सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)
Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary
आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअथ नवमोऽध्यायः
§ ७८४. बन्धपदार्थो निर्दिष्टः । इदानीं तदनन्तरोद्देशभाजः संवरस्य निर्देशः प्राप्तकाल इत्यत
इदमाह—
आस्रवनिरोधः संवरः ॥१॥
§ ७८५. अभिनवकर्मदानहेतुरास्रवो व्याख्यातः । तस्य निरोधः संवर इत्युच्यते । स ५
द्विविधो भावसंवरो द्रव्यसंवरश्चेति । तत्र संसारनिमित्तक्रियानिवृत्तिर्भावसंवरः । तन्निरोधे¹
तत्पूर्वकर्मपुद्गलादानविच्छेदो द्रव्यसंवरः ।
§ ७८६. इदं विचार्यते—कस्मिन् गुणस्थाने कस्य संवर इति² । अत्र उच्यते—मिथ्यादर्शन-
कर्मोदयवशीकृत आत्मा मिथ्यादृष्टिः । तत्र मिथ्यादर्शनप्राधान्येन यत्कर्म आस्रवति तन्निरोधाच्छेषे
सासादनसम्यग्दृष्ट्यादौ तत्संवरो भवति । किं पुनस्तत् । मिथ्यात्वनपुंसकवेदनरकायुर्नर कगत्येक- १०
द्वित्रिचतुरिन्द्रियजातिहुण्डसंस्थानासंप्राप्तासृपाटिकासंहनननरकगतिप्रायोग्यानुपूर्व्या तपस्थावरसूक्ष्मा-
पर्याप्तकसाधारणशरीरसंज्ञकषोडशप्रकृतिलक्षणम् ।
§ ७८७. असंयमस्त्रिविधः; अनन्तानुबन्ध्यप्रत्याख्यानप्रत्याख्यानोदयविकल्पात् । तत्प्रत्ययस्य
कर्मणस्तदभावे संवरोऽवसेयः । तद्यथा-निद्रानिद्राप्रचलाप्रचलास्त्यानगृद्ध्यनन्तानुबन्धिक्रोधमान-
मायालोभस्त्रीवेदतिर्यगायुस्तिर्यग्गतिचतुःसंस्थानचतुःसंहननतिर्यग्गतिप्रायोग्यानुपूर्व्योद्योताप्रशस्त - १५
§ ७८४. बन्ध पदार्थका निर्देश किया । इस समय उसके बाद कहने योग्य संवर पदार्थके
निर्देशका समय आ गया है इसलिए यह सूत्र कहते हैं—
आस्रवका निरोध करना संवर है ॥१॥
§ ७८५. नूतन कर्मके ग्रहणमें हेतु रूप आस्रवका व्याख्यान किया । उसका निरोध करना
संवर है । वह दो प्रकारका है—भाव संवर और द्रव्य संवर । संसारकी निमित्तभूत क्रियाकी २०
निवृत्ति होना भावसंवर है और इसका (संसारकी निमित्तभूत क्रियाका) निरोध होनेपर तत्पूर्वक
होनेवाले कर्म-पुद्गलोंके ग्रहणका विच्छेद होना द्रव्यसंवर है ।
§ ७८६. अब इस बातका विचार करना है कि किस गुणस्थानमें किस कर्मप्रकृतिका संवर
होता है इसलिए इसी बातको आगे कहते हैं—जो आत्मा मिथ्यादर्शन कर्मके उदयके आधीन है
वह मिथ्यादृष्टि है । इसके मिथ्यादर्शनकी प्रधानतासे जिस कर्मका आस्रव होता है उसका मिथ्या- २५
दर्शनके अभावमें शेष रहे सासादनसम्यग्दृष्टि आदिमें संवर होता है । वह कर्म कौन है ? मिथ्यात्व,
नपुंसकवेद, नरकायु, नरकगति, एकेन्द्रिय जाति, द्वीन्द्रिय जाति, त्रीन्द्रिय जाति, चतुरिन्द्रिय जाति,
हुण्डसंस्थान, असम्प्राप्तासृपाटिकासंहनन, नरकगतिप्रायोग्यानुपूर्वी, आतप, स्थावर, सूक्ष्म,
अपर्याप्तक और साधारणशरीर यह सोलह प्रकृतिरूप कर्म हैं ।
§ ७८७ असंयमके तीन भेद हैं—अनन्तानुबन्धीका उदय, अप्रत्याख्यानावरणका उदय ३०
और प्रत्याख्यानावरणका उदय । इसलिए इसके निमित्तसे जिस कर्मका आस्रव होता है उसका
इसके अभावमें संवर जानना चाहिए । यथा—अनन्तानुबन्धी कषायके उदयसे होनेवाले असंयमकी
मुख्यतासे आस्रवको प्राप्त होनेवाली निद्रानिद्रा, प्रचला-प्रचला, स्त्यानगृद्धि, अनन्तानुबन्धी क्रोध,
अनन्तानुबन्धी मान, अनन्तानुबन्धी माया, अनन्तानुबन्धी लोभ, स्त्रीवेद, तिर्यंचायु, तिर्यंचगति,
१. तन्निरोधेन तत्पू-ता०, ना० । २. इति । उच्च्य-मु० । ३५