सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)
Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary
आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१०४ सर्वार्थसिद्धि
सत्य और भाषासमितिमें अन्तरका कथन ३१४ ज्ञानावरणके उदयमें प्रज्ञा परीषह कैसे होता
ये दस धर्म संवरके कारण कैसे हैं इसका विचार ३१५ है इसका विचार ३३०
अनुप्रेक्षाके बारह भेद ३१५ दर्शनमोह और अन्तरायके उदयमें जो परीषह
अनित्यादि बारह अनुप्रेक्षाओंके चिन्तन होते हैं उनका निर्देश ३३१
करनेकी प्रक्रिया ३१५ चारित्रमोहके उदयमें जो परीषह होते हैं
निर्जराके दो भेद व उनकी व्याख्या ३१८ उनका निर्देश ३३१
ये अनुप्रेक्षाएँ संवरका कारण कैसे हैं निष्पद्यपरीषह चारित्रमोहके उदयमें कैसे
इसका विचार ३२० होता है इसका विचार ३३२
अनुप्रेक्षाको संवरके हेतुओंके मध्यमें रखनेका वेदनीयके उदयमें जो परीषह होते हैं
प्रयोजन ३२० इसका विचार ३३२
परीषहकी निरुक्ति व प्रयोजन ३२० एक जीवके एक साथ कितने परीषह होते
परीषहजय संवर और निर्जराका कारण कैसे हैं इसका विचार ३३२
है इसका विचार ३२० एक जीव के एक साथ उन्नीस परीषह क्यों
परीषहोंके नाम ३२० होते हैं इसका विचार ३३३
क्षुधादि बाईस परीषहोंको किस प्रकार जीतना प्रज्ञा और अज्ञान परीषह एक साथ कैसे
चाहिए इसका पृथक्-पृथक् विचार ३२० होते हैं इसका विचार ३३३
पूर्वोक्त विधिसे परीषहोंको सहन करनेसे संवर चारित्रके पाँच भेद ३३३
होता है इसका निर्देश ३२७ चारित्रको अलगसे ग्रहण करनेका प्रयोजन ३३३
सूक्ष्मसाम्पराय और छद्मस्थ वीतराग के सामायिकचारित्रके दो भेद और उनकी
चौदह परीषह होते हैं इस बातका निर्देश ३२७ व्याख्या ३३३
सूक्ष्मसाम्पराय जीवके मोहोदयनिमित्तक परीषह छेदोपस्थापनाचारित्रका स्वरूप ३३३
क्यों नहीं होते इस शंकाका परिहार ३२७ परिहारविशुद्धि चारित्रका स्वरूप ३३४
पूर्वोक्त जीवोंके ये चौदह परीषह किस सूक्ष्मसाम्पराय चारित्रका स्वरूप ३३४
अपेक्षासे होते हैं इस बातका विचार ३२७ अथाख्यातचारित्रका स्वरूप व अथ शब्दकी
जिनके ग्यारह परीषह होते हैं इस बातका सार्थकता ३३४
निर्देश ३२८ अथाख्यातका दूसरा नाम यथाख्यात है इस
जिनके ग्यारह परीषह किंनिमित्तक होते हैं बातका सयुक्तिक निर्देश ३३४
इस बातका निर्देश ३२८ 'इति' शब्द की सार्थकता ३३४
जिनके मोहनीयका उदय न होनेपर भी सामायिक आदिके आनुपूर्वी कथनकी
ग्यारह परीषह क्यों कहे हैं इस बातका सार्थकता ३३४
निर्देश ३२८ बाह्य तपके छह भेद ३३५
‘न सन्ति’ पदके अध्याहारकी सूचना ३२८ अनशन आदि की व्याख्या व उसके कथनका
बादरसाम्पराय के सब परीषह होते हैं इस प्रयोजन ३३५
वातका निर्देश ३२९ परीषह और कायक्लेश में क्या अन्तर है
बादरसाम्परायशब्दका अर्थ ३२९ इस बातका निर्देश ३३६
किन चारित्रोंमें सब परीषह सम्भव हैं इस बाह्य तप कहनेका प्रयोजन ३३६
बात का निर्देश ३३० अन्तरंग तपके छह भेद ३३६
ज्ञानावरणके उदयमें जो दो परीषह होते हैं प्रायश्चित्त आदि की व्याख्या ३३६
उनका निर्देश ३३० ध्यानको छोड़कर शेष पाँच अन्तरंग तपोंके
अवान्तर भेद ३३६
CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri