सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)
Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary
आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा
३०० सर्वार्थसिद्धौ [ ८।१४ § ७५९ -
§ ७५९. अन्तरायापेक्षया भेदनिर्देशः क्रियते—दानस्यान्तरायो लाभस्यान्तराय इत्यादि ।
दानादिपरिणामव्याघातहेतुत्वात्तद्व्यपदेशः । यदुदयाद्दातुकामोऽपि न प्रयच्छति, लब्धुकामोऽपि न
लभते, भोक्तुमिच्छन्नपि न भुङ्क्ते, उपभोक्तुमभिवाञ्छन्नपि नोपभुङ्क्ते, उत्साहितुकामोऽपि
नोत्सहते त एते पञ्चान्तरायस्य भेदाः ।
§ ७६०. व्याख्याताः प्रकृतिबन्धविकल्पाः । इदानीं स्थितिबन्धविकल्पो वक्तव्यः । सा
स्थितिर्द्विविधा—उत्कृष्टा जघन्या च । तत्र यासां कर्मप्रकृतीनामुत्कृष्टा स्थितिः समाना तन्निर्दें-
शार्थमुच्यते—
आदितस्तिसृणामन्तरायस्य च त्रिंशत्सागरोपमकोटीकोट्यः परा स्थितिः ॥१४॥
§ ७६१. मध्येऽन्ते वा तिसृणां ग्रहणं माभूदिति 'आदितः' १इत्युच्यते । 'अन्तरायस्य' इति
वचनं व्यवहितग्रहणार्थम् । सागरोपममुक्तपरिमाणम् । कोटीनां कोट्यः कोटीकोट्यः । परा उत्कृष्टे-
त्यर्थः । एतदुक्तं भवति—ज्ञानावरणदर्शनावरणवेदनीयान्तरायाणामुत्कृष्टा स्थितिस्त्रिंशत्सागरोपम-
कोटीकोट्य इति । सा कस्य भवति । मिथ्यादृष्टेः संज्ञिनः पञ्चेन्द्रियस्य पर्याप्तकस्य । अन्येषामार्ग-
मात्संप्रत्ययः कर्तव्यः ।
§ ७५९. यहाँ अन्तरायकी अपेक्षा भेदनिर्देश किया है । यथा—दान का अन्तराय, लाभका
अन्तराय इत्यादि । इन्हें दानादि परिणामके व्याघातका कारण होनेसे यह संज्ञा मिली है । जिनके
उदयसे देनेकी इच्छा करता हुआ भी नहीं देता है, प्राप्त करनेकी इच्छा रखता हुआ भी नहीं प्राप्त
करता है, भोगनेकी इच्छा करता हुआ भी नहीं भोग सकता है, उपभोग करनेकी इच्छा करता
हुआ भी उपभोग नहीं ले सकता है और उत्साहित होनेकी इच्छा रखता हुआ भी उत्साहित नहीं
होता है इस प्रकार ये पांच अन्तरायके भेद हैं ।
विशेषार्थ—जीवकी दान, लाभ, भोग, उपभोग और वीर्य ये पाँच लब्धियाँ हैं । अन्तरायकर्म
इन पाँच जीवभावोंकी अभिव्यक्तिमें बाधक कारण है यह उक्त कथनका तात्पर्य है । कहीं कहीं
अन्तराय कर्मके क्षय व क्षयोपशमका फल बाह्य सामग्रीकी प्राप्ति कहा गया है पर वह उपचार
कथन है । तत्त्वतः बाह्य सामग्री पर है । उसकी प्राप्ति जीवविपाकी अन्तराय कर्मके क्षय व क्षयो-
पशमका फल नहीं हो सकता । परमें स्वका भाव मिथ्यात्वका फल है और उसका स्वीकार कषाय-
का फल है ऐसा यहाँ समझना चाहिए ।
§ ७६०. प्रकृतिबन्धके भेद कहे । इस समय स्थितिबन्धके भेद कहने चाहिए । वह स्थिति
दो प्रकारकी है—उत्कृष्ट स्थिति और जघन्य स्थिति । उनमें जिन कर्मप्रकृतियोंकी उत्कृष्ट स्थिति
समान है उनका निर्देश करनेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
आदिकी तीन प्रकृतियाँ अर्थात् ज्ञानावरण, दर्शनावरण और वेदनीय तथा अन्तराय इन
चारकी उत्कृष्ट स्थिति तीस कोटाकोटि सागरोपम है ॥१४॥
§ ७६१. बीचमें या अन्तमें तीन का ग्रहण न होवे इसलिए सूत्रमें 'आदितः' पद कहा है ।
अन्तरायकर्मका पाठ प्रारम्भके तीन कर्मोंके पाठसे व्यवहित है उसका ग्रहण करनेके लिए, 'अन्त-
रायस्य' वचन दिया है । सागरोपमका परिमाण पहले कह आये हैं । कोटियोंकी कोटि कोटाकोटि
कहलाती है । पर शब्द उत्कृष्ट वाची है । उक्त कथनका यह अभिप्राय है कि ज्ञानावरण, दर्शना-
वरण, वेदनीय और अन्तरायकर्मकी उत्कृष्ट स्थिति तीस कोटाकोटि सागरोपम होती है । शंका—
यह उत्कृष्ट स्थिति किसे प्राप्त होती है ? समाधान—मिथ्यादृष्टि, संज्ञी, पंचेन्द्रिय और पर्याप्तक
जीवको प्राप्त होती है । अन्य जीवोंके आगमसे देखकर ज्ञान कर लेना चाहिए ।
१. आदित उच्च-आ०, दि० १, दि० २ ।
CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri
§ ७६२. मोहनीयस्योत्कृष्टस्थितिप्रतिपत्त्यर्थमाह —
सप्ततिर्मोहनीयस्य ॥१५॥
§ ७६३. 'सागरोपमकोटीकोट्यः पराः स्थितिः' इत्यनुवर्तते । इयमपि परा स्थितिर्मिथ्या-
दृष्टेः संज्ञिनः पञ्चेन्द्रियस्य पर्याप्तकस्यावसेया । इतरेषां¹ यथागममवगमः कर्तव्यः ।
§ ७६४. नामगोत्रयोरुत्कृष्टस्थितिप्रतिपत्त्यर्थमाह—
विंशतिर्नामगोत्रयोः ॥१६॥
§ ७६५. 'सागरोपमकोटीकोट्यः परा स्थितिः' इत्यनुवर्तते । इयमप्युत्कृष्टा स्थितिर्मिथ्यादृष्टेः
संज्ञिपञ्चेन्द्रियपर्याप्तकस्य । इतरेषां यथागममवबोद्धव्या ।
§ ७६६. अथायुषः कोत्कृष्टा स्थितिरित्युच्यते—
त्रयस्त्रिंशत्सागरोपमाण्यायुषः ॥१७॥
§ ७६७. पुनः 'सागरोपम'ग्रहणं कोटीकोटिनिवृत्त्यर्थम् । 'परा स्थितिः'इत्यनुवर्तते । इयमपि
पूर्वोक्तस्यैव । शेषाणामागमतोऽवसेया ।
विशेषार्थ—कर्मोंकी स्थिति तीन प्रकारसे प्राप्त होती है—बन्धसे, संक्रमसे और सत्त्वसे ।
यहाँपर बन्धकी अपेक्षा उत्कृष्ट और जघन्य स्थिति बतलायी गयी है। अतितीव्र संक्लेश परिणामोंसे
मिथ्यादृष्टि संज्ञी पंचेन्द्रिय पर्याप्तक जीव ज्ञानावरण, दर्शनावरण, वेदनीय और अन्तराय कर्मकी
तीस कोटाकोटि सागरोपमप्रमाण उत्कृष्ट स्थिति बाँधता है यह उक्त कथनका तात्पर्य है ।
§ ७६२. मोहनीयकी उत्कृष्ट स्थितिका ज्ञान करानेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
मोहनीयकी उत्कृष्ट स्थिति सत्तर कोटाकोटि सागरोपम है ॥१५॥
§ ७६३. इस सूत्रमें 'सागरोपमकोटीकोट्यः परा स्थितिः' पदकी अनुवृत्ति होती है । यह
भी उत्कृष्ट स्थिति मिथ्यादृष्टि संज्ञी पंचेन्द्रिय पर्याप्तक जीवके जानना चाहिए । इतर जीवोंके
आगमके अनुसार ज्ञान कर लेना चाहिए ।
§ ७६४. नाम और गोत्रकर्मकी उत्कृष्ट स्थितिका ज्ञान करानेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
नाम और गोत्रकी उत्कृष्ट स्थिति बीस कोटाकोटि सागरोपम है ॥१६॥
§ ७६५. 'सागरोपमकोटीकोट्यः परा स्थितिः' पदकी अनुवृत्ति होती है। यह भी उत्कृष्ट
स्थिति मिथ्यादृष्टि संज्ञी पंचेन्द्रिय पर्याप्तक जीवके जानना चाहिए। इतर जीवोंके आगमके अनुसार
जान लेना चाहिए ।
§ ७६६. अब आयु कर्मकी उत्कृष्ट स्थिति क्या है यह बतलानेके लिए आगेका सूत्र
कहते हैं—
आयुकी उत्कृष्ट स्थिति तैंतीस सागरोपम है ॥१७॥
§ ७६७. इस सूत्र में पुनः 'सागरोपम' पदका ग्रहण कोटाकोटी पदकी निवृत्तिके लिए दिया
है। यहाँ 'परा स्थितिः' पदकी अनुवृत्ति होती है। यह भी पूर्वोक्त जीवके होती है। शेष जीवोंके
आगमसे जान लेना चाहिए ।
विशेषार्थ—यहाँ टीकामें आयुकर्मका उत्कृष्ट स्थितिबन्धका स्वामी मिथ्यादृष्टि कहा है। सो
यह इस अभिप्रायसे कहा है कि मिथ्यादृष्टि संज्ञी पंचेन्द्रिय पर्याप्तक जीव भी नरकायु बन्धके योग्य
उत्कृष्ट संक्लेश परिणामोंके होने पर नरकायुका उत्कृष्ट स्थितिबन्ध करता है। इसका यह अभिप्राय
नहीं कि अन्य गुणस्थानवालेके आयुकर्मका उत्कृष्ट स्थितिबन्ध नहीं होता । देवायुका तैंतीस साग-
१. -सेया । अन्येषां यथागममवगमः कर्तव्यः आ०, दि० १ । -सेया । इतरेषां यथागममवगन्तव्यम् ?
३०२ सर्वार्थसिद्धौ [ ८।१८ § ७६८ -
§ ७६८. उक्तोत्कृष्टा स्थितिः । इदानीं जघन्या स्थितिर्वक्तव्या । तत्र समानजघन्यस्थितीः
पञ्च प्रकृतीरवस्थाप्य तिसृणां जघन्यस्थितिप्रतिपत्त्यर्थं सूत्रद्वयमुपन्यस्यते लघ्वर्थम्—
अपरा द्वादश मुहूर्ता वेदनीयस्य ॥१८॥
§ ७६९. अपरा जघन्या इत्यर्थः । वेदनीयस्य द्वादश मुहूर्ताः ।
नामगोत्रयोरष्टौ ॥१९॥
§ ७७०. 'मुहूर्ता' इत्यनुवर्तते । 'अपरा स्थितिः' इति च ।
§ ७७१. अवस्थापितप्रकृतिजघन्यस्थितिप्रतिपादनार्थमाह—
शेषाणामन्तर्मुहूर्ता ॥२०॥
§ ७७२. शेषाणां पञ्चानां प्रकृतीनामन्तर्मुहूर्तापरा स्थितिः । ज्ञानदर्शनावरणान्तरायाणां
जघन्या स्थितिः सूक्ष्मसांपराये, मोहनीयस्य अनिवृत्तिबादरसांपराये । आयुषः संख्येयवर्षायुष्षु¹
तिर्यक्षु मनुष्येषु च ।
§ ७७३. आह, उभयी स्थितिरभिहिता । ज्ञानावरणादीनाम् अथानुभवः किंलक्षण
इत्यत आह—
विपाकोऽनुभवः ॥२१॥
§ ७७४. विशिष्टो नानाविधो वा पाको विपाकः । पूर्वोक्तकषायतीव्रमन्दादिभावास्रवविशेषा-
द्विशिष्टः पाको विपाकः । अथवा द्रव्यक्षेत्रकालभवभावलक्षणनिमित्तभेदजनितवैश्वरूप्यो नानाविधः
रोषम उत्कृष्ट स्थितिबन्ध सकल संयमके धारी सम्यग्दृष्टिके ही होता है । पर टीकाकारने यहाँ
उसके कहनेकी विवक्षा नहीं की ।
§ ७६८. उत्कृष्ट स्थिति कही । अब जघन्य स्थिति कहनी चाहिए । उसमें समान जघन्य
स्थितिवाली पाँच प्रकृतियोंको स्थगित करके थोड़ेमें कहनेके अभिप्रायसे तीन प्रकृतियोंकी जघन्य
स्थितिका ज्ञान करानेके लिए दो सूत्र कहते हैं—
वेदनीयकी जघन्य स्थिति बारह मुहूर्त है ॥१८॥
§ ७६९. अपरा अर्थात् जघन्य । यह वेदनीयकी बारह मुहूर्त है ।
नाम और गोत्रकी जघन्य स्थिति आठ मुहूर्त है ॥१९॥
§ ७७०. यहाँ 'मुहूर्ता' पदकी अनुवृत्ति होती है और 'अपरा स्थितिः' पदकी भी ।
§ ७७१. अब स्थगित की गयीं प्रकृतियोंकी जघन्य स्थितिका कथन करनेके लिए आगेका
सूत्र कहते हैं—
बाकीके पाँच कर्मोंकी जघन्य स्थिति अन्तर्मुहूर्त है ॥२०॥
§ ७७२. शेष पाँच प्रकृतियोंकी अन्तर्मुहूर्त जघन्य स्थिति है । ज्ञानावरण, दर्शनावरण और
अन्तरायकी जघन्य स्थिति सूक्ष्मसाम्पराय गुणस्थानमें, मोहनीयकी जघन्य स्थिति अनिवृत्ति बादर-
साम्पराय गुणस्थानमें और आयुको जघन्य स्थिति संख्यात वर्षकी आयुवाले तिर्यंचों और मनुष्यों-
में प्राप्त होती है ।
§ ७७३. दोनों प्रकारकी स्थिति कही । अब ज्ञानावरणादिकके अनुभवका क्या स्वरूप है
इसलिए आगेका सूत्र कहते हैं—
विपाक अर्थात् विविध प्रकारके फल देनेकी शक्तिका पड़ना ही अनुभव है ॥२१॥
§ ७७४. विशिष्ट या नाना प्रकारके पाकका नाम विपाक है । पूर्वोक्त कषायोंके तीव्र, मन्द
आदिरूप भावास्रवके भेदसे विशिष्ट पाकका होना विपाक है । अथवा द्रव्य, क्षेत्र, काल, भव और
१. -युष्कति-मु० ।
पाको विपाकः। असावनुभव इत्याख्यायते । शुभपरिणामानां प्रकर्षभावाच्छुभप्रकृतीनां प्रकृष्टोऽनुभवः
अशुभप्रकृतीनां निकृष्टः । अशुभपरिणामानां प्रकर्षभावादशुभप्रकृतीनां प्रकृष्टोऽनुभवः शुभप्रकृतीनां
निकृष्टः । स एवं प्रत्ययवशादुपात्तोऽनुभवो द्विधा प्रवर्तते स्वमुखेन परमुखेन च । सर्वासां मूल-
प्रकृतीनां स्वमुखेनैवानुभवः । उत्तरप्रकृतीनां तुल्यजातीयानां परमुखेनापि भवति आयुर्दर्शनचारित्र-
मोहवर्जनाम् । न हि नरकायुर्मुखेन तिर्यगायुर्मनुष्यायुर्वा विपच्यते । नापि दर्शनमोहश्चारित्रमोह- ५
मुखेन, चारित्रमोहो वा दर्शनमोहमुखेन ।
§ ७७५. आह अभ्युपेमः प्रागुपचितनानाप्रकारकर्मविपाकोऽनुभवः । इदं तु न विजानीमः
किमयं प्रसंख्यातोऽप्रसंख्यातः । इत्यत्रोच्यते प्रसंख्यातोऽनुभूयत इति ब्रूमहे । कुतः । यतः—
स यथानाम ॥२२॥
§ ७७६. ज्ञानावरणस्य फलं ज्ञानाभावो दर्शनावरणस्यापि¹ फलं दर्शनशक्त्युपरोध इत्येव- १०
माद्यन्वर्थसंज्ञानिर्देशात्सर्वासां कर्मप्रकृतीनां सविकल्पानामनुभवसंप्रत्ययो जायते ।
§ ७७७. आह, यदि विपाकोऽनुभवः प्रतिज्ञायते, तत्कर्मानुभूतं सत्² किमाभरणवदवतिष्ठते
आहोस्विनिष्पीतसारं प्रच्यवते । इत्यत्रोच्यते—
ततश्च निर्जरा ॥२३॥
भावसद्भाव निमित्तभेदसे उत्पन्न हुआ वैश्वरूप नाना प्रकारका पाक विपाक है । इसीको अनुभव १५
कहते हैं । शुभ परिणामोंके प्रकर्षभावके कारण शुभ प्रकृतियोंका प्रकृष्ट अनुभव होता है और अशुभ
प्रकृतियोंका निकृष्ट अनुभव होता है । तथा अशुभ परिणामोंके प्रकर्षभावके कारण अशुभ प्रकृतियों-
का प्रकृष्ट अनुभव होता है और शुभ प्रकृतियोंका निकृष्ट अनुभव होता है । इस प्रकार कारणवशसे
प्राप्त हुआ वह अनुभव दो प्रकारसे प्रवृत्त होता है—स्वमुखसे और परमुखसे । सब मूल प्रकृतियों-
का अनुभव स्वमुखसे ही प्रवृत्त होता है । आयु, दर्शनमोहनीय और चारित्रमोहनीयके सिवा तुल्य- २०
जातीय उत्तरप्रकृतियोंका अनुभव परमुखसे भी प्रवृत्त होता है । नरकायुके मुखसे तिर्यंचायु या
मनुष्यायुका विपाक नहीं होता । और दर्शनमोह चारित्रमोहरूपसे और चारित्रमोह दर्शनमोहरूपसे
विपाकको नहीं प्राप्त होता ।
§ ७७५. शंका—पहले संचित हुए नाना प्रकारके कर्मोंका विपाक अनुभव है यह हम स्वी-
कार करते हैं किन्तु यह नहीं जानते कि क्या यह प्रसंख्यात होता है या अप्रसंख्यात होता है ? २५
समाधान—हम कहते हैं कि यह प्रसंख्यात अनुभवमें आता है । शंका—किस कारणसे । समाधान—
यतः—
वह जिस कर्मका जैसा नाम है उसके अनुरूप होता है ॥२२॥
§ ७७६. ज्ञानावरणका फल ज्ञानका अभाव करना है । दर्शनावरणका भी फल दर्शनशक्ति-
का उपरोध करना है इत्यादि रूपसे सब कर्मोंकी सार्थक संज्ञाका निर्देश किया है अतएव अपने ३०
अवान्तर भेदसहित उनमें किसका क्या अनुभव है इसका ज्ञान हो जाता है ।
§ ७७७. यदि विपाकका नाम अनुभव है ऐसा स्वीकार करते हो तो अनुभूत होने पर वह
कर्म आभरणके समान अवस्थित रहता है या फल भोग लेनेके बाद वह झर जाता है ? इस बातको
बतलानेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
इसके बाद निर्जरा होती है ॥२३॥ ३५
१. -णस्य फलं मु० । २. भूतं किमा -मु० ।
३०४ सर्वार्थसिद्धौ [ ८।२३ § ७७८ -
७७८. पीडानुग्रहावात्मने प्रदायाभ्यवहृतौदनादिविकारवत्पूर्वस्थितिक्षयादवस्थानाभावातक-
र्मणो निवृत्तिर्निर्जरा । सा द्विपकारा—विपाकजा इतरा च । तत्र चतुर्गतावनेकजातिविशेषावघूर्णिते¹
संसारमहार्णवे चिरं परिभ्रमतः शुभाशुभस्य कर्मणः क्रमेण परिपाककालप्राप्तस्यानुभवोदयावलि-
स्रोतोऽनुप्रविष्टस्यारब्धफलस्य या निवृत्तिः सा विपाकजा निर्जरा। यत्कर्माप्राप्तविपाककालमौप-
क्रमिकक्रियाविशेषसामर्थ्यादनुदीर्णं बलादुदीर्योदयावलिं प्रवेश्य वेद्यते आम्रपनसादिपाकवत् सा
अविपाकजा निर्जरा । 'च'शब्दो निमित्तान्तरसमुच्चयार्थः । 'तपसा निर्जरा च' इति वक्ष्यते ततश्च
भवति अन्यतश्चेति सूत्रार्थो योजितः । किमर्थमिह निर्जरानिर्देशः क्रियते, संवरात्परा निर्देष्टव्या
उद्देशवत् । लध्वर्थमिह वचनम् । तत्र हि पाठे 'विपाकोऽनुभवः' इति पुनरनुवादः कर्तव्यः स्यात् ।
§ ७७८. जिस प्रकार भात आदिका मल निवृत्त होकर निर्जीण हो जाता है उसी प्रकार
आत्माका भला-बुरा करके पूर्व प्राप्त स्थितिका नाश हो जानेसे स्थिति न रहनेके कारण कर्मकी
निवृत्तिका होना निर्जरा है। वह दो प्रकारकी है—विपाकजा और अविपाकजा । उसमें अनेक
जाति विशेष रूपी भँवर युक्त चार गतिरूपी संसार महासमुद्रमें चिरकाल तक परिभ्रमण करनेवाले
इस जीवके क्रमसे परिपाक कालको प्राप्त हुए और अनुभवोदयावलि रूपी सोतेमें प्रविष्ट हुए ऐसे
शुभाशुभ कर्मका फल देकर जो निवृत्ति होती है वह विपाकजा निर्जरा है। तथा आम और पनस
को औपक्रमिक क्रियाविशेषके द्वारा जिस प्रकार अकालमें पका लेते हैं उसी प्रकार जिसका विपाक-
काल अभी नहीं प्राप्त हुआ है फिर भी औपक्रमिक क्रियाविशेषकी सामर्थ्यसे उदयावलिके बाहर
स्थित जो कर्म बलपूर्वक उदयावलिमें प्रविष्ट कराके अनुभवा जाता है वह अविपाकजा निर्जरा है।
सूत्रमें 'च' शब्द अन्य निमित्तका समुच्चय करनेके लिए दिया है। तपसा निर्जरा च' यह आगे
कहेंगे, इसलिए 'च' शब्दके देनेका यह प्रयोजन है कि पूर्वोक्त प्रकारसे निर्जरा होती है और अन्य
प्रकारसे भी। शंका—यहाँ निर्जराका उल्लेख किसलिए किया है, क्योंकि उद्देश्यके अनुसार उसका
संवरके बाद उल्लेख करना ठीक होता ? समाधान—थोड़ेमें बोध करानेके लिए यहाँ निर्जराका
उल्लेख किया है। संवरके बाद पाठ देने पर 'विपाकोऽनुभवः' इसका फिरसे अनुवाद करना पड़ता।
विशेषार्थ—अनुभव, अनुभाग या फलदानशक्ति इनका एक अर्थ है। कर्मका बन्ध होते समय
जिस कर्मकी जो प्रकृति होती है उसके अनुरूप उसे फलदानशक्ति प्राप्त होतो है। उदाहरणार्थ—
ज्ञानावरणकी ज्ञानको आवृत्त करनेकी प्रकृति है इसलिए इसे इसीके अनुरूप फलदानशक्ति प्राप्त
होती है। प्रकृतिका अर्थ स्वभाव है और अनुभवका अर्थ है उस स्वभावके अनुरूप उसे भोगना ।
साधारणतः यहाँ यह कहा जा सकता है कि यदि प्रकृति और अनुभवका यही अर्थ है तो इन्हें
अलग अलग मानना उचित नहीं है, क्योंकि जिस कर्मकी जैसी प्रकृति होगी उसके अनुरूप उसका
भोग सुतरां सिद्ध है। इसलिए प्रकृतिबन्ध और अनुभवबन्ध ये दो स्वतन्त्र सिद्ध नहीं होते, किन्तु
अनुभवबन्धका अन्तर्भाव प्रकृतिबन्धमें ही हो जाता है। यदि कहा जाय कि ज्ञानावरण आदि रूप-
से कर्मकी प्रकृति फलदानशक्तिके निमित्तसे होती है इसलिए प्रकृतिबन्धमें अनुभवबन्धका अन्तर्भाव
नहीं किया जा सकता सो इसका यह समाधान है कि जब कि प्रकृतिबन्धका कारण योग है और
अनुभवबन्धका कारण कषाय है तब फिर फलदान शक्तिके निमित्तसे कर्मकी प्रकृति बनती है यह
कैसे माना जा सकता है। थोड़ी देरको यह मान भी लिया जाय तब भी यह प्रश्न खड़ा रहता है
कि प्रकृतिबन्ध और अनुभवबन्धको अलग अलग क्यों माना गया है और उनके अलग अलग
माननेके योग और कषाय दो स्वतन्त्र कारण क्यों बतलाये गये हैं। सूत्रकारने बन्धके चार भेद
करके भी विपाक अर्थात् कर्मभोगको अनुभव कहा है और उसे प्रकृतिके अनुरूप बतलाया है।
१. -घूर्णिते आ०, दि० १, दि० २ ।
- ८।२३ § ७७८ ] अष्टमोऽध्यायः ३०५
इससे तो यही सिद्ध होता है कि वस्तुतः ये दो नहीं हैं, किन्तु बन्ध समयकी अपेक्षा जिसका नाम
प्रकृति है उदयकालकी अपेक्षा उसे ही अनुभव कहते हैं ? समाधान यह है कि कर्मबन्धके समय कर्म-
का विविधरूपसे विभाग योगके निमित्तसे ही होता है और विभागको प्राप्त हुए कर्मोंमें हीनाधिक
फलदानशक्तिका प्राप्त होना कषायके निमित्तसे होता है, इसलिए ये दोनों स्वतन्त्र माने गये हैं।
यद्यपि यह ठीक है कि बिना शक्तिके किसी कर्मकी प्रकृति नहीं बन सकती। स्वतन्त्र प्रकृति कहनेसे
उसकी शक्तिका बोध हो ही जाता है फिर भी ऐसी शक्तिकी एक सीमा होती है। उसका उल्लंघन
कर जो न्यूनाधिक शक्ति पायी जाती है उसीका बोध कराना अनुभागबन्धका काम है। उदाहरणार्थ
ग्यारहवें, बारहवें और तेरहवें गुणस्थानमें सातावेदनीयका प्रकृति बन्ध होता है और यह प्रकृति-
बन्ध एक नियत मर्यादामें अनुभागको लिये हुए ही होता है फिर भी यहाँ अनुभागबन्धका निषेध
किया गया है सो इसका कारण यह है कि जो अनुभाग सकषाय अवस्थामें सातावेदनीयका प्राप्त
होता था वह यहाँ प्राप्त नहीं होता है। सकषाय अवस्थामें प्राप्त होनेवाले जघन्य अनुभागसे भी
यह अनन्तवें भागमात्र होता है। इतना कम अनुभाग सकषाय अवस्थामें नहीं प्राप्त हो सकता।
इससे प्रकृतिबन्धसे अनुभागबन्धके अलग कहनेकी उपयोगिता सिद्ध हो जाती है। तात्पर्य यह
है कि प्रकृतिबन्धमें कर्मभेदको स्वीकार करके भी न्यूनाधिक फलदान शक्ति नहीं स्वीकार
की गयी है किन्तु अनुभागबन्धमें इसका और इसके कारणका स्वतन्त्र रूपसे विचार किया जाता
है इसलिए प्रकृतिबन्ध और उसका कारण स्वतन्त्र है तथा अनुभागबन्ध और उसका कारण
स्वतन्त्र है यह निश्चित होता है। अब रही सूत्रकारके विपाकको अनुभव कहनेकी बात सो
इस कथनमें भी यही अभिप्राय छिपा हुआ है। सब जीवोंका विपाक एक प्रकारका नहीं होता,
वह न्यूनाधिक देखा जाता है और विपाककी यह न्यूनाधिकता अकारण नहीं हो सकती।
यही कारण है कि सूत्रकार अनुभवबन्धकी स्वतन्त्र परिगणना करते हैं और उसकी पुष्टि
विपाकके द्वारा दिखलाते हैं। इस प्रकार अनुभवबन्ध क्या है और उसे स्वतन्त्र क्यों कहा इसका
विचार किया।
फिर भी यह अनुभाग बन्धकालमें जैसा प्राप्त होता है एकान्ततः वैसा ही नहीं बना रहता
है। अपने अवस्थान कालके भीतर वह बदल भी जाता है और नहीं भी बदलता है। बदलनेसे
इसकी तीन अवस्थाएँ होती हैं—संक्रमण, उत्कर्षण और अपकर्षण। संक्रमण अवान्तर प्रकृतियोंमें
होता है, मूल प्रकृतियोंमें नहीं होता। उसमें भी आयुकर्मकी अवान्तर प्रकृतियों का संक्रमण नहीं
होता और दर्शनमोहनीयका चारित्रमोहनीय रूपसे तथा चारित्रमोहनीयका दर्शनमोहनीयरूपसे
संक्रमण नहीं होता। संक्रमणके चार भेद हैं—प्रकृतिसंक्रमण, स्थितिसंक्रमण, अनुभागसंक्रमण
और प्रदेशसंक्रमण। जहाँ प्रकृतिसंक्रमण और प्रदेशसंक्रमणकी मुख्यता होती है वहाँ वह संक्रमण
शब्द द्वारा सम्बोधित किया जाता है और जहाँ मात्र स्थितिसंक्रमण अनुभागसंक्रमण होता है वहाँ
वह उत्कर्षण और अपकर्षण शब्द द्वारा सम्बोधित किया जाता है। बन्धकालमें जो स्थिति और
अनुभाग प्राप्त होता है उसमें कमी होना अपकर्षण है और घटी हुई स्थिति व अनुभागमें वृद्धि
होना उत्कर्षण है। इस प्रकार विविध अवस्थाओंमें-से गुजरते हुए उदयकालमें जो अनुभाग रहता
है उसका परिपाक होता है। अनुदय अवस्थाको प्राप्त प्रकृतियोंका परिपाक उदय अवस्थाको प्राप्त
सजातीय प्रकृति रूपसे होता है। इसके विषयमें यह नियम है कि उदयवाली प्रकृतियोंका फल
स्वमुखसे मिलता है और अनुदयवाली प्रकृतियोंका फल परमुखसे मिलता है। उदाहरणार्थ—
साताका उदय रहने पर उसका भोग सातारूपसे ही होता है किन्तु तब असाता स्तिबुक
संक्रमण द्वारा सातारूपसे परिणमन करती जाती है इसलिए इसका उदय परमुखसे होता है।
उदय कालके एक समय पहले अनुदयरूप प्रकृतिके निषेकका उदयको प्राप्त हुई प्रकृतिरूपसे परिणम
३९
CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri
is next to line 25)
" कर्म प्रकृतियोंके कारणभूत प्रति समय योगविशेषसे सूक्ष्म, एकक्षेत्रावगाही और स्थित"
Line 25:
"अनन्तानन्त पुद्गल परमाणु सब आत्मप्रदेशोंमें (सम्बन्धको प्राप्त) होते हैं ॥२४॥"
Line 26:
" § ७८०. नामप्रत्ययाः—नामके कारणभूत कर्मपरमाणु नामप्रत्यय कहलाते हैं। 'नाम' इस"
Line 27:
"पद द्वारा सब कर्मप्रकृतियाँ कही जाती हैं। जिसकी पुष्टि 'स यथानाम' इस सूत्रवचनसे होती है।"
Line 28:
"इस पदद्वारा हेतुका कथन किया गया है। सर्वतः—प्रदेशबन्ध सब भवोंमें होता है। 'सर्वेषु भवेषु"
Line 29:
"इति सर्वतः' यह इसकी व्युत्पत्ति है। सर्व शब्दसे 'दृश्यन्तेऽन्यतोऽपि' इस सूत्र द्वारा तसि प्रत्यय"
Line 30:
(Marginal '३०')
"करनेपर सर्वतः पद बनता है। इस पदद्वारा कालका ग्रहण किया गया है। एक-एक जीवके व्यतीत"
Line 31:
"हुए अनन्तानन्त भव होते हैं और आगामी संख्यात, असंख्यात व अनन्तानन्त भव होते हैं। योग-"
Line 32:
"विशेषात्—योगविशेषरूप निमित्तसे कर्मरूप पुद्गल ग्रहण किये जाते
- ८।२५ § ७८२ ] अष्टमोऽध्यायः ३०७
इति वचनमाधारनिर्देशार्थं नैकप्रदेशादिषु कर्मप्रदेशा वर्तन्ते । क्व तर्हि । ऊर्ध्वमधस्तिर्यक् च
सर्वेष्वात्मप्रदेशेषु व्याप्य स्थिता इति । 'अनन्तानन्तप्रदेश'वचनं परिमाणान्तरव्यपोहार्थम्, न
संख्येया न चासंख्येया नाप्यनन्ता इति । ते खलु पुद्गलस्कन्धा अभव्यानन्तगुणाः सिद्धानन्तभाग-
प्रमितप्रदेशा घनाङ्गुलस्यासंख्येयभागक्षेत्रावगाहिन एकद्वित्रिचतुःसंख्येयसमयस्थितिकाः पञ्चवर्ण-
पञ्चरस-द्विगन्ध-चतुःस्पर्शस्वभावा अष्टविधकर्मप्रकृतियोग्या योगवशादा१त्मनात्मसात्क्रियन्ते । इति ५
प्रदेश-बन्धः समासतो वेदितव्यः ।
§ ७८१. आह; बन्धपदार्थानन्तरं पुण्यपापोपसंख्यानं चोदितं तद्बन्धेऽन्तर्भूतमिति प्रत्या-
ख्यातम् । तत्रे॒दं वक्तव्यं कोऽत्र पुण्यबन्धः कः पापबन्ध इति । तत्र २पुण्यप्रकृतिपरिगणनार्थमिदमार-
भ्यते—
सद्वेद्यशुभायुर्नामगोत्राणि पुण्यम् ॥२५॥ १०
§ ७८२. शुभं प्रशस्तमिति यावत् । तदुत्तरैः प्रत्येकमभिसंबध्यते शुभमायुः शुभं नाम शुभं
गोत्रमिति । शुभायुस्त्रितयं तिर्यगायुर्मनुष्यायुर्देवायुरिति । शुभनाम सप्तत्रिंशद्विकल्पम् । तद्यथा—
मनुष्यगतिर्देवगतिः पञ्चेन्द्रियजातिः पञ्च शरीराणि त्रीण्युपाङ्गानि समचतुरस्रसंस्थानं वज्र
३०८ सर्वार्थसिद्धौ [ ८।२६ ६ ७८३ -
द्योतप्रशस्तविहायोगतयस्त्रसबादरपर्याप्तिप्रत्येकशरीरस्थिरशुभसुभगसुस्वरादेययशःकीर्तयो निर्माणं
तीर्थंकरनाम चेति । शुभमेकमुच्चैर्गोत्रं, सद्येद्यमिति । एता द्विचत्वारिंशत्प्रकृतयः 'पुण्य'संज्ञाः ।
अतोऽन्यत्पापम् ॥२६॥
§ ७८३. अस्मात्पुण्यसंज्ञिकर्मप्रकृतिसमूहादन्यत्कर्म 'पापम्' इत्युच्यते । तद् द्वयशीतिविधम् ।
तद्यथा—ज्ञानावरणस्य प्रकृतयः पञ्च दर्शनावरणस्य नव मोहनीयस्य षड्विंशतिः पञ्चान्तरायस्य
नरकगतितिर्यग्गती चतस्रो जातयः पञ्च संस्थानानि पञ्च संहननान्यप्रशस्तवर्णरसगन्धस्पर्शा
नरकगतितिर्यग्गत्यानुपूर्व्यद्वयमुपघातातपाप्रशस्तविहायोगतिस्थावरसूक्ष्मापर्याप्तिसाधारणशरीरास्थिरा-
शुभादुर्भगदुःस्वरानादेयायशःकीर्तयश्चेति नामप्रकृतयश्चतुस्त्रिंशत् । असद्वेद्यं नरकायुनींचैर्गोत्र-
मिति । एवं व्याख्यातः सप्रपञ्चो बन्धपदार्थः । अवधिमनःपर्ययकेवलज्ञानप्रत्यक्षप्रमाणगम्यस्तदुप-
दिष्टागमानुमेयः ।
इति तत्त्वार्थवृत्तौ सर्वार्थसिद्धिसंज्ञिकायामष्टमोऽध्यायः समाप्तः ॥८॥
उद्योत, प्रशस्तविहायोगति, त्रस, बादर, पर्याप्त, प्रत्येकशरीर, स्थिर, शुभ, सुभग, सुस्वर, आदेय,
यशःकीर्ति, निर्माण और तीर्थंकर । एक उच्च गोत्र शुभ है और सातावेदनीय ये बयालीस प्रकृतियाँ
पुण्यसंज्ञक हैं।
विशेषार्थ—यहाँ बयालीस पुण्य प्रकृतियाँ गिनायी हैं। प्रशस्त परिणामोंसे जिनमें अधिक
अनुभाग प्राप्त होता है वे पुण्य प्रकृतियाँ हैं। यह लक्षण इन प्रकृतियोंमें घटित होता है इसलिए ये
पुण्य प्रकृतियाँ मानी गयी हैं। बन्धकी अपेक्षा कुल प्रकृतियाँ १२० परिगणित की जाती हैं। इसी
अपेक्षासे यहाँ बयालीस संख्या निर्दिष्ट की गयी है। यहाँ वर्णादिकके अवान्तर भेद बीस न गिना
कर कुल चार भेद गिनाये हैं। तत्त्वार्थभाष्यकार आचार्य उमास्वातिने सम्यक्त्वप्रकृति, हास्य,
रति और पुरुषवेद इन चारकी भी पुण्यप्रकृतियोंमें परिगणना की है। तथा वीरसेन स्वामीने
जयधवला टीकामें भी इन्हें पुण्यप्रकृतियाँ सिद्ध किया है। इस प्रकार कुल पुण्यप्रकृतियाँ कितनी हैं
इसका निर्देश किया।
इनके सिवा शेष सब प्रकृतियाँ पापरूप हैं ॥२६॥
§ ७८३. इस पुण्यसंज्ञावाले कर्मप्रकृतिसमूहसे जो भिन्न कर्मसमूह है वह पापरूप कहा जाता
है। वह बयासी प्रकारका है। यथा-ज्ञानावरणकी पाँच प्रकृतियाँ, दर्शनावरणकी नौ प्रकृतियाँ,
मोहनीयकी छब्बीस प्रकृतियाँ, अन्तरायकी पाँच प्रकृतियाँ, नरकगति, तिर्यंचगति, चार जाति,
पाँच संस्थान, पाँच संहनन, अप्रशस्त वर्ण, अप्रशस्त रस, अप्रशस्त गन्ध और अप्रशस्त स्पर्श,
नरकगत्यानुपूर्वी और तिर्यग्गत्यानुपूर्वी ये दो, उपघात, अप्रशस्त विहायोगति, स्थावर, सूक्ष्म,
अपर्याप्ति, साधारणशरीर, अस्थिर, अशुभ, दुर्भग, दुस्वर, अनादेय और अयशःकीर्ति ये नामकर्मकी
चौंतीस प्रकृतियाँ, असाता वेदनीय, नरकायु और नीच गोत्र। इस प्रकार विस्तारके साथ बन्ध
पदार्थका व्याख्यान किया। यह अवधिज्ञान, मनःपर्ययज्ञान और केवलज्ञानरूप प्रत्यक्ष प्रमाणगम्य
है और इन ज्ञानवाले जीवों द्वारा उपदिष्ट आगमसे अनुमेय है।
विशेषार्थ-यहाँ पाप प्रकृतियाँ कौन-कौन हैं इनका नाम निर्देश किया गया है। अप्रशस्त
परिणामोंके निमित्तसे जिनमें अधिक अनुभाग प्राप्त होता है वे पाप प्रकृतियाँ हैं। यहाँ पाप प्रकृतियाँ
कुल बयासी गिनायी हैं। पाँच बन्धन और संघात इनका पाँच शरीरोंमें अन्तर्भाव हो जाता है तथा
मिश्रमोहनीय और सम्यक्त्वमोहनीय ये दो बन्ध प्रकृतियाँ नहीं हैं। और वर्णादि बीस प्रशस्त भी
होते हैं और अप्रशस्त भी। यही कारण है कि इन्हें पुण्य प्रकृतियोंमें भी गिनाया है और पाप
प्रकृतियोंमें भी। इस प्रकार कुल ८२ पाप प्रकृतियाँ होती हैं जिनका नामनिर्देश टीकामें किया ही है।
इस प्रकार सर्वार्थसिद्धिसंज्ञक तत्त्वार्थवृत्तिमें आठवाँ अध्याय समाप्त हुआ ॥८॥
CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri
अथ नवमोऽध्यायः
§ ७८४. बन्धपदार्थो निर्दिष्टः । इदानीं तदनन्तरोद्देशभाजः संवरस्य निर्देशः प्राप्तकाल इत्यत
इदमाह—
आस्रवनिरोधः संवरः ॥१॥
§ ७८५. अभिनवकर्मदानहेतुरास्रवो व्याख्यातः । तस्य निरोधः संवर इत्युच्यते । स ५
द्विविधो भावसंवरो द्रव्यसंवरश्चेति । तत्र संसारनिमित्तक्रियानिवृत्तिर्भावसंवरः । तन्निरोधे¹
तत्पूर्वकर्मपुद्गलादानविच्छेदो द्रव्यसंवरः ।
§ ७८६. इदं विचार्यते—कस्मिन् गुणस्थाने कस्य संवर इति² । अत्र उच्यते—मिथ्यादर्शन-
कर्मोदयवशीकृत आत्मा मिथ्यादृष्टिः । तत्र मिथ्यादर्शनप्राधान्येन यत्कर्म आस्रवति तन्निरोधाच्छेषे
सासादनसम्यग्दृष्ट्यादौ तत्संवरो भवति । किं पुनस्तत् । मिथ्यात्वनपुंसकवेदनरकायुर्नर कगत्येक- १०
द्वित्रिचतुरिन्द्रियजातिहुण्डसंस्थानासंप्राप्तासृपाटिकासंहनननरकगतिप्रायोग्यानुपूर्व्या तपस्थावरसूक्ष्मा-
पर्याप्तकसाधारणशरीरसंज्ञकषोडशप्रकृतिलक्षणम् ।
§ ७८७. असंयमस्त्रिविधः; अनन्तानुबन्ध्यप्रत्याख्यानप्रत्याख्यानोदयविकल्पात् । तत्प्रत्ययस्य
कर्मणस्तदभावे संवरोऽवसेयः । तद्यथा-निद्रानिद्राप्रचलाप्रचलास्त्यानगृद्ध्यनन्तानुबन्धिक्रोधमान-
मायालोभस्त्रीवेदतिर्यगायुस्तिर्यग्गतिचतुःसंस्थानचतुःसंहननतिर्यग्गतिप्रायोग्यानुपूर्व्योद्योताप्रशस्त - १५
§ ७८४. बन्ध पदार्थका निर्देश किया । इस समय उसके बाद कहने योग्य संवर पदार्थके
निर्देशका समय आ गया है इसलिए यह सूत्र कहते हैं—
आस्रवका निरोध करना संवर है ॥१॥
§ ७८५. नूतन कर्मके ग्रहणमें हेतु रूप आस्रवका व्याख्यान किया । उसका निरोध करना
संवर है । वह दो प्रकारका है—भाव संवर और द्रव्य संवर । संसारकी निमित्तभूत क्रियाकी २०
निवृत्ति होना भावसंवर है और इसका (संसारकी निमित्तभूत क्रियाका) निरोध होनेपर तत्पूर्वक
होनेवाले कर्म-पुद्गलोंके ग्रहणका विच्छेद होना द्रव्यसंवर है ।
§ ७८६. अब इस बातका विचार करना है कि किस गुणस्थानमें किस कर्मप्रकृतिका संवर
होता है इसलिए इसी बातको आगे कहते हैं—जो आत्मा मिथ्यादर्शन कर्मके उदयके आधीन है
वह मिथ्यादृष्टि है । इसके मिथ्यादर्शनकी प्रधानतासे जिस कर्मका आस्रव होता है उसका मिथ्या- २५
दर्शनके अभावमें शेष रहे सासादनसम्यग्दृष्टि आदिमें संवर होता है । वह कर्म कौन है ? मिथ्यात्व,
नपुंसकवेद, नरकायु, नरकगति, एकेन्द्रिय जाति, द्वीन्द्रिय जाति, त्रीन्द्रिय जाति, चतुरिन्द्रिय जाति,
हुण्डसंस्थान, असम्प्राप्तासृपाटिकासंहनन, नरकगतिप्रायोग्यानुपूर्वी, आतप, स्थावर, सूक्ष्म,
अपर्याप्तक और साधारणशरीर यह सोलह प्रकृतिरूप कर्म हैं ।
§ ७८७ असंयमके तीन भेद हैं—अनन्तानुबन्धीका उदय, अप्रत्याख्यानावरणका उदय ३०
और प्रत्याख्यानावरणका उदय । इसलिए इसके निमित्तसे जिस कर्मका आस्रव होता है उसका
इसके अभावमें संवर जानना चाहिए । यथा—अनन्तानुबन्धी कषायके उदयसे होनेवाले असंयमकी
मुख्यतासे आस्रवको प्राप्त होनेवाली निद्रानिद्रा, प्रचला-प्रचला, स्त्यानगृद्धि, अनन्तानुबन्धी क्रोध,
अनन्तानुबन्धी मान, अनन्तानुबन्धी माया, अनन्तानुबन्धी लोभ, स्त्रीवेद, तिर्यंचायु, तिर्यंचगति,
१. तन्निरोधेन तत्पू-ता०, ना० । २. इति । उच्च्य-मु० । ३५
विहायोगतिदुर्भगदुःस्वरानादेयनीचैर्गोत्रसंज्ञिकानां पञ्चविंशतिप्रकृतीनामनन्तानुबन्धिकषायोदयकृता-
संयमप्रधानास्रवाणामेकेन्द्रियादयः सासादनसम्यग्दृष्ट्यन्ता बन्धकाः । तदभावे तासामुत्तरत्र संवरः ।
अप्रत्याख्यानावरणक्रोधमानमायालोभमनुष्यायुर्मनुष्यगत्यौदारिकशरीरतदङ्गोपाङ्गवज्रर्षभनाराच -
संहननमनुष्यगतिप्रायोग्यानुपूर्व्यनाम्नां दशानां प्रकृतीनामप्रत्याख्यानकषायोदयकृतासंयमहेतुका-
नामेकेन्द्रियादयोऽसंयतसम्यग्दृष्ट्यन्ता बन्धकाः । तदभावादूर्ध्वं तासां संवरः । सम्यङ्ममिथ्यात्वगुणे-
नायुर्न बध्यते । प्रत्याख्यानावरणक्रोधमानमायालोभानां चतसृणां प्रकृतीनां प्रत्याख्यानकषायोदय-
कारणासंयमास्रवाणामेकेन्द्रियप्रभृतयः संयतासंयतावसाना बन्धकाः । तदभावादुपरिष्टात्तासां
संवरः । प्रमादोपनीतस्य तदभावे निरोधः । प्रमादेनोपनीतस्य कर्मणः प्रमत्तसंयतादूर्ध्वं तदभावा-
न्निरोधः प्रत्येतव्यः । किं पुनस्तत् । असद्वेद्यारतिशोकास्थिराशुभायशःकीर्तिकल्पम् । देवायु-
र्बन्धस्यारम्भस्य प्रमाद एव हेतुरप्रमादोऽपि तत्प्रत्यासन्नः । तदूर्ध्वं तस्य संवरः । कषाय एवास्रवो यस्य
कर्मणो न प्रमादादिः तस्य तन्निरोधे निरास्रोऽवसेयः । स च कषायः प्रमादादिविरहितस्तीव्रमध्यम-
जघन्यभावेन त्रिषु गुणस्थानेषु व्यवस्थितः । तत्रापूर्वकरणस्यादौ संख्येयभागे द्वे कर्मप्रकृती
निद्राप्रचले बध्येते । तत ऊर्ध्वं संख्येयभागे त्रिंशत् प्रकृतयो देवगतिपञ्चेन्द्रियजातिवैक्रियिकाहार-
कतैजसकार्मणशरीरसमचतुरस्रसंस्थानवैक्रियिकाहारकशरीराङ्गोपाङ्गवर्णगन्धरसस्पर्शदेवगतिप्रायो -
ग्यानुपूर्व्यागुरुलघूपघातपरघातोच्छ्वासप्रशस्तविहायोगतित्रसबादरपर्याप्तप्रत्येकशरीरस्थिरशुभसुभग-
मध्यके चार संस्थान, मध्यके चार संहनन, तिर्यंचगतिप्रायोग्यानुपूर्वी, उद्योत, अप्रशस्त विहायो-
गति, दुर्भग, दुःस्वर, अनादेय और नीचगोत्र इन पचीस प्रकृतियोंका एकेन्द्रियसे लेकर सासादन-
सम्यग्दृष्टि गुणस्थान तकके जीव बन्ध करते हैं, अतः अनन्तानुबन्धीके उदयसे होनेवाले असंयमके
अभावमें आगे इनका सवर होता है । अप्रत्याख्यानावरण कषायके उदयसे होनेवाले असंयमकी
मुख्यतासे आस्रवको प्राप्त होनेवाली अप्रत्याख्यानावरण क्रोध, अप्रत्याख्यानावरण मान, अप्र-
त्याख्यानावरण माया, अप्रत्याख्यानावरण लोभ, मनुष्यायु, मनुष्यगति, औदारिकशरीर, औदारिक
अंगोपांग, वज्रर्षभनाराच संहनन और मनुष्यगतिप्रायोग्यानुपूर्वी इन दश प्रकृतियोंका एकेन्द्रियोंसे
लेकर असंयतसम्यग्दृष्टि गुणस्थान तकके जीव बन्ध करते हैं, अतः अप्रत्याख्यानावरण कषायके
उदयसे होनेवाले असंयमका अभाव होनेपर आगे इनका संवर होता है । सम्यग्मिथ्यात्व गुणके
होनेपर आयुकर्मका बन्ध नहीं होता यहाँ इतनी विशेष बात है । प्रत्याख्यानावरण कषायके उदयसे
होनेवाले असंयमसे आस्रवको प्राप्त होनेवाली प्रत्याख्यानावरण क्रोध, मान, माया और लोभ इन
चार प्रकृतियोंका एकेन्द्रियोंसे लेकर संयतासंयत गुणस्थान तकके जीव बन्ध करते हैं, अतः प्रत्या-
ख्यानावरण कषायके उदयसे होनेवाले असंयमके अभावमें आगे इनका संवर होता है । प्रमादके
निमित्तसे आस्रवको प्राप्त होनेवाले कर्मका उसके अभावमें संवर होता है। जो कर्म प्रमादके
निमित्तसे आस्रवको प्राप्त होता है उसका प्रमत्तसंयत गुणस्थानके आगे प्रमाद न रहनेके कारण
संवर जानना चाहिए। वह कर्म कौन है ? असातावेदनीय, अरति, शोक, अस्थिर, अशुभ और
अयशःकीर्तिरूप प्रकृतियोंके भेदसे वह कर्म छह प्रकारका है । देवायुके बन्धका आरम्भ प्रमादहेतुक
भी होता है और उसके नजदीकका अप्रमादहेतुक भी, अतः इसका अभाव होनेपर आगे उसका
संवर जानना चाहिए । जिस कर्मका मात्र कषायके निमित्तसे आस्रव होता है प्रमादादिकके निमित्त-
से नहीं उसका कषायका अभाव होनेपर संवर जानना चाहिए । प्रमादादिकके अभावमें होनेवाला
वह कषाय तीव्र, मध्यम और जघन्यरूपसे तीन गुणस्थानोंमें अवस्थित है । उनमेंसे अपूर्वकरण
गुणस्थानके प्रारम्भिक संख्येय भागमें निद्रा और प्रचला ये दो कर्मप्रकृतियाँ बन्धको प्राप्त होती
हैं। इससे आगे संख्येय भागमें देवगति, पंचेन्द्रिय जाति, वैक्रियिक शरीर, आहारक शरीर, तैजस
शरीर, कार्मण शरीर, समचतुरस्र संस्थान, वैक्रियिक शरीर अंगोपांग, आहारक शरीर अंगोपांग, वर्ण,
- ९।२ § ७८९ ] नवमोऽध्यायः ३११
सुस्वरादेयनिर्माणतीर्थंकराख्या बध्यन्ते । तस्यैव चरमसमये चतस्रः प्रकृतयो हास्यरतिभयजुगुप्सा-
संज्ञा बन्धमुपयान्ति । ता एतास्तीव्रकषायास्रवास्तदभावान्निर्दिष्टार्द्धभागादूर्ध्वं संव्रियन्ते । अनिवृत्ति-
बादरसांपरायस्यादिसमयादारभ्य संख्येयेषु भागेषु पुंवेदक्रोधसंज्वलनौ बध्येते । तत ऊर्ध्वं
शेषेषु संख्येयेषु भागेषु माने¹संज्वलनमायासंज्वलनौ बन्धमुपगच्छतः । तस्यैव चरमसमये लोभ-
संज्वलनो बन्धमेति । ता एताः प्रकृतयो मध्यमकषायास्रवास्तदभावे निर्दिष्टस्य भागस्योपरिष्टा- ५
त्संवरमाप्नुवन्ति । पञ्चानां ज्ञानावरणानां चतुर्णां दर्शनावरणानां यशःकीर्तेरुच्चैर्गोत्रस्य पञ्चा-
नामन्तरायाणां च मन्दकषायास्रवाणां सूक्ष्मसांपरायो बन्धकः । तदभावादुत्तरत्र² तेषां संवरः ।
केवलेनैव योगेन सद्धेद्यस्योपशान्तकषायक्षीणकषायसयोगानां बन्धो भवति । तदभावादयोगकेवलि-
नस्तस्य संवरो भवति ।
§ ७८८. उक्तः संवरस्तद्धेतु³प्रतिपादनार्थमाह— १०
स गुप्तिसमितिधर्मानुप्रेक्षापरीषहजयचारित्रैः ॥२॥
§ ७८९. यतः संसारकारणादात्मनो गोपनं भवति सा गुप्तिः । प्राणिपीडापरिहारार्थं
गन्ध, रस, स्पर्श, देवगति प्रायोग्यानुपूर्वी, अगुरुलघु, उपघात, परघात, उच्छ्वास, प्रशस्त विहायो-
गति, त्रस, बादर, पर्याप्त, प्रत्येकशरीर, स्थिर, शुभ, सुभग, सुस्वर, आदेय, निर्माण और तीर्थंकर
ये तीस प्रकृतियां बन्धको प्राप्त होती हैं । तथा इसी गुणस्थानके अन्तिम समयमें हास्य, रति, १५
भय और जुगुप्सा ये चार प्रकृतियां बन्धको प्राप्त होती हैं । ये तीव्र कषायसे आस्रवको प्राप्त होने-
वाली प्रकृतियां हैं, इसलिए तीव्र कषायका उत्तरोत्तर अभाव होनेसे विवक्षित भागके आगे उनका
संवर होता है । अनिवृत्ति बादर साम्परायके प्रथम समयसे लेकर उसके संख्यात भागोंमें पुंवेद
और क्रोध संज्वलनका बन्ध होता है । इससे आगे शेष रहे संख्यात भागोंमें मान संज्वलन और
माया संज्वलन ये दो प्रकृतियां बन्धको प्राप्त होती हैं और उसीके अन्तिम समयमें लोभ संज्वलन २०
बन्धको प्राप्त होता है । इन प्रकृतियोंका मध्यम कषायके निमित्तसे आस्रव होता है, अतएव
मध्यम कषायका उत्तरोत्तर अभाव होनेपर विवक्षित भागके आगे उनका संवर होता है । मन्द
कषायके निमित्तसे आस्रवको प्राप्त होनेवाली पांच ज्ञानावरण, चार दर्शनावरण, यशःकीर्ति,
उच्चगोत्र और पांच अन्तराय इन सोलह प्रकृतियोंका सूक्ष्मसाम्पराय जीव बन्ध करता है, अतः
मन्द कषायका अभाव होनेसे आगे इनका संवर होता है । केवल योगके निमित्तसे आस्रवको प्राप्त २५
होनेवाली असाता वेदनीयका उपशान्तकषाय, क्षीणकषाय और सयोगकेवली जीवोंके बन्ध होता
है । योगका अभाव हो जानेसे अयोगकेवलीके उसका संवर होता है ।
विशेषार्थ—संवर जीवनमें नये दोष और दोषोंके कारण एकत्रित न होने देनेका मार्ग है ।
संवरके बाद ही संचित हुए दोषों व उनके कारणोंका परिमार्जन किया जा सकता है और तभी
मुक्ति-लाभ होता है । साधारणतः वे दोष और उनके कारण क्या हैं यहाँ इनकी गुणस्थानक्रमसे ३०
विस्तृत चर्चा की गयी है । प्राणीमात्रको इन्हें समझकर संवरके मार्गमें लगना चाहिए यह उक्त
कथनका भाव है।
§ ७८८. संवरका कथन किया । अब उसके हेतुओंका कथन करनेके लिए आगेका सूत्र
कहते हैं—
वह संवर गुप्ति, समिति, धर्म, अनुप्रेक्षा, परिषहजय और चारित्रसे होता है ॥२॥ ३५
§ ७८९. जिसके बलसे संसारके कारणोंसे आत्माका गोपन अर्थात् रक्षा होती है वह गुप्ति
१. मानमाया-मु० । २. -भावात्तु-मु० । ३. तद्भेदप्रति-मु० ।
३१२ सर्वार्थसिद्धौ [ ९।३ § ७९० –
सम्यग्गमनं समितिः । इष्टे ¹ स्थाने धत्ते इति धर्मः । शरीरादीनां स्वभावानुचिन्तनमनुप्रेक्षा ।
क्षुदादिवेदनोत्पत्तौ कर्मनिर्जरार्थं सहन परिषहः । परिषहस्य जयः परिषहजयः । चारित्रशब्द
आदिसूत्रे व्याख्यातार्थः । एतेषां गुप्त्यादीनां संवरणक्रियायाः साधकतमत्वात् करणनिर्देशः ।
संवरोऽधिकृतोऽपि 'स' इति तच्छब्देन परामृश्यते गुप्त्यादिभिः साक्षात्संबन्धनार्थः ² । किं प्रयोजनम् ।
अवधारणार्थम् ³ । स एष संवरो गुप्त्यादिभिरेव नान्येनोपायेनेति । तेन तीर्थाभिषेकदीक्षाशीर्षोप- ⁴
हारदेवताराधनादयो निवर्तिता भवन्ति; रागद्वेषमोहोपात्तस्य कर्मणोऽन्यथा निवृत्त्यभावात् ।
§ ७९०. संवरनिर्जरा हेतुविशेषप्रतिपादनार्थमाह—
तपसा निर्जरा च ॥३॥
§ ७९१. तपो धर्मेऽन्तर्भूतमपि पृथगुच्यते उभयसाधनत्वख्यापनार्थं संवरं प्रति प्राधान्यप्रति-
पादनार्थं च । ननु च तपोऽभ्युदयाङ्गमिष्टं देवेन्द्रादिस्थानप्राप्तिहेतुत्वाभ्युपगमात् ⁵, तत् कथं
निर्जराङ्गं स्यादिति । नैष दोषः; एकस्यानेककार्यदर्शनादग्निवत् । यथाग्निरेकोऽपि ⁶ विक्लेदन-
भस्माङ्गारादिप्रयोजन उपलभ्यते तथा तपोऽभ्युदयकर्मक्षयहेतुरित्यत्र को विरोधः ।
है
- ९।६ § ७९६ ] नवमोऽध्यायः ३१३
§ ७९२. संवरहेतु¹ष्वादावुद्दिष्टाया गुप्तेः स्वरूपप्रतिपत्त्यर्थमाह—
सम्यग्योगनिग्रहो गुप्तिः ॥४॥
§ ७९३. योगो व्याख्यातः 'कायवाङ्मनःकर्म योगः' इत्यत्र। तस्य स्वेच्छाप्रवृत्तिनिवर्तनं
निग्रहः। विषयसुखाभिलाषार्थं ²प्रवृत्तिनिषेधार्थं सम्यग्विशेषणम्। तस्मात् सम्यग्विशेषणविशिष्टात् ५
संक्लेशाप्रादुर्भावपरात्कायादियोगनिरोधे सति तन्निमित्तं कर्म नास्रवतीति संवरप्रसिद्धिरवगन्तव्या।
सा त्रितयी कायगुप्तिर्वाग्गुप्तिर्मनोगुप्तिरिति।
§ ७९४. तत्राशक्तस्य मुनेर्निरवद्यप्रवृत्तिख्यापनार्थमाह—
ईर्याभाषैषणादाननिक्षेपोत्सर्गाः समितयः ॥५॥
§ ७९५. 'सम्यग्' इत्य³नुवर्तते। तेनेर्यादयो विशेष्यन्ते। सम्यगीर्या सम्यग्भाषा सम्यगेषणा
सम्यगादाननिक्षेपौ सम्यगुत्सर्ग इति। सा एताः पञ्च समितयो विदितजीवस्थानादिविधेर्मुनेः १०
प्राणिपीडापरिहाराभ्युपाया वेदितव्याः। तथा प्रवर्तमानस्यासंयमपरिणामनिमित्तकर्मास्रवात्संवरो
भवति।
§ ७९६. तृतीयस्य संवरहेतोर्धर्मस्य भेदप्रतिपत्त्यर्थमाह—
उत्तमक्षमामार्दवार्जवशौचसत्यसंयमतपस्त्यागाकिंचन्यब्रह्मचर्याणि धर्मः ॥६॥
§ ७९२. गुप्तिका संवरके हेतुओंके प्रारम्भमें निर्देश किया है, अतः उसके स्वरूपका कथन १५
करनेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
योगोंका सम्यक् प्रकारसे निग्रह करना गुप्ति है ॥४॥
§ ७९३. 'कायवाङ्मनःकर्म योगः' इस सूत्रमें योगका व्याख्यान कर आये हैं। उसकी
स्वच्छन्द प्रवृत्तिको रोकना निग्रह है। विषय-सुखकी अभिलाषाके लिए की जानेवाली प्रवृत्तिका
निषेध करनेके लिए 'सम्यक्' विशेषण दिया है। इस सम्यक् विशेषण युक्त संक्लेशको नहीं उत्पन्न २०
होने देने रूप योगनिग्रहसे कायादि योगोंका निरोध होने पर तन्निमित्तक कर्म आस्रव नहीं होता
है इसलिए संवरकी सिद्धि जान लेना चाहिए। वह गुप्ति तीन प्रकारकी है—कायगुप्ति, वचनगुप्ति
और मनोगुप्ति।
§ ७९४. अब गुप्तिके पालन करनेमें अशक्त मुनिके निर्दोष प्रवृत्तिकी प्रसिद्धिके लिए आगेका
सूत्र कहते हैं— २५
ईर्या, भाषा, एषणा, आदाननिक्षेप और उत्सर्ग ये पाँच समितियाँ हैं ॥५॥
§ ७९५. यहाँ 'सम्यक्' इस पदकी अनुवृत्ति होती है। उससे ईर्यादिक विशेष्यपनेको प्राप्त
होते हैं—सम्यगीर्या, सम्यग्भाषा, सम्यगेषणा, सम्यगादाननिक्षेप और सम्यगुत्सर्ग। इस प्रकार कही
गयी ये पाँच समितियाँ जीवस्थानादि विधिको जाननेवाले मुनिके प्राणियोंकी पीडाको दूर करनेके
उपाय जानने चाहिए। इस प्रकारसे प्रवृत्ति करनेवालेके असंयमरूप परिणामोंके निमित्तसे जो ३०
कर्मोंका आस्रव होता है उसका संवर होता है।
§ ७९६. तीसरा संवरका हेतु धर्म है। उसके भेदोंका ज्ञान करानेके लिए आगेका सूत्र
कहते हैं—
उत्तम क्षमा, उत्तम मार्दव, उत्तम आर्जव, उत्तम शौच, उत्तम सत्य, उत्तम संयम, उत्तम
तप, उत्तम त्याग, उत्तम आकिंचन्य और उत्तम ब्रह्मचर्य यह दस प्रकारका धर्म है ॥६॥ ३५
१. –हेतुत्वादा–। २. –पार्थप्रवृत्तिनियमनार्थं सम्य–ता०, ना०। ३. इति वर्तते ता०।
४०
CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri
§ ७९७. किमर्थमिदमुच्यते । आद्यं प्रवृत्तिनिग्रहार्थम्, तत्रासमर्थानां प्रवृत्त्युपायप्रदर्शनार्थं
द्वितीयम् । इदं पुनर्दशविधधर्माख्यानं¹ समितिषु प्रवर्तमानस्य प्रमादपरिहारार्थं वेदितव्यम् । शरीर-
स्थितिहेतुमार्गणार्थं परकुलान्यु²पगच्छतो भिक्षोर्दुष्टजनाक्रोशप्रहसनावज्ञाताडनशरीरव्यापादनादीनां
संनिधाने कालुष्यानुत्पत्तिः क्षमा । जात्यादिमदावेशादभिमानाभावो मार्दवं माननिर्हरणम् ।
योगस्यावक्रता आर्जवम् । प्रकर्षप्राप्तलोभान्निवृत्तिः शौचम् । सत्सु प्रशस्तेषु जनेषु साधु वचनं
सत्यमित्युच्यते । ननु चैतद् भाषासमितावन्तर्भवति । नैष दोषः; समितौ प्रवर्तमानो मुनिः साधुष्व-
साधुषु च भाषाव्यवहारं कुर्वन् हितं मितं च ब्रूयात् अन्यथा रागादनर्थदण्डदोषः स्यादिति वाक्स-
मितिरित्यर्थः । इह पुनः सन्तः प्रव्रजितास्तद्भक्ता वा तेषु साधु सत्यं ज्ञानचारित्र³शिक्षणादिषु
बह्वपि कर्तव्यमित्यनुज्ञायते धर्मोपबृंहणार्थम् । समितिषु वर्तमानस्य प्राणीन्द्रियपरिहारस्संयमः ।
कर्मक्षयार्थं तप्यत इति तपः । तदुत्तरत्र वक्ष्यमाणं द्वादशविकल्पमवसेयम् । संयतस्य योग्यं ज्ञानादि-
दानं त्यागः । उपात्तेष्वपि शरीरादिषु संस्कारापोहाय ममेदमित्यभिसन्धिनिवृत्तिराकिंचन्यम् ।
नास्य⁴ किंचनास्तीत्याकिंचनः तस्य भावः कर्म वा आकिंचन्यम् । अनुभूताङ्गनास्मरणकथा-
श्रवणस्त्रीसंसक्तशयनासनादिवर्जनाद् ब्रह्मचर्यं परिपूर्णमवतिष्ठते । स्वतन्त्रवृत्तिनिवृत्त्यर्थो वा⁵ गुरुकुल-
§ ७९७. शंका—यह किसलिए कहा है ? समाधान—संवरका प्रथम कारण प्रवृत्तिका
निग्रह करनेके लिए कहा है। जो वैसा करनेमें असमर्थ हैं उन्हें प्रवृत्तिका उपाय दिखलानेके लिए
दूसरा कारण कहा है किन्तु यह दश प्रकारके धर्मका कथन समितियोंमें प्रवृत्ति करनेवालेके
प्रमादका परिहार करनेके लिए कहा है। शरीरकी स्थितिके कारणकी खोज करनेके लिए पर
कुलोंमें जाते हुए भिक्षुको दुष्ट जन गाली-गलौज करते हैं, उपहास करते हैं, तिरस्कार करते हैं,
मारते-पीटते हैं और शरीरको तोड़ते-मरोड़ते हैं तो भी उनके कलुषताका उत्पन्न न होना क्षमा
है। जाति आदि मदोंके आवेशवश होनेवाले अभिमानका अभाव करना मार्दव है। मार्दवका अर्थ
मानका नाश करना। योगोंका वक्र न होना आर्जव है। प्रकर्षप्राप्त लोभका त्याग करना शौच
है। अच्छे पुरुषोंके साथ साधु वचन बोलना सत्य है। शंका—इसका भाषासमितिमें अन्तर्भाव
होता है? समाधान—यह कोई दोष नहीं है, क्योंकि समितिके अनुसार प्रवृत्ति करनेवाला मुनि
साधु और असाधु दोनों प्रकारके मनुष्योंमें भाषाव्यवहार करता हुआ हितकारी परिमित वचन
बोले, अन्यथा राग होनेसे अनर्थदण्डका दोष लगता है यह वचनसमितिका अभिप्राय है। किन्तु
सत्य धर्मके अनुसार प्रवृत्ति करनेवाला मुनि सज्जन पुरुष, दीक्षित या उनके भक्तोंमें साधु सत्य
वचन बोलता हुआ भी ज्ञान चारित्रके शिक्षण आदिके निमित्तसे बहुविध कर्तव्योंकी सूचना देता
है और यह सब धर्मकी अभिवृद्धिके अभिप्रायसे करता है, इसलिए सत्य धर्मका भाषासमितिमें
अन्तर्भाव नहीं होता। समितियोंमें प्रवृत्ति करनेवाले मुनिके उनका परिपालन करनेके लिए जो
प्राणियोंका और इन्द्रियोंका परिहार होता है वह संयम है। कर्मक्षयके लिए जो तपा जाता है वह
तप है। वह आगे कहा जानेवाला बारह प्रकारका जानना चाहिए। संयतके योग्य ज्ञानादिका
दान करना त्याग है। जो शरीरादिक उपात्त हैं उनमें भी संस्कारका त्याग करनेके लिए 'यह
मेरा है' इस प्रकारके अभिप्रायका त्याग करना आकिंचन्य है। जिसका कुछ नहीं है वह अकिंचन
है और उसका भाव या कर्म आकिंचन्य है। अनुभूत स्त्रीका स्मरण न करनेसे, स्त्रीविषयक
कथाके सुननेका त्याग करनेसे और स्त्रीसे सटकर सोने व बैठनेका त्याग करनेसे परिपूर्ण ब्रह्मचर्य
१. -ख्यानं प्रवर्त्त-ता० । २. -न्युपयतो भिक्षो ता० । ३. -रित्रलक्षणा-मु० । ४. -नास्ति किंचनास्याकिं-
मु०, दि० १, दि० २ । ५. -कुलावा सो मु०, ता० ।
- ९७ § ८०० ] नवमोऽध्यायः ३१५
वासो ब्रह्मचर्यम् । दृष्टप्रयोजनपरिवर्जनार्थमुत्तमविशेषणम् । तान्येवं भाव्यमानानि धर्मव्यपदेशभाञ्जि
स्वगुणप्रतिपक्षदोषसद्भावनाप्रणिहितानि संवरकारणानि भवन्ति ।
§ ७९८. आह, क्रोधाद्यनुत्पत्तिः क्षमादिविशेषप्रत्यनीकालम्बनादित्युकम्, तत्र कस्मात्क्षमा-
दीनयमवलम्बते नान्यथा प्रवर्तत इत्युच्यते । यस्मात्तप्तायःपिण्डवत्क्षमादिपरिणतेनात्महितैषिणा
कर्तव्याः- ५
अनित्याशरणसंसारैकत्वान्यत्वाशुच्यास्रवसंवरनिर्जरालोकबोधिदुर्लभधर्मस्वा-
ख्यातत्वानुचिन्तनमनुप्रेक्षाः ॥७॥
§ ७९९. इमानि शरीरेन्द्रियविषयोपभोगद्रव्याणि समुदायरूपाणि जलबुद्बुदवदनवस्थितस्व-
भावानि गर्भादिष्ववस्थाविशेषेषु सदोपलभ्यमानसंयोगविपर्ययाणि, मोहादत्राज्ञो नित्यतं मन्यते ।
न किंचित्संसारे समुदितं ध्रुवमस्ति आत्मनो ज्ञानदर्शनोपयोगस्वभावादन्यदिति चिन्तनमनित्यता- १०
नुप्रेक्षा । एवं १ह्यस्य भव्यस्य चिन्तयतस्तेष्वभिष्वङ्गाभावाद् भुक्तोज्झितगन्धमाल्यादिष्विव
वियोगकालेऽपि विनिपातो नोत्पद्यते ।
§ ८००. यथा-मृगशावस्यैकान्ते बलवता क्षुधितेनामिषैषिणा व्याघ्रेणाभिभूतस्य न किंचि-
च्छरणमस्ति, तथा जन्मजरामृत्युव्याधिप्रभृतिव्यसनमध्ये परिभ्रमतो जन्तोः शरणं न विद्यते ।
परिपुष्टमपि शरीरं भोजनं प्रति सहायीभवति न व्यसनोपनिपाते । यत्नेन संचिता२ अर्था अपि न १५
होता है । अथवा स्वतन्त्र वृत्तिका त्याग करनेके लिए गुरुकुलमें निवास करना ब्रह्मचर्य है । दिखाई
देनेवाले प्रयोजनका निषेध करनेके लिए क्षमादिके पहले उत्तम विशेषण दिया है । इस प्रकार
जीवनमें उतारे गये और स्वगुण तथा प्रतिपक्षभूत दोषोंके सद्भावमें यह लाभ और यह हानि है
इस तरहकी भावनासे प्राप्त हुए ये धर्मसंज्ञावाले उत्तम क्षमादिक संवरके कारण होते हैं ।
§ ७९८. क्षमादि विशेष और उनके उलटे कारणोंका अवलम्बन आदि करनेसे क्रोधादिकी २०
उत्पत्ति नहीं होती है यह पहले कह आये हैं । उसमें किस कारणसे यह जीव क्षमादिकका अवलम्बन
लेता है, अन्यथा प्रवृत्ति नहीं करता है इसका कथन करते हैं । यतः तपाये हुए लोहेके गोलेके
समान क्षमादि रूपसे परिणत हुए आत्महितैषीको करने योग्य-
अनित्य, अशरण, संसार, एकत्व, अन्यत्व, अशुचि, आस्रव, संवर, निर्जरा, लोक, बोधि-
दुर्लभ और धर्मस्वाख्यातत्वका बार-बार चिन्तन करना अनुप्रेक्षाएँ हैं ॥७॥ २५
§ ७९९. ये समुदायरूप शरीर, इन्द्रियविषय, उपभोग और परिभोग द्रव्य जलके बुलबुलके
समान अनवस्थित स्वभाववाले होते हैं तथा गर्भादि अवस्थाविशेषोंमें सदा प्राप्त होनेवाले संयोगों-
से विपरीत स्वभाववाले होते हैं । मोहवश अज्ञ प्राणी इनमें नित्यताका अनुभव करता है पर
वस्तुतः आत्माके ज्ञानोपयोग और दर्शनोपयोगके सिवा इस संसारमें कोई भी पदार्थ ध्रुव नहीं है
इस प्रकार चिन्तन करना अनित्यानुप्रेक्षा है । इस प्रकार चिन्तन करनेवाले इस भव्यके उन ३०
शरीरादिमें आसक्तिका अभाव होनेसे भोगकर छोड़े हुए गन्ध और माला आदिके समान वियोग
कालमें भी सन्ताप नहीं होता है ।
§ ८००. जिस प्रकार एकान्तमें क्षुधित और मांसके लोभी बलवान् व्याघ्रके द्वारा दबोचे
गये मृगशावकके लिए कुछ भी शरण नहीं होता उसी प्रकार जन्म, जरा, मृत्यु और व्याधि आदि
दुःखोंके मध्यमें परिभ्रमण करनेवाले जीवका कुछ भी शरण नहीं है । परिपुष्ट शरीर ही भोजनके ३५
प्रति सहायक है, दुःखोंके प्राप्त होनेपर नहीं । यत्नसे संचित किया हुआ धन भी भवान्तरमें साथ
१. ह्यस्य चिन्त-मु०, ता० । २. संचितोऽर्थोऽपि न भवान्तरमनुगच्छति मु० ।
३१६ सर्वार्थसिद्धौ [ ९।७ ६ ८०१-
भवान्तरमनुगच्छन्ति । संविभक्तसुखदुःखः सुहृदोऽपि न मरणकाले परित्रायन्ते । बान्धवाः
समुदिताश्च रुजा परीतं न परिपालयन्ति । अस्ति चेत्सुचरितो धर्मो व्यसनमहार्णवे तरणोपायो
भवति । मृत्युना नीयमानस्य सहस्रनयनादयोऽपि न शरणम् । तस्माद् भवव्यसनसंकटे धर्म एव
शरणं सुहृदर्थोऽप्यनपायी, नान्यत्किञ्चिच्छरणमिति भावना अशरणानुप्रेक्षा । एवं ह्यस्याध्यवस्यतो
नित्यमशरणोऽस्मीति भृशमुद्विग्नस्य सांसारिकेषु भावेषु ममत्वविगमो भवति । भगवदर्हत्सर्वज्ञ-
प्रणीत एव मार्गे प्रयत्नौ भवति ।
§ ८०१. कर्मविपाकवशादात्मनो भवान्तरावाप्तिः संसारः । स पुरस्तात्पञ्चविधपरिवर्तन-
रूपेण व्याख्यातः । तस्मिन्ननेकयोनिकुलकोटिबहुलशतसहस्रसंकटे संसारे परिभ्रमन् जीवः कर्मयन्त्र-
प्रेरितः पिता भूत्वा भ्राता पुत्रः पौत्रश्च भवति । माता भूत्वा भगिनी भार्या दुहिता च भवति ।
स्वामी भूत्वा दासो भवति । दासो भूत्वा स्वाम्यपि भवति । नट इव रङ्गे । अथवा किं बहुना,
स्वयमात्मनः पुत्रो भवतीत्येवमादि संसारस्वभावचिन्तनं संसारानुप्रेक्षा । एवं ह्यस्य भावयतः
संसारदुःखभयादुद्विग्नस्य ततो निर्वेदो भवति । निर्विण्णश्च संसारप्रहाणाय प्रयतते ।
§ ८०२. जन्मजरामरणावृत्ति महादुःखानुभवनं प्रति एक एवाहं न कश्चिन्मे स्वः परो वा
विद्यते । एक एव जायेऽहम् । एक एव म्रिये । न मे कश्चित् स्वजनः परजनो वा व्याधिजरामरणा-
दीनि दुःखान्यपहरति । बन्धुमित्राणि श्मशानं नातिवर्तन्ते । धर्म एव मे सहायः सदा अनपायीति
नहीं जाता । जिन्होंने सुख और दुःखको समान रूपसे बाँट लिया है ऐसे मित्र भी मरणके समय
रक्षा नहीं कर सकते । मिलकर बन्धुजन भी रोगसे व्याप्त इस जीवकी रक्षा करनेमें असमर्थ होते
हैं। यदि सुचरित धर्म हो तो वह ही दुःखरूपी महासमुद्रमें तरनेका उपाय हो सकता है । मृत्युसे ले
जानेवाले इस जीवके सहस्रनयन आदि भी शरण नहीं है, इसलिए संसार विपत्तिरूप स्थानमें धर्म
ही शरण है। वही मित्र है और वही कभी भी न छूटनेवाला अर्थ है, अन्य कुछ शरण नहीं है इस
प्रकारकी भावना करना अशरणानुप्रेक्षा है । इस प्रकार विचार करनेवाले इस जीवके 'मैं सदा
अशरण हूँ' इस तरह अतिशय उद्विग्न होनेके कारण संसारके कारणभूत पदार्थोंमें ममता नहीं
रहती और वह भगवान् अरहंत सर्वज्ञ प्रणीत मार्गमें ही प्रयत्नशील होता है ।
§ ८०१. कर्मके विपाकके वशसे आत्माको भवान्तरकी प्राप्ति होना संसार है । उसका
पहले पाँच प्रकारके परिवर्तन रूपसे व्याख्यान कर आये हैं। अनेक योनि और कुल कोटिलाखसे
व्याप्त उस संसारमें परिभ्रमण करता हुआ यह जीव कर्मयन्त्रसे प्रेरित होकर पिता होकर भाई,
पुत्र और पौत्र होता है। माता होकर भगिनी, भार्या और लड़की होता है। स्वामी होकर दास
होता है तथा दास होकर स्वामी भी होता है । जिस प्रकार रंगस्थलमें नट नाना रूप धारण
करता है उस प्रकार यह होता है। अथवा बहुत कहनेसे क्या प्रयोजन, स्वयं अपना पुत्र होता है।
इत्यादि रूपसे संसारके स्वभावका चिन्तन करना संसारानुप्रेक्षा है । इस प्रकार चिन्तन करते हुए
संसारके दुःखके भयसे उद्विग्न हुए इसके संसारसे निर्वेद होता है और निर्विण्ण होकर संसारका
नाश करनेके लिए प्रयत्न करता है।
§ ८०२. 'जन्म, जरा और मरणकी आवृत्ति रूप महादुःखका अनुभवन करनेके लिए अकेला
ही मैं हूँ, न कोई मेरा स्व है और न पर है, अकेला ही मैं जन्मता हूँ और अकेला ही मरता हूँ।
मेरा कोई स्वजन या परजन व्याधि, जरा और मरण आदि दुःखोंको दूर नहीं करता । बन्धु और
मित्र श्मशानसे आगे नहीं जाते । धर्म ही मेरा कभी साथ न छोड़नेवाला सदा काल सहायक है।
१. ममत्वनिरासो भव-आ०, दि० १, दि० २, मु०, ना० । २. मार्गे प्रतिपन्नो भव-आ०, दि० १,
दि० २, मु० । ३. -यन्त्रानुप्रेरितः । ४. प्रतियतते मु० । ५. - मरणानुवृत्ति-मु० । ६. जायेऽहम् । एक
ता० । ७. श्मशानात् नाति-ता० ।
– ९।७ § ८०५ ] नवमोऽध्यायः ३१७
चिन्तनमेकत्वानुप्रेक्षा। एवं ह्यस्य भावयतः स्वजनेषु प्रीत्यनुबन्धो न भवति। परजनेषु च द्वेषानु-
बन्धो नोपजायते। ततो निःसङ्गतामभ्युपगतो मोक्षायैव घटते।
§ ८०३. शरीरादन्यत्वचिन्तनमन्यत्वानुप्रेक्षा। तद्यथा—बन्धं प्रत्येकत्वे सत्यपि लक्षणभेदा-
दन्योऽहमैन्द्रियकं शरीरमै¹तीन्द्रियोऽहमज्ञं शरीरं ज्ञोऽहमनित्यं शरीरं नित्योऽहमाद्यन्तवच्छरीरमनाद्य-
नन्तोऽहम्। बहूनि मे शरीरशतसहस्राण्यतीतानि संसारे परिभ्रमतः। स एवाहमन्यस्तेभ्य इत्येवं ५
मे किमङ्ग, पुनर्बाह्येभ्यः परिग्रहेभ्यः। इत्येवं ह्यस्य मनः समाधानस्य शरीरादिषु स्पृहा नोत्पद्यते।
ततस्तत्त्वज्ञानभावनापूर्वके वैराग्यप्रकर्षे सति आत्यन्तिकस्य मोक्षसुखस्यावा²प्तिर्भवति।
§ ८०४. शरीरमिदमत्यन्ताशुचियोनिं³ शुक्रशोणिताशुचिसंवर्धितमवस्करवदशुचिभाजनं
त्वङ्मात्रप्रच्छादितमतिपूतिरसनिष्यन्दिस्रोतोबिलमङ्गारवदात्मभावमाश्रितमप्याश्वेवापादयति ।
स्नानानुलेपनधूपप्रघर्षवासमाल्यादिभिरपि न शक्यमशुचित्वमपहर्तु मस्य। सम्यग्दर्शनादि पुनर्भा- १०
व्यमानं जीवस्यात्यन्तिकां शुद्धिमाविर्भावयतीति तत्त्वतो भावनमशुचित्वानुप्रेक्षा। एवं ह्यस्य
संस्मरतः शरीरनिर्वेदो भवति। निर्विण्णश्च जन्मोदधितरणाय चित्तं समाधत्ते।
§ ८०५. आस्रवसंवरनिर्जराः पूर्वोक्ता अपि इहोपन्यस्यन्ते तद्गतगुणदोषभावनार्थम्। तद्यथा—
आस्रवा इहामुत्रापाययुक्ता महानदीस्रोतोवेगतीक्ष्णा इन्द्रियकषाया व्रतादयः। तत्रेन्द्रियाणि ताव-
त्स्पर्शनादीनि वनगजवायसपन्नगपतङ्गहरिणादीन् व्यसनार्णवमवगाहयन्ति तथा कषायादयोऽपीह १५
इस प्रकार चिन्तन करना एकत्वानुप्रेक्षा है। इस प्रकार चिन्तन करनेवाले इस जीवके स्वजनोंमें
प्रीतिका अनुबन्ध नहीं होता और परजनोंमें द्वेषका अनुबन्ध नहीं होता, इसलिए निःसंगताको
प्राप्त होकर मोक्षके लिए ही प्रयत्न करता है।
§ ८०३. शरीरसे अन्यत्वका चिन्तन करना अन्यत्वानुप्रेक्षा है। यथा—बन्धकी अपेक्षा अभेद
होनेपर भी लक्षणके भेदसे 'मैं' अन्य हूँ। शरीर ऐन्द्रियिक है, मैं अतीन्द्रिय हूँ। शरीर अज्ञ है, मैं २०
ज्ञाता हूँ। शरीर अनित्य है, मैं नित्य हूँ। शरीर आदि-अन्तवाला है और मैं अनाद्यनन्त हूँ। संसार-
में परिभ्रमण करते हुए मेरे लाखों शरीर अतीत हो गये। उनसे भिन्न वह ही मैं हूँ, इस प्रकार
शरीरसे भी जब मैं अन्य हूँ तब हे वत्स ! मैं बाह्य पदार्थोंसे भिन्न होऊँ तो इसमें क्या आश्चर्य ?
इस प्रकार मनको समाधान युक्त करनेवाले इसके शरीरादिकमें स्पृहा उत्पन्न नहीं होती है और
इससे तत्त्वज्ञानकी भावनापूर्वक वैराग्यका प्रकर्ष होनेपर आत्यन्तिक मोक्ष सुखकी प्राप्ति होती है। २५
§ ८०४. यह शरीर अत्यन्त अशुचि पदार्थोंका योनि है। शुक्र और शोणितरूप अशुचि
पदार्थोंसे वृद्धिको प्राप्त हुआ है, शौचगृहके समान अशुचि पदार्थोंका भाजन है। त्वचामात्रसे
आच्छादित है। अति दुर्गन्ध रसको बहानेवाला झरना है। अंगारके समान अपने आश्रयमें आये
हुए पदार्थको भी शीघ्र ही नष्ट करता है। स्नान, अनुलेपन, धूपका मालिश और सुगन्धिमाला
आदिके द्वारा भी इसकी अशुचिताको दूर कर सकना शक्य नहीं है किन्तु अच्छी तरह भावना ३०
किये गये सम्यग्दर्शन आदिक जीवकी आत्यन्तिक शुद्धिको प्रकट करते हैं। इस प्रकार वास्तविक-
रूपसे चिन्तन करना अशुचि अनुप्रेक्षा है। इस प्रकार चिन्तन करनेवाले इसके शरीरसे निर्वेद
होता है और निर्विण्ण होकर जन्मोदधिको तरनेके लिए चित्तको लगाता है।
§ ८०५. आस्रव, संवर और निर्जराका कथन पहले कर आये हैं तथापि उनके गुण और
दोषोंका विचार करनेके लिए यहाँ उनका फिरसे उपन्यास किया गया है। यथा—आस्रव इस लोक ३५
और परलोकमें दुःखदायी हैं। महानदीके प्रवाहके वेगके समान तीक्ष्ण हैं तथा इन्द्रिय, कषाय और
अव्रतरूप हैं। उनमें से स्पर्शनादिक इन्द्रियाँ वनगज, कौआ, सर्प, पतंग और हरिण आदिको दुःख-
१. – मनिन्द्रियो मु०, दि० १, दि० २, ता० । २. –स्याप्तिर्भ-मु० । ३. –न्ताशुचिशुक्रशोणितयोन्यशुचिसं-
मु० । –न्ताशुचिपूतिशुक्रशोणितसं – दि० १। –न्ताशुचिशुक्रशोणितसं–दि० २ । ४. तद्गुण-मु० ।
CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri
३१८ सर्वार्थसिद्धौ [ ९।७ § ८०६-
वधबन्धापयशःपरिक्लेशादीन् जनयन्ति । अमुत्र च नानागतिषु बहुविधदुःखप्रज्वलितासु परि२-
भ्रमयन्तीत्येवमास्रवदोषानुचिन्तनमास्रवानुप्रेक्षा । एवं ह्यस्य चिन्तयतः क्षमादिषु श्रेयस्त्वबुद्धिर्न
प्रच्यवते । सर्व एते आस्रवदोषाः कूर्मवत्संवृतात्मनो न भवन्ति ।
§ ८०६. यथा महार्णवे नावो विवर३पिधानेऽसति क्रमात् स्रुतजलाभिप्लवे सति तदाश्रयाणां
५ विनाशोऽवश्यंभावी, छिद्रपिधाने च निरुपद्रवमभिलषितदेशान्तरप्रापणं, तथा कर्मागमद्वारसंवरणे
सति नास्ति श्रेयःप्रतिबन्ध इति संवरगुणानुचिन्तनं संवरानुप्रेक्षा । एवं ह्यस्य चिन्तयतः संवरे
नित्योद्युक्तता भवति । ततश्च निःश्रेयसपदप्राप्तिरिति ।
§ ८०७. निर्जरा वेदनाविपाक४ इत्युक्तम् । सा द्वेधा — अबुद्धिपूर्वा कुशलमूला चेति । तत्र
नरकादिषु कर्मफलविपाकजा अबुद्धिपूर्वा सा अकुशलानुबन्धा । परिषहजये कृते कुशलमूला सा
१० शुभानुबन्धा निरनुबन्धा चेति । इत्येवं निर्जराया गुणदोषभावनं निर्जरानुप्रेक्षा । एवं ह्यस्यानुस्मरतः
कर्मनिर्जरायै प्रवृत्तिर्भवति ।
§ ८०८. लोकसंस्थानादिविधिर्व्याख्यातः । समन्तादनन्तस्यालोकाकाशस्य बहुमध्यदेश-
भाविनो लोकस्य संस्थानादिविधिर्व्याख्यातः । तत्स्वभावानुचिन्तनं लोकानुप्रेक्षा । एवं ह्यस्याध्य-
वस्यतस्तत्त्वज्ञानविशुद्धिर्भवति ।
१५ § ८०९. एकस्मिन्निगोतशरीरे जीवाः सिद्धानामनन्तगुणाः। एवं सर्वलोको निरन्तरं निचितः
रूप समुद्रमें अवगाहन कराती हैं। कषाय आदिक भी इस लोकमें वध, अपयश और क्लेशादिक
दुःखोंको उत्पन्न करते हैं, तथा परलोकमें नाना प्रकारके दुःखोंसे प्रज्वलित नाना गतियोंमें परि-
भ्रमण कराते हैं। इस प्रकार आस्रवके दोषोंका चिन्तन करना आस्रवानुप्रेक्षा है । इस प्रकार
चिन्तन करनेवाले इस जीवके क्षमादिकमें कल्याणरूप बुद्धिका त्याग नहीं होता है, तथा कछुएके
२० समान जिसने अपनी आत्माको संवृत कर लिया है उसके ये सब आस्रवके दोष नहीं होते हैं ।
§ ८०६. जिस प्रकार महार्णवमें नावके छिद्रके नहीं ढके रहनेपर क्रमसे झिरे हुए जलसे
व्याप्त होनेपर उसके आश्रयसे बैठे हुए मनुष्योंका विनाश अवश्यम्भावी है और छिद्रके ढँके रहनेपर
निरुपद्रवरूपसे अभिलषित देशान्तरका प्राप्त होना अवश्यम्भावी है उसी प्रकार कर्मागमके द्वारके
ढँके होनेपर कल्याणका प्रतिबन्ध नहीं होता । इस प्रकार संवरके गुणोंका चिन्तन करना संवरानु-
२५ प्रेक्षा है। इस प्रकार चिन्तन करनेवाले इस जीवके संवरमें निरन्तर उद्युक्तता होती है और इससे
मोक्षपदकी प्राप्ति होती है ।
§ ८०७ वेदना विपाकका नाम निर्जरा है यह पहले कह आये हैं। वह दो प्रकारकी है—
अबुद्धिपूर्वा और कुशलमूला। नरकादि गतियोंमें कर्मफलके विपाकसे जायमान जो अबुद्धिपूर्वा
निर्जरा होती है वह अकुशलानुबन्धा है। तथा परीषहके जीतनेपर जो निर्जरा होती है वह कुशल-
३० मूला निर्जरा है। वह शुभानुबन्धा और निरनुबन्धा होती है। इस प्रकार निर्जराके गुणदोषका
चिन्तन करना निर्जरानुप्रेक्षा है। इस प्रकार चिन्तन करने वाले इसकी कर्मनिर्जराके लिए प्रवृत्ति
होती है ।
§ ८०८. लोकसंस्थान आदिकी विधि पहले कह आये हैं। अर्थात् चारों ओरसे अनन्त
अलोकाकाशके बहुमध्यदेशमें स्थित लोकके संस्थान आदिकी विधि पहले कह आये हैं। उसके
३५ स्वभावका अनुचिन्तन करना लोकानुप्रेक्षा है। इस प्रकार विचार करनेवाले इसके तत्त्वज्ञानकी
विशुद्धि होती है।
§ ८०९. एक निगोदशरीरमें सिद्धोंसे अनन्तगुणे जीव हैं। इस प्रकार स्थावर जीवोंसे सब
१. -बन्धपरि-मु०, ता० । २. -तासु भ्रम-मु० । ३. विवरापिधाने सति मु० । ४. -पाकजा इत्यु-मु० ।
CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri
– ९।७ § ८१० ] नवमोऽध्यायः ३१९
स्थावरैरतस्तत्र त्रसता वालुकासमुद्रे पतिता वज्रसिकताकणिकेव दुर्लभा । तत्र च विकलेन्द्रियाणां
भूयिष्ठत्वात्पञ्चेन्द्रियता गुणेषु कृतज्ञतेव कृच्छ्रलभ्या । तत्र च तिर्यक्षु पशुमृगपक्षिसरीसृपादिषु
बहुषु सत्सु मनुष्यभावश्चतुष्पथे रत्नराशिरिव दुरासदः । तत्प्रच्यवे च पुनस्तदुत्पत्तिर्दग्धतरुपुद्गल-
तद्भावोपपत्तिवद् दुर्लभा । तल्लाभे च देशकुलेन्द्रियसंपन्नीरोगत्वान्युत्तरोत्तरतोऽतिदुर्लभानि ।
सर्वेष्वपि तेषु लब्धेषु सद्धर्मप्रतिलम्भो यदि न स्याद् व्यर्थं जन्म वदनमिव दृष्टिविकलम् । तमेवं¹ ५
कृच्छ्रलभ्यं धर्ममवाप्य विषयसुखे रञ्जनं भस्मार्थंचन्दनदहनमिव विफलम् । विरक्तविषयसुखस्य तु
तपोभावनाधर्मप्रभावनासुखमरणदिलक्षणः समाधिर्दु र्वापः । तस्मिन् सति बोधिलाभः फलवान्
भवतीति चिन्तनं बोधिदुर्लभानुप्रेक्षा । एवं ह्यस्य भावयतो बोधिं प्राप्य प्रमादो न कदाचिदपि
भवति ।
§ ८१०. अयं जिनोपदिष्टो धर्मोऽहिंसालक्षणः सत्याधिष्ठितो विनयमूलः । क्षमाबलो ब्रह्मचर्यगुप्त १०
उपशमप्रधानो नियतिलक्षणो निष्परिग्रहतालम्बनः । अस्यालाभादनादिसंसारे जीवाः परिभ्रमन्ति
दुष्कर्मविपाकजं दुःखमनुभवन्तः । अस्य पुनः प्रतिलम्भे विविधाभ्युदयप्राप्तिपूर्विका निःश्रेयसोप-
लब्धिर्नियतेति चिन्तनं धर्मस्वाख्यातत्वानुप्रेक्षा । एवं ह्यस्य चिन्तयतो धर्मानुरागात्सदा² प्रतियत्नो
भवति ।
लोक निरन्तर भरा हुआ है । अतः इस लोकमें त्रस पर्यायका प्राप्त होना इतना दुर्लभ है जितना १५
कि बालुकाके समुद्रमें पड़ी हुई वज्रसिकताकी कणिकाका प्राप्त होना दुर्लभ होता है । उसमें भी
विकलेन्द्रिय जीवोंकी बहुलता होनेके कारण गुणोंमें जिस प्रकार कृतज्ञता गुणका प्राप्त होना बहुत
दुर्लभ होता है उसी प्रकार पंचेन्द्रिय पर्यायका प्राप्त होना बहुत दुर्लभ है। उसमें भी पशु, मृग,
पक्षी और सरीसृप तिर्यंचोंकी बहुलता होती है, इसलिए जिस प्रकार चौपथपर रत्नराशिका प्राप्त
होना अति कठिन है उसी प्रकार मनुष्य पर्यायका प्राप्त होना भी अति कठिन है । और मनुष्य २०
पर्यायके मिलनेके बाद उसके च्युत हो जानेपर पुनः उसकी उत्पत्ति होना इतना कठिन है जितना
कि जले हुए वृक्षके पुद्गलोंका पुनः उस वृक्ष पर्यायरूपसे उत्पन्न होना कठिन होता है । कदाचित्
पुनः इसकी प्राप्ति हो जाये तो देश, कुल, इन्द्रियसम्पत् और नीरोगता इनका प्राप्त होना उत्तरो-
त्तर दुर्लभ है । इन सबके मिल जानेपर भी यदि समीचीन धर्मकी प्राप्ति न होवे तो जिस प्रकार
दृष्टिके बिना मुख व्यर्थ होता है उसी प्रकार मनुष्यजन्मका प्राप्त होना व्यर्थ है । इस प्रकार २५
अतिकठिनतासे प्राप्त होने योग्य उस धर्मको प्राप्त कर विषयसुखमें रममाण होना भस्मके लिए
चन्दनको जलानेके समान निष्फल है । कदाचित् विषयसुखसे विरक्त हुआ तो भी इसके लिए तपकी
भावना, धर्मकी प्रभावना और सुखपूर्वक मरणरूप समाधिका प्राप्त होना अतिदुर्लभ है । इसके
होनेपर ही बोधिलाभ सफल है ऐसा विचार करना बोधिदुर्लभानुप्रेक्षा है । इस प्रकार विचार
करनेवाले इस जीवके बोधिको प्राप्त कर कभी भी प्रमाद नहीं होता । ३०
§ ८१०. जिनेन्द्रदेवने यह जो अहिंसालक्षण धर्म कहा है, सत्य उसका आधार है, विनय
उसकी जड़ है, क्षमा उसका बल है, ब्रह्मचर्यसे रक्षित है, उपशमकी उसमें प्रधानता है, नियति
उसका लक्षण है, परिग्रह रहितपना उसका आलम्बन है । इसकी प्राप्ति नहीं होनेसे दुष्कर्म विपाकसे
जायमान दुःखको अनुभव करते हुए ये जीव अनादि संसारमें परिभ्रमण करते हैं । परन्तु इसका
लाभ होने पर नाना प्रकारके अभ्युदयोंकी प्राप्तिपूर्वक मोक्षकी प्राप्ति होना निश्चित है ऐसा चिन्तन ३५
करना धर्मस्वाख्यातत्वानुप्रेक्षा है । इस प्रकार चिन्तन करनेवाले इस जीवके धर्मानुरागवश उसकी
प्राप्तिके लिए सदा यत्न होता है ।
१. तमेव कृ–आ०, दि० १, दि० २ । २. सदा कृतप्रति–ता० ।
CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri