शालिहोत्रम्: अश्वशास्त्र (महर्षि शालिहोत्र - प्राचीन भारतीय अश्व-चिकित्सा एवं लक्षण विज्ञान)

शालिहोत्रम्: अश्वशास्त्र (महर्षि शालिहोत्र - प्राचीन भारतीय अश्व-चिकित्सा एवं लक्षण विज्ञान)
Shalihotram Ashvashastra of Maharshi Shalihotra
महर्षि शालिहोत्र द्वारा
DevanagariSanskritpublished130 पृष्ठ
पृष्ठ 106, कुल 130 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 106
शालिहोत्र । ५७
उसमें भरदे और एक तोला पारा दोनों कानों में डाल कर
पुरानी रुईसे बन्द करदे और चार पांच फेर बन्दूक की कान
पर करे।
दोगमाका इलाज-इसमें घोडेको सिरसे पैर तक पसीना
जारी हो जाता है. यह वडा कठिन रोग है, इसके लिये यह
दवा करे।
उपलेकी राख जब तक पसीना न सूखै तब तक शरीर से मलै
और दोनों कानों के सिरों पर दो गुल देवै।
दूसरी दवा-मिरच आधपाव; हरताल टका भर और अकर-
करहा छटांक भर सबको पीसकर ४० दिन तक सेर भर शराब
में मिलाकर पिलावै।
दीवानगोका इलाज-जो घोडा अपने हाथ पैर और सीना
आदिको अपने आप काटै तो जानों कि पागल होगया है।
दवा-अंगोज सीर अर्थात् लहसन, सोंफकी जड, अजवायन
सेंधानमक. ढाकके बीज. सेंहुडके बीज सब नौ २ दिरमले और
गुलकन्द सेरभर सबको कूट छानकर