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शालिहोत्रम्: अश्वशास्त्र (महर्षि शालिहोत्र - प्राचीन भारतीय अश्व-चिकित्सा एवं लक्षण विज्ञान)

Shalihotram Ashvashastra of Maharshi Shalihotra

महर्षि शालिहोत्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished130 पृष्ठ

शालिहोत्र ।
इसी प्रकार तीन दिन तक दोनों समय करे और संगवाद का
बफारा दे ।
सुमसे रस जारी करने का उपाय-अजवायन और गुड वरावर
ले और इसका चौथाई सुहागाले, सबको कूटकर उसकी पत-
लियोंमें भर दे और एक टाटकी थैला बनाकर उसमें सुमको
रख दे इसी प्रकार तीन दिन तक बन्द रहने दे और जब गलि-
लियों का खोखलापन साफ होजाय तब खारी नमक और कच्चा
सुहागा छः छः दाम कूटकर भर देवे ।
दूसरी दवा-कुटकी, भुनाहुआ सुहागा और फिटकरी तीनों
कूट कर पुराने गुडमें मिलाकर चालीस गोली बनावे और पानी
के पीने से दोघडी पहिले एक गोली देवे पानी पीने के वक्त
कायजा रक्खे जिससे पानी कठिनतासे पीवे और पानी पिलाने
के बाद कायजा घोल डाले ।
रस उतरना-बहुधा घोडे तथा और पशुओंका भी पैर फूल
जाता है और रस बहने लगता है बहुधा घोडोंके पैरके ऊपरसे
और सुमके पुतलीसे रस बहा करता है, उस दशामें नित्य दोनों
समय नीम के पानी से पैरको धोवे और सडी हुई पुतली को
चाकू या सुमसे तराशके काटकर फेंक देवे और नीचे लिखा
मरहम लगावै ।
मोम और चर्बी दोनेको समान भाग लेकर रेंडीका तेल दूनाले
इन सबको चुराकर पैसा भर तूतिया और अधेलाभर कपूर
मिलाकर काममें लावै ।
दूसरी-तारपीनका तेल आधसेर, गन्धकका चूर्ण तीन पाव

७२ शालिहोत्र ।
शीरा एक पाव, शहद पाव भर और सत्तू आवश्यकतानुसार
मिलाकर छटांक भरकी गोली बनाले और दिनमें दो बार
घोडे को खिलावै ।
चौथी दवा-तारपीनका तेल आधपाव, साबुन आधपाव, जीरा
पानभर; अद्दरख आधा छटांक और सत्तू जितना आवश्यक हो
मिलाकर सब की तीन गोली बनावै और दिन भरमें तीन बार
घोडे को खिलावै ।
वोगमा और कैसरजादका इलाज ।
जो किसी घोडेको चांदनी मार जाय तो दोनों आंख
बैठ जाती हैं, सिरसे पांवतक तशनुज होजाता है तथा तमाम
शरीर तखते की तरह हो जाता है, इस बीमारी में
घोडा दाना घास छोड देता है क्योंकि उसको मुँह हिलाने
में भी कष्ट होता है यह भी एक प्रकार का वात रोग
है. इसमें जब तक मुँह रहता हैं तब तक इलाज हो सकता है ।
पहिली दवा-एक जवान मुर्गेके दोनों पंख और पांव काट
कर शेषको उवाल कर खरलमें डालकर कूटले, फिर उसमें
पाव भर काली मिरच महीन पीसकर मिलादे और सेर भर
उत्तम शराब में एक सेर महेला के साथ खिलावै और गरम
पानी पिलावै ।
दूसरी दवा-एक छपकली के हाथ, पांव और पूंछ काटकर
शेषको खरल में कूटकर आटे में मिलाकर खिलावै और दोनों
कान पुरानी रुई से बन्द करदे ।
तीसरी दवा-शिगरफको पीसकर उसकी पूंछकी नोंक चीरकर

शालिहोत्र । ५७
उसमें भरदे और एक तोला पारा दोनों कानों में डाल कर
पुरानी रुईसे बन्द करदे और चार पांच फेर बन्दूक की कान
पर करे।
दोगमाका इलाज-इसमें घोडेको सिरसे पैर तक पसीना
जारी हो जाता है. यह वडा कठिन रोग है, इसके लिये यह
दवा करे।
उपलेकी राख जब तक पसीना न सूखै तब तक शरीर से मलै
और दोनों कानों के सिरों पर दो गुल देवै।
दूसरी दवा-मिरच आधपाव; हरताल टका भर और अकर-
करहा छटांक भर सबको पीसकर ४० दिन तक सेर भर शराब
में मिलाकर पिलावै।
दीवानगोका इलाज-जो घोडा अपने हाथ पैर और सीना
आदिको अपने आप काटै तो जानों कि पागल होगया है।
दवा-अंगोज सीर अर्थात् लहसन, सोंफकी जड, अजवायन
सेंधानमक. ढाकके बीज. सेंहुडके बीज सब नौ २ दिरमले और
गुलकन्द सेरभर सबको कूट छानकर

८८ शालिहोत्रम् ।
बनावै और प्रतिदिन एक गोली प्रातःकाल खिलावे रातिव
खाने को न दे गर्म पानी पिलावै जो दस्त आने में देरी हो तो
तहिलास खिलावै और जो बहुत दस्त आवै तो ठण्डे पानी से
सोंठ की गोली बांधकर खिलावै और ऊपर से एक नीबू
खिलादे ।
ज्वरों का वर्णन- ज्वर में शरीर गरम होजाता है, घोडा सुस्त
रहता है , न कुछ खाता है और न कुछ पीता है, मूत्र कारंग
बदल जाता है । ज्वर में सब से पहिले जुलाव दे ।
पहिली दवा- टारटार एमटिक आधा ड्राम, कपूर आधा
ड्राम और शोरा दो ड्राम उदमें थोडी सी अलसी की खली
और शीरा मिलाकर गोली बनाले और दिन में दो बार
खिलावै ।
दूसरी दवा-कपूर और सुर्मा प्रत्येक अधेलाभर और शोरा
तीन पैसाभर इनमें शीरा और मैदा या आटा मिलाकर गोली
बनाले । प्रति दिन एक या दो गोली खिलावै ।
तीसरी दवौ-सुर्मा आधा पैसा भर, सीरा डेढ पैसा भर और
काला नमक एक पैसा भरले इनमें थोडा शहद मिलाकर
गोली बनाले और प्रतिदिन दो बार घोडे को खिलावै । यह
इनफूंएंजा नामक ( शीत ) ज्वर पर बहुत लाभदायक है ।
सन्निपातज ज्वर-यह ज्वर घोडेको अचानक उत्पन्न होजाता है
और यदि हसका उपाय शीघ्रही न किया जाय तो घोडा मर
जाता है । इस ज्वर में घोडे की नाडी तेज चलती है, नाक के
भीतर सुखीसी दिखलाई देती है सामने की टांगे तनी हुई सी

शालिहोत्रम् । ८९
रहती है, श्वास अधिक वेग से चलने लगता है और शरीर
गरम होजाता है ।
पहिली दवा-सुर्मा घेचाभर और डिजिटेलिस, शोरा और
काला नमक प्रत्येक एक पैमा भर इन सबको थोडे शहद में
मिलाकर एक गोली बनाले और ऐसी एक २ गोली प्रत्येक
आठ घण्टे के पश्चात् घोडे को खिलावे तो आराम हो ।
दूसरी दवा-शोरा दो पेसेभर और टार्टयमेटिक आधा पेसा
भर दोनों को मैदा और शीरा में मिलाकर गोली बनावे और
दिन में दो वार खिलावे ।
तांसरी दवा-इयलप्यम ४५ रत्ती, टार्टयमेटिक ४० रत्ती,
डिजिटेलिस १० रत्ती, और मुलहटी चार पेमाभर इन सबको
शहद में मिलाकर एक गोली बनाले और ऐसी एक २ गोली
प्रत्येक छः घण्टे पश्चात रोगी को खिलावे ।
चौथी दवा-कार्बोनेट आफ यमोनियां डेड ड्राम अफीम एक
ड्राम और सोंफ आधा आउंस इन सबको थोड़ा शीरामें मिला-
कर गोली बनाकर दिन में दो वार खिलावे । यह दवा उस
समय देनी चाहिये जब कि बीमारी बहुत बढ़ जाय और फें-
फड़ा सड़ने लगे ।
कफज ज्वर का इलाज-इस ज्वर में शरीर गरम होजाता है,
मुंह से कफ निकलता है ।
पहिली दवा-डिजिटेलिस आधा ड्राम, कपूर एक ड्राम; सुर्मा
एक ड्राम, अलसी की खली एक दाम और शोरा तीन दाम
इन सबको मिलाकर एक गोली बनावे और ऐसी १ दो गोली
दिन में दो बार घोड़ा को खिलावे ।

६० शालिहोत्रम् ।
दूसरी दवा-जङ्गली प्याज छदाम भर, हिंगडा पैसाभर और
अफीम छदामभर इन सबको मिलाकर एक गोली बनावे और
प्रतिदिन रात को एक गोली खिलावे ।
तीसरी दवा-गन्धक दो पैसाभर, हींग आधी छटांक, मुलहटी
का चूर्ण आधी छटांक, और तारपिन का तेल आधी छटांक,
इन सबको मिलाकर चार गोली बनावे और प्रतिदिन रात को
एक गोली खिलावे ।
चौथी दवा-मुलहटी का चूर्ण दो पैसाभर, जौ का चून आधी
छटांक और कोलतार छदाम भर इनमें थोड़ा शहद मिलाकर
एक गोली बनावे और ऐसी ऐसी एक गोली प्रतिदिन रात के
समय दे ।
कंवल रोग का वर्णन-उस रोग में घोडे के नेत्र पीले पड
जाते हैं, मूत्रका रङ्ग पीला तथा गाढा हो जाता है, दाना खाने
से घोडे को अरुचि होजाती है दस्त साफ नहीं होता है और
कभी २ बन्द हो जाता है ।
जो दस्त साफ न होता हो तब यह दवा करे:-
पहिली दवा-कैलोम्यल एक ड्राम, सुर्मा दुकराभर और मुस-
ब्वर धेलाभर सबको शीरा में मिलाकर एक गोली बनावे ।
चार २ पांच पांच घण्टे के पीछे ऐसी ऐसी एक एक गोली
जबतक दस्त न हो तबतक दे ।
दूसरी दवा-मुसब्बर धेलाभर और कोलोम्यल एक ड्राम इनको
शीरा में मिलाकर एक गोली बनाले और ऐसी ऐसी दो गोली
दिनभर में दो बार खिलावे ।

शालिहोत्रम् । ९१
प्रमेह रोग-इसमें धातु गिरती है इसके लिये यह दवा दे (१)
कतिला देवे । (२) कृत्या, केलाकी जड और कतिला प्रातः-
काल देवे (३) सफेद जीरा अथवा मुली की जड का चूर्ण
बनाकर दे ।
गांठ फूट जाना-बहुधा घोड़ों का गांठ फूल आता है और
पीछे फूट भी जाता है और बहा करता है, इस दशा में घोडे
को बांध रखना चाहिये ।
पहिली दवा-फिटकरी और चीनी के बर्तन का टुकड़ा दो
नों को पीसकर पानी में सानले, न बहुत गाढा हो न बहुत
पतला फिर इसका लेप करे ऊपर से पत्ती रखकर पट्टी बांध
दे (बहुधा इस लेप में काजल भी मिला लेते हैं।)
कृमि रोग-बहुधा घोड़े के पेटमें कीडे पडजाते हैं, जो दस्त
में भी निकला करते हैं, इससे भूख बन्द होजाती है ।
इसकी दवा-नमक दो पैसाभर, जुन्तआना पैसाभर, लोहेका
जङ्ग पैसाभर सभैन धेला भर और शीरा थोडा सा ले इन सब
चीजों को मिलाकर गोली बनावे, सात दिन तक सबेरे के
समय एक गोली दे और इसके पीछे जुलाब दे ।
दूसरी दवा-काली जीरी और नीम की पत्ती खिलाना भी
बहुत उत्तम है।
कुत्ता का काटना-जिस घोडे को कुत्ता काट खाय उसको
मनुष्य की खोपडी का चूर्ण छदामभर, मकोय डेढ रत्ती और
कुछ गुड इनकी गोली बनाकर सबेरे और सन्ध्या के समय
एक एक गोली खिलावे, इसी प्रकार छः सप्ताह तक दे तो
घोडा पागल न होगा ।

९० शालिहोत्रम् ।
मोचका इलाज-जिस घोडे का पांव मोच आने से फूल गया
है । उसके पांव को नौसादर आधी छटांक, और शोरा एक
छटांक आधसेर पानी में मिलाकर उसमें कपडा तरकर उससे
बांध दे और हर समय कपडा को तर रक्खे, जो सूजन और
दर्द अधिक हो तो उस स्थान पर जोंक लगादे, और यदि
आवश्यकता हो तो उस स्थान की फस्द भी खोल सकते हैं।
आंव और दस्तों का इलाज-जो घोडेके दस्त में आंव और
खून आता हो तो उसके लिये यह दवा देनी चाहिये ।
पहिली दवा-मेंहदी की पत्ती आधी छटांक, सूखी बेलगिरी
एक छटांक, कतीरा आधी छटांक और सफेद जीरा आधी
छटांक इन सबको कूट कर मिलाले और आधा सवेरे तथा
आधा सन्ध्या को खिलावे ।
दूसरी दवा-अफीम दुकरा भर; छटी मिट्टी का चूर्ण आधी
छटांक, बबुल का गोंद आधी छटांक और पोदीना की पत्ती
आधी छटांक इन सबको कूटकर एक या दो दफे खिलावे ।
[

शालिहोत्रम् । ६१
दूसरा लेप-पिंच ढाई पाव, पत्थर के कोयलेका तेल तीन छ-
टांक और मोम आधी छटांक तथा थोडा तेलिन मक्खीका चूर्ण
पहिली तीन दवाओं को पिघलाकर फिर तेलिन मक्खी का
चूर्ण मिलाकर लेप बनाले ।
तीसरा लेप-पिंच दो सेर, तारपीन का तेल तीन छटांक और
अलसी का तेल आध पाव इन तीनों को आग पर पिघला
कर लेप बनाले ।
जहरवाद ।
पहिली दवा-मिरच, कसौंदी, अदरख और पान बराबर लेकर
सबको कूटले और छटांक २ भर दिनमें दो बार खिलावे ।
दूसरी दवा-चन्दाल, सोंठ, मिरच, पीपल, कुटकी, वायबिडंग,
चिरायता, सफेद जीरा, नीबकी छाल, काकडासिंगी, काली जीरी
लहसन, गेरू, सोया के बीज सबको तोला २ भर लेकर कूटकर
बुकनी बनाले और आधसेर सत्तू के साथ खिलावे ।
घोडेको जुलाव देनेकी औषध-जो घोडेको साल भरमें एक
बार जुलाव दिया जाय तो कभी बीमारी पैदा नहीं हो सकती
जब जुलाव देना हो तब पहिले दिन घोडे को दाने के बदले
में चोकर पानीमें सानकर खिलावै और दूसरे दिन कुछ न दे,
संध्या समय चोकर दे और तीसरे दिन मामूली दाना दे तीन
दिन सवारी न ले ॥
पहिला जुलाब-मुसव्वर तीन तोले सौंफ दो माशे और वि-
लायती साबुन छःमाशे इनको कूटकर गुलकन्द में मिला गोली
बांधकर खिलावै और टहलावै और जो चाहे कि पेशाब भी

९४ . शालिहोत्रम् ।
खुलकर हो तो कलमी शोरा छः माशे और बबूलका गोंद ६
माशे और मिलाले ।
दूसरा नुखसा-एलुआ, हल्दी और काला निमक तीनों को
पांच तोले लेकर बारीक पीसकर दो गोलियां बांधे । एक गोली
शामको देवै और जो दस्त होने में देर हो तो दूसरी गोली
और दे देवै । जो ज्यादा दस्त हों तो तुलसीकी पत्तीकी गोली
बनाकर देवै या नींवूकी पत्तीमें चार तोले मिरच मिलाकर
खिलावै ।
तोसरा नुसखा-काला नमक एक पाव, सनाय के पत्ता आध
पाव सोंठका चूर्ण आधी छटांक इन द्रव्यों को एक सेर चावल
के गरम मांद के साथ खिलावै ।
चौथा नुसखा-अण्डीका तेल एक पाव और नमक एक पाव
इनको आध सेर अलसी के मांठमें मिलाकर पिआदे ।
जुलाबके दस्तों को बन्द करना ।
जो जुलाबसे घोडेको दस्त बहुत आयै और बन्द करने की
आवश्यकता हो तो सोंफ, सफेद जीरा, और कालीमिरच चार २
तोले लेकर कच्ची पकीकर पीसकर गोलियां बना लेवे और एक
गोली दे, फिर थोडी देर बाद दूसरी गोली दे और जो इस
दवा से दस्त बन्द न हो तो भुनी हुई हींग एक तोले; घी चार
तोले और साठी चावल आठ तोले इन सबको पीसकर गोली
बनाकर खिलावे ।
अतिसारका इलाज-जिस घोडेका पेट चलता हो उसको
यह दवा दे:-

शालिहोत्रम् । ६५
(१) भंगकी लुगदी खिलावे (२) सोंठ और सौंफ प्रत्येक
एक दाम दोनोंको आधी आधी भूनले और आधी कच्ची
रक्खे, माई एक दाम घीमें मिली हुई, मोचरस एक दाम
बेलगिरी दो दाम, बंग चार दाम धावे के फूल एक
दामः लोध एक दाम, मीठे इन्द्रजौ एक दाम और मोंठ
एक दाम सबको कूट पीसकर एक सेर खट्टे दहीमें मिलाकर
खिलावे ।
चारों फसलोंकी बीमारियों का इलाज ।
वसंत ऋतु (फस्ल बहार) में घोडेको कफके जोर से बीमारी
होती है इसमें चिकनाई और मिठाई से परहेज रक्खे जिससे
कफ न बढने पावै, सूखी घास और कूएका पानी पीने को
देवे; सबेरे और संध्याको सैर करानी चाहिये तथा यह चीज
खिलावेः-शहद, कुटकी, बांसेकी पत्ती, नीम, सेंधा नमक,
पीपल, शराब आतशी और सेत्रकी पत्ती आदि खिलावै ।
गर्मीके दिनोंका इलाज-इन दिनोंमें घोडेको बहुत गर्मी और
पित्तका जोर होता है, इस लिये जिससे गर्मी बढै वह चीज न
देनी चाहिये, पोइया या सरपट दौडावे, दिनमें दो तीन वार
पानी पिलावै दाना कम कर देवें, बदन को धोता रहै, थान
ठण्डा रक्खेः पानी, मट्ठा, हरी घास, खिलावे और ठण्डी
दवा देवै । गर्मी के दिनों में घोडे को तीन प्रकार की बीमारियां
होती है ।
पहिला-जब घोडेका बदन गरम हो, रंग कांपता हो दोनों
कूखतनी रहें, बुतानेका रंग पीला रहें धीरे २ बदन सूखता
जाय, सुस्त रहै और भूखसे खाना न खावै तौ यह ताव खा-

९८ शालिहोत्रम् ।
जानेकी पहिचान है, इसके लिये यह दवा करे:-सोंठ, पीपल,
काली मिरच, छोटी इलायची के दाने, जवाखार, सज्जी भूनी
हींग बराबर २ लेकर कूट छानकर रखले फिर देवदारू और
शीशम दोनों की लकड़ी पाव २ भर पानी में उबाले जब दो सेर
पानी रहै तब छानकर उस चूर्ण को मिलाकर पिलावै, जो दस्त
आवै तौ अच्छा है ॥.
दूसरी बीमारी का इलाज-दूसरी बीमारी वह है जिसमें घोडे
का लिङ्ग खोलीसे बाहर निकल आता है और सूजन होजाती
है' घोडा बार २ गरम श्वास लेताहै, चांदनी को देखकर डरता हैं
मार्ग नहीं चलता है, पानीसे उसका जी नहीं भरता है आंखों
को मुश्किलसे खोलता है,तालू और जीभका रंग पीला पडजाता
है, नाक और मुंहसे पानी जारी होजाता है इसमें भी पहिला
सा इलाज करें । तीसरी बीमारी का इलाज-जो मुंहसे लुआब
जारी हो तौ उस वक्त पावभर भंगकी लुगदी बनाकर खिलावे ।
पेशाब में गाढापन होनेका इलाज ।
जिस घोडे को पेशाब गाढेपन के साथ होवे उसको यह
बीमारी सात दिन से अधिक न बढ़ने दे अर्थात सात दिन
इसका इलाज करे ।
दवा-त्रिफला, सफेद जीरा और कतीरा तीनोंको बराबर ले
कूट छानकर आध पाव सबेरे दाने से पहिले और आध पाव
संध्या को दानेके पीछे खिलावै और ऐसो दवा न करना चाहिये
जो गरम होवै और पेशाब के गाढेपन में जर्दी होवै तौ अदरख
और काली मिरच दाने के बाद देना चाहिये ।
वे वक्त पानी पिलाने से बीमारी होवै उसका इलाज ।
जब घोडा मंजिलका चला और दौडा हुआ आवै तब उसको

शालिहोत्रम् । ६७
पिलाना न रक्खे किन्तु उसी समय ठण्डा करके पानी पिलावे
जिससे दाना घास अच्छी तरह खाय और जो घोडे को बिना
ठण्डा किये पानी पिला देवे तो रुधिर जोश खा जाता है और
शरीर गरम होजाता है और कभी२ लीद और पेशाबभी बन्द
होजाताहै और आंखोंसे पानी जारी होजाता है ।
जो ऐसा हाल हो तो कस्तसीरी और तिल का तेल दोनों
को गुनगुना करके मालिश करे ।
दूसरी दवा-अरण्डकेपत्ते और गोबरकी पोटलीका सेककरे ।
तीसरीदवा-ढूंडीकेपास नश्तरदे और शहदका शर्बत पिलावे ।
रातिब हजम होनेका इलाज-अदरक आधा पाव, काली मिर्च
आधापाव, पीपलामुल, आध पाव, गिरी छटांक भर, बादाम की
मिंगी आधापाव, लोंग छटांकभर, गुजराती इलायची छः दाने
सोंठ छः टंक, तज छटांकभर और पान सात सौ सबको कूटकर
तीन भाग करे और एक२ भागको दिनमें तीन २ वार खिलावे
और दवाके बाद पहर भर क़ायजा रक्खे ।
बछेडेको मलीदा खिलानेकी रीति ।
सेरभरचनेके चूनकीरोटी बनाकर सेरभरदूधमें मललेऔर उसमें
सेरभर बूरा मिलाकर पानीपीनेकेबाद चालीसदिनतक खिलावे ।
बुड्ढे घोडेके। कल्ला खिलानेका इलाज ।
बकरीके दोचारकल्ले मंगाकर आगमेंमुलमुलाले,फिरमांसकोहड्डी
से अलगकर पानीके साथ देगचीमेंभर चूल्हेपर चढ़ादे और हाथों
से मलता रहे तथा आग मन्दी २ जलावे जब घी ऊपर आजावे
तब उसे महेले के साथ चालीस दिन तक पानी पीने के पीछे
घोडे को खिलावे ।

६८ शालिहोत्रम् ।
मेथी खिलाने की तरकीब-जो मेथी के साथ महेला दिया
जाय तो बहुत लाभदायकहै । तथा सोंठ चार भाग और मेथी
एक भाग पकाकर जाडेके दिनोंमें खिलावे मेथी कम खिलावे ।
हल्दी खिलाने की रीति-आधपाव हल्दी को कूटकर खालिस
दूध में आठ पहर भिगोवे फिर दूसरे दिन निकाल कर मलकर
हलुवा बनाकर खिलावे, और दूसरे दिन से हल्दी को थोडी२
बढाता जाय यहां तक कि पांचवे दिन पूरी पावभर होजाय ।
इसी प्रकार चालीस दिन तक हल्दी घोडे को खिलावे ।
अद्रख का हलुवा खिलाने की रीति ।
यह हलुवा, जवान; बुड्ढे और बछेडे सब प्रकार के घोड़ों को
मोटा करने के लिये लाभदायक है, इससे शरीर की कान्ति
बढ़ती है. इस हलुएको जाडे और चौमासे में खिलावे तो घोडा
कभी दुबला न हो ।
हल्दी, अद्रख और मेथी प्रत्येक ढाईसेर लेकर सबको महीन
पीसले फिर इनमें घी डालकर अग्नि पर चढा कर भूनले किन्तु
बहुत लाल न हो जाय फिर उसमें शक्कर पांच सेर
और गाय का दूध दस सेर मिलादे और चमचे से चलाता रहे
जब हलुआ तैयार होजाय तब उतार कर एक बर्तन में रखले
और पानी पिलाने के पश्चात् पावभर खिलावे तथा क्रमशः
बढ़ाता हुआ सेर भर की खुराक तक पहुँचावे ।
खांड खिलानेकी विधि-खांड खिलानेसे भी घोडा बहुत मोटा
होजाता है कि जितनी मोंठ हो उससे चौथाई खांड मिलाकर
घोडे को नित्य खिलावे-यह प्रयोग पाचन शक्ति को बढाता है।

शालिहोत्र । ६९
हाजमे का चूर्ण - जिस घोडे की पाचनशक्ति ठीक न हो उसको
दवा रातिब खिलाने के पश्चात् नित्य देवै ।
दवा-कचरी, राई बेंगलामला, सोंठ घोडावच, हर्रा पाक सोंजर
और कालानमक सबको बराबर लेकर कूट छानले और उसमें आध
पाव चूर्ण महेले में मिलाकर घोडेको खिलावैं और कायदा रक्खै !
पचलोटा बनाने की विधि-यह नुसखा सूजन, बादी और
कफ को बहुत लाभदायक है इससे घोडा मोटा होताहै और पाच-
न शक्ति ठीक होती है ।
कालीजीरी, चीता, सोंठ, पिरन, घोडावच, त्रिफला, बायविडंग
पीपल, सेंधानमक, खारो नमक, राई, भुनी हींग; कचरी अज
वायन, हल्दी, भुनीहुई फिटकरी, भुना हुआ सुहागा; कुटकी,
जवाखार; कवत्रोल और सोंजर सबको कूट छानकर चूर्ण बना
कर रातिब के बाद घोडा को खिलावै और इसकी मात्रा चार
दामकी हैं महेले के साथ । जिसको बादी का रोग हो, जिसको
नालकी तकलीफ हो जो बादगीरा अथवा जोगीरा से पीडित
हो उसको बेसन में मिलाकर यह चूर्ण खिलावै । इस प्रकार
सात दिनतक खिलावै तो सब बीमारी दूर हों । यदि इसनुसखे
में सुहागा न डाला जाय तौ उत्तम है क्योंकि इससे रस जारी
हो जाता है ।
फरियाद रस चूर्ण-इस चूर्णसे बादा, कफ, गर्मी और दम ये
बन्द होजाते हैं:-जोग पावभर, हरड, बहेडा, आंवला आधसेर
सोंठ, पावभर अजमोद, पीपला मूल, जवाखार घुडवच, बाय-
विडंग, तवाखीर, काला गुगल और मग़जफ्लूस प्रत्येक पाव २
भर, सोंफ एक सेर, बेलगिरी आध पाव मरोडफली, फिटकरी

१०० शालिहोत्रम् ।
कलोंजी, अस्पन्द, सांभर नमक, कुटकी, मिरच, हलहुल के बीज
विलायपापडा, काकडासिंगी, कडेसर, काला जीरा; सुहागा, सों-
चर नमक हल्दी वंग प्रत्येक आध २ पाव कचरी और मेथी
प्रत्येक आध २ सेर सएजने की छाल, चार सेर और लोध आध
पाव इन सबको कूट छानकर आध २ पाव की मात्रा दाना देनेके
पहिले घोडे को खिलावै अगर दाने के पीछे दे तो भी कुछ हर्ज
नहीं है ।
हूत्रनिगार बनाने की विधि-राई, वन्दाल, हींग पीपल, भिला-
वा डींग चीता कुटकी तिल और अदरक इन सबको कूटकर
बेर की बराबर गोली बनावे । एक गोली नित्य संध्या के समय
खिलावै और कायदा रक्खे ।
सादिकुलनफा चूर्ण-त्रिफला, सोंठ, लालमिरच, सोवा, हुलहुल
के बीज, गुरच, जंगी हरड प्रत्येक पावभर, अजवायन और क-
चरी प्रत्येक एकसेर, असगंध, पीपलामूल, चीता, बेलपस, अक्र-
रकरह, इन्द्रजौ, पीपल और शातरा प्रत्येक एक २ छटांक घुड़-
वच सज्जी काला नमक, सोंफ कत, मूली के बीज, मैनफल,
कालेसेर वन्दाल प्रत्येक आध २ पाव, राई सवासेर, कुटकी सवा
सेर, हल्दी लहसन और खारी प्रत्येक आधसेर सांभर नमक
तीन पाव हींग तीन दाम और पोहकर मूल तीन दामले । सबको
कूटकर और छानकर तीन सेर सिरके में भिगोकर सुखाले और
एक छटांक रातिव के पश्चात् नित्य खिलावै ।
मुफ्ताहुलनफा चूर्ण-राई अजवायन बहेड़ा हरड सरशफ
असवन्द, मुसव्वर, बोल, अजमोद, काकडासिंगी, अंजीर के बी-

शालिहोत्र । १०१
ज, कचरी. मेथी, मस्तंगी,बङ्ग, अदरख, गुगल, कुचला, इलायची,
पीपल लोंग, स्याहजीरा, सफेदजीरा, अरनी, असगन्ध, धाय के
फूल, कवांच के बीज,इन्द्रायणकी जड, जायफल, कवावा, इन्द्र-
जौ, तज, अतरज, आंवला, गिलोय, भङ्ग, भारङ्गी, भिलावा,
हल्दी, सोंठ, सोंफ, सतुआ, गन्धक, वायविडंग, काली मिरच,
घुड़बच, वेलगिरी, खारी नमक, असखार; सांभर नमक, सज्जी,
जवाखार, काला नमक, सहजने की छाल, चिरायता, देवदारू,
दारुहल्दी, जंगली कनेर की छाल और पोहकर मूल सबको
आध २ सेर ले और जायफल टकाभर ले सबको मिलाकर
कूट छानकर नीबू के अर्क में भिगोकर सुखाले, फिर दही में
भिगोकर सुखाले इसमें से प्रतिदिन आठ या नौ दिरम गुड के
साथ खिलावे और जो किसी प्रकार की बीमारी हो तो सत्तू
के साथ दाना खाने के पश्चात् खिलावे ।
रूमी चूर्ण-यह चूर्ण बहुत लाभदायक है, इससे जहरवाद
बादो और कफ आदिक अनेक रोग दूर होते हैं तथा यह
प्रत्येक ऋतु में लाभदायक होता है ।
दवा-अजमोद, चिरायता, जवाखार, काकडासिंगी, कूट वि-
लास पापडा, कुटकी, तीखर, पापल, सम्हालू के पत्ता, गुगल,
चीता, मरोड़फली, पीपलामूल प्रत्येक पावभर प्याज, बन्दाल
हल्दी, सोंठ, हर्रा, बहेडा, कचरी, सहजनेकी छाल और पोदीना प्रत्ये
क एकसेर, सेंधा नमक, काला नमक, सांभर नमक, पांगा नमक,
घुड़बच, सज्जी, राई, काली जीरी; अदरख, कालीमिरच, इन्द्रजौ
देसी अजवायन, गिलोय, वेलगिरी, भंग, मँगरेला, दोनोंजीरे,नीम
के पत्ता, बकायनका पत्ता, इन्द्रायनका सूखा फल और छोटी हरड

१०२ शालिहोत्रम्।
प्रत्येक आध २ सेर, फिटकरी और सुहागा भुना हुआ, कुचला
आधापाव, भुनी हुई हींग छटांकभर; सबको कूटछान कर रखले
और दाना देने के पश्चात् सत्तू के साथ आधापाव चूर्ण
खिलावे और एक पहर पर कायजा रक्खे।
सम्बुलखारकी गोलियां-जहरवाद और कुरकुरी आदि सबको
फायदा रखती है :-
दवा-बचनाग, सम्बुल, हरताल, संगरफ, संगरेजा सोंठ, लोंग,
सुहागा, काली मिर्च; प्रत्येक एक तोला और अदरख पांचसेर
ले अदरख को कूटकर उसका अर्क निकालले और उसमें शेष
सब दवाइयोंको कूटकर खरलमें डालकर अदरखके अर्कके साथ
सात दिनतक घोटे और ऐसी बारीक करे कि सुर्माभी उसके
सामने कुछ न रहे जो अदरख न हो तो पानके अर्क में ही घोट
ले खरल भी पक्के पत्थर का हो जिससे दवा में पत्थर का अंश
न आजाय, फिर चनाकी बराबर गोलियां बनाले, जब आवश्यक-
ता हो तब छटांकभर गेहूं के चून की रोटी बनाकर उसमें एक
गोली को पीसकर रखकर घोडे को खिलादे. दाना खिलाने के
बाद सन्ध्या समय घोडे को खिलावे ।
मरहमकी बनाने का विधि-राल पावभर, मोम टकाभर, शीशम
का तेल सेरभर ले, तेलको लोहे की कढाई में नीमकी सेरभर
पत्ती डालकर जलादे, जब पत्ती जलजाय तब निकालकर फेंक
देवे, फिर राल और मोम डालकर नीमकी लकडी से घोटे,
तदुपरांत पानी से पचास बार धोकर रखले यह मरहम सब
प्रकार के घावों को लाभदायक है।

शालिहोत्र। १०३
मरहम जंगार बनानेकी विधि-यह मरहम नासूरके लिये बहुत
ही लाभ दायक है; चाहे मनुष्यके नासूर हो और चाहे घोडे के
सबको लाभ देता है।
नीमकी हरी पत्ती आठ दाम, मोम, राल, जंगार; प्रत्येक एक
दाम, साबुन पांच दाम, तूतिया चार रत्ती इनको कूट छानकर
रक्खे, फिर गर्मियों में पावसेर तिलका तेल और जाडे में कडवा
ले नीमकी पत्तियों को डालकर जलावै, जब जल जांय तब
पत्तियों को निकाल कर फेंक देवे और उक्त सब दवाओं को
छानकर धीरे २ मिलावे, नहीं तो गोली बंध जायगी और दवा
बिगड जायगी।
मरहम ददरेजा के बनाने की विधि-काला जीरा, तूतिया;
भिलावा, हरताल, समुद्र चक, दारुहल्दी और जवाखार पचीस
२ दाम ले, पावसेर तेलको कढाई में चढाकर जोशदे, फिर
उतार कर सब दवाओं को कूटकर धीरे २ नीमकी लकडी से
चार पहर तक घोटे यह तेल सब प्रकार के घाव, नासूर, तंग
और पीठ के घाव सबको दूर करता है।
आश्चर्य जनक नुसखोंका वर्णन।
पहिला नुसखा-अगर घोडेकी भौरी दूर करनी हो तो उस
जगह की खाल काटकर वहां सिन्दूर और तेल मिलाकर
लगावे जब तक घाव न भरै तब तक बराबर इसी उपाय को
करता रहे।
दूसरा नुसखा-चूना और सज्जी दोनों को पानी में मिलाकर
भौरी पर लगावै तो यह रोग दूर होता है; लगातार २ चार
दिन तक यही उपाय करे।

१०४ शालिहोत्रम् ।
तीसरा नुसखा-जो घोडा आग या बारूद से जल जाय तो
उसके घावको प्याजके पानीसे धोया करै. मनुष्यों के लिये भी यह
लाभदायक है बरसाती भी इससे दूर होती है।
चौथा नुसखा-जो घोडे के घावसे रुधिर बहना बंद न होतो
मकडीका जाला लेकर उस जगह पर लगावै अथवा सुहागे के
चूर्ण को घाव पर छिडके ।
पांचवां नुसखा-यदि घोडेके घावको नीमके पानी अथवा आद
मी के मूत्र से धोवै तो बहुत लाभदायक है ।
छठा नुसखा-जिस घावमें कीडे पड गये हों उसमें सूखा
तम्बाकू भरना उत्तम है अथवा कुटकी पीसकर भरै ।
सातवां नुसखा-जब इन्दमालका घाव होजाय तब यह इलाज
करै कि फिटकरी; माई, बडी हरड, अनारको छिलका और
एलुआ भुना हुआ सबको समान भाग लेकर बारीक पीसले
और नित्य घावके मुखपर भरा करै ।
आठवां नुसखा-जो घावपर बाल न जमते हों तो थूक में
कडवा तेल फेंटकर लगावै (२) साबुन और नील मिलाकर
मलै । (३) चमडाको जलाकर उसमें तेल, सिन्दुर और थोडा
साबुन मिलाकर लगावै ।
नवां नुसखा-जो घोडेको सांप काट खाय तो उसको जितनी
वह खा सकै उतनी नीमकी पत्ती खिलावै ।
दसवां नुसखा-जिस घोडेके कफ बहुत गिरता है उसको पीपल
अदरख और काली मिरच तीनों को पीसकर खिलावै ।
ग्यारहवां नुसखा-जिस घोडे की मनी झडती हो उसे कत्था,
केलेकी जड और कतीरा मिलाकर तीन दिन तक देवै ( २ )