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सर्वकोश
सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary

आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

पृष्ठ 114, कुल 558 में से

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पृष्ठ 114

२ सर्वार्थसिद्धौ
कारपरिच्छेदपराङ्मुखम्'' इति । तत्सदप्यसदेव ²निराकारत्वादिति । "³बुद्ध्यादिवैशेषिकगुणोच्छेदः
पुरुषस्य मोक्षः" इति⁴ । तदपि परिकल्पनमसदेव विशेषलक्षणशून्यस्यावस्तुत्वात् । "प्रदीपनिर्वाण-
⁵कल्पमात्मनिर्वाणम्" इति च । तस्य ⁶खरविषाणकल्पना तैरेवाहृत्य निरूपिता । इत्येवमादि ।
तस्य स्वरूपमनवद्यमुत्तरत्र वक्ष्यामः ।
§ ३. तत्प्राप्त्युपायं प्रत्यपि ते विसंवदन्ते—"ज्ञानादेव चारित्रनिरपेक्षात्तत्प्राप्तिः, श्रद्धा-
नमात्रादेव वा, ज्ञाननिरपेक्षाच्चारित्रमात्रादेव" इति च । व्याध्यभिभूतस्य तद्विनिवृत्त्युपायभूतभेषज-
विषयव्यस्तज्ञानादिसाधनत्वाभाववद् ⁷व्यस्तं ज्ञानादिमोक्षप्राप्त्युपायो न भवति ।
ज्ञेयके ज्ञानसे रहित है । किन्तु ऐसा चैतन्य सत्स्वरूप होकर भी असत् ही है, क्योंकि ऐसा
मानने पर उसका कोई आकार अर्थात् स्वरूप नहीं प्राप्त होता । (२. वैशेषिक) बुद्धि आदि विशेष
गुणोंका अलग हो जाना ही आत्माका मोक्ष है । किन्तु यह कल्पना भी असमीचीन है, क्योंकि
विशेष लक्षणसे रहित वस्तु नहीं होती । (३. बौद्ध) जिस प्रकार दीपक बुझ जाता है उसी
प्रकार आत्माकी सन्तानका विच्छेद होना ही मोक्ष है । किन्तु जैसे गदहेके सींग केवल कल्पनाके
विषय होते हैं स्वरूपसत् नहीं वैसे ही इस प्रकारका मोक्ष भी केवल कल्पनाका विषय है स्वरूपसत्
नहीं । यह बात स्वयं उन्हींके कथनसे सिद्ध हो जाती है । इत्यादि । इस मोक्षका निर्दोष स्वरूप
आगे (दसवें अध्यायमें) कहेंगे ।
§ ३. इसी प्रकार वे प्रवादी लोग उसकी प्राप्तिके उपायोंके विषयमें भी विवाद करते हैं ।
कोई मानते हैं कि (१) चारित्रके बिना केवल ज्ञानसे मोक्षकी प्राप्ति होती है । दूसरे मानते हैं कि
(२) केवल श्रद्धानसे मोक्षकी प्राप्ति होती है । तथा अन्य मानते हैं कि (३) ज्ञानके बिना केवल
चारित्रसे मोक्षकी प्राप्ति होती है । परन्तु जिस प्रकार रोगके दूर करनेकी उपायभूत दवाईका
मात्र ज्ञान, श्रद्धान या आचरण रोगीके रोगके दूर करनेका उपाय नहीं है उसी प्रकार अलग-
अलग ज्ञान आदि मोक्षकी प्राप्तिके उपाय नहीं हैं ।
विशेषार्थ—अब तक जो कुछ बतलाया है यह तत्त्वार्थसूत्र और उसके प्रथम सूत्रकी उत्था-
निका मात्र है । इसमें सर्व प्रथम बतलाया है कि किस निमित्तसे इसकी रचना हुई । आशय यह
है कि कोई एक भव्य आत्माके हितकी खोजमें था । इसके लिए वह किसी एकान्त रम्य आश्रममें
गया और वहाँ मुनियोंकी सभामें बैठे हुए निर्ग्रन्थाचार्यसे प्रश्न किया । इसपरसे इस तत्त्वार्थसूत्र
की रचना हुई है । तत्त्वार्थराजवार्तिकके प्रारम्भमें जो उत्थानिका दी है उससे भी इसी बातकी
पुष्टि होती है । किन्तु वहाँ प्रथम सूत्रका निर्देश करनेके बाद एक दूसरे मतका भी उल्लेख किया
है। वहाँ बतलाया है कि तत्त्वार्थसूत्रकी रचनाके सम्बन्धमें अन्य लोग इस प्रकारसे व्याख्यान करते
हैं कि 'इधर पुरुषोंकी शक्ति उत्तरोत्तर क्षीण होती जा रही है, अतः सिद्धान्तकी प्रक्रियाको प्रकट
करनेके लिए मोक्षमार्गके निर्देशके सम्बन्धसे आनुपूर्वी क्रमसे शास्त्रकी रचनाका प्रारम्भ करते हुए
“सम्यग्दर्शनज्ञानचारित्राणि मोक्षमार्गः” यह सूत्र कहा है । यहाँ शिष्य और आचार्यका सम्बन्ध
१. मुखम् । तत्-आ०, अ० । २. -त्वात् खरविषाणवत् । बुद्ध्या-मु० । ३. 'नवानामात्मविशेषगुणानामत्य-
न्तोच्छित्तिर्मोक्षः ।' -प्रश० व्यो० पृ० ६३८ । ४. इति च । तदपि दि० १, अ० । ५. 'यस्मिन् न जातिर्न
जरा न मृत्युर्न व्याधयो नाप्रियसंप्रयोगः । नेच्छाविपन्नप्रियविप्रयोगः क्षेमं पदं नैष्ठिकमच्युतं तत् ॥ दीपो यथा
निर्वृतिमभ्युपेतो नैवावनिं गच्छति नान्तरिक्षम् । दिशं न कांचिद्विदिशं न कांचित् स्नेहक्षयात् केवलमेति
शान्तिम् ॥' -सौन्दर० १६।२७-२९ । 'प्रदीपस्येव निर्वाणं विमोक्षस्तस्य चेतसः ।' -प्र० वार्तिकालं०
१।४५ । ६. -षाणवत्कल्पना -आ०, दि० १ दि० २. अ० मु० । ७. -वत् । एवं व्यस्तज्ञानादि -दि० १,
दि० २ मु० ।
CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri