शालिहोत्रम्: अश्वशास्त्र (महर्षि शालिहोत्र - प्राचीन भारतीय अश्व-चिकित्सा एवं लक्षण विज्ञान)
Shalihotram Ashvashastra of Maharshi Shalihotra
महर्षि शालिहोत्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंशालिहोत्रम् । ६५
(१) भंगकी लुगदी खिलावे (२) सोंठ और सौंफ प्रत्येक
एक दाम दोनोंको आधी आधी भूनले और आधी कच्ची
रक्खे, माई एक दाम घीमें मिली हुई, मोचरस एक दाम
बेलगिरी दो दाम, बंग चार दाम धावे के फूल एक
दामः लोध एक दाम, मीठे इन्द्रजौ एक दाम और मोंठ
एक दाम सबको कूट पीसकर एक सेर खट्टे दहीमें मिलाकर
खिलावे ।
चारों फसलोंकी बीमारियों का इलाज ।
वसंत ऋतु (फस्ल बहार) में घोडेको कफके जोर से बीमारी
होती है इसमें चिकनाई और मिठाई से परहेज रक्खे जिससे
कफ न बढने पावै, सूखी घास और कूएका पानी पीने को
देवे; सबेरे और संध्याको सैर करानी चाहिये तथा यह चीज
खिलावेः-शहद, कुटकी, बांसेकी पत्ती, नीम, सेंधा नमक,
पीपल, शराब आतशी और सेत्रकी पत्ती आदि खिलावै ।
गर्मीके दिनोंका इलाज-इन दिनोंमें घोडेको बहुत गर्मी और
पित्तका जोर होता है, इस लिये जिससे गर्मी बढै वह चीज न
देनी चाहिये, पोइया या सरपट दौडावे, दिनमें दो तीन वार
पानी पिलावै दाना कम कर देवें, बदन को धोता रहै, थान
ठण्डा रक्खेः पानी, मट्ठा, हरी घास, खिलावे और ठण्डी
दवा देवै । गर्मी के दिनों में घोडे को तीन प्रकार की बीमारियां
होती है ।
पहिला-जब घोडेका बदन गरम हो, रंग कांपता हो दोनों
कूखतनी रहें, बुतानेका रंग पीला रहें धीरे २ बदन सूखता
जाय, सुस्त रहै और भूखसे खाना न खावै तौ यह ताव खा-