सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)
Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary
आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंविषयानुक्रमणिका। १०३
दर्शनमोहनीयके तीन भेदोंका कारण व उनकी मूल प्रकृतियोंका स्वमुखसे अनुभव ३०३
व्याख्या २९२ कुछ कर्मोंको छोड़कर उत्तर प्रकृतियोंका
चारित्रमोहनीयके सब भेदोंकी व्याख्या २९३ परमुखसे भी अनुभव होता है ३०३
आयुकर्मके चार भेद २९४ अपने कर्मके नामानुसार अनुभव होता है ३०३
आयुव्यपदेशका कारण व चारों आयुओंकी कर्मफलके बाद निर्जरा होती है ३०३
व्याख्या २९४ निर्जरा व उसके भेदोंकी व्याख्या ३०४
नामकर्मके अवान्तर भेद २९५ 'च' पदकी सार्थकता ३०४
गति व उसके भेदोंकी व्याख्या २९५ विशेषार्थ द्वारा अनुभागबन्धका विशेष विवरण ३०४
जाति व उसके भेदोंकी व्याख्या २९५ प्रदेशबन्धकी व्याख्या ३०६
शरीर नामकर्म व उसके भेदोंकी व्याख्या २९५ पुण्य प्रकृतियाँ ३०७
अंगोपांग व उसके भेदोंकी व्याख्या २९६ पुण्य प्रकृतियोंके नाम ३०७
निर्माण व उसके भेदोंकी व्याख्या २९६ पाप प्रकृतियाँ ३०८
बन्धनकी व्याख्या २९६ पाप प्रकृतियोंके नाम ३०८
संघातकी व्याख्या २९६
संस्थान व उसके छह भेदोंकी व्याख्या २९६ नौवाँ अध्याय
संहनन व उसके छह भेदोंकी व्याख्या २९६ संवरका स्वरूप ३०९
स्पर्शादिक २०की व्याख्या २९६ संवरके दो भेद व उनके लक्षण ३०९
आनुपूर्व्य व उसके चार भेदोंकी व्याख्या २९७ किस गुणस्थानमें किस निमित्तसे कितनी
पूर्वोक्त भेदोंके सिवा अन्य भेदोंकी व्याख्या २९६ प्रकृतियोंका संवर होता है ३०९
गोत्र कर्मके दो भेद २९९ संवरके हेतु ३११
उच्च व नीच गोत्रकी व्याख्या २९९ गुप्ति, समिति, धर्म, अनुप्रेक्षा और परीषह-
अन्तराय कर्मके पाँच भेद २९९ जयका स्वरूप ३११
दानान्तराय आदिके कार्य ३०० सूत्रमें आये हुए 'सः' पदकी सार्थकता ३१२
आदिके तीन कर्म व अन्तराय कर्मका उत्कृष्ट संवर और निर्जराके हेतुभूत तपका निर्देश ३१२
स्थितिबन्ध ३०० तपका धर्ममें अन्तर्भाव होता है फिर भी
इन कर्मोंके उत्कृष्ट स्थितिबन्धका स्वामी ३०० उसके अलगसे कहनेका कारण ३१२
मोहनीय कर्मका उत्कृष्ट स्थितिबन्ध ३०१ तप अभ्युदय स्वर्गादिका कारण होकर भी
मोहनीयके उत्कृष्ट स्थितिबन्धका स्वामी ३०१ निर्जराका कारण कैसे है इस शंकाका
नाम और गोत्रकर्मका उत्कृष्ट स्थितिबन्ध ३०१ समाधान ३१२
इन कर्मोंके उत्कृष्ट स्थितिबन्धका स्वामी ३०१ गुप्तिका स्वरूप ३१३
आयुकर्मका उत्कृष्ट स्थितिबन्ध ३०१ निग्रह पदकी व्याख्या ३१३
आयुकर्मके उत्कृष्ट स्थितिबन्धका स्वामी ३०१ सम्यक् पदकी सार्थकता ३१३
वेदनीय कर्मका जघन्य स्थितिबन्ध ३०२ गुप्ति संवरका कारण कैसे है इस बातका निर्देश ३१३
नाम और गोत्रकर्मका जघन्य स्थितिबन्ध ३०२ समितिके पाँच भेद ३१३
शेष कर्मोंका जघन्य स्थितिबन्ध ३०२ समिति संवरका हेतु कैसे है इस बातका निर्देश ३१३
अनुभागबन्धकी व्याख्या ३०२ धर्मके दस भेद ३१३
विपाकपदकी व्याख्या ३०२ गुप्ति, समिति और धर्मको संवरका हेतु
अनुभवके दो भेद ३०३ कहनेका प्रयोजन ३१३
अनुभवकी दो प्रकारसे प्रवृत्ति ३०३ क्षमादि दस धर्मोंका स्वरूप ३१३