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सर्वकोश
सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary

आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

पृष्ठ 113, कुल 558 में से

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पृष्ठ 113

श्रीपूज्यपादाचार्यविरचिता
सर्वार्थसिद्धिः
प्रथमोऽध्यायः
मोक्षमार्गस्य नेतारं भेत्तारं कर्मभूभृताम् । ज्ञातारं विश्वतत्त्वानां वन्दे तद्गुणलब्धये ॥१॥
§ १. कश्चिद्भव्यः प्रत्यासन्ननिष्ठः प्रज्ञावान् स्वहितमुपलिप्सुर्विविक्ते परमरम्ये भव्य-
सत्त्वविश्रामास्पदे क्वचिदाश्रमपदे मुनिपरिषदन्मध्ये संनिषण्णं मूर्त्तमिव मोक्षमार्गमवाग्विसर्गं वपुषा
निरूपयन्तं युक्त्यागमकुशलं परहितप्रतिपादनैककार्यमार्यनिषेव्यं निर्ग्रन्थाचार्यवर्यमुपसद्य सविनयं
परिपृच्छति स्म । भगवन्, किं¹ नु खलु आत्मने हितं स्यादिति । स आह मोक्ष इति । स एव पुनः ५
प्रत्याह किंस্বরূপोऽसौ मोक्षः कश्चास्य प्राप्त्युपाय इति । आचार्य आह-निरवशेषनिराकृतकर्ममल-
कलङ्कस्याशरीरस्यात्मनोऽचिन्त्यस्वाभाविकज्ञानादिगुणमव्याबाधसुखमात्यन्तिकमवस्थान्तरं मोक्षं²
इति ।
§ २. तस्यात्यन्तपरोक्षत्वाच्छद्मस्थाः प्रवादिनस्तीर्थंकरंमन्यास्तस्य स्वरूपमस्पृशन्तीभि-
र्वाग्भिर्युक्त्याभासनिबन्धनाभिरन्यथैव परिकल्पयन्ति "चैतन्यं³ पुरुषस्य स्वरूपम्⁴, तच्च ज्ञेया- १०

जो मोक्षमार्गके नेता हैं, कर्मरूपी पर्वतोंके भेदनेवाले हैं और विश्वतत्त्वोंके ज्ञाता हैं, उनकी
मैं उनके समान गुणोंकी प्राप्तिके लिए वन्दना करता हूँ ॥१॥
§ १. अपने हितको चाहनेवाला कोई एक बुद्धिमान् निकट भव्य था । वह अत्यन्त रमणीय
भव्य जीवोंके विश्रामके योग्य किसी एकान्त आश्रममें गया । वहाँ उसने मुनियोंकी सभामें बैठे हुए
वचन बोले बिना ही मात्र अपने शरीरकी आकृतिसे मानो मूर्तिमान् मोक्षमार्गका निरूपण करनेवाले, १५
युक्ति तथा आगममें कुशल, दूसरे जीवोंके हितका मुख्यरूपसे प्रतिपादन करनेवाले और आर्य
पुरुषोंके द्वारा सेवनीय प्रधान निर्ग्रन्थ आचार्यके पास जाकर विनयके साथ पूछा- 'भगवन् !
आत्माका हित क्या है ?' आचार्यने उत्तर दिया- 'आत्माका हित मोक्ष है।' भव्यने फिर पूछा-
'मोक्षका क्या स्वरूप है और उसकी प्राप्तिका उपाय क्या है ?' आचार्यने कहा कि- 'जब आत्मा
कर्ममल, कलंक और शरीरको अपनेसे सर्वथा जुदा कर देता है तब उसके जो अचिन्त्य स्वाभाविक २०
ज्ञानादि गुणरूप और अव्याबाध सुखरूप सर्वथा विलक्षण अवस्था उत्पन्न होती है उसे मोक्ष
कहते हैं।'
§ २. चूंकि ऐसा मोक्ष अत्यन्त परोक्ष है, अतः अपनेको तीर्थंकर माननेवाले अल्पज्ञानी
प्रवादी लोग मोक्षके स्वरूपको स्पर्श नहीं करनेवाले और असत्य युक्तिरूप वचनोंके द्वारा उसका
स्वरूप सर्वथा अन्य प्रकारसे बतलाते हैं। यथा-( १. सांख्य ) पुरुषका स्वरूप चैतन्य है जो २५

१. किं खलु आत्मने-आ०, अ० । किं खलु आत्मनो-दि० १, दि० २ । २. मोक्षः त-आ०, अ०, दि० १,
दि० २ । ३. 'चैतन्यं पुरुषस्य स्वरूपमिति' -योगभा० १।९ । 'तदा द्रष्टुः स्वरूपेऽवस्थानम्' -योगसू० १।३ ।
४. स्वरूपमिति त-आ०, त० ।
CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons; Dev Prayag. Digitized by eGangotri