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सर्वकोश
सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary

आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

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विषयानुक्रमणिका १०१
अनुवीचीभाषण पदका अर्थ २५९ मूर्च्छाको परिग्रह मानने पर बाह्य पदार्थ परिग्रह
अचौर्यव्रतकी पाँच भावनाएँ २५९ कैसे हैं इस बातका विचार २६७
प्रत्येक पदकी व्याख्या २६० व्रतीका स्वरूप २६८
ब्रह्मचर्य व्रतकी पाँच भावनाएँ २६० शल्य पदकी व्याख्या व उसके भेद २६८
परिग्रहत्याग व्रतकी पाँच भावनाएँ २६० शल्यके तीनों भेदोंकी व्याख्या २६८
हिंसादिकमें अपाय और अवद्यदर्शनका उपदेश २६१ निःशल्यको व्रती कहनेका प्रयोजन २६८
हिंसादिक कैसे अपाय और अवद्य हैं इसका व्रतीके दो भेद २६९
विस्तारसे विवेचन २६१ अगार पदका अर्थ २६९
हिंसादिक दुःख ही हैं इस भावनाका उपदेश २६२ मुनिके शून्य अगार आदिमें रहने पर अगारी-
हिंसादिक दुःख कैसे हैं इसका विस्तारसे विवेचन २६२ पन प्राप्त होता है और गृहस्थके घर छोड़
लोक कल्याणकारी मैत्री आदि चार भावनाएँ २६२ देने पर अनगारीपन प्राप्त होता है इस शंकाका
मैत्री आदि पदकी व्याख्या २६३ परिहार २६९
संवेग और वैराग्यके लिए जगत् और कायके अगारीके पूरे व्रत नहीं होनेसे वह व्रती कैसे है
स्वभावका चिन्तन २६३ इस बातका विचार २६९
लोकका आकार २६३ अगारीकी व्याख्या २७०
जगत् और कायके स्वभावका किस प्रकार अगारीके व्रतोंको अणु कहनेका प्रयोजन २७०
विचार करे २६३ अगारी किस प्रकारकी हिंसाका त्यागी होता है २७०
हिंसाकी व्याख्या २६४ अहिंसा आदि पाँचों अणुव्रतोंकी व्याख्या २७०
प्रमत्तयोगपदकी सार्थकता २६४ अगारी अन्य किन गुणोंसे सम्पन्न होता है
प्राणोंका वियोग न होनेपर भी हिंसा होती है इसका विचार २७०
इस बातका उल्लेख २६४ दिग्विरतिव्रतकी व्याख्या २७०
अनृतकी व्याख्या २६५ देशविरति व्रतकी व्याख्या २७१
असत् और अनृत पदकी व्याख्या २६५ अनर्थदण्डका अर्थ २७१
हिंसाकर वचन ही अनृत है इस बातका अनर्थदण्डके पाँच भेद और उनकी व्याख्या २७१
खुलासा २६५ सामायिक की व्याख्या २७१
स्तेयकी व्याख्या २६५ प्रोषध व उपवास शब्दका अर्थ २७२
आदान पदका अर्थ २६५ प्रोषधोपवासकी व्याख्या २७२
कर्म और नोकर्मका ग्रहण स्तेय क्यों नहीं है उपभोगपरिभोगकी व्याख्या २७२
इसका विचार २६५ मधु आदिके सप्रयोजन त्यागका उपदेश २७२
भिक्षुके भ्रमण करते समय रथ्याद्वारमें प्रवेश केतकी आदिके फूल व साधारण वनस्पतिके
करनेसे चोरी क्यों नहीं होती इसका विचार २६५ सप्रयोजन त्यागका उपदेश २७२
अब्रह्मकी व्याख्या २६६ यान वाहन आदिके परिमाण करनेका उपदेश २७२
मिथुन पदका अर्थ २६६ अतिथि पदकी व्याख्या २७३
सब कर्म मैथुन क्यों नहीं है इसका खुलासा २६६ अतिथिसंविभागके चार भेद २७३
ब्रह्म पदकी व्याख्या २६६ गृहस्थका सल्लेखना धर्म २७३
परिग्रहकी व्याख्या २६७ मरण पदकी व्याख्या २७३
मूर्च्छा पदका अर्थ २६७ सल्लेखना पदका अर्थ २७३
मूर्च्छा पदसे वातादि प्रकोपजन्य मूर्च्छाका ग्रहण सूत्रमें 'जोषिता' पद रखनेका कारण २७३
क्यों नहीं किया इस बातका खुलासा २६७ सल्लेखना आत्मवध नहीं है इस बातका समर्थन २७४
CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri