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सर्वकोश
सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary

आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

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पृष्ठ 106

१०२ सर्वार्थसिद्धि
सम्यग्दृष्टिके पाँच अतीचार २७५ आठवाँ अध्याय
प्रशंसा और संस्तवमें अन्तर २७५ बन्धके हेतु २८३
सम्यग्दर्शनके आठ अंग होने पर पाँच अती- प्रमाद पदकी व्याख्या २८३
चार ही क्यों कहे इसका कारण २७५ मिथ्यादर्शनके दो भेद और उनकी व्याख्या २८३
व्रतों और शीलोंमें पाँच-पाँच अतिचारोंको परोपदेशनिमित्त मिथ्यादर्शनके चार या पाँच
बतलानेवाला अधिकार सूत्र २७५ भेद व उनका खुलासा २८३
अहिंसाणुव्रतके पाँच अतिचार २७५ क्रियावादी आदिके अवान्तर भेद २८४
बन्ध आदि प्रत्येक पदकी व्याख्या २७६ अविरतिके १२ भेद २८४
सत्याणुव्रतके पाँच अतीचार २७६ कषायके २५ भेद २८४
मिथ्योपदेश आदि प्रत्येक पदकी व्याख्या २७६ मनोयोग आदिके अवान्तर भेद २८४
अचौर्याणुव्रतके पाँच अतीचार २७६ प्रमादके अनेक भेद २८४
स्तेनप्रयोग आदि प्रत्येक पदकी व्याख्या २७६ किस गुणस्थानमें कितने बन्धके हेतु हैं इसका
स्वदारसन्तोष व्रतके पाँच अतीचार २७७ विचार २८४
परविवाहकरण आदि प्रत्येक पदकी व्याख्या २७७ बन्धकी व्याख्या २८५
परिग्रहपरिमाण व्रतके पाँच अतीचार २७७ 'सकषायत्वात्' पद देनेका प्रयोजन २८५
दिग्विरमणव्रतके पाँच अतीचार २७८ 'जीवः' पद देनेका प्रयोजन २८५
ऊर्ध्वव्यतिक्रम आदि प्रत्येक पदकी व्याख्या २७८ 'कर्मणो योग्यान्' इस प्रकार निर्देश करनेका
देशविरमणव्रतके पाँच अतीचार २७८ प्रयोजन २८५
आनयन आदि प्रत्येक पदकी व्याख्या २७८ दृष्टान्तपूर्वक कर्मरूप परिणमनका समर्थन २८६
अनर्थदण्डविरतिव्रतके पाँच अतीचार २७९ 'सः' पदकी सार्थकता २८६
कन्दर्प आदि प्रत्येक पदकी व्याख्या २७९ बन्धके चार भेद २८६
सामायिकके पाँच अतीचार २७९ प्रकृति आदि प्रत्येक पदकी दृष्टान्तपूर्वक व्याख्या २८६
योगदुष्प्रणिधान आदि प्रत्येक पदकी व्याख्या २७९ प्रकृति और प्रदेशबन्धका कारण योग है तथा
प्रोषधोपवासके पाँच अतीचार २७९ स्थितिबन्ध और अनुभागबन्धका कारण कषाय
अप्रत्यवेक्षित आदि प्रत्येक पदकी व्याख्या २७९ है इस बातका निर्देश २८७
भोगोपभोगपरिसंख्यानव्रतके पाँच अतीचार २८० प्रकृतिबन्धके आठ भेद २८८
सचित्त आदि प्रत्येक पदकी व्याख्या २८० आवरण पदकी व्याख्या २८७
अतिथिसंविभाग शीलके पाँच अतीचार २८० वेदनीय आदि प्रत्येक पदकी व्युत्पत्ति २८८
सचित्तनिक्षेप आदि प्रत्येक पदकी व्याख्या २८० प्रकृतिबन्धके आठ भेदोंके अवान्तर भेद २८९
सल्लेखनाके पाँच अतीचार २८१ ज्ञानावरणके पाँच भेद २८९
जीविताशंसा आदि प्रत्येक पदकी व्याख्या २८१ अभव्यके मनःपर्यय और केवलज्ञान शक्ति किस
दान पदकी व्याख्या २८१ अपेक्षासे है २८९
अनुग्रह पदका अर्थ २८१ भव्य और अभव्य विकल्पका कारण २८९
स्वोपकार क्या है और परोपकार क्या है इसका दर्शनावरणके नौ भेद २९०
खुलासा २८१ निद्रा आदि पाँचोंकी व्याख्या २९०
'स्व' शब्दका अर्थ २८१ वेदनीयके दो भेद २९१
दानमें विशेषता लानेके कारण २८१ सद्वेद्य और असद्वेद्यकी व्याख्या २९१
विधि व विशेष शब्दका अर्थ २८२ मोहनीयके २८ भेद २९१
विधिविशेष आदिका खुलासा २८२
CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri