शालिहोत्रम्: अश्वशास्त्र (महर्षि शालिहोत्र - प्राचीन भारतीय अश्व-चिकित्सा एवं लक्षण विज्ञान)
Shalihotram Ashvashastra of Maharshi Shalihotra
महर्षि शालिहोत्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें९८ शालिहोत्रम् ।
जानेकी पहिचान है, इसके लिये यह दवा करे:-सोंठ, पीपल,
काली मिरच, छोटी इलायची के दाने, जवाखार, सज्जी भूनी
हींग बराबर २ लेकर कूट छानकर रखले फिर देवदारू और
शीशम दोनों की लकड़ी पाव २ भर पानी में उबाले जब दो सेर
पानी रहै तब छानकर उस चूर्ण को मिलाकर पिलावै, जो दस्त
आवै तौ अच्छा है ॥.
दूसरी बीमारी का इलाज-दूसरी बीमारी वह है जिसमें घोडे
का लिङ्ग खोलीसे बाहर निकल आता है और सूजन होजाती
है' घोडा बार २ गरम श्वास लेताहै, चांदनी को देखकर डरता हैं
मार्ग नहीं चलता है, पानीसे उसका जी नहीं भरता है आंखों
को मुश्किलसे खोलता है,तालू और जीभका रंग पीला पडजाता
है, नाक और मुंहसे पानी जारी होजाता है इसमें भी पहिला
सा इलाज करें । तीसरी बीमारी का इलाज-जो मुंहसे लुआब
जारी हो तौ उस वक्त पावभर भंगकी लुगदी बनाकर खिलावे ।
पेशाब में गाढापन होनेका इलाज ।
जिस घोडे को पेशाब गाढेपन के साथ होवे उसको यह
बीमारी सात दिन से अधिक न बढ़ने दे अर्थात सात दिन
इसका इलाज करे ।
दवा-त्रिफला, सफेद जीरा और कतीरा तीनोंको बराबर ले
कूट छानकर आध पाव सबेरे दाने से पहिले और आध पाव
संध्या को दानेके पीछे खिलावै और ऐसो दवा न करना चाहिये
जो गरम होवै और पेशाब के गाढेपन में जर्दी होवै तौ अदरख
और काली मिरच दाने के बाद देना चाहिये ।
वे वक्त पानी पिलाने से बीमारी होवै उसका इलाज ।
जब घोडा मंजिलका चला और दौडा हुआ आवै तब उसको