शालिहोत्रम्: अश्वशास्त्र (महर्षि शालिहोत्र - प्राचीन भारतीय अश्व-चिकित्सा एवं लक्षण विज्ञान)
Shalihotram Ashvashastra of Maharshi Shalihotra
महर्षि शालिहोत्र द्वारा
पृष्ठ 121, कुल 130 में से
संदर्भ में पढ़ें१०२ शालिहोत्रम्।
प्रत्येक आध २ सेर, फिटकरी और सुहागा भुना हुआ, कुचला
आधापाव, भुनी हुई हींग छटांकभर; सबको कूटछान कर रखले
और दाना देने के पश्चात् सत्तू के साथ आधापाव चूर्ण
खिलावे और एक पहर पर कायजा रक्खे।
सम्बुलखारकी गोलियां-जहरवाद और कुरकुरी आदि सबको
फायदा रखती है :-
दवा-बचनाग, सम्बुल, हरताल, संगरफ, संगरेजा सोंठ, लोंग,
सुहागा, काली मिर्च; प्रत्येक एक तोला और अदरख पांचसेर
ले अदरख को कूटकर उसका अर्क निकालले और उसमें शेष
सब दवाइयोंको कूटकर खरलमें डालकर अदरखके अर्कके साथ
सात दिनतक घोटे और ऐसी बारीक करे कि सुर्माभी उसके
सामने कुछ न रहे जो अदरख न हो तो पानके अर्क में ही घोट
ले खरल भी पक्के पत्थर का हो जिससे दवा में पत्थर का अंश
न आजाय, फिर चनाकी बराबर गोलियां बनाले, जब आवश्यक-
ता हो तब छटांकभर गेहूं के चून की रोटी बनाकर उसमें एक
गोली को पीसकर रखकर घोडे को खिलादे. दाना खिलाने के
बाद सन्ध्या समय घोडे को खिलावे ।
मरहमकी बनाने का विधि-राल पावभर, मोम टकाभर, शीशम
का तेल सेरभर ले, तेलको लोहे की कढाई में नीमकी सेरभर
पत्ती डालकर जलादे, जब पत्ती जलजाय तब निकालकर फेंक
देवे, फिर राल और मोम डालकर नीमकी लकडी से घोटे,
तदुपरांत पानी से पचास बार धोकर रखले यह मरहम सब
प्रकार के घावों को लाभदायक है।