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शालिहोत्रम्: अश्वशास्त्र (महर्षि शालिहोत्र - प्राचीन भारतीय अश्व-चिकित्सा एवं लक्षण विज्ञान)

शालिहोत्रम्: अश्वशास्त्र (महर्षि शालिहोत्र - प्राचीन भारतीय अश्व-चिकित्सा एवं लक्षण विज्ञान)

Shalihotram Ashvashastra of Maharshi Shalihotra

महर्षि शालिहोत्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished130 पृष्ठ

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पृष्ठ 112

शालिहोत्रम् । ६१
दूसरा लेप-पिंच ढाई पाव, पत्थर के कोयलेका तेल तीन छ-
टांक और मोम आधी छटांक तथा थोडा तेलिन मक्खीका चूर्ण
पहिली तीन दवाओं को पिघलाकर फिर तेलिन मक्खी का
चूर्ण मिलाकर लेप बनाले ।
तीसरा लेप-पिंच दो सेर, तारपीन का तेल तीन छटांक और
अलसी का तेल आध पाव इन तीनों को आग पर पिघला
कर लेप बनाले ।
जहरवाद ।
पहिली दवा-मिरच, कसौंदी, अदरख और पान बराबर लेकर
सबको कूटले और छटांक २ भर दिनमें दो बार खिलावे ।
दूसरी दवा-चन्दाल, सोंठ, मिरच, पीपल, कुटकी, वायबिडंग,
चिरायता, सफेद जीरा, नीबकी छाल, काकडासिंगी, काली जीरी
लहसन, गेरू, सोया के बीज सबको तोला २ भर लेकर कूटकर
बुकनी बनाले और आधसेर सत्तू के साथ खिलावे ।
घोडेको जुलाव देनेकी औषध-जो घोडेको साल भरमें एक
बार जुलाव दिया जाय तो कभी बीमारी पैदा नहीं हो सकती
जब जुलाव देना हो तब पहिले दिन घोडे को दाने के बदले
में चोकर पानीमें सानकर खिलावै और दूसरे दिन कुछ न दे,
संध्या समय चोकर दे और तीसरे दिन मामूली दाना दे तीन
दिन सवारी न ले ॥
पहिला जुलाब-मुसव्वर तीन तोले सौंफ दो माशे और वि-
लायती साबुन छःमाशे इनको कूटकर गुलकन्द में मिला गोली
बांधकर खिलावै और टहलावै और जो चाहे कि पेशाब भी