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सर्वकोश
सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary

आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

पृष्ठ 109, कुल 558 में से

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पृष्ठ 109

विषयानुक्रमणिका १०५
प्रायश्चित्तके नौ भेद ३३६ रौद्रध्यानके चार भेद व स्वामी ३४३
आलोचन आदि नौ भेदोंकी व्याख्या ३३७ देशसंयतके रौद्रध्यान कैसे होता है इस
विनय तपके चार भेद ३३८ बातका विचार ३४३
ज्ञानविनय आदि चार भेदोंकी व्याख्या ३३८ संयतके रौद्रध्यान न होने का कारण ३४४
वैयावृत्त्य तपके दस भेद ३३८ धर्म्यध्यानके चार भेद ३४४
वैयावृत्त्य तपके दस भेदोंका कारण ३३८ विचय पदकी निरुक्ति ३४४
आचार्य आदि पदोंकी व्याख्या ३३८ आज्ञाविचय आदि चारोंकी व्याख्या ३४४
स्वाध्याय तपके पाँच भेद ३३९ धर्म्यध्यानके चारों भेदोंके स्वामी ३४४
वाचना आदि पदोंकी व्याख्या व प्रयोजन ३३९ विशेषार्थ द्वारा कर्मोंके उदय व उदीरणाका
व्युत्सर्ग तपके दो भेद ३३९ विशेष विवेचन ३४५
व्युत्सर्ग पदकी निरुक्ति व भेदनिर्देश ३३९ आदिके दो शुक्लध्यान पूर्वविद्के होते हैं ३४७
बाह्य उपधिके प्रकार ३३९ पूर्वविद् पदका अर्थ ३४७
अन्तरंग उपधिके प्रकार ३३९ श्रेणी आरोहणके पूर्व धर्म्यध्यान होता है
व्युत्सर्ग तपका प्रयोजन ३३९ और बादमें शुक्लध्यान होता है इस
ध्यानका प्रयोक्ता, स्वरूप व काल परिमाण ३४० बातका निर्देश ३४७
आदिके तीन संहनन उत्तम हैं इस बातका निर्देश ३४० अन्तके दो शुक्लध्यान केवलीके होते हैं ३४७
ध्यानके साधन ये तीनों हैं पर मोक्षका साधन शुक्लध्यानके चार भेदोंके नाम ३४८
प्रथम संहनन ही है इस बातका निर्देश ३४० शुक्लध्यानके चारों भेदोंके स्वामी ३४८
एकाग्रचिन्तानिरोध पदकी व्याख्या ३४० आदिके दो शुक्लध्यानोंमें विशेषताका कथन ३४८
चिन्तानिरोधको ध्यान कहनेसे आनेवाले एकाश्रय पदका तात्पर्य ३४८
दोषका परिहार ३४१ दूसरा शुक्लध्यान अविचार है इस बातका
ध्यानके चार भेद ३४१ निर्देश ३४९
आर्त आदि पदोंकी व्याख्या ३४१ वितर्क शब्दका अर्थ ३४९
चारों प्रकारके ध्यानोंमेंसे प्रत्येकके दो दो वीचार पदकी व्याख्या ३४९
भेद क्यों हैं इस बातका निर्देश ३४१ अर्थ, व्यंजन, योग और संक्रान्ति पदकी
अन्तके दो ध्यान मोक्षके हेतु हैं ३४१ व्याख्या ३४९
पर शब्दसे अन्तके दो ध्यानोंका ग्रहण कैसे अर्थसंक्रान्तिका उदाहरण ३४९
होता है इस बातका निर्देश ३४१ व्यंजनसंक्रान्तिका प्रकार ३४९
आर्तध्यानके प्रथम भेदका लक्षण ३४२ योगसंक्रान्तिका प्रकार ३४९
अमनोज्ञ पदकी व्याख्या ३४२ मुनि पृथक्त्ववितर्क वीचारका ध्यान किस लिए
आर्तध्यान द्वितीय भेदका लक्षण ३४२ और कब करता है इस बातका निर्देश ३५०
वेदना नामक आर्तध्यानका लक्षण ३४२ मुनि एकत्ववितर्कका ध्यान किस लिए और
वेदना पदकी व्याख्या ३४२ कब करता है इस बातका निर्देश ३५०
निदान नामक आर्तध्यानका लक्षण ३४२ मुनि सूक्ष्मक्रियाप्रतिपाति ध्यान किस लिए और
चारों प्रकारके आर्तध्यानके स्वामी ३४३ कब करता है इस बातका निर्देश ३५०
अविरत आदि पदोंकी व्याख्या ३४३ मुनि व्युच्छिन्नक्रियानिवर्ति ध्यान किस लिए और
अविरत आदि तीनोंके आदिके तीन ध्यान कब करता है इस बातका निर्देश ३५१
होते हैं किन्तु निदान प्रमत्तसंयतके नहीं साक्षात् मोक्षका कारण क्या है इस बातका
होता इस बातका निर्देश ३४३ निर्देश ३५१
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