दिन पानी से धोडाले ।
ग्यारहवां उपाय-पाव भर कडवे तेलमें पैसे भर नील मिला-
कर घोडे के शरीर पर मलै पहर भर पीछे चिकनी मिट्टी लगा
कर गर्मी की ऋतुमें ठंडे पानी से और जाडे की ऋतुमें गर्म
पानी से धोडालै ।
गजचर्मका उपाय-इस रोगमें घोडेका चमडा हाथी के चम-
डेके समान खुर खुरा हो जाता है शरीर की चमक दमक मारी
जाती है ।
कासनी, कांजी, बच और भिलावा इनमें से सब दवाओं को
शालिहोत्रम् । ५३
कांजी में मिला पाताल यंत्र में रख तेल खींचले और उसमें
तिल का तेल मिलाकर लगाता रहे ।
पित्तीका इलाज-सर्पकी कांचली थोडे गुड़में मिलाकर खिलावे
अथवा काली मिरच और गेरू छटांक २ भर पीसकर तीन दिन
तक खिलावे ।
आग से जलजाने की दवा ।
पहिली दवा-जले हुए पर प्याजका रस लगा देना चाहिए ।
दूसरी दवा-आधी छटांक पत्थर का चूना ढाई पाव पानी में
मिलाकर अच्छी तरह से हिलावे । पीछे रखदे तब थोडी देरमें
चुना नीचे बैठ जायगा तब ऊपर के निर्मल पानी को धीरे धीरे
निकाल कर एक बोतल में भर ले फिर एक बोतल में थोडासा
अलसी का तेल और उससे तिगुना चूने वाला पानी मिलाकर
हिलावे । हिलाते हिलाते जब गाढा होजाय तब जली हुई जग
हपर लगादे इस दवा से घाव को सदा तर रक्खे।
अग्निवाद का इलाज—जिसके यह रोग होता है उसके देहके
रोम और चमड़ा जगह जगह से गलकर ऐसे अलग होजाता
है जैसे आग का जला होता है ।
पहिली दवा-चांवलका भात नीमके पत्ते और दही तीनों आध
आध सेर लेकर रातिब की तरह बीस दिन तक खिलावे ।
दूसरा सरसों का तेल दो सेर, गौ का घी दो सेर, चर्बी दो
सेर, तीनों को अग्नि पर चढादे, फिर दो सेर सावन धीरे धीरे
चम्मच से मिलावे, जब सब मिल जाय और जलकर राख होजाय
तब जौ के चून में पाव भर प्रतिदिन खिलावे ।
५४ शालिहोत्रम् ।
तीसरा उपाय-पारा पपरिया कत्था, बोल और कपूर इनसब
को पैसे २ भर लेकर आध सेर घी में मिला लेवे और तीन
दिन तक घाव पर लेप करे, तीसरे दिन पोली मिट्टी लगाकर
पोले २ हाथों से धोये ।
झुरुनबाद का इलाज-इस रोग में घोडा पांव उठाकर पटककर
चलता है अथवा पैर को घसीट कर चलता है ।
पहिली दवा-लहसन और पारा दोनों दो दो ड्राम लेकर कूट
ले और दोनों समय महेले या सत्तू के संग देवे ।
दूसरी दवा-हलदी, पारा और पीपल तीनों को सत्तू के वा
महेले में तड़के ही खिलावे ।
तीमरो दवा-थोड़ी सी हींग सत्तू में मिला इक्कीस दिन तक
देवै । बरसाती का लक्षण-यह रोग घोडेके पैरों में हुआ करता
है और विशेष करके यह वर्षा ऋतु में हुआ करता है इसलिये
इसे बरसाती कहते हैं ।
पहिली दवा-हलदी, घुड़वच और पुरानो गच इनको पीसकर
घाव में भर देवै ।
दूसरी दवा-नीमका तेल घाव पर लगावै और जब सूख जाय
तब चूना भर देवै ।
तीसरा उपाय-भिलावा पावभर, विलायती मोम सेर १ और
मीठा तेल सेरभर लोहेकी कढाईमें आगपर चढ़ादे, जब जलकर
राख होजाय तब उतारकर छानले और बोतल में भरकर रखले,
घावको पहिले केञ्जव नीमके पानीसे धोडाले और उसपर थोडा
सा पिसा नीलाथोथा बुरककर उक्तदवा दोनोंसमय लगाना चाहिये
चौथा उपाय-नीला थोथा और फिटकरी दोनों एक २ तोले
शालिहोत्रम् । ५५
लेकर पीस डाले और घावको नीमके पानी से धोकर बुरक
दे फिर कपडे से बांधदे ।
पांचवां उपाय-बकरीकी चर्बी दो सेर, मोम आधपाव, एरं-
डका तेल पावभर, कोलतार पाव भर इनमें से पहिली तीन
दवाओं को आग पर रखकर पिघलालेवे, फिर कोलतार डाल
कर मिला लेवें ठंडा होने पर जमकर मरहम बन जायगा, फिर
नीम के पानी से घावको धो तृतियाका चूर्ण बुरक कर मरहम
लगाकर कपडे से बांध देवें । दिनमें दो बार लगाता रहे ।
छठा उपाय-सेंधानमक १ छटांक, पीपल ९ दिरम, बकरी का
ताजा रुधिर पाव भर मिलाकर खिलावे और आंखों के पीछे
तीनों वा दोनों पावों में फस्द खोले ॥
बहुधा इन घावों में से बुरा मांस बाहर निकलकर त्वचा से
ऊँचा होजाता है और प्याजकीसी गांठ पड जाती है ।
पहिली दवा-प्याज और तृतिया पीसकर बुरे मांस पर बांधे
ऊपर से एरंडके पत्ते बांधदें । इसी तरह प्रति दिन करता रहे ।
दूसरा उपाय-तृतियाको पीसकर उस पर मांस बुरकता रहे ।
थोडी देर पीछे उसपर गरम प्याज बांधदे और एक दिन पीछे
खोलें और जो बहुतही जल्दी आराम कराना हो तो मनसिल
कांजी के पानी में पीसकर बांधे पर पहिले घावको नीमके पानी
से धो डाले ।
घोडेके गरम होनेका वर्णन-घोडे बहुधा चलने में अडजाया
करते हैं इस समय उनको मारना उचित नहीं है ? परन्तु उसके
अडनेका कारण जानना चाहिये. ऐसे अवसर में उनकी आंखें
लाल होजाया करती हैं और भूक भी जाती रहती है ।
५६ शालिहोत्रम् ।
पहिली दवा-हरड, बहेडा और आंवला तीनों छटांक २ भर
लेकर कुचल डाले और रात्रि के समय भिगोदे, दिन निकलते
ही छान कर पिलादे इस तरह पांच छः दिन तक करने से
आराम हो जाता है ।
दूसरी दवा-रातके समय मिट्टी के घडे में जल भरकर उसमें
आधसेर शीशमकी पत्तियां डालदे, दिन निकलने पर हाथसे
पत्तियों को मसल कर छानले और उस जलमें पाव भर जौं का
सत्तू घोलकर पिलादे इसी तरह पांच चार दिन तक करने से
आराम होजाता है । पहिले दिनकी पत्तियां निकाल कर दूसरे
दिन भी काम में लाई जासक्ती हैं यह पत्तियां तीसरे दिन
बदलदी जाती हैं।
तीसरा उपाय-रातके समय मिट्टी के एक नवीन पात्रमें सेर
भर पानी भरकर उसमें छटांक भर कतीरा डालदो सबेरे के
समय उसे मिलाकर पिलादे ।
कमर के दर्दका इलाज-बहुधा चोट वा लचका खाजाने से
यह दर्द उत्पन्न होजाया करता है ।
पहिली दवा-थोडेसे चांवलोंका माढ निकालकर ठंडा करले,
इस माढमें घोडेकी पूंछकी डंडीको उलटकर डालदे परन्तु प्रथम
ही घोडेकी पिछाडी दृढतासे बांध देवै । जब दुम भीग जाय तब
पिछाडी खोलदे ऐसा करने से घोडा पूंछको बडे वेगसे फड
फडावैगा और लचक जाती रहेगी ।
दूसरी दवा-अंडीका गूदा दहीमें पीसकर तीन दिन तक कमर
पर लगावै और चौथे दिन गरम पानी से धो डाले ।
शालिहोत्र । ५७
जो कमर में सूजन होजाय या फट जाय तो यह दवा लगावे
लछाव की पत्ती, तिली का तेल और पानी तीनों को सेर सेर
ले एक देगची में चढादे जब पत्ती जल जाय और पानी भी
जल जाय तेल रह जाय तब उसे बर्तन में रखले और उसकी
कमर से मला करे । यह दवा और दर्दोंको भी लाभकारक है।
दूसरी दवा-शहद १ तोला; कपूर ३ माशे इन दोनोंको मिला
कर मले; ऊपर से बकरीकी नरम खाल बांधकर धूपमें खडाकर
दिया करे परन्तु खाल नित्य ताजी बदल दिया करे, १० दिन
तक ऐसा करने से आराम हो जाता है ।
बादगीरा का इलाज-इस रोगमें वादीके कारण घोडेकी कमर
में दर्द होने लगता है इससे वह पेट को लटकाता है, पीठको
झुकाता है और पीठ और पेट दोनों सूखने लगजाते हैं ।
पहली दवा-कडवा तेल आघपाव, भिलावा आघपाव इन
दोनोंको कढाईमें चढा खूब जलाले, फिर नीलाथोता दो तोले
रस कपूर दो तोला इन दोनों को पीसकर दो पोटली बनावे
और इस तेल में भिगोकर गरम कर करके रीढ से पीठ तक
सेकै यह दवा एकही दिन की जाती है ।
दूसरी दवा-तिल के तेल से सेकै फिर तिल का तेल और
जवाखार दोनों को पानी में औटा कर पिलावे ।
तीसरी दवा-गरम पानी के साथ साबुन लगा कर धोवे ।
चौथी दवा-दूध और नमक को औटाकर मले ।
पांचवीं दवा-सरेस को पानी में पका कर लगावे ।
छठी दवा-कुटकी आघपाव, सोंठ आघपाव, कमीला आघ-