शालिहोत्रम्: अश्वशास्त्र (महर्षि शालिहोत्र - प्राचीन भारतीय अश्व-चिकित्सा एवं लक्षण विज्ञान)
Shalihotram Ashvashastra of Maharshi Shalihotra
महर्षि शालिहोत्र द्वारा
पृष्ठ 73, कुल 130 में से
संदर्भ में पढ़ें५४ शालिहोत्रम् ।
तीसरा उपाय-पारा पपरिया कत्था, बोल और कपूर इनसब
को पैसे २ भर लेकर आध सेर घी में मिला लेवे और तीन
दिन तक घाव पर लेप करे, तीसरे दिन पोली मिट्टी लगाकर
पोले २ हाथों से धोये ।
झुरुनबाद का इलाज-इस रोग में घोडा पांव उठाकर पटककर
चलता है अथवा पैर को घसीट कर चलता है ।
पहिली दवा-लहसन और पारा दोनों दो दो ड्राम लेकर कूट
ले और दोनों समय महेले या सत्तू के संग देवे ।
दूसरी दवा-हलदी, पारा और पीपल तीनों को सत्तू के वा
महेले में तड़के ही खिलावे ।
तीमरो दवा-थोड़ी सी हींग सत्तू में मिला इक्कीस दिन तक
देवै । बरसाती का लक्षण-यह रोग घोडेके पैरों में हुआ करता
है और विशेष करके यह वर्षा ऋतु में हुआ करता है इसलिये
इसे बरसाती कहते हैं ।
पहिली दवा-हलदी, घुड़वच और पुरानो गच इनको पीसकर
घाव में भर देवै ।
दूसरी दवा-नीमका तेल घाव पर लगावै और जब सूख जाय
तब चूना भर देवै ।
तीसरा उपाय-भिलावा पावभर, विलायती मोम सेर १ और
मीठा तेल सेरभर लोहेकी कढाईमें आगपर चढ़ादे, जब जलकर
राख होजाय तब उतारकर छानले और बोतल में भरकर रखले,
घावको पहिले केञ्जव नीमके पानीसे धोडाले और उसपर थोडा
सा पिसा नीलाथोथा बुरककर उक्तदवा दोनोंसमय लगाना चाहिये
चौथा उपाय-नीला थोथा और फिटकरी दोनों एक २ तोले