शालिहोत्रम्: अश्वशास्त्र (महर्षि शालिहोत्र - प्राचीन भारतीय अश्व-चिकित्सा एवं लक्षण विज्ञान)
Shalihotram Ashvashastra of Maharshi Shalihotra
महर्षि शालिहोत्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंशालिहोत्र । ५७
पहिलो कुरकुरी मूत्र बन्द होनेसे-इसमें घोडा बारबार तनता
है और मूत्रेन्द्रिय को कभी बाहर और कभी भीतर करताहै।
इसमें लाल मिरच पीसकर सूतमें लपेट बत्तीसी बना मूत्रमार्ग
में प्रवेश करे और जो घोड़ी हो तो केवल पिसी हुई मिरच वा
एक बतासा उसकी योनिमें रखनेसे शीघ्रही पेशाब करेगी। जो
इससे पेशाब न उतरे तो थोडा सा कतीरा खिलादे ।
दूसरा उपाय-छटाकभर शोरा पानीमें घोलकर पिलादे अथवा
शोरे के पानी से कपडा भिगोकर मूत्रमार्ग में रखदे ।
अन्य उपाय-बेर की पत्ती पीसकर उसकी लुगदी मूत्रद्वार में
रक्खे, अथवा नासिकाद्वारा खालिस सरसों का तेल पिलावै अ-
थवा उसके सिर में से दो चार जुंए निकाल कर उसके कानमें
डालदे, अथवा राईको पानीमें पीसकर उसके अण्डकोषोंपर मलै।
अथवा एक सेर पानीमें थोड़ीसी इमली पीसकर पिलादे, अथ-
वा खीरा वा ककड़ीके बीज समान भाग लेकर पानीमें पीसकर
पिलादे, अथवा लोटेमें पानी भरकर घोडोकी योनिके पास टोंटी
द्वारा धीरे २ पृथ्वीपर गिरावे और मुख से सीटी बजाता रहे ।
दूसरी कुरकुरी-इसमें घोडेका मूत्र और लीद दोनों बन्द हो
जाते हैं, बारबार पृथ्वी पर लेटता है और बगलोंकी ओर झांक
ता है पेट में दर्द होता है ।
पहली दवा-सोंठ और काजल समान भाग लेकर गोमूत्र में
रिगडकर बत्ती बनाले और इसको घोडे वा घोडी के मूत्रस्थान
में रख देवे ।
दूसरी दवा-सैंधा नमक, पीपल, नीम की छाल; नागरमोथा