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शालिहोत्रम्: अश्वशास्त्र (महर्षि शालिहोत्र - प्राचीन भारतीय अश्व-चिकित्सा एवं लक्षण विज्ञान)

शालिहोत्रम्: अश्वशास्त्र (महर्षि शालिहोत्र - प्राचीन भारतीय अश्व-चिकित्सा एवं लक्षण विज्ञान)

Shalihotram Ashvashastra of Maharshi Shalihotra

महर्षि शालिहोत्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished130 पृष्ठ

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पृष्ठ 74

शालिहोत्रम् । ५५
लेकर पीस डाले और घावको नीमके पानी से धोकर बुरक
दे फिर कपडे से बांधदे ।
पांचवां उपाय-बकरीकी चर्बी दो सेर, मोम आधपाव, एरं-
डका तेल पावभर, कोलतार पाव भर इनमें से पहिली तीन
दवाओं को आग पर रखकर पिघलालेवे, फिर कोलतार डाल
कर मिला लेवें ठंडा होने पर जमकर मरहम बन जायगा, फिर
नीम के पानी से घावको धो तृतियाका चूर्ण बुरक कर मरहम
लगाकर कपडे से बांध देवें । दिनमें दो बार लगाता रहे ।
छठा उपाय-सेंधानमक १ छटांक, पीपल ९ दिरम, बकरी का
ताजा रुधिर पाव भर मिलाकर खिलावे और आंखों के पीछे
तीनों वा दोनों पावों में फस्द खोले ॥
बहुधा इन घावों में से बुरा मांस बाहर निकलकर त्वचा से
ऊँचा होजाता है और प्याजकीसी गांठ पड जाती है ।
पहिली दवा-प्याज और तृतिया पीसकर बुरे मांस पर बांधे
ऊपर से एरंडके पत्ते बांधदें । इसी तरह प्रति दिन करता रहे ।
दूसरा उपाय-तृतियाको पीसकर उस पर मांस बुरकता रहे ।
थोडी देर पीछे उसपर गरम प्याज बांधदे और एक दिन पीछे
खोलें और जो बहुतही जल्दी आराम कराना हो तो मनसिल
कांजी के पानी में पीसकर बांधे पर पहिले घावको नीमके पानी
से धो डाले ।
घोडेके गरम होनेका वर्णन-घोडे बहुधा चलने में अडजाया
करते हैं इस समय उनको मारना उचित नहीं है ? परन्तु उसके
अडनेका कारण जानना चाहिये. ऐसे अवसर में उनकी आंखें
लाल होजाया करती हैं और भूक भी जाती रहती है ।