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सर्वकोश
शालिहोत्रम्: अश्वशास्त्र (महर्षि शालिहोत्र - प्राचीन भारतीय अश्व-चिकित्सा एवं लक्षण विज्ञान)

शालिहोत्रम्: अश्वशास्त्र (महर्षि शालिहोत्र - प्राचीन भारतीय अश्व-चिकित्सा एवं लक्षण विज्ञान)

Shalihotram Ashvashastra of Maharshi Shalihotra

महर्षि शालिहोत्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished130 पृष्ठ

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पृष्ठ 69

५० शालिहोत्रम् ।
हैं, अण्डकोशोंपर सूजन हो जाती है इसमें उँगुलियों से दबा दबा
कर धीरे २ आंतों को अपने स्थान पर करना चाहिये ।
छठी कुरकुरी-इसके लक्षण पांचवी कुरकुरी के विपरीत होते
हैं, घोडे को बैठने उठने में बडा कष्ट होता है ।
पहली दवा-बकरी के कलेजे को दस सेर पानी में आगपर
चढादे और गाढा २ पिलावे ।
दूसरी दवा-पावभर नरकचूर को मोठ के आटेमें मिला दोनों
समय आधा आधा खिलावे ।
विशेष द्रष्टव्य-कोई चतुर आदमी हाथ को घी से चुपड कर
गुदा में प्रवेश करके लीद निकाल देते हैं, यह काम बहुत बुरा
है, फिर कोई उपाय नहीं चलता है ।
सातवी कुरकुरी-इसमें आंतों में पीडा होती है, पेशाब और
लीद कठिनता से होती हैं, कभी २ होती ही नहीं है, पेट में
गडगडाहट होता है, बेसुध होकर बार बार लेटता है, चेहरा
लाल पड जाता है, इसमें दाग देना अधिक लाभदायक है, जो
न दागे तो नीचे लिखी हुई दवाइयां करे ।
पहली दवा-घोडावच, गेरू हींग, वायविडङ्ग इनको समान
भाग चार चार दिरम लेकर कूट पीस कपडछन करके फिर सेर
भर शराब में मिलाकर नाल में भर भर कर पिलावे, जब तक
अच्छा न हों तब तक प्रतिदिन करता रहे ।
दूसराउपाय-दो सेर दूध और आधसेर कडवा तेल दोनों
को मिला गुनगुना करके पिलावे, जो दस्त न आवे तो फिर
पिलावे ।