सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
शालिहोत्रम्: अश्वशास्त्र (महर्षि शालिहोत्र - प्राचीन भारतीय अश्व-चिकित्सा एवं लक्षण विज्ञान)

शालिहोत्रम्: अश्वशास्त्र (महर्षि शालिहोत्र - प्राचीन भारतीय अश्व-चिकित्सा एवं लक्षण विज्ञान)

Shalihotram Ashvashastra of Maharshi Shalihotra

महर्षि शालिहोत्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished130 पृष्ठ

पृष्ठ 76, कुल 130 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 76

शालिहोत्र । ५७
जो कमर में सूजन होजाय या फट जाय तो यह दवा लगावे
लछाव की पत्ती, तिली का तेल और पानी तीनों को सेर सेर
ले एक देगची में चढादे जब पत्ती जल जाय और पानी भी
जल जाय तेल रह जाय तब उसे बर्तन में रखले और उसकी
कमर से मला करे । यह दवा और दर्दोंको भी लाभकारक है।
दूसरी दवा-शहद १ तोला; कपूर ३ माशे इन दोनोंको मिला
कर मले; ऊपर से बकरीकी नरम खाल बांधकर धूपमें खडाकर
दिया करे परन्तु खाल नित्य ताजी बदल दिया करे, १० दिन
तक ऐसा करने से आराम हो जाता है ।
बादगीरा का इलाज-इस रोगमें वादीके कारण घोडेकी कमर
में दर्द होने लगता है इससे वह पेट को लटकाता है, पीठको
झुकाता है और पीठ और पेट दोनों सूखने लगजाते हैं ।
पहली दवा-कडवा तेल आघपाव, भिलावा आघपाव इन
दोनोंको कढाईमें चढा खूब जलाले, फिर नीलाथोता दो तोले
रस कपूर दो तोला इन दोनों को पीसकर दो पोटली बनावे
और इस तेल में भिगोकर गरम कर करके रीढ से पीठ तक
सेकै यह दवा एकही दिन की जाती है ।
दूसरी दवा-तिल के तेल से सेकै फिर तिल का तेल और
जवाखार दोनों को पानी में औटा कर पिलावे ।
तीसरी दवा-गरम पानी के साथ साबुन लगा कर धोवे ।
चौथी दवा-दूध और नमक को औटाकर मले ।
पांचवीं दवा-सरेस को पानी में पका कर लगावे ।
छठी दवा-कुटकी आघपाव, सोंठ आघपाव, कमीला आघ-