सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary

आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

विषयानुक्रमणिका ९१
योगमार्गणाकी अपेक्षा जीवोंके स्पर्शनका निरूपण ३५ लेश्यामार्गणाको अपेक्षा जीवोंका अन्तरप्ररूपण ५५
वेदमार्गणाकी ,, ,, ,, ३५ भव्यमार्गणाकी ,, ,, ,, ५६
कषायमार्गणाकी ,, ,, ,, ३६ सम्यक्त्वमार्गणाकी ,, ,, ,, ५६
ज्ञानमार्गणाकी ,, ,, ,, ३६ संज्ञिमार्गणाकी ,, ,, ,, ५८
संयममार्गणाकी ,, ,, ,, ३६ आहारमार्गणाकी ,, ,, ,, ५८
दर्शनमार्गणाकी ,, ,, ,, ३७
लेश्यामार्गणाकी ,, ,, ,, ३७ ७ भावप्ररूपणा ५९-६२
भव्यमार्गणाकी ,, ,, ,, ३८ चौदह गुणस्थानोंमें जीवोंका भाव-प्ररूपण ५९
सम्यक्त्वमार्गणाकी ,, ,, ,, ३८ गतिमार्गणाको ,, ,, ,, ६०
संज्ञिमार्गणाकी ,, ,, ,, ३८ इन्द्रियमार्गणाकी ,, ,, ,, ६०
आहारमार्गणाकी ,, ,, ,, ३८ कायमार्गणाकी ,, ,, ,, ६०
योगमार्गणाकी ,, ,, ,, ६०
५ काल प्ररूपणा ३९-४६ वेदमार्गणाकी ,, ,, ,, ६०
गुणस्थानोंकी अपेक्षा जीवोंके कालका वर्णन ३९ कषायमार्गणाकी ,, ,, ,, ६०
गतिमार्गणाको ,, ,, ,, ४० ज्ञानमार्गणाकी ,, ,, ,, ६०
इन्द्रियमार्गणाकी ,, ,, ,, ४१ संयममार्गणाकी ,, ,, ,, ६०
कायमार्गणाकी ,, ,, ,, ४२ दर्शनमार्गणाकी ,, ,, ,, ६१
योगमार्गणाकी ,, ,, ,, ४२ लेश्यामार्गणाकी ,, ,, ,, ६१
वेदमार्गणाकी ,, ,, ,, ४३ भव्यमार्गणाकी ,, ,, ,, ६१
कषायमार्गणाकी ,, ,, ,, ४३ सम्यक्त्वमार्गणाकी ,, ,, ,, ६१
ज्ञानमार्गणाकी ,, ,, ,, ४३ संज्ञिमार्गणाकी ,, ,, ,, ६१
संयममार्गणाकी ,, ,, ,, ४४ आहारमार्गणाकी ,, ,, ,, ६२
दर्शनमार्गणाकी ,, ,, ,, ४४
लेश्यामार्गणाकी ,, ,, ,, ४४ ८ अल्पबहुत्वप्ररूपण ६२-६५
भव्यमार्गणाकी ,, ,, ,, ४५ चौदह गुणस्थानोंमें जीवोंका अल्पबहुत्व-प्ररूपण ६२
सम्यक्त्वमार्गणाकी ,, ,, ,, ४५ गतिमार्गणाकी अपेक्षा ,, ,, ६२
संज्ञिमार्गणाकी ,, ,, ,, ४६ इन्द्रियमार्गणाकी ,, . ,, ६२
आहारमार्गणाकी ,, ,, ,, ४६ कायमार्गणाकी ,, ,, ,, ६३
योगमार्गणाकी ,, ,, ,, ६३
६ अन्तर प्ररूपणा ४६-५९ वेदमार्गणाकी ,, ,, ,, ६३
चौदह गुणस्थानोंमें जीवोंका अन्तर कथन ४६ कषायमार्गणाकी ,, ,, ,, ६३
गतिमार्गणाकी अपेक्षा ,, ,, ४७ ज्ञानमार्गणाकी ,, ,, ,, ६३
इन्द्रियमार्गणाकी ,, ,, ,, ४९ संयममार्गणाकी ,, ,, ,, ६४
कायमार्गणाकी ,, ,, ,, ५० दर्शनमार्गणाकी ,, ,, ,, ६४
योगमार्गणाकी ,, ,, ,, ५१ लेश्यामार्गणाकी ,, ,, ,, ६४
वेदमार्गणाकी ,, ,, ,, ५१ भव्यमार्गणाकी ,, ,, ,, ६४
कषायमार्गणाकी ,, ,, ,, ५२ सम्यक्त्वमार्गणाकी ,, ,, ,- ६५
ज्ञानमार्गणाकी ,, ,, ,, ५३ संज्ञिमार्गणाकी ,, ,, ,, ६५
संयममार्गणाकी ,, ,, ,, ५३ आहारमार्गणाकी ,, ,, ,, ६५
दर्शनमार्गणाकी ,, ,, ,, ५४ सम्यग्ज्ञानके पाँच भेद ६५
CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri

९२ सर्वार्थसिद्धि
सम्यग्ज्ञानके पाँच भेदोंका स्वरूप ६६ श्रुतज्ञानका स्वरूप और उसके भेद ८३
मतिज्ञानादिक्रमसे पाठ रखनेका कारण ६६ मतिपूर्वक श्रुतज्ञानके माननेमें आनेवाली
ये पाँचों ज्ञान दो प्रमाणरूप हैं इस बातका आपत्तियोंका परिहार ८४
निर्देश ६७ श्रुत नयभेदसे कथंचित् अनादिनिधन और
सन्निकर्ष और इन्द्रियकी प्रमाणताका कथंचित् सादि है ८४
निराकरण ६७ श्रुत पूर्वक भी श्रुतज्ञान उत्पन्न होता है इस
ज्ञानके फलका निरूपण ६८ आशंकाका समाधान ८४
विशेषार्थ द्वारा सन्निकर्ष और इन्द्रियको श्रुतके भेद व उनका कारण ८५
प्रमाण मानने पर उठनेवाले दोषोंका विशेषार्थ द्वारा श्रुतज्ञानका स्पष्टीकरण ८६
स्पष्टीकरण और उनका परिहार ६९ भवप्रत्यय अवधिज्ञानके स्वामी ८६
परोक्षज्ञानका प्रतिपादन ७० भवप्रत्यय कहनेका कारण ८७
परोक्षका स्वरूप ७१ क्षयोपशम निमित्तक अवधिज्ञानके स्वामी ८७
प्रत्यक्षज्ञानका प्रतिपादन ७२ अवधिज्ञानके छह भेद व उनका स्वरूप ८८
प्रत्यक्षका स्वरूप ७२ मनःपर्ययज्ञानके भेद और स्वरूप ८९
विभङ्गज्ञानकी प्रमाणताका निराकरण ७२ ऋजुमति और विपुलमतिका अर्थ ८९
इन्द्रिय-व्यापारजनित ज्ञानको प्रत्यक्ष इन दोनों ज्ञानोंका क्षेत्र और कालकी
माननेमें दोष ७२ अपेक्षा विषय ९०
मतिज्ञानके पर्यायवाची नामोंका प्रतिपादन ७४ ऋजुमति और विपुलमति मनःपर्यय
मति, स्मृति और चिन्तादि नामोंकी ज्ञानमें अन्तर ९०
निरुक्ति व तात्पर्य ७४ विशुद्धि और अप्रतिपातका अर्थ ९०
मतिज्ञानकी उत्पत्तिका निमित्त ७५ विशुद्धि और अप्रतिपातके द्वारा दोनों ज्ञानोंमें
इन्द्रिय और अनिन्द्रियका स्वरूप ७५ अन्तरका विशेष कथन ९०
तत् पदकी सार्थकता ७६ अवधिज्ञान और मनःपर्ययज्ञानमें विशेषता ९१
मतिज्ञानके भेद ७७ विशुद्धि आदिके द्वारा दोनों ज्ञानोंमें अन्तरका
अवग्रह आदिका स्वरूप ७७ विशेष स्पष्टीकरण ९२
अवग्रहादिके विषयभूत पदार्थोंके भेद ७८ मतिज्ञान और श्रुतज्ञानका विषय ९२
बहुआदिका स्वरूप ७८ मतिज्ञानकी अरूपी द्रव्योंमें मनसे प्रवृत्ति
बहु और बहुविधमें अन्तर ७९ होती है ९२
उक्त और निःसृतमें अन्तर ७९ अवधिज्ञानका विषय ९३
'क्षिप्रनिःसृत' पाठान्तरकी सूचना और मनःपर्ययज्ञानका विषय ९३
उसका अर्थ ७९ केवलज्ञानका विषय ९४
ध्रुवावग्रह और धारणामें भेद ७९ एक जीवमें एक साथ संभव ज्ञानोंका निरूपण ९५
बहु आदि अर्थके अवग्रह आदि होते हैं ८० मिथ्याज्ञानोंका निरूपण ६६
अर्थ पद देनेकी सार्थकता ८० मिथ्याज्ञानके कारणोंका निरूपण ९६
व्यञ्जन का अवग्रह ही होता है ८० कारण विपर्यास भेदाभेदविपर्यास और
व्यञ्जन शब्दका अर्थ ८१ स्वरूपविपर्यासका वर्णन ९७
व्यञ्जनावग्रह और अर्थावग्रहमें भेद ८१ नयोंके भेद ९८
व्यञ्जनावग्रह चक्षु और मनसे नहीं होता ८१ नयका स्वरूप ९८
आगम और युक्तिसे चक्षु और मनकी नैगमनयका स्वरूप ९८
अप्राप्यकारिताकी सिद्धि ८२ संग्रहनयका स्वरूप ९९
CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri

विषयानुक्रमणिका ९३
व्यवहारनयका स्वरूप ९९ उपयोगके भेदोंका स्वरूप व प्रवृत्तिक्रमका
ऋजुसूत्रनयका स्वरूप १०० निर्देश ११५
शब्दनयका स्वरूप १०० जीवोंके भेद ११६
समभिरूढ़नयका स्वरूप १०१ संसार शब्दका अर्थ ११६
एवम्भूतनयका स्वरूप १०१ द्रव्यपरिवर्तनका स्वरूप ११७
नयोंका पारस्परिक सम्बन्ध और उत्तरोत्तर क्षेत्र परिवर्तनका ,, ११७
विषय की सूक्ष्मता १०२ काल परिवर्तनका ,, ११८
विशेषार्थ द्वारा नयोंका स्पष्टीकरण १०३ भव परिवर्तनका ,, ११८
भाव परिवर्तनका ,, ११९
दूसरा अध्याय संसारी जीवोंके भेद १२१
जीवके असाधारण भावोंका निरूपण १०५ मनके दो भेद तथा समनस्क और अमनस्क
उपशम आदिका अर्थ १०५ शब्दका अर्थ १२१
औपशमिकादि भावोंके क्रमकी सार्थकता १०५ संसारी जीवोंके प्रकारान्तरसे भेद १२१
भावोंके भेदोंकी संख्या १०६ सूत्रमें संसारी पद देनेकी सार्थकता १२१
द्विनवाष्टादिपदका भेद शब्दके साथ दो त्रस और स्थावर शब्दका आगमिक अर्थ १२२
प्रकारका समास १०६ स्थावर जीवोंके भेद १२२
औपशमिक भावके दो भेद १०७ स्थावर शब्दका अर्थ १२२
औपशमिक सम्यक्त्व किस प्रकार उत्पन्न पृथिवी, पृथिवीकाय, पृथिवीकायिक और
होता है १०७ पृथिवीजीवका स्वरूप १२२
काललब्धिका वर्णन १०७ स्थावर जीवोंके प्राण १२३
औपशमिकचारित्र किस प्रकार उत्पन्न त्रस जीवोंके भेद १२३
होता है १०८ द्वीन्द्रिय आदि शब्दोंका अर्थ १२३
क्षायिकभावके नौ भेद १०८ द्वीन्द्रिय आदि जीवोंके प्राण १२३
नौ क्षायिक भावोंका स्वरूप व उनका कार्य १०९ इन्द्रियोंकी संख्या १२४
क्षायिक दानादि कृत अभयदानादि सिद्धोंके इन्द्रियोंमें कर्मेन्द्रियोंका ग्रहण नहीं होता १२४
क्यों नहीं होते इसका कारण १०९ इन्द्रियोंके दो भेद १२४
क्षायोपशमिक भावके अठारह भेद ११० द्रव्येन्द्रियके दो भेद १२४
क्षायोपशमिक भावके अठारह भेदोंका स्वरूप १११ निर्वृत्ति और उपकरणका अर्थ व इनके भेद १२५
औदयिक भावके इक्कीस भेद ११२ भावेन्द्रियके दो भेद १२५
औदयिक भावके भेदोंका स्वरूप ११२ लब्धि और उपयोगका अर्थ १२५
उपशान्तकषाय आदिमें शुक्ललेश्या किस उपयोगको इन्द्रिय कहनेका कारण १२५
प्रकार मानी गयी है इसका निर्देश ११३ पाँच इन्द्रियोंके विषय १२६
पारिणामिक भावके तीन भेद ११३ कर्मसाधन और भावसाधन द्वारा
अस्तित्वादि अन्य भी पारिणामिक भाव हैं फिर स्पर्शादिकी सिद्धि १२७
उनका ग्रहण क्यों नहीं किया इस शंका मनका विषय १२८
का समाधान ११४ श्रुत शब्दके दो अर्थ १२८
विशेषार्थ द्वारा पारिणामिक भावोंका खुलासा ११४ वनस्पति पर्यन्त जीवोंके एक इन्द्रिय होती है १२८
जीवका लक्षण ११५ स्पर्शन इन्द्रियकी उत्पत्तिका कारण १२८
उपयोगका स्वरूप ११५ कृमि आदि जीवोंके दो आदि इन्द्रियां होती हैं १२९
उपयोगके भेद-प्रभेद ११५ किस क्रमसे इन्द्रियां बढ़ी हैं उनका नामनिर्देश १२९

९४ सर्वार्थसिद्धि
संज्ञी जीवोंका स्वरूप १२९ वैक्रियिक और आहारक शरीरको अप्रतीघात
समनस्क पद देनेकी सार्थकता १३० क्यों नहीं कहा १३९
विग्रहगतिमें जीवकी गतिका कारण १३० तैजस और कार्मणका अनादिसम्बन्ध १३९
विग्रह कर्म व योग शब्दका अर्थ १३० 'च' पदकी सार्थकता १३९
गतिका नियम १३१ तैजस और कार्मणके स्वामी १३९
श्रेणि शब्दका अर्थ १३१ एक जीवके एक साथ लभ्य शरीरोंकी संख्या १४०
गतिपदकी सार्थकता १३१ कार्मण शरीरकी निरुपभोगता १४०
काल और देशनियमका विधान १३१ उपभोग पदका अर्थ १४०
विग्रह शब्दका अर्थ १३२ तैजस शरीर भी निरुपभोग हैं फिर उसका
'अविग्रहा जीवस्य' सूत्रकी सार्थकता १३२ ग्रहण क्यों नहीं किया १४१
संसारी जीवकी गतिका नियम और समय १३२ औदारिक शरीर किस-किस जन्मसे होता है १४१
निष्कुटक्षेत्रसे मरकर निष्कुटक्षेत्रमें उत्पन्न वैक्रियिक शरीर किस जन्मसे होता है १४२
होनेवाले जीवकी त्रिविग्रह गति १३२ वैक्रियिक शरीर लब्धिप्रत्यय भी होता है १४२
अविग्रहवाली गतिका समय निर्देश १३३ तैजसशरीर भी लब्धिप्रत्यय होता है १४१
अनाहारक जीवोंका समय-निर्देश १३३ आहारकशरीरकी विशेषता और स्वामी १४२
आहार शब्दका अर्थ १३३ शुभ आदि पदोंका अर्थ १४२
जन्मके भेद १३४ आहारकशरीरकी उत्पत्तिका प्रयोजन १४३
सम्मूर्च्छन, गर्भ और उपपाद पदका अर्थ १३४ नारक और सम्मूर्च्छिनोंके वेद का वर्णन १४३
चौरासी लाख योनियां किसके कितनी होती हैं १३४ नारक शब्दका अर्थ १४३
योनियोंके भेद १३४ देवोंके वेदका वर्णन १४४
सचित्त आदि पदोंका अर्थ १३४ शेष जीवोंके वेदका वर्णन १४४
'तत्' पदकी सार्थकता १३५ लिंगके दो भेद व उनका अर्थ १४४
योनि और जन्ममें अन्तर १३५ स्त्री आदि शब्दोंकी व्युत्पत्ति १४४
किस जीवके कौन योनि होती है इसका खुलासा १३५ अनपवर्त्यायुष्क जीवोंका निरूपण १४५
गर्भ जन्मके स्वामी १३६ औपपादिक आदि पदोंका अर्थ १४५
जरायु आदि पदोंका अर्थ १३६ पाठान्तरका निर्देश १४६
उपपाद जन्मके स्वामी १३६
तीसरा अध्याय
उपपाद जन्मके स्वामी १३६
सम्मूर्च्छन जन्मके स्वामी १३६ नरककी सात भूमियां व उनका आधार १४७
जन्मके भूस्वामियोंके प्रतिपादक तीनों सूत्र रत्नप्रभा आदि नामोंकी सार्थकता १४७
नियमार्थक हैं १३६ 'भूमि' पदकी सार्थता १४७
शरीरके पांच भेद १३७ भूमि, तीन वातवलय और आकाश इनमें
औदारिक आदि पदोंका अर्थ १३७ आधार-आधेयभाव १४७
शरीरोंमें उत्तरोत्तर सूक्ष्मता १३७ सप्त पदकी सार्थकता १४८
तैजससे पूर्व तीन शरीर उत्तरोत्तर प्रदेशोंकी विशेषार्थ द्वारा अधोलोकका विशेष स्पष्टीकरण १४८
अपेक्षा असंख्यातगुणे हैं १३८ भूमियोंमें नरकों ( बिलों ) की संख्या १४८
गुणकारका प्रमाण १३८ भूमियोंमें नरक प्रस्तारोंका विचार १४९
अन्तके दो शरीर अनन्तगुणे हैं १३८ नारक निरन्तर अशुभतरलेश्या आदि वाले
तैजस और कार्मण शरीरकी अप्रतीघातता १३९ होते हैं इसका विचार १४९
प्रतीघात पदका अर्थ १३९ नित्य शब्दका अर्थ १४९

विषयानुक्रमणिका ९५
किस भूमिमें कौन लेश्या है इसका विचार १५० हिमवान् आदि नाम अनिमित्तक और
द्रव्यलेश्या और भावलेश्याका काल १५० अनादि हैं १५६
नारकियोंके देहका विचार व देहकी ऊँचाई १५० हिमवान् आदिको वर्षधर पर्वत कहनेका
नारकियोंके तीव्र वेदनाका कारण १५० कारण १५६
नारकोंमें उष्णता व शीतताका विचार १५० कौन पर्वत कहाँसे कहाँ तक अवस्थित है व उनकी
नारकी स्वभावसे अशुभ विक्रिया करते हैं ऊँचाई और अवगाह क्या है इसका विचार १५६
और अशुभ निमित्त जोड़ते हैं १५० पर्वतोंका रंग १५६
नारकी आपसमें दुःखके कारण होते हैं १५१ पर्वतोंकी विशेषता व विस्तार १५७
परस्पर दुःख उत्पन्न करनेके कारणोंका निर्देश १५१ 'च' पदकी सार्थकता १५७
नारकियोंकी विक्रियासे ही तलवार, बरछो पर्वतोंपर तालाब १५७
आदि बनते हैं १५१ प्रथम तालाबका आयाम व विस्तार १५७
तीसरी भूमि तक असुरोंके निमित्तसे दुःख- प्रथम तालाबका अवगाह १५७
की उत्पत्ति १५१ प्रथम तालाबमें कमलका प्रमाण १५८
असुर शब्दका अर्थ १५१ प्रथम तालाबके कमलके अवयवोंका प्रमाण
असुरोंके संक्लिष्ट विशेषणकी सार्थकता १५१ व जलतलसे कमलकी ऊँचाईका प्रमाण १५८
कुछ अम्बाबरीष आदि देव ही दुःखमें अन्य तालाब व कमलोंका प्रमाण १५८
निमित्त होते हैं इसका निर्देश १५१ कमलोंमें निवास करनेवालो छह देवियों व
सूत्रमें आये हुए 'च' पदकी सार्थकता १५२ उनका परिवार और आयु १५८
नारकियोंके अकालमरण न होनेका कारण १५२ कमलोंकी कर्णिकाके बीचमें बने हुए प्रासादों
नारकियोंकी उत्कृष्ट आयु १५२ का प्रमाण व रंग १५९
'सत्त्वानाम्' पदकी सार्थकता १५३ मुख्य कमलोंके परिवार, कमलोंमें रहनेवाले
तिर्यग्लोक पदका अर्थ १५३ अन्य देव १५९
द्वीपों और समुद्रोंके मुख्य-मुख्य नामोंका निर्देश १५३ पूर्वोक्त क्षेत्रोंमें बहनेवाली चौदह नदियाँ १५९
द्वीपों और समुद्रोंके अनेक नामोंका निर्देश १५३ पूर्व समुद्रको जानेवाली नदियाँ १५९
द्वीपों और समुद्रोंका विष्कम्भ और आकृति १५३ पश्चिम समुद्रको जानेवालो नदियाँ १६०
सूत्रमें आये हुए प्रत्येक पदकी सार्थकता १५३ कौन नदी किस तालाबके किस ओरके द्वारसे
जम्बूद्वीपका सन्निवेश और व्यास १५४ निकली है इसका विचार- १६०
जम्बूद्वीप नाम पड़नेका कारण १५४ गंगा और सिन्धु आदि नदियों की परिवार
जम्बूवृक्षकी अवस्थिति कहाँ है और वह नदियाँ १६०
किस रूप है इसका विचार १५४ सूत्रमें गंगा और सिन्धु दोनों पदोंके रखने
विशेषार्थ द्वारा मध्यलोक और सुमेरु पर्वत- की सार्थकता १६०
का वर्णन १५४ भरत क्षेत्रका विस्तार १६१
सात क्षेत्रोंकी संज्ञा १५५ विदेह पर्यन्त आगेके पर्वतों व क्षेत्रोंका
भरत आदि संज्ञाएँ अनिमित्तक और विस्तार १६१
अनादि हैं १५५ उत्तरके क्षेत्र व पर्वतोंके विस्तारका प्रमाण १६२
कौन क्षेत्र कहाँ पर है इसका विचार १५५ भरत और ऐरावत क्षेत्रमें कालकृत परिवर्तन १६२
सात क्षेत्रोंका विभाग करनेवाले छह यह परिवर्तन क्षेत्रका न होकर वहाँके जीवों-
कुलाचल पर्वत १५६ का होता है १६२
ये पर्वत कहाँ से कहाँ तक फैले हुए हैं १५६ यह परिवर्तन अनुभव, आयु और प्रमाणादि
कृत होता है १६२

९६ सर्वार्थसिद्धि
अनुभव आदि शब्दोंका अर्थ १६२ मनुष्योंके भेद १६७
कालके दो भेद और इनमेंसे प्रत्येकके छह आर्यशब्दका अर्थ और आर्योंके भेद १६७
छह भेद १६२ म्लेच्छोंके भेद व उनके विशेष वर्णनके
कालके दोनों भेदोंकी कल्प संज्ञा १६३ प्रसंगसे अन्तर्दीपोंका वर्णन १६८
सुषमासुषमा आदि कालोंका प्रमाण आदि १६३ शक, यवन आदि कर्मभूमिज म्लेच्छ हैं इस
शेष भूमियाँ अवस्थित हैं १६३ बातका निर्देश १६९
हैमवतक आदि मनुष्योंकी आयु १६३ कर्मभूमि कहाँ कहाँ है १६९
हैमवत आदि क्षेत्रोंमें कौनसा काल प्रवर्त्तता भोगभूमियाँ कहाँ कहाँ हैं १६९
है व वहाँके मनुष्योंका रंग व आहार आदि कर्म शब्दका अर्थ १६९
किस प्रकारका है १६४ कर्मभूमि और भोगभूमि बननेका कारण १६९
दक्षिणके क्षेत्रोंके समान उत्तरके क्षेत्रोंका मनुष्योंकी उत्कृष्ट और जघन्य स्थिति १७०
वर्णन है १६४ पल्यके तीन भेद और उनका प्रमाण लाने
विदेहमें कालका प्रमाण १६४ की विधि १७०
विदेहमें काल, मनुष्योंकी ऊँचाई, आहार उद्धारसागरका प्रमाण १७०
और आयुका विचार १६४ द्वीप-समुद्रोंकी गणना १७१
पूर्वका प्रमाण १६५ अद्धासागरका प्रमाण १७१
भरतक्षेत्रके विष्कम्भका सोपपत्ति विचार १६५ अद्धासागरसे किन किनकी गिनती होती है
जम्बूद्वीपके बाद कौन सा समुद्र है और इसका विचार १७१
तदनन्तर कौन सा द्वीप है इसका निर्देश १६५ तिर्यञ्चोंकी उत्कृष्ट और जघन्य स्थिति १७१
धातकीखण्ड द्वीपके क्षेत्रादिका विचार १६५ तिर्यग्योनिज शब्दका अर्थ १७१
धातकीखण्डको दक्षिण और उत्तर इन
दो भागोंमें विभाजित करनेवाले दो चौथा अध्याय
इष्वाकार पर्वत १६५ देवोंके चार भेद १७३
धातकीखण्ड-द्वीपमें दो मेरु १६५ देव शब्दका अर्थ १७३
धातकीखण्ड द्वीपमें दो-दो भरतादि क्षेत्र निकाय शब्दका अर्थ १७३
और दो-दो हिमवान् आदि १६६ आदिके तीन निकायोंमें लेश्या विचार १७३
धातकीखण्ड द्वीपमें क्षेत्रों व पर्वतोंका देवनिकायोंमें अन्तर्भेदोंका निर्देश १७४
संस्थान व विष्कम्भ १६६ कल्पोपपन्न पद देनेकी सार्थकता १७४
धातकीखण्ड द्वीपमें सपरिवार धातकीवृक्ष १६६ देवनिकायोंमें अन्तर्भेदोंका नामनिर्देश १७५
धातकीखण्ड द्वीपके बाद कालोद समुद्र व इन्द्र आदि शब्दोंका अर्थ १७५
उसका विस्तार १६६ व्यन्तर और ज्योतिषियोंमें कितने अन्तर्भेद
पुष्करार्धमें क्षेत्रादिका विचार १६६ हैं इसका विचार १७६
पुष्करार्धमें इष्वाकार पर्वत व पुष्कर वृक्ष प्रथम दो निकायोंमें इन्द्रोंका विचार १७६
आदिका निर्देश १६६ प्रत्येक निकायके अवान्तर भेदोंके इन्द्रोंके नाम १७६
पुष्करार्ध संज्ञाका करण १६७ ऐशान कल्पोंमें प्रवीचारका विचार १७७
मानुषोत्तर पर्वतके पहले मनुष्य हैं १६७ शेष कल्पोंमें प्रवीचारका विचार १७७
मानुषोत्तर पर्वतका विशेष वर्णन १६७ प्रवीचार पद देनेकी सार्थकता १७७
मानुषोत्तर पर्वतको लांघकर ऋद्धिधारी कल्पातीत देवोंमें प्रवीचार नहीं है इस
मनुष्य भी नहीं जा सकते १६७ बातका निर्देश १७८
CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri

विषयानुक्रमणिका ९७
भवनवासियोंके दस भेद १७८ ग्रैवेयकके पूर्व तक कल्प संज्ञा १८७
भवनवासी शब्दका अर्थ १७८ लौकान्तिक देवोंका निवास स्थान १८८
असुरकुमार आदि नामोंमें कुमार पदकी लौकान्तिक शब्दकी सार्थकता १८८
सार्थकता १७८ लौकान्तिकोंके आठ भेदोंके नाम १८८
भवनवासियोंका निवासस्थान १७८ किस दिशामें किस नामवाले लौकान्तिक रहते
व्यन्तरोंके आठ भेद १७९ हैं इसका विचार १८८
व्यन्तर शब्दका अर्थ १७९ 'च' शब्दसे समुच्चित अन्य लौकान्तिकोंका
व्यन्तरोंका निवासस्थान १७९ निर्देश १८८
ज्योतिषियोंके पाँच भेद १७९ विजयादिकमे द्विचरम देव होते हैं १८९
ज्योतिष्क पदकी सार्थकता १७९ आदि पदसे सर्वार्थसिद्धिके ग्रहण न होनेका कारण १८९
'सूर्याचन्द्रमसौ' पदके पृथक् देनेका कारण १७९ द्विचरम शब्दका अर्थ १८९
ज्योतिषियोंका पूरे विवरणके साथ निवासस्थान १७९ तिर्यग्योनिसे किनका ग्रहण होता है इसका
मनुष्य लोकमें ज्योतिषियोंकी निरन्तर मेरु विचार १९०
प्रदक्षिणा १८० तिर्यञ्च सब लोकमें रहते हैं अतः उनका क्षेत्र
ज्योतिष्क विमानोंके गमन करनेका कारण १८० नहीं कहा १९०
ज्योतिष्कदेव मेरु पर्वतसे कितनी दूर रहकर भवनवासियोंके अवान्तर भेदोंकी उत्कृष्ट आयु १९०
प्रदक्षिणा करते हैं १८० सौधर्म और ऐशान कल्पमें उत्कृष्ट आयु १९१
गतिमान् ज्योतिषियोंके निमित्तसे कालका विभाग 'अधिके' यह अधिकार वचन है इस बातका
होता है १८० निर्देश , १९१
कालके दो भेद व व्यवहार कालका स्वरूप १८१ सानत्कुमार और माहेन्द्र कल्पमें उत्कृष्ट आयु १९१
मनुष्य लोकके बाहर ज्योतिष्क विमान शेष बारह कल्पोंमें उत्कृष्ट आयु १९१
अवस्थित हैं १८१ 'तु' पदकी सार्थकता १९१
वैमानिकोंके वर्णनके प्रसंगसे अधिकार सूत्र १८२ कल्पातीत विमानोंमें उत्कृष्ट आयु १९२
विमान शब्दका अर्थ व उसके भेदोंका विचार १८२ 'सर्वार्थसिद्धौ' पदको पृथक् ग्रहण करनेका
वैमानिकोंके दो भेद १८२ कारण १९२
वैमानिक देव ऊपर ऊपर निवास करते हैं १८३ सौधर्म और ऐशान कल्पमें जघन्य आयु १९३
कितने कल्प विमानोंमें वे देव रहते हैं इसका शेष सबमें जघन्य आयुका विचार १९३
विचार १८३ द्वितीयादि नरकोंमें जघन्य आयु १९३
सौधर्म आदि शब्दके व्यवहारका कारण १८३ प्रथम नरकमें जघन्य आयु १९४
मेरु पर्वतकी ऊँचाई व अवगाहका परिमाण १८४ भवनवासियोंमें जघन्य आयु १९४
अधोलोक आदि शब्दोंकी सार्थकता १८४ व्यन्तरोंमें जघन्य आयु १९४
सौधर्म कल्पका ऋजु विमान कहाँ पर है इसका व्यन्तरोंमें उत्कृष्ट आयु १९५
निर्देश १८४ ज्योतिषियोंमें उत्कृष्ट आयु १९५
'नवसु' पदके पृथक् देनेका कारण १८४ ज्योतिषियोंमें जघन्य आयु १९५
देवोंमें उत्तरोत्तर स्थिति प्रभावादिकृत विशेषता १८५ लौकान्तिक देवोंमें आयुका विचार १९५
गति आदि शब्दों का अर्थ १८५
कहांके देवके शरीरकी कितनी ऊँचाई है आदि पाँचवाँ अध्याय
का विचार १८५ अजीवकाय द्रव्योंका निर्देश १९६
वैमानिक देवोंमें लेश्याका विचार १८६ काय शब्द देनेकी सार्थकता १९६
सूत्रार्थकी आगमसे संगति बिठानेका उपक्रम १८७ अजीव यह धर्मादिक द्रव्योंकी सामान्य संज्ञा है १९६
१३
CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri

९८ सर्वार्थसिद्धि
ये धर्मादिक द्रव्य हैं इस बातका निर्देश १९७ लोक शब्दका अर्थ २०६
द्रव्य पदकी व्युत्पत्ति १९७ आकाशके दो भेद और उनका अर्थ २०६
ये धर्मादिक द्रव्यत्व नामक सामान्यके योगसे लोकालोक विभागका कारण २०६
द्रव्य नहीं हैं इस बातका सयुक्तिक विचार १९७ धर्म और अधर्म द्रव्य लोकव्यापी हैं २०६
'गुणसमुदायो द्रव्यम्' ऐसा माननेमें भी आपत्ति १९७ पुद्गल द्रव्य लोकके एक प्रदेश आदिमें रहते हैं २०७
द्रव्य पदकी व्युत्पत्ति और उसकी सिद्धि १९७ मूर्त पुद्गल एकत्र कैसे रहते हैं इसका विचार २०७
'द्रव्याणि' बहुवचन देनेका कारण व अन्य जीव लोकके असंख्येयभाग आदिमें रहते हैं २०७
विशेषताओंका निर्देश १९८ सशरीरी अनन्तानन्त जीव असंख्येयभाग
जीव भी द्रव्य हैं इस बातका निर्देश १९८ आदिमें कैसे रहते हैं इसका विचार २०८
नैयायिकोंके द्वारा माने गये द्रव्योंके अन्तर्भाव जीवके असंख्येयभाग आदिमें रहनेका कारण २०८
की सिद्धि १९८ धर्म और अधर्म द्रव्यका उपकार २०९
द्रव्योंकी विशेषता २०० गति, स्थिति और उपग्रह पदका अर्थ २०९
नित्य आदि प्रत्येक पदकी व्याख्या २०० उपग्रह पदकी सार्थकता २०९
पुद्गल द्रव्य रूपी है इसका विचार २०० गति और स्थितिको धर्म और अधर्म द्रव्यका
रूप पदका अर्थ २०० उपकार माननेका कारण २०९
आकाश पर्यन्त एक एक द्रव्य हैं इसका विचार २०१ गति और स्थितिके प्रतिबन्ध न होनेका कारण २०९
सूत्रमें द्रव्य पदके ग्रहण करनेकी सार्थकता २०१ धर्म और अधर्म द्रव्यकी सिद्धि २१०
धर्मादिक द्रव्य निष्क्रिय हैं २०२ अवकाशका उपकार २१०
निष्क्रिय शब्दका अर्थ २०२ निष्क्रिय धर्मादि द्रव्योंको आकाश कैसे
धर्मादिक द्रव्य निष्क्रिय होने पर भी उनमें अवगाह देता है इसका विचार २११
उत्पादादिकी सिद्धि २०२ दो स्कन्धों के परस्पर टकरानेसे आकाशके
उत्पादके दो भेद २०२ अवकाश दानकी हानि नहीं होती २११
निष्क्रिय धर्मादिक द्रव्य गति आदिके हेतु सूक्ष्म पुद्गल परस्पर अवकाश देते हैं तो भी
कैसे हैं इसका विचार २०२ आकाशके अवकाशदानकी हानि नहीं
धर्म, अधर्म और एक जीवके प्रदेश २०३ होती इस बातका समर्थन २११
असंख्येयके तीन भेद २०३ पुद्गलोंका उपकार २११
प्रदेश शब्दका अर्थ २०३ कार्मण शरीरके पुद्गलपनेकी सिद्धि २१२
धर्म और अधर्म द्रव्य लोकाकाशव्यापी हैं २०३ वचनके दो भेद और उनका स्वरूप व पुद्गल-
जीव शरीरपरिमाण होकर भी लोकपूरण समुद्घात पनेकी सिद्धि २१२
के समय लोकाकाशव्यापी होता है २०३ मनके दो भेद और उनका स्वरूप व पुद्गल-
आकाशके प्रदेशोंका विचार २०३ पनेकी सिद्धि २१३
अनन्त शब्दका अर्थ २०३ मन द्रवन्तर नहीं है इसकी सयुक्तिक सिद्धि २१३
पुद्गलोंके प्रदेशोंका विचार २०४ प्राण और अपान शब्दका अर्थ २१३
'च' पदकी सार्थकता २०४ मन, प्राण और अपानके पुद्गलपनेकी सिद्धि २१३
अनन्तके तीन भेद २०४ आत्माके अस्तित्वकी सिद्धि २१४
असंख्यातप्रदेशी लोकमें अनन्तानन्त प्रदेशी पुद्गलोंके अन्य उपकार २१४
स्कन्ध कैसे समाता है इसका विचार २०४ सुख, दुःख आदि शब्दोंका अर्थ २१४
अणुके दो आदि प्रदेश नहीं होते २०४ उपग्रह पदकी सार्थकता २१४
सब द्रव्योंका लोकाकाशमें अवगाह है २०५ जीवोंका उपकार २१५
आधाराधेयविचार २०५ कालका उपकार २१६
CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri

विषयानुक्रमणिका ९९
वर्तना शब्दका अर्थ २१६ गुणवैषम्यमें सदृशोंका भी बन्ध होता है यह
काल द्रव्य क्रियावान् नहीं है इसका समर्थन २१६ बतलानेके लिए सूत्रमें सदृश पदका
कालके अस्तित्वकी सिद्धि २१६ ग्रहण किया २२८
परिणाम पदका अर्थ २१६ दो अधिक गुणवालोंका बन्ध होता है २२८
क्रिया पदका अर्थ २१७ बन्धके प्रकारोंका विशेष विवेचन २२८
परत्व और अपरत्वका विचार २१७ बन्ध होने पर अधिक गुणवाले पारिणामिक
वर्तनासे पृथक् परिणामादिके ग्रहण करनेका होते हैं २२९
प्रयोजन २१७ द्रव्यका लक्षण २३१
पुद्गलका लक्षण २१८ एक द्रव्यके दूसरे द्रव्यसे भिन्न होनेके कारणकी
स्पर्श आदि पदोंका अर्थ व उनके भेद २१८ सयुक्तिक सिद्धि २३१
'रूपिणः पुद्गलाः' सूत्रके रहते हुए भी इस काल भी द्रव्य है २३२
सूत्रके कहनेका कारण २१८ कालमें द्रव्यपने की सिद्धि २३३
पुद्गलकी व्यञ्जन पर्यायोंका निर्देश २१९ कालद्रव्यको अलग कहनेका कारण २३३
शब्दके दो भेद व उनका विशेष विचार २१९ विशेषार्थ द्वारा कालका विचार २३४
बन्धके दो भेद व उनका विशेष विचार २१९ कालकी पर्याय अनन्त समय रूप हैं इसकी
सौक्ष्म्यके दो भेद व उनका विचार २१९ सिद्धि २३५
स्थौल्यके दो भेद व उनका विचार २१९ गुणका लक्षण २३६
संस्थानका अपने भेदोंके साथ विचार २१९ गुणका लक्षण पर्यायोंमें न जाय इसकी
भेदके छह भेद व उनका विचार २२० व्यवस्था २३६
तम आदि शेषका स्वरूप निर्देश २२० परिणामका स्वरूप २३७
पुद्गलके भेद २२० परिणामके दो भेद और उनकी सिद्धि २३७
अणु शब्दका अर्थ २२०
स्कन्ध शब्दका अर्थ २२१ छठाँ अध्याय
स्कन्धोंकी उत्पत्तिका हेतु २२१
भेद और संघात पदका अर्थ २२१ योगका स्वरूप २३८
बहुवचन निर्देशकी सार्थकता २२१ कर्म शब्दका अर्थ २३८
अणुकी उत्पत्तिका हेतु २२२ योगके भेद २३८
'भेदसंघातेभ्यः' इस सूत्रमें भेद पदके ग्रहण काय, वचन और मनोयोगका स्वरूप २३८
करनेका प्रयोजन २२२ आस्रवका स्वरूप २३९
अचाक्षुष चाक्षुष कैसे होता है इसका विचार २२२ पुण्यास्रव और पापास्रव २३९
द्रव्यका लक्षण २२३ ये कायादि तीनों योग शुभ और अशुभ इन
सत्की व्याख्या २२३ दो भागोंमें विभक्त हैं २३९
उत्पाद आदि पदोंका अर्थ २२३ शुभयोगका स्वरूप २३९
युक्त पद किस अर्थमें ग्रहण किया है अशुभ योगका स्वरूप २३९
इसका विचार २२३ पुण्य और पाप पदकी व्याख्या २३९
नित्य पदकी व्याख्या २२५ साम्परायिक और ईर्यापथ आस्रव कितने
मुख्यता और गौणतासे अनेकान्तकी सिद्धि २२५ होते हैं २४०
पुद्गलोंके बन्धका कारण २२६ आस्रवके स्वामीके दो भेद २४०
जघन्य गुणवालोंका बन्ध नहीं होता २२७ कषाय शब्दका अर्थ २४०
गुणसाम्यमें सदृशोंका बन्ध नहीं होता २२८ संप्राय शब्दका अर्थ २४०
ईर्या शब्दका अर्थ २४०
CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri

१०० सर्वार्थसिद्धि
साम्परायिक आस्रवके भेद २४० तिर्यंचायुके आस्रव २५०
पचीस क्रियाओंका विशेष विवेचन २४० तिर्यंचायुके आस्रवोंका विस्तारसे निरूपण २५०
किन कारणोंसे आस्रवमें विशेषता होती है मनुष्यायुके आस्रव २५१
इसका निर्देश २४२ मनुष्यायुके आस्रवोंका विस्तारसे निरूपण २५१
तीव्र, मन्द आदि पदोंकी व्याख्या २४२ मनुष्यायुके अन्य आस्रव २५१
अधिकरणके दो भेद २४३ चारों आयुओंके आस्रव २५१
‘जीवाजीवाः’ ऐसा बहुवचन रखनेका कारण २४३ ‘च’ पदकी सार्थकता २५१
जीवाधिकरणके भेद २४३ देवायुके आस्रव २५२
संरम्भ आदि प्रत्येक पदकी व्याख्या २४४ सूत्रगत प्रत्येक पदकी व्याख्या २५२
जीवाधिकरणके १०८ भेदोंका नामोल्लेख २४४ देवायुका अन्य आस्रव २५२
‘च’ पदकी सार्थकता २४४ ‘सम्यक्त्वं च’ पृथक् सूत्र बनानेका प्रयोजन २५२
अजीवाधिकरणके भेद २४४ अशुभ नामकर्मके आस्रव २५३
निसर्ग आदि पदोंका अर्थ २४४ सूत्रगत प्रत्येक पदकी व्याख्या २५३
‘पर’ पदकी सार्थकता २४४ अशुभ नामकर्मके आस्रवोंका विस्तारसे कथन २५३
निर्वर्तना आदिके उत्तर भेदोंकी व्याख्या २४४ शुभनामकर्मके आस्रव २५३
ज्ञानावरण और दर्शनावरणके आस्रव २४५ ‘च’ पदकी सार्थकता २५३
प्रदोष आदि प्रत्येक पदका अर्थ २४५ शुभनामकर्मके आस्रवोंका विस्तारसे कथन २५३
आसादन और उपघातमें अन्तर २४५ तीर्थंकर प्रकृतिके आस्रव २५४
‘तत्’ पदसे ज्ञान और दर्शनका ग्रहण कैसे होता सूत्रगत प्रत्येक पदकी व्याख्या २५४
है इसका विचार २४५ नीचगोत्रके आस्रव २५५
प्रदोषादि ज्ञानावरण और दर्शनावरण दोनोंके सूत्रगत प्रत्येक पदकी व्याख्यां २५५
आस्रवके हेतु कैसे हैं इसका विचार २४६ उच्चगोत्रके आस्रव २५५
असातावेदनीयके आस्रव २४६ सूत्रगत प्रत्येक पदकी व्याख्या २५५
दुःख आदि प्रत्येक पदकी व्याख्या २४६ अन्तराय कर्मके आस्रव २५६
शोकादिक दुःखके प्रकार होकर भी उनके अलग तत्प्रदोष आदि प्रतिनियत कर्मोंके आस्रवोंका
से ग्रहण करनेका कारण २४६ कथन करनेसे आनेवाले दोषका परिहार २५६
यदि दुःखादिक असाता वेदनीयके आस्रव हैं तो
केशोत्पाटन आदि क्यों करते हैं इसका सातवाँ अध्याय
सयुक्तिक विचार २४७ व्रतकी व्याख्या २५७
सातावेदनीयके आस्रव २४७ हिंसादि परिणामविशेष अध्रुव हैं उनसे दूर
सूत्रगत प्रत्येक पदकी व्याख्या २४७ होना कैसे सम्भव है इस शंकाका परिहार २५७
‘इति’ पदकी सार्थकता २४८ हिंसा आदि पदोंको क्रमसे रखनेका प्रयोजन २५८
दर्शनमोहके आस्रव २४८ रात्रिभोजन विरमण व्रत अलगसे नहीं कहने
केवली आदि पदोंकी व्याख्या २४८ का कारण २५८
सोदाहरण अवर्णवादका निरूपण २४८ व्रतके दो भेद २५८
चारित्रमोहके आस्रव २४९ प्रत्येक पदकी व्याख्या २५८
कषाय आदि पदोंकी व्याख्या २४९ व्रतकी स्थिरताके लिए पाँच-पाँच भावनाओंका
चारित्रमोहके आस्रवोंका विस्तारसे निरूपण २४९ अधिकार सूत्र २५९
नरकायुके आस्रव २५० अहिंसा व्रतकी पाँच भावनाएँ २५९
नरकायुके आस्रवोंका विस्तारसे निरूपण २५० सत्यव्रतकी पाँच भावनाएँ २५९
CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri

विषयानुक्रमणिका १०१
अनुवीचीभाषण पदका अर्थ २५९ मूर्च्छाको परिग्रह मानने पर बाह्य पदार्थ परिग्रह
अचौर्यव्रतकी पाँच भावनाएँ २५९ कैसे हैं इस बातका विचार २६७
प्रत्येक पदकी व्याख्या २६० व्रतीका स्वरूप २६८
ब्रह्मचर्य व्रतकी पाँच भावनाएँ २६० शल्य पदकी व्याख्या व उसके भेद २६८
परिग्रहत्याग व्रतकी पाँच भावनाएँ २६० शल्यके तीनों भेदोंकी व्याख्या २६८
हिंसादिकमें अपाय और अवद्यदर्शनका उपदेश २६१ निःशल्यको व्रती कहनेका प्रयोजन २६८
हिंसादिक कैसे अपाय और अवद्य हैं इसका व्रतीके दो भेद २६९
विस्तारसे विवेचन २६१ अगार पदका अर्थ २६९
हिंसादिक दुःख ही हैं इस भावनाका उपदेश २६२ मुनिके शून्य अगार आदिमें रहने पर अगारी-
हिंसादिक दुःख कैसे हैं इसका विस्तारसे विवेचन २६२ पन प्राप्त होता है और गृहस्थके घर छोड़
लोक कल्याणकारी मैत्री आदि चार भावनाएँ २६२ देने पर अनगारीपन प्राप्त होता है इस शंकाका
मैत्री आदि पदकी व्याख्या २६३ परिहार २६९
संवेग और वैराग्यके लिए जगत् और कायके अगारीके पूरे व्रत नहीं होनेसे वह व्रती कैसे है
स्वभावका चिन्तन २६३ इस बातका विचार २६९
लोकका आकार २६३ अगारीकी व्याख्या २७०
जगत् और कायके स्वभावका किस प्रकार अगारीके व्रतोंको अणु कहनेका प्रयोजन २७०
विचार करे २६३ अगारी किस प्रकारकी हिंसाका त्यागी होता है २७०
हिंसाकी व्याख्या २६४ अहिंसा आदि पाँचों अणुव्रतोंकी व्याख्या २७०
प्रमत्तयोगपदकी सार्थकता २६४ अगारी अन्य किन गुणोंसे सम्पन्न होता है
प्राणोंका वियोग न होनेपर भी हिंसा होती है इसका विचार २७०
इस बातका उल्लेख २६४ दिग्विरतिव्रतकी व्याख्या २७०
अनृतकी व्याख्या २६५ देशविरति व्रतकी व्याख्या २७१
असत् और अनृत पदकी व्याख्या २६५ अनर्थदण्डका अर्थ २७१
हिंसाकर वचन ही अनृत है इस बातका अनर्थदण्डके पाँच भेद और उनकी व्याख्या २७१
खुलासा २६५ सामायिक की व्याख्या २७१
स्तेयकी व्याख्या २६५ प्रोषध व उपवास शब्दका अर्थ २७२
आदान पदका अर्थ २६५ प्रोषधोपवासकी व्याख्या २७२
कर्म और नोकर्मका ग्रहण स्तेय क्यों नहीं है उपभोगपरिभोगकी व्याख्या २७२
इसका विचार २६५ मधु आदिके सप्रयोजन त्यागका उपदेश २७२
भिक्षुके भ्रमण करते समय रथ्याद्वारमें प्रवेश केतकी आदिके फूल व साधारण वनस्पतिके
करनेसे चोरी क्यों नहीं होती इसका विचार २६५ सप्रयोजन त्यागका उपदेश २७२
अब्रह्मकी व्याख्या २६६ यान वाहन आदिके परिमाण करनेका उपदेश २७२
मिथुन पदका अर्थ २६६ अतिथि पदकी व्याख्या २७३
सब कर्म मैथुन क्यों नहीं है इसका खुलासा २६६ अतिथिसंविभागके चार भेद २७३
ब्रह्म पदकी व्याख्या २६६ गृहस्थका सल्लेखना धर्म २७३
परिग्रहकी व्याख्या २६७ मरण पदकी व्याख्या २७३
मूर्च्छा पदका अर्थ २६७ सल्लेखना पदका अर्थ २७३
मूर्च्छा पदसे वातादि प्रकोपजन्य मूर्च्छाका ग्रहण सूत्रमें 'जोषिता' पद रखनेका कारण २७३
क्यों नहीं किया इस बातका खुलासा २६७ सल्लेखना आत्मवध नहीं है इस बातका समर्थन २७४
CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri

१०२ सर्वार्थसिद्धि
सम्यग्दृष्टिके पाँच अतीचार २७५ आठवाँ अध्याय
प्रशंसा और संस्तवमें अन्तर २७५ बन्धके हेतु २८३
सम्यग्दर्शनके आठ अंग होने पर पाँच अती- प्रमाद पदकी व्याख्या २८३
चार ही क्यों कहे इसका कारण २७५ मिथ्यादर्शनके दो भेद और उनकी व्याख्या २८३
व्रतों और शीलोंमें पाँच-पाँच अतिचारोंको परोपदेशनिमित्त मिथ्यादर्शनके चार या पाँच
बतलानेवाला अधिकार सूत्र २७५ भेद व उनका खुलासा २८३
अहिंसाणुव्रतके पाँच अतिचार २७५ क्रियावादी आदिके अवान्तर भेद २८४
बन्ध आदि प्रत्येक पदकी व्याख्या २७६ अविरतिके १२ भेद २८४
सत्याणुव्रतके पाँच अतीचार २७६ कषायके २५ भेद २८४
मिथ्योपदेश आदि प्रत्येक पदकी व्याख्या २७६ मनोयोग आदिके अवान्तर भेद २८४
अचौर्याणुव्रतके पाँच अतीचार २७६ प्रमादके अनेक भेद २८४
स्तेनप्रयोग आदि प्रत्येक पदकी व्याख्या २७६ किस गुणस्थानमें कितने बन्धके हेतु हैं इसका
स्वदारसन्तोष व्रतके पाँच अतीचार २७७ विचार २८४
परविवाहकरण आदि प्रत्येक पदकी व्याख्या २७७ बन्धकी व्याख्या २८५
परिग्रहपरिमाण व्रतके पाँच अतीचार २७७ 'सकषायत्वात्' पद देनेका प्रयोजन २८५
दिग्विरमणव्रतके पाँच अतीचार २७८ 'जीवः' पद देनेका प्रयोजन २८५
ऊर्ध्वव्यतिक्रम आदि प्रत्येक पदकी व्याख्या २७८ 'कर्मणो योग्यान्' इस प्रकार निर्देश करनेका
देशविरमणव्रतके पाँच अतीचार २७८ प्रयोजन २८५
आनयन आदि प्रत्येक पदकी व्याख्या २७८ दृष्टान्तपूर्वक कर्मरूप परिणमनका समर्थन २८६
अनर्थदण्डविरतिव्रतके पाँच अतीचार २७९ 'सः' पदकी सार्थकता २८६
कन्दर्प आदि प्रत्येक पदकी व्याख्या २७९ बन्धके चार भेद २८६
सामायिकके पाँच अतीचार २७९ प्रकृति आदि प्रत्येक पदकी दृष्टान्तपूर्वक व्याख्या २८६
योगदुष्प्रणिधान आदि प्रत्येक पदकी व्याख्या २७९ प्रकृति और प्रदेशबन्धका कारण योग है तथा
प्रोषधोपवासके पाँच अतीचार २७९ स्थितिबन्ध और अनुभागबन्धका कारण कषाय
अप्रत्यवेक्षित आदि प्रत्येक पदकी व्याख्या २७९ है इस बातका निर्देश २८७
भोगोपभोगपरिसंख्यानव्रतके पाँच अतीचार २८० प्रकृतिबन्धके आठ भेद २८८
सचित्त आदि प्रत्येक पदकी व्याख्या २८० आवरण पदकी व्याख्या २८७
अतिथिसंविभाग शीलके पाँच अतीचार २८० वेदनीय आदि प्रत्येक पदकी व्युत्पत्ति २८८
सचित्तनिक्षेप आदि प्रत्येक पदकी व्याख्या २८० प्रकृतिबन्धके आठ भेदोंके अवान्तर भेद २८९
सल्लेखनाके पाँच अतीचार २८१ ज्ञानावरणके पाँच भेद २८९
जीविताशंसा आदि प्रत्येक पदकी व्याख्या २८१ अभव्यके मनःपर्यय और केवलज्ञान शक्ति किस
दान पदकी व्याख्या २८१ अपेक्षासे है २८९
अनुग्रह पदका अर्थ २८१ भव्य और अभव्य विकल्पका कारण २८९
स्वोपकार क्या है और परोपकार क्या है इसका दर्शनावरणके नौ भेद २९०
खुलासा २८१ निद्रा आदि पाँचोंकी व्याख्या २९०
'स्व' शब्दका अर्थ २८१ वेदनीयके दो भेद २९१
दानमें विशेषता लानेके कारण २८१ सद्वेद्य और असद्वेद्यकी व्याख्या २९१
विधि व विशेष शब्दका अर्थ २८२ मोहनीयके २८ भेद २९१
विधिविशेष आदिका खुलासा २८२
CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri

विषयानुक्रमणिका। १०३
दर्शनमोहनीयके तीन भेदोंका कारण व उनकी मूल प्रकृतियोंका स्वमुखसे अनुभव ३०३
व्याख्या २९२ कुछ कर्मोंको छोड़कर उत्तर प्रकृतियोंका
चारित्रमोहनीयके सब भेदोंकी व्याख्या २९३ परमुखसे भी अनुभव होता है ३०३
आयुकर्मके चार भेद २९४ अपने कर्मके नामानुसार अनुभव होता है ३०३
आयुव्यपदेशका कारण व चारों आयुओंकी कर्मफलके बाद निर्जरा होती है ३०३
व्याख्या २९४ निर्जरा व उसके भेदोंकी व्याख्या ३०४
नामकर्मके अवान्तर भेद २९५ 'च' पदकी सार्थकता ३०४
गति व उसके भेदोंकी व्याख्या २९५ विशेषार्थ द्वारा अनुभागबन्धका विशेष विवरण ३०४
जाति व उसके भेदोंकी व्याख्या २९५ प्रदेशबन्धकी व्याख्या ३०६
शरीर नामकर्म व उसके भेदोंकी व्याख्या २९५ पुण्य प्रकृतियाँ ३०७
अंगोपांग व उसके भेदोंकी व्याख्या २९६ पुण्य प्रकृतियोंके नाम ३०७
निर्माण व उसके भेदोंकी व्याख्या २९६ पाप प्रकृतियाँ ३०८
बन्धनकी व्याख्या २९६ पाप प्रकृतियोंके नाम ३०८
संघातकी व्याख्या २९६
संस्थान व उसके छह भेदोंकी व्याख्या २९६ नौवाँ अध्याय
संहनन व उसके छह भेदोंकी व्याख्या २९६ संवरका स्वरूप ३०९
स्पर्शादिक २०की व्याख्या २९६ संवरके दो भेद व उनके लक्षण ३०९
आनुपूर्व्य व उसके चार भेदोंकी व्याख्या २९७ किस गुणस्थानमें किस निमित्तसे कितनी
पूर्वोक्त भेदोंके सिवा अन्य भेदोंकी व्याख्या २९६ प्रकृतियोंका संवर होता है ३०९
गोत्र कर्मके दो भेद २९९ संवरके हेतु ३११
उच्च व नीच गोत्रकी व्याख्या २९९ गुप्ति, समिति, धर्म, अनुप्रेक्षा और परीषह-
अन्तराय कर्मके पाँच भेद २९९ जयका स्वरूप ३११
दानान्तराय आदिके कार्य ३०० सूत्रमें आये हुए 'सः' पदकी सार्थकता ३१२
आदिके तीन कर्म व अन्तराय कर्मका उत्कृष्ट संवर और निर्जराके हेतुभूत तपका निर्देश ३१२
स्थितिबन्ध ३०० तपका धर्ममें अन्तर्भाव होता है फिर भी
इन कर्मोंके उत्कृष्ट स्थितिबन्धका स्वामी ३०० उसके अलगसे कहनेका कारण ३१२
मोहनीय कर्मका उत्कृष्ट स्थितिबन्ध ३०१ तप अभ्युदय स्वर्गादिका कारण होकर भी
मोहनीयके उत्कृष्ट स्थितिबन्धका स्वामी ३०१ निर्जराका कारण कैसे है इस शंकाका
नाम और गोत्रकर्मका उत्कृष्ट स्थितिबन्ध ३०१ समाधान ३१२
इन कर्मोंके उत्कृष्ट स्थितिबन्धका स्वामी ३०१ गुप्तिका स्वरूप ३१३
आयुकर्मका उत्कृष्ट स्थितिबन्ध ३०१ निग्रह पदकी व्याख्या ३१३
आयुकर्मके उत्कृष्ट स्थितिबन्धका स्वामी ३०१ सम्यक् पदकी सार्थकता ३१३
वेदनीय कर्मका जघन्य स्थितिबन्ध ३०२ गुप्ति संवरका कारण कैसे है इस बातका निर्देश ३१३
नाम और गोत्रकर्मका जघन्य स्थितिबन्ध ३०२ समितिके पाँच भेद ३१३
शेष कर्मोंका जघन्य स्थितिबन्ध ३०२ समिति संवरका हेतु कैसे है इस बातका निर्देश ३१३
अनुभागबन्धकी व्याख्या ३०२ धर्मके दस भेद ३१३
विपाकपदकी व्याख्या ३०२ गुप्ति, समिति और धर्मको संवरका हेतु
अनुभवके दो भेद ३०३ कहनेका प्रयोजन ३१३
अनुभवकी दो प्रकारसे प्रवृत्ति ३०३ क्षमादि दस धर्मोंका स्वरूप ३१३

१०४ सर्वार्थसिद्धि
सत्य और भाषासमितिमें अन्तरका कथन ३१४ ज्ञानावरणके उदयमें प्रज्ञा परीषह कैसे होता
ये दस धर्म संवरके कारण कैसे हैं इसका विचार ३१५ है इसका विचार ३३०
अनुप्रेक्षाके बारह भेद ३१५ दर्शनमोह और अन्तरायके उदयमें जो परीषह
अनित्यादि बारह अनुप्रेक्षाओंके चिन्तन होते हैं उनका निर्देश ३३१
करनेकी प्रक्रिया ३१५ चारित्रमोहके उदयमें जो परीषह होते हैं
निर्जराके दो भेद व उनकी व्याख्या ३१८ उनका निर्देश ३३१
ये अनुप्रेक्षाएँ संवरका कारण कैसे हैं निष्पद्यपरीषह चारित्रमोहके उदयमें कैसे
इसका विचार ३२० होता है इसका विचार ३३२
अनुप्रेक्षाको संवरके हेतुओंके मध्यमें रखनेका वेदनीयके उदयमें जो परीषह होते हैं
प्रयोजन ३२० इसका विचार ३३२
परीषहकी निरुक्ति व प्रयोजन ३२० एक जीवके एक साथ कितने परीषह होते
परीषहजय संवर और निर्जराका कारण कैसे हैं इसका विचार ३३२
है इसका विचार ३२० एक जीव के एक साथ उन्नीस परीषह क्यों
परीषहोंके नाम ३२० होते हैं इसका विचार ३३३
क्षुधादि बाईस परीषहोंको किस प्रकार जीतना प्रज्ञा और अज्ञान परीषह एक साथ कैसे
चाहिए इसका पृथक्-पृथक् विचार ३२० होते हैं इसका विचार ३३३
पूर्वोक्त विधिसे परीषहोंको सहन करनेसे संवर चारित्रके पाँच भेद ३३३
होता है इसका निर्देश ३२७ चारित्रको अलगसे ग्रहण करनेका प्रयोजन ३३३
सूक्ष्मसाम्पराय और छद्मस्थ वीतराग के सामायिकचारित्रके दो भेद और उनकी
चौदह परीषह होते हैं इस बातका निर्देश ३२७ व्याख्या ३३३
सूक्ष्मसाम्पराय जीवके मोहोदयनिमित्तक परीषह छेदोपस्थापनाचारित्रका स्वरूप ३३३
क्यों नहीं होते इस शंकाका परिहार ३२७ परिहारविशुद्धि चारित्रका स्वरूप ३३४
पूर्वोक्त जीवोंके ये चौदह परीषह किस सूक्ष्मसाम्पराय चारित्रका स्वरूप ३३४
अपेक्षासे होते हैं इस बातका विचार ३२७ अथाख्यातचारित्रका स्वरूप व अथ शब्दकी
जिनके ग्यारह परीषह होते हैं इस बातका सार्थकता ३३४
निर्देश ३२८ अथाख्यातका दूसरा नाम यथाख्यात है इस
जिनके ग्यारह परीषह किंनिमित्तक होते हैं बातका सयुक्तिक निर्देश ३३४
इस बातका निर्देश ३२८ 'इति' शब्द की सार्थकता ३३४
जिनके मोहनीयका उदय न होनेपर भी सामायिक आदिके आनुपूर्वी कथनकी
ग्यारह परीषह क्यों कहे हैं इस बातका सार्थकता ३३४
निर्देश ३२८ बाह्य तपके छह भेद ३३५
‘न सन्ति’ पदके अध्याहारकी सूचना ३२८ अनशन आदि की व्याख्या व उसके कथनका
बादरसाम्पराय के सब परीषह होते हैं इस प्रयोजन ३३५
वातका निर्देश ३२९ परीषह और कायक्लेश में क्या अन्तर है
बादरसाम्परायशब्दका अर्थ ३२९ इस बातका निर्देश ३३६
किन चारित्रोंमें सब परीषह सम्भव हैं इस बाह्य तप कहनेका प्रयोजन ३३६
बात का निर्देश ३३० अन्तरंग तपके छह भेद ३३६
ज्ञानावरणके उदयमें जो दो परीषह होते हैं प्रायश्चित्त आदि की व्याख्या ३३६
उनका निर्देश ३३० ध्यानको छोड़कर शेष पाँच अन्तरंग तपोंके
अवान्तर भेद ३३६
CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri

विषयानुक्रमणिका १०५
प्रायश्चित्तके नौ भेद ३३६ रौद्रध्यानके चार भेद व स्वामी ३४३
आलोचन आदि नौ भेदोंकी व्याख्या ३३७ देशसंयतके रौद्रध्यान कैसे होता है इस
विनय तपके चार भेद ३३८ बातका विचार ३४३
ज्ञानविनय आदि चार भेदोंकी व्याख्या ३३८ संयतके रौद्रध्यान न होने का कारण ३४४
वैयावृत्त्य तपके दस भेद ३३८ धर्म्यध्यानके चार भेद ३४४
वैयावृत्त्य तपके दस भेदोंका कारण ३३८ विचय पदकी निरुक्ति ३४४
आचार्य आदि पदोंकी व्याख्या ३३८ आज्ञाविचय आदि चारोंकी व्याख्या ३४४
स्वाध्याय तपके पाँच भेद ३३९ धर्म्यध्यानके चारों भेदोंके स्वामी ३४४
वाचना आदि पदोंकी व्याख्या व प्रयोजन ३३९ विशेषार्थ द्वारा कर्मोंके उदय व उदीरणाका
व्युत्सर्ग तपके दो भेद ३३९ विशेष विवेचन ३४५
व्युत्सर्ग पदकी निरुक्ति व भेदनिर्देश ३३९ आदिके दो शुक्लध्यान पूर्वविद्के होते हैं ३४७
बाह्य उपधिके प्रकार ३३९ पूर्वविद् पदका अर्थ ३४७
अन्तरंग उपधिके प्रकार ३३९ श्रेणी आरोहणके पूर्व धर्म्यध्यान होता है
व्युत्सर्ग तपका प्रयोजन ३३९ और बादमें शुक्लध्यान होता है इस
ध्यानका प्रयोक्ता, स्वरूप व काल परिमाण ३४० बातका निर्देश ३४७
आदिके तीन संहनन उत्तम हैं इस बातका निर्देश ३४० अन्तके दो शुक्लध्यान केवलीके होते हैं ३४७
ध्यानके साधन ये तीनों हैं पर मोक्षका साधन शुक्लध्यानके चार भेदोंके नाम ३४८
प्रथम संहनन ही है इस बातका निर्देश ३४० शुक्लध्यानके चारों भेदोंके स्वामी ३४८
एकाग्रचिन्तानिरोध पदकी व्याख्या ३४० आदिके दो शुक्लध्यानोंमें विशेषताका कथन ३४८
चिन्तानिरोधको ध्यान कहनेसे आनेवाले एकाश्रय पदका तात्पर्य ३४८
दोषका परिहार ३४१ दूसरा शुक्लध्यान अविचार है इस बातका
ध्यानके चार भेद ३४१ निर्देश ३४९
आर्त आदि पदोंकी व्याख्या ३४१ वितर्क शब्दका अर्थ ३४९
चारों प्रकारके ध्यानोंमेंसे प्रत्येकके दो दो वीचार पदकी व्याख्या ३४९
भेद क्यों हैं इस बातका निर्देश ३४१ अर्थ, व्यंजन, योग और संक्रान्ति पदकी
अन्तके दो ध्यान मोक्षके हेतु हैं ३४१ व्याख्या ३४९
पर शब्दसे अन्तके दो ध्यानोंका ग्रहण कैसे अर्थसंक्रान्तिका उदाहरण ३४९
होता है इस बातका निर्देश ३४१ व्यंजनसंक्रान्तिका प्रकार ३४९
आर्तध्यानके प्रथम भेदका लक्षण ३४२ योगसंक्रान्तिका प्रकार ३४९
अमनोज्ञ पदकी व्याख्या ३४२ मुनि पृथक्त्ववितर्क वीचारका ध्यान किस लिए
आर्तध्यान द्वितीय भेदका लक्षण ३४२ और कब करता है इस बातका निर्देश ३५०
वेदना नामक आर्तध्यानका लक्षण ३४२ मुनि एकत्ववितर्कका ध्यान किस लिए और
वेदना पदकी व्याख्या ३४२ कब करता है इस बातका निर्देश ३५०
निदान नामक आर्तध्यानका लक्षण ३४२ मुनि सूक्ष्मक्रियाप्रतिपाति ध्यान किस लिए और
चारों प्रकारके आर्तध्यानके स्वामी ३४३ कब करता है इस बातका निर्देश ३५०
अविरत आदि पदोंकी व्याख्या ३४३ मुनि व्युच्छिन्नक्रियानिवर्ति ध्यान किस लिए और
अविरत आदि तीनोंके आदिके तीन ध्यान कब करता है इस बातका निर्देश ३५१
होते हैं किन्तु निदान प्रमत्तसंयतके नहीं साक्षात् मोक्षका कारण क्या है इस बातका
होता इस बातका निर्देश ३४३ निर्देश ३५१
१४

१०६ सर्वार्थसिद्धि
साक्षात् मोक्षका कारण मिलने पर मुनि मुक्त यत्नसाध्य अभाव किस क्रमसे होता है इस
होता है इस बातका निर्देश ३५१ इस बातका निर्देश ३५७
दोनों प्रकारका तप संवरके साथ निर्जराका भी अन्य किन भावोंके अभावसे मोक्ष होता है
कारण है इस बातका समर्थन ३५१ इस बातका निर्देश ३५९
किसके कितनी निर्जरा होती है ३५१ भव्यत्व पदको ग्रहण करनेका कारण ३५९
अधिकारी भेदसे उत्तरोत्तर असंख्यातगुणी मोक्षमें किन भावोंका अभाव नहीं होता इस
निर्जराका विशेष खुलासा ३५१ बातका निर्देश ३५९
निर्ग्रन्थोंके पाँच भेद ३५३ मोक्षमें अनन्त वीर्य आदिका सद्भावख्यापन ३५९
पुलाक आदि पदोंकी व्याख्या ३५३ मुक्त जीवोंके आकारका शंका-समाधानपूर्वक
ये पुलाकादि पाँचों किस अपेक्षासे निर्ग्रन्थ प्रतिपादन ३६०
कहलाते हैं इसका कारण ३५३ मुक्त जीव लोकाकाश प्रमाण क्यों नहीं होता
निर्ग्रन्थोंमें संयम आदिकी अपेक्षा भेद कथन ३५४ इस बातका निर्देश ३६०
संयमकी अपेक्षा भेद कथन ३५४ मुक्त जीवके ऊपर लोकान्त गमनका निर्देश ३६०
श्रुतकी अपेक्षा भेद कथन ३५४ ऊपर लोकान्त गमनमें हेतुओंका निर्देश ३६०
प्रतिसेवनाकी अपेक्षा भेद कथन ३५४ दृष्टान्तों द्वारा हेतुओंका समर्थन ३६१
तीर्थकी अपेक्षा भेद कथन ३५४ हेतुपूर्वक दृष्टान्तोंका विशेष स्पष्टीकरण ३६१
लिंगकी अपेक्षा अभेद कथन ३५४ ऊपर लोकान्तसे आगे गमन न करनेका कारण ३६१
लेश्याकी अपेक्षा भेद कथन ३५५ मुक्त जीवोंमें क्षेत्र आदिकी अपेक्षा भेद कथन ३६२
उपपादकी अपेक्षा भेद कथन ३५५ भेद कथनमें दो नयोंका अवलम्बन ३६२
स्थानकी अपेक्षा भेद कथन ३५५ क्षेत्रकी अपेक्षा भेदकथन ३६२
कालकी अपेक्षा भेदकथन ३६२
दसवाँ अध्याय गतिकी अपेक्षा भेदकथन ३६२
केवलज्ञानकी उत्पत्तिके हेतु और कर्मक्षयका लिंगकी अपेक्षा भेदकथन ३६२
क्रमनिर्देश ३५६ तीर्थकी अपेक्षा भेदकथन ३६३
मोहक्षयात् पदको अलग रखनेका कारण ३५६ चारित्रकी अपेक्षा भेदकथन ३६३
मोहका क्षय पहले क्यों और किस क्रमसे होता प्रत्येक बुद्धबोधितकी अपेक्षा भेदकथन ३६३
है इस बातका निर्देश ३५६ ज्ञानकी अपेक्षा भेदकथन ३६३
क्षीणकषाय जीवके शेष ज्ञानावरणादि कर्मोंका अवगाहनकी अपेक्षा भेदकथन ३६३
क्षय कब और किस क्रमसे होता है इस अन्तरकी अपेक्षा भेदकथन ३६३
बातका निर्देश ३५७ संख्याकी अपेक्षा भेदकथन ३६३
कारणपूर्वक मोक्षका स्वरूप ३५७ क्षेत्रादिकी अपेक्षा अल्पबहुत्व ३६३
कर्मके अभावके दो भेद ३५७ सर्वार्थसिद्धि इस नामकी सार्थकता और
किन कर्मोंका अयत्नसाध्य अभाव होता है इस महत्त्वप्रख्यापन ३६४
बातका निर्देश ३५७ वीर जिनकी स्तुति ३६४

अध्याय २-४: जीव-तत्त्व, संसारी-मुक्त भेद, नरक-स्वर्ग एवं देव-लोक रचना

टिप्पणियोंमें उल्लिखित ग्रन्थोंकी संकेत सूची
संकेत ग्रन्थनाम संकेत ग्रन्थनाम
अने० ना० अनेकान्त नाममाला प्र० वार्तिकाल० प्रमाणवार्तिकालंकार
अ० अन्य प्रति प्रवचन० क्षे० प्रवचनसार क्षेत्र
आ० नि० आचारांग नियुक्ति प्रश० व्यो० प्रशस्तपादभाष्य व्योमवती टीका
आ० आरा प्रति बा० अणु० बारह अणुपेक्खा
गो० क० गोम्मटसार कर्मकाण्ड बा० भा० बार्हस्पत्य भाष्य
गो० जी० गोम्मटसार जीवकाण्ड मु० मुद्रित प्रति ( सर्वार्थसिद्धि )
जैनेन्द्र० जैनेन्द्र व्याकरण $\left.\begin{matrix} मूला०
मूलाचा० \end{matrix}\right}$ मूलाचार
त० ताडपत्रीय प्रति १
तत्त्वा० तत्त्वार्थवार्तिक युक्त्यनु० युक्त्यनुशासन
दि० १ दिल्ली प्रति १ यो०भा० योगभाष्य
दि० २ दिल्ली प्रति २ योगसू० योगसूत्र
धव० प्र० अ० धवला प्रति अमरावती रत्न० रत्नकरण्डक
ना० ताड़पत्रीय प्रति २ वि० भा० विशेषावश्यक भाष्य
न्या० भा० न्यायभाष्य वि० म० विशुद्धिमग्ग
न्यायबिन्दुटी० न्यायबिन्दु टीका सन्मति० सन्मतितर्क
न्या० सू० न्यायसूत्र स० प्रा० समयप्राभृत
परि० शे० परिभाषेन्दुशेखर $\left.\begin{matrix} स०
सर्वा० \end{matrix}\right}$ सर्वार्थसिद्धि
प० मु० परीक्षामुख
$\left.\begin{matrix} पा०
पा० म० भा० \end{matrix}\right}$ पातञ्जल महाभाष्य सिद्धद्वा० सिद्धद्वात्रिंशत्का
सौन्दर० सौन्दरानन्द
पा० यो० सू० पातञ्जल योगसूत्र
पंच० पंचसंग्रह ( श्वे० ) सां० कौ० सांख्यकौमुदी
अ० अध्याय
प० पत्र
पृ० पृष्ठ
श्लो० श्लोक
सू० सूत्र
CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri

अथ चक्रं द्वितीये हस्तिक्षेत्रे विंशोपकादि
नामपद लब्धि नामपद लब्धि
मस्तकाच्छादनम् ० । ८ । ७ । १ । ० । २ ललाट फलकम् ० । ६ ० । ४
गल आच्छादनम् ० । ६ ० । ११ । १२ नेत्र दल ० । ८
कण्ठ विस्तीर्ण आच्छादनम् ० । १० ० । १५ कनीनी मण्डल ० । १ ० । ५
तालुपीठ पृष्ठ ० । १२ ० । १४ नेत्र रोम ० । १४
गलात् कण्ठतः ० । ५ ० । ६ दृक्कोण मध्यभाग ० । ८ ० । ६
(डोम्बिकैः) नेत्र मध्य ० । ६ दृक्कोण मध्यभाग ० । १० ० । १०
गण्डस्थल { ० । ८ / ० । ४ । १२ दृक्पात भूमि ० । ४ । ६
१ नेत्र विस्तीर्ण ० । ८
विष्कम्भतः ० । ११ । १२ कनीनामण्डल ० । ३ । १२
गण्डगर्भः ० । १८ । ० १ नेत्र विस्तीर्ण १ ० । ३
दन्तपीठ ० । ५ । १२ २ नेत्र विस्तीर्ण ८ ० । ३
आस्फालनम् ० । १४ विष्कम्भ नेत्र विस्ती ० । ४ ० । २ ० । ३
पृष्ठ आच्छादनम् ० । ५ ० । ३ ४ नेत्र परिणाह ० । १४
दन्तदण्डौ ० । ६ ० । ३ घोषमण्डल ० । ५ ० । ५
केसरोत्पत्ति ० । १४ । ६ अधि कर्णस्थल ० । २ । १२ । १७ । ०
पुच्छदण्ड ० । ५ ० । ६ दन्तपीठ ० । ३ ० । १०
दन्तोत्पत्ति { ० । ३ / ० । १२ गण्डकुम्भोपरि ० । ६ ० । १७
नासाविस्तीर्ण ० । ४ । ८ । १ कुम्भपीठ { ० । ६ ० । २ / ० । ७
मस्तकाच्छादन { ० । ५ ० । ५ ० । २
दन्तगर्भः ० । २ । ८ । १ कुम्भ मस्तकाच्छादन ० । ६ ० । ६ ० । ५
द्विनखान्तराले ० । ६ ० । ४ ( ० । ८ ) हस्तदण्ड ० । ५
विष्कम्भ ० । ६
दल ० । २
दल ० । १
कर्णक ० । ६ । २
दल ० । ३

श्रीपूज्यपादाचार्यविरचिता
सर्वार्थसिद्धिः
प्रथमोऽध्यायः
मोक्षमार्गस्य नेतारं भेत्तारं कर्मभूभृताम् । ज्ञातारं विश्वतत्त्वानां वन्दे तद्गुणलब्धये ॥१॥
§ १. कश्चिद्भव्यः प्रत्यासन्ननिष्ठः प्रज्ञावान् स्वहितमुपलिप्सुर्विविक्ते परमरम्ये भव्य-
सत्त्वविश्रामास्पदे क्वचिदाश्रमपदे मुनिपरिषदन्मध्ये संनिषण्णं मूर्त्तमिव मोक्षमार्गमवाग्विसर्गं वपुषा
निरूपयन्तं युक्त्यागमकुशलं परहितप्रतिपादनैककार्यमार्यनिषेव्यं निर्ग्रन्थाचार्यवर्यमुपसद्य सविनयं
परिपृच्छति स्म । भगवन्, किं¹ नु खलु आत्मने हितं स्यादिति । स आह मोक्ष इति । स एव पुनः ५
प्रत्याह किंस্বরূপोऽसौ मोक्षः कश्चास्य प्राप्त्युपाय इति । आचार्य आह-निरवशेषनिराकृतकर्ममल-
कलङ्कस्याशरीरस्यात्मनोऽचिन्त्यस्वाभाविकज्ञानादिगुणमव्याबाधसुखमात्यन्तिकमवस्थान्तरं मोक्षं²
इति ।
§ २. तस्यात्यन्तपरोक्षत्वाच्छद्मस्थाः प्रवादिनस्तीर्थंकरंमन्यास्तस्य स्वरूपमस्पृशन्तीभि-
र्वाग्भिर्युक्त्याभासनिबन्धनाभिरन्यथैव परिकल्पयन्ति "चैतन्यं³ पुरुषस्य स्वरूपम्⁴, तच्च ज्ञेया- १०

जो मोक्षमार्गके नेता हैं, कर्मरूपी पर्वतोंके भेदनेवाले हैं और विश्वतत्त्वोंके ज्ञाता हैं, उनकी
मैं उनके समान गुणोंकी प्राप्तिके लिए वन्दना करता हूँ ॥१॥
§ १. अपने हितको चाहनेवाला कोई एक बुद्धिमान् निकट भव्य था । वह अत्यन्त रमणीय
भव्य जीवोंके विश्रामके योग्य किसी एकान्त आश्रममें गया । वहाँ उसने मुनियोंकी सभामें बैठे हुए
वचन बोले बिना ही मात्र अपने शरीरकी आकृतिसे मानो मूर्तिमान् मोक्षमार्गका निरूपण करनेवाले, १५
युक्ति तथा आगममें कुशल, दूसरे जीवोंके हितका मुख्यरूपसे प्रतिपादन करनेवाले और आर्य
पुरुषोंके द्वारा सेवनीय प्रधान निर्ग्रन्थ आचार्यके पास जाकर विनयके साथ पूछा- 'भगवन् !
आत्माका हित क्या है ?' आचार्यने उत्तर दिया- 'आत्माका हित मोक्ष है।' भव्यने फिर पूछा-
'मोक्षका क्या स्वरूप है और उसकी प्राप्तिका उपाय क्या है ?' आचार्यने कहा कि- 'जब आत्मा
कर्ममल, कलंक और शरीरको अपनेसे सर्वथा जुदा कर देता है तब उसके जो अचिन्त्य स्वाभाविक २०
ज्ञानादि गुणरूप और अव्याबाध सुखरूप सर्वथा विलक्षण अवस्था उत्पन्न होती है उसे मोक्ष
कहते हैं।'
§ २. चूंकि ऐसा मोक्ष अत्यन्त परोक्ष है, अतः अपनेको तीर्थंकर माननेवाले अल्पज्ञानी
प्रवादी लोग मोक्षके स्वरूपको स्पर्श नहीं करनेवाले और असत्य युक्तिरूप वचनोंके द्वारा उसका
स्वरूप सर्वथा अन्य प्रकारसे बतलाते हैं। यथा-( १. सांख्य ) पुरुषका स्वरूप चैतन्य है जो २५

१. किं खलु आत्मने-आ०, अ० । किं खलु आत्मनो-दि० १, दि० २ । २. मोक्षः त-आ०, अ०, दि० १,
दि० २ । ३. 'चैतन्यं पुरुषस्य स्वरूपमिति' -योगभा० १।९ । 'तदा द्रष्टुः स्वरूपेऽवस्थानम्' -योगसू० १।३ ।
४. स्वरूपमिति त-आ०, त० ।
CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons; Dev Prayag. Digitized by eGangotri

२ सर्वार्थसिद्धौ
कारपरिच्छेदपराङ्मुखम्'' इति । तत्सदप्यसदेव ²निराकारत्वादिति । "³बुद्ध्यादिवैशेषिकगुणोच्छेदः
पुरुषस्य मोक्षः" इति⁴ । तदपि परिकल्पनमसदेव विशेषलक्षणशून्यस्यावस्तुत्वात् । "प्रदीपनिर्वाण-
⁵कल्पमात्मनिर्वाणम्" इति च । तस्य ⁶खरविषाणकल्पना तैरेवाहृत्य निरूपिता । इत्येवमादि ।
तस्य स्वरूपमनवद्यमुत्तरत्र वक्ष्यामः ।
§ ३. तत्प्राप्त्युपायं प्रत्यपि ते विसंवदन्ते—"ज्ञानादेव चारित्रनिरपेक्षात्तत्प्राप्तिः, श्रद्धा-
नमात्रादेव वा, ज्ञाननिरपेक्षाच्चारित्रमात्रादेव" इति च । व्याध्यभिभूतस्य तद्विनिवृत्त्युपायभूतभेषज-
विषयव्यस्तज्ञानादिसाधनत्वाभाववद् ⁷व्यस्तं ज्ञानादिमोक्षप्राप्त्युपायो न भवति ।
ज्ञेयके ज्ञानसे रहित है । किन्तु ऐसा चैतन्य सत्स्वरूप होकर भी असत् ही है, क्योंकि ऐसा
मानने पर उसका कोई आकार अर्थात् स्वरूप नहीं प्राप्त होता । (२. वैशेषिक) बुद्धि आदि विशेष
गुणोंका अलग हो जाना ही आत्माका मोक्ष है । किन्तु यह कल्पना भी असमीचीन है, क्योंकि
विशेष लक्षणसे रहित वस्तु नहीं होती । (३. बौद्ध) जिस प्रकार दीपक बुझ जाता है उसी
प्रकार आत्माकी सन्तानका विच्छेद होना ही मोक्ष है । किन्तु जैसे गदहेके सींग केवल कल्पनाके
विषय होते हैं स्वरूपसत् नहीं वैसे ही इस प्रकारका मोक्ष भी केवल कल्पनाका विषय है स्वरूपसत्
नहीं । यह बात स्वयं उन्हींके कथनसे सिद्ध हो जाती है । इत्यादि । इस मोक्षका निर्दोष स्वरूप
आगे (दसवें अध्यायमें) कहेंगे ।
§ ३. इसी प्रकार वे प्रवादी लोग उसकी प्राप्तिके उपायोंके विषयमें भी विवाद करते हैं ।
कोई मानते हैं कि (१) चारित्रके बिना केवल ज्ञानसे मोक्षकी प्राप्ति होती है । दूसरे मानते हैं कि
(२) केवल श्रद्धानसे मोक्षकी प्राप्ति होती है । तथा अन्य मानते हैं कि (३) ज्ञानके बिना केवल
चारित्रसे मोक्षकी प्राप्ति होती है । परन्तु जिस प्रकार रोगके दूर करनेकी उपायभूत दवाईका
मात्र ज्ञान, श्रद्धान या आचरण रोगीके रोगके दूर करनेका उपाय नहीं है उसी प्रकार अलग-
अलग ज्ञान आदि मोक्षकी प्राप्तिके उपाय नहीं हैं ।
विशेषार्थ—अब तक जो कुछ बतलाया है यह तत्त्वार्थसूत्र और उसके प्रथम सूत्रकी उत्था-
निका मात्र है । इसमें सर्व प्रथम बतलाया है कि किस निमित्तसे इसकी रचना हुई । आशय यह
है कि कोई एक भव्य आत्माके हितकी खोजमें था । इसके लिए वह किसी एकान्त रम्य आश्रममें
गया और वहाँ मुनियोंकी सभामें बैठे हुए निर्ग्रन्थाचार्यसे प्रश्न किया । इसपरसे इस तत्त्वार्थसूत्र
की रचना हुई है । तत्त्वार्थराजवार्तिकके प्रारम्भमें जो उत्थानिका दी है उससे भी इसी बातकी
पुष्टि होती है । किन्तु वहाँ प्रथम सूत्रका निर्देश करनेके बाद एक दूसरे मतका भी उल्लेख किया
है। वहाँ बतलाया है कि तत्त्वार्थसूत्रकी रचनाके सम्बन्धमें अन्य लोग इस प्रकारसे व्याख्यान करते
हैं कि 'इधर पुरुषोंकी शक्ति उत्तरोत्तर क्षीण होती जा रही है, अतः सिद्धान्तकी प्रक्रियाको प्रकट
करनेके लिए मोक्षमार्गके निर्देशके सम्बन्धसे आनुपूर्वी क्रमसे शास्त्रकी रचनाका प्रारम्भ करते हुए
“सम्यग्दर्शनज्ञानचारित्राणि मोक्षमार्गः” यह सूत्र कहा है । यहाँ शिष्य और आचार्यका सम्बन्ध
१. मुखम् । तत्-आ०, अ० । २. -त्वात् खरविषाणवत् । बुद्ध्या-मु० । ३. 'नवानामात्मविशेषगुणानामत्य-
न्तोच्छित्तिर्मोक्षः ।' -प्रश० व्यो० पृ० ६३८ । ४. इति च । तदपि दि० १, अ० । ५. 'यस्मिन् न जातिर्न
जरा न मृत्युर्न व्याधयो नाप्रियसंप्रयोगः । नेच्छाविपन्नप्रियविप्रयोगः क्षेमं पदं नैष्ठिकमच्युतं तत् ॥ दीपो यथा
निर्वृतिमभ्युपेतो नैवावनिं गच्छति नान्तरिक्षम् । दिशं न कांचिद्विदिशं न कांचित् स्नेहक्षयात् केवलमेति
शान्तिम् ॥' -सौन्दर० १६।२७-२९ । 'प्रदीपस्येव निर्वाणं विमोक्षस्तस्य चेतसः ।' -प्र० वार्तिकालं०
१।४५ । ६. -षाणवत्कल्पना -आ०, दि० १ दि० २. अ० मु० । ७. -वत् । एवं व्यस्तज्ञानादि -दि० १,
दि० २ मु० ।
CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri