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शालिहोत्रम्: अश्वशास्त्र (महर्षि शालिहोत्र - प्राचीन भारतीय अश्व-चिकित्सा एवं लक्षण विज्ञान)

शालिहोत्रम्: अश्वशास्त्र (महर्षि शालिहोत्र - प्राचीन भारतीय अश्व-चिकित्सा एवं लक्षण विज्ञान)

Shalihotram Ashvashastra of Maharshi Shalihotra

महर्षि शालिहोत्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished130 पृष्ठ

पृष्ठ 123, कुल 130 में से

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पृष्ठ 123

१०४ शालिहोत्रम् ।
तीसरा नुसखा-जो घोडा आग या बारूद से जल जाय तो
उसके घावको प्याजके पानीसे धोया करै. मनुष्यों के लिये भी यह
लाभदायक है बरसाती भी इससे दूर होती है।
चौथा नुसखा-जो घोडे के घावसे रुधिर बहना बंद न होतो
मकडीका जाला लेकर उस जगह पर लगावै अथवा सुहागे के
चूर्ण को घाव पर छिडके ।
पांचवां नुसखा-यदि घोडेके घावको नीमके पानी अथवा आद
मी के मूत्र से धोवै तो बहुत लाभदायक है ।
छठा नुसखा-जिस घावमें कीडे पड गये हों उसमें सूखा
तम्बाकू भरना उत्तम है अथवा कुटकी पीसकर भरै ।
सातवां नुसखा-जब इन्दमालका घाव होजाय तब यह इलाज
करै कि फिटकरी; माई, बडी हरड, अनारको छिलका और
एलुआ भुना हुआ सबको समान भाग लेकर बारीक पीसले
और नित्य घावके मुखपर भरा करै ।
आठवां नुसखा-जो घावपर बाल न जमते हों तो थूक में
कडवा तेल फेंटकर लगावै (२) साबुन और नील मिलाकर
मलै । (३) चमडाको जलाकर उसमें तेल, सिन्दुर और थोडा
साबुन मिलाकर लगावै ।
नवां नुसखा-जो घोडेको सांप काट खाय तो उसको जितनी
वह खा सकै उतनी नीमकी पत्ती खिलावै ।
दसवां नुसखा-जिस घोडेके कफ बहुत गिरता है उसको पीपल
अदरख और काली मिरच तीनों को पीसकर खिलावै ।
ग्यारहवां नुसखा-जिस घोडे की मनी झडती हो उसे कत्था,
केलेकी जड और कतीरा मिलाकर तीन दिन तक देवै ( २ )