शालिहोत्रम्: अश्वशास्त्र (महर्षि शालिहोत्र - प्राचीन भारतीय अश्व-चिकित्सा एवं लक्षण विज्ञान)
Shalihotram Ashvashastra of Maharshi Shalihotra
महर्षि शालिहोत्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंशालिहोत्र। १०३
मरहम जंगार बनानेकी विधि-यह मरहम नासूरके लिये बहुत
ही लाभ दायक है; चाहे मनुष्यके नासूर हो और चाहे घोडे के
सबको लाभ देता है।
नीमकी हरी पत्ती आठ दाम, मोम, राल, जंगार; प्रत्येक एक
दाम, साबुन पांच दाम, तूतिया चार रत्ती इनको कूट छानकर
रक्खे, फिर गर्मियों में पावसेर तिलका तेल और जाडे में कडवा
ले नीमकी पत्तियों को डालकर जलावै, जब जल जांय तब
पत्तियों को निकाल कर फेंक देवे और उक्त सब दवाओं को
छानकर धीरे २ मिलावे, नहीं तो गोली बंध जायगी और दवा
बिगड जायगी।
मरहम ददरेजा के बनाने की विधि-काला जीरा, तूतिया;
भिलावा, हरताल, समुद्र चक, दारुहल्दी और जवाखार पचीस
२ दाम ले, पावसेर तेलको कढाई में चढाकर जोशदे, फिर
उतार कर सब दवाओं को कूटकर धीरे २ नीमकी लकडी से
चार पहर तक घोटे यह तेल सब प्रकार के घाव, नासूर, तंग
और पीठ के घाव सबको दूर करता है।
आश्चर्य जनक नुसखोंका वर्णन।
पहिला नुसखा-अगर घोडेकी भौरी दूर करनी हो तो उस
जगह की खाल काटकर वहां सिन्दूर और तेल मिलाकर
लगावे जब तक घाव न भरै तब तक बराबर इसी उपाय को
करता रहे।
दूसरा नुसखा-चूना और सज्जी दोनों को पानी में मिलाकर
भौरी पर लगावै तो यह रोग दूर होता है; लगातार २ चार
दिन तक यही उपाय करे।