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सर्वकोश
सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary

आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

पृष्ठ 429, कुल 558 में से

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पृष्ठ 429

– ९।७ § ८०५ ] नवमोऽध्यायः ३१७
चिन्तनमेकत्वानुप्रेक्षा। एवं ह्यस्य भावयतः स्वजनेषु प्रीत्यनुबन्धो न भवति। परजनेषु च द्वेषानु-
बन्धो नोपजायते। ततो निःसङ्गतामभ्युपगतो मोक्षायैव घटते।
§ ८०३. शरीरादन्यत्वचिन्तनमन्यत्वानुप्रेक्षा। तद्यथा—बन्धं प्रत्येकत्वे सत्यपि लक्षणभेदा-
दन्योऽहमैन्द्रियकं शरीरमै¹तीन्द्रियोऽहमज्ञं शरीरं ज्ञोऽहमनित्यं शरीरं नित्योऽहमाद्यन्तवच्छरीरमनाद्य-
नन्तोऽहम्। बहूनि मे शरीरशतसहस्राण्यतीतानि संसारे परिभ्रमतः। स एवाहमन्यस्तेभ्य इत्येवं ५
मे किमङ्ग, पुनर्बाह्येभ्यः परिग्रहेभ्यः। इत्येवं ह्यस्य मनः समाधानस्य शरीरादिषु स्पृहा नोत्पद्यते।
ततस्तत्त्वज्ञानभावनापूर्वके वैराग्यप्रकर्षे सति आत्यन्तिकस्य मोक्षसुखस्यावा²प्तिर्भवति।
§ ८०४. शरीरमिदमत्यन्ताशुचियोनिं³ शुक्रशोणिताशुचिसंवर्धितमवस्करवदशुचिभाजनं
त्वङ्‌मात्रप्रच्छादितमतिपूतिरसनिष्यन्दिस्रोतोबिलमङ्गारवदात्मभावमाश्रितमप्याश्वेवापादयति ।
स्नानानुलेपनधूपप्रघर्षवासमाल्यादिभिरपि न शक्यमशुचित्वमपहर्तु मस्य। सम्यग्दर्शनादि पुनर्भा- १०
व्यमानं जीवस्यात्यन्तिकां शुद्धिमाविर्भावयतीति तत्त्वतो भावनमशुचित्वानुप्रेक्षा। एवं ह्यस्य
संस्मरतः शरीरनिर्वेदो भवति। निर्विण्णश्च जन्मोदधितरणाय चित्तं समाधत्ते।
§ ८०५. आस्रवसंवरनिर्जराः पूर्वोक्ता अपि इहोपन्यस्यन्ते तद्‍गतगुणदोषभावनार्थम्। तद्यथा—
आस्रवा इहामुत्रापाययुक्ता महानदीस्रोतोवेगतीक्ष्णा इन्द्रियकषाया व्रतादयः। तत्रेन्द्रियाणि ताव-
त्स्पर्शनादीनि वनगजवायसपन्नगपतङ्गहरिणादीन् व्यसनार्णवमवगाहयन्ति तथा कषायादयोऽपीह १५
इस प्रकार चिन्तन करना एकत्वानुप्रेक्षा है। इस प्रकार चिन्तन करनेवाले इस जीवके स्वजनोंमें
प्रीतिका अनुबन्ध नहीं होता और परजनोंमें द्वेषका अनुबन्ध नहीं होता, इसलिए निःसंगताको
प्राप्त होकर मोक्षके लिए ही प्रयत्न करता है।
§ ८०३. शरीरसे अन्यत्वका चिन्तन करना अन्यत्वानुप्रेक्षा है। यथा—बन्धकी अपेक्षा अभेद
होनेपर भी लक्षणके भेदसे 'मैं' अन्य हूँ। शरीर ऐन्द्रियिक है, मैं अतीन्द्रिय हूँ। शरीर अज्ञ है, मैं २०
ज्ञाता हूँ। शरीर अनित्य है, मैं नित्य हूँ। शरीर आदि-अन्तवाला है और मैं अनाद्यनन्त हूँ। संसार-
में परिभ्रमण करते हुए मेरे लाखों शरीर अतीत हो गये। उनसे भिन्न वह ही मैं हूँ, इस प्रकार
शरीरसे भी जब मैं अन्य हूँ तब हे वत्स ! मैं बाह्य पदार्थोंसे भिन्न होऊँ तो इसमें क्या आश्चर्य ?
इस प्रकार मनको समाधान युक्त करनेवाले इसके शरीरादिकमें स्पृहा उत्पन्न नहीं होती है और
इससे तत्त्वज्ञानकी भावनापूर्वक वैराग्यका प्रकर्ष होनेपर आत्यन्तिक मोक्ष सुखकी प्राप्ति होती है। २५
§ ८०४. यह शरीर अत्यन्त अशुचि पदार्थोंका योनि है। शुक्र और शोणितरूप अशुचि
पदार्थोंसे वृद्धिको प्राप्त हुआ है, शौचगृहके समान अशुचि पदार्थोंका भाजन है। त्वचामात्रसे
आच्छादित है। अति दुर्गन्ध रसको बहानेवाला झरना है। अंगारके समान अपने आश्रयमें आये
हुए पदार्थको भी शीघ्र ही नष्ट करता है। स्नान, अनुलेपन, धूपका मालिश और सुगन्धिमाला
आदिके द्वारा भी इसकी अशुचिताको दूर कर सकना शक्य नहीं है किन्तु अच्छी तरह भावना ३०
किये गये सम्यग्दर्शन आदिक जीवकी आत्यन्तिक शुद्धिको प्रकट करते हैं। इस प्रकार वास्तविक-
रूपसे चिन्तन करना अशुचि अनुप्रेक्षा है। इस प्रकार चिन्तन करनेवाले इसके शरीरसे निर्वेद
होता है और निर्विण्ण होकर जन्मोदधिको तरनेके लिए चित्तको लगाता है।
§ ८०५. आस्रव, संवर और निर्जराका कथन पहले कर आये हैं तथापि उनके गुण और
दोषोंका विचार करनेके लिए यहाँ उनका फिरसे उपन्यास किया गया है। यथा—आस्रव इस लोक ३५
और परलोकमें दुःखदायी हैं। महानदीके प्रवाहके वेगके समान तीक्ष्ण हैं तथा इन्द्रिय, कषाय और
अव्रतरूप हैं। उनमें से स्पर्शनादिक इन्द्रियाँ वनगज, कौआ, सर्प, पतंग और हरिण आदिको दुःख-
१. – मनिन्द्रियो मु०, दि० १, दि० २, ता० । २. –स्याप्तिर्भ-मु० । ३. –न्ताशुचिशुक्रशोणितयोन्यशुचिसं-
मु० । –न्ताशुचिपूतिशुक्रशोणितसं – दि० १। –न्ताशुचिशुक्रशोणितसं–दि० २ । ४. तद्गुण-मु० ।
CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri