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शालिहोत्रम्: अश्वशास्त्र (महर्षि शालिहोत्र - प्राचीन भारतीय अश्व-चिकित्सा एवं लक्षण विज्ञान)

शालिहोत्रम्: अश्वशास्त्र (महर्षि शालिहोत्र - प्राचीन भारतीय अश्व-चिकित्सा एवं लक्षण विज्ञान)

Shalihotram Ashvashastra of Maharshi Shalihotra

महर्षि शालिहोत्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished130 पृष्ठ

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पृष्ठ 104

शालिहोत्र ।
इसी प्रकार तीन दिन तक दोनों समय करे और संगवाद का
बफारा दे ।
सुमसे रस जारी करने का उपाय-अजवायन और गुड वरावर
ले और इसका चौथाई सुहागाले, सबको कूटकर उसकी पत-
लियोंमें भर दे और एक टाटकी थैला बनाकर उसमें सुमको
रख दे इसी प्रकार तीन दिन तक बन्द रहने दे और जब गलि-
लियों का खोखलापन साफ होजाय तब खारी नमक और कच्चा
सुहागा छः छः दाम कूटकर भर देवे ।
दूसरी दवा-कुटकी, भुनाहुआ सुहागा और फिटकरी तीनों
कूट कर पुराने गुडमें मिलाकर चालीस गोली बनावे और पानी
के पीने से दोघडी पहिले एक गोली देवे पानी पीने के वक्त
कायजा रक्खे जिससे पानी कठिनतासे पीवे और पानी पिलाने
के बाद कायजा घोल डाले ।
रस उतरना-बहुधा घोडे तथा और पशुओंका भी पैर फूल
जाता है और रस बहने लगता है बहुधा घोडोंके पैरके ऊपरसे
और सुमके पुतलीसे रस बहा करता है, उस दशामें नित्य दोनों
समय नीम के पानी से पैरको धोवे और सडी हुई पुतली को
चाकू या सुमसे तराशके काटकर फेंक देवे और नीचे लिखा
मरहम लगावै ।
मोम और चर्बी दोनेको समान भाग लेकर रेंडीका तेल दूनाले
इन सबको चुराकर पैसा भर तूतिया और अधेलाभर कपूर
मिलाकर काममें लावै ।
दूसरी-तारपीनका तेल आधसेर, गन्धकका चूर्ण तीन पाव