शालिहोत्रम्: अश्वशास्त्र (महर्षि शालिहोत्र - प्राचीन भारतीय अश्व-चिकित्सा एवं लक्षण विज्ञान)
Shalihotram Ashvashastra of Maharshi Shalihotra
महर्षि शालिहोत्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंशालिहोत्र। ४१
तीसरा जुल्लाब-आधसेर पानी में आधपाव सूरती तमाखू खू-
ब कूटकर मसल डाले और छानकर पानी पिलादे, पिलाने के
पीछे पसीना निकले वा न निकले गद्दो मार देवे जिससे घोडा
बैठने न पावे । और शोरा का पानी मूत्र के स्थान पर लगाना
उचित है ।
चौथा जुलाब-पीपल, पीपला मूल, कसौंदी के बीज, काली-
मिरच और सोंठ इन सबको समान भाग लेकर कूट कर कपड-
छन करले और इसमें से डेढ छटांक लेकर गौ के दूध में मिला
कर पिलाना चाहिये ।
तीसरी कुरकुरी-जब घोड़ा डाभ (दर्भा) खा लेता है तब
वह उसकी आंतो को छीलने लगती है ऐसा होने पर घोडा
अपनी दुम को बार बार मलता है और बार बार बेचैनी से
पृथ्वी पर लेटता है ।
इस रोग में सेर भर गर्म दूध में आधसेर कडवा तेल मिला-
कर नाल में भरकर पिला देवे।
चौथी कुरकुरी-इसमें घोडा होठों को थप थपाकर मलता है
और हवा पी पीकर राह चूकताहै। अपनी स्वाभाविक बातोंको
भूल जाता है, मुख की शक्ति बन्द हो जाती है।
पहिली दवा-घोडे के तालु में गुड की एक चकती
चिपका देवे ।
दूसरा उपाय-ताजे नीमकी लकडीकी लगाम मुखमें लगादे।
तीसरा उपाय-भुना सुहागा छः माशे, गुड आधपाव दोनों
को पावभर पानी में मिला कर पिलादे ।
पांचवी कुरकुरी-इसमें घोडेकी आंतें स्थानसे अलग होजाती