शालिहोत्रम्: अश्वशास्त्र (महर्षि शालिहोत्र - प्राचीन भारतीय अश्व-चिकित्सा एवं लक्षण विज्ञान)
Shalihotram Ashvashastra of Maharshi Shalihotra
महर्षि शालिहोत्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंशालिहोत्रम् । ९१
प्रमेह रोग-इसमें धातु गिरती है इसके लिये यह दवा दे (१)
कतिला देवे । (२) कृत्या, केलाकी जड और कतिला प्रातः-
काल देवे (३) सफेद जीरा अथवा मुली की जड का चूर्ण
बनाकर दे ।
गांठ फूट जाना-बहुधा घोड़ों का गांठ फूल आता है और
पीछे फूट भी जाता है और बहा करता है, इस दशा में घोडे
को बांध रखना चाहिये ।
पहिली दवा-फिटकरी और चीनी के बर्तन का टुकड़ा दो
नों को पीसकर पानी में सानले, न बहुत गाढा हो न बहुत
पतला फिर इसका लेप करे ऊपर से पत्ती रखकर पट्टी बांध
दे (बहुधा इस लेप में काजल भी मिला लेते हैं।)
कृमि रोग-बहुधा घोड़े के पेटमें कीडे पडजाते हैं, जो दस्त
में भी निकला करते हैं, इससे भूख बन्द होजाती है ।
इसकी दवा-नमक दो पैसाभर, जुन्तआना पैसाभर, लोहेका
जङ्ग पैसाभर सभैन धेला भर और शीरा थोडा सा ले इन सब
चीजों को मिलाकर गोली बनावे, सात दिन तक सबेरे के
समय एक गोली दे और इसके पीछे जुलाब दे ।
दूसरी दवा-काली जीरी और नीम की पत्ती खिलाना भी
बहुत उत्तम है।
कुत्ता का काटना-जिस घोडे को कुत्ता काट खाय उसको
मनुष्य की खोपडी का चूर्ण छदामभर, मकोय डेढ रत्ती और
कुछ गुड इनकी गोली बनाकर सबेरे और सन्ध्या के समय
एक एक गोली खिलावे, इसी प्रकार छः सप्ताह तक दे तो
घोडा पागल न होगा ।