सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)
Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary
आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३१८ सर्वार्थसिद्धौ [ ९।७ § ८०६-
वधबन्धापयशःपरिक्लेशादीन् जनयन्ति । अमुत्र च नानागतिषु बहुविधदुःखप्रज्वलितासु परि२-
भ्रमयन्तीत्येवमास्रवदोषानुचिन्तनमास्रवानुप्रेक्षा । एवं ह्यस्य चिन्तयतः क्षमादिषु श्रेयस्त्वबुद्धिर्न
प्रच्यवते । सर्व एते आस्रवदोषाः कूर्मवत्संवृतात्मनो न भवन्ति ।
§ ८०६. यथा महार्णवे नावो विवर३पिधानेऽसति क्रमात् स्रुतजलाभिप्लवे सति तदाश्रयाणां
५ विनाशोऽवश्यंभावी, छिद्रपिधाने च निरुपद्रवमभिलषितदेशान्तरप्रापणं, तथा कर्मागमद्वारसंवरणे
सति नास्ति श्रेयःप्रतिबन्ध इति संवरगुणानुचिन्तनं संवरानुप्रेक्षा । एवं ह्यस्य चिन्तयतः संवरे
नित्योद्युक्तता भवति । ततश्च निःश्रेयसपदप्राप्तिरिति ।
§ ८०७. निर्जरा वेदनाविपाक४ इत्युक्तम् । सा द्वेधा — अबुद्धिपूर्वा कुशलमूला चेति । तत्र
नरकादिषु कर्मफलविपाकजा अबुद्धिपूर्वा सा अकुशलानुबन्धा । परिषहजये कृते कुशलमूला सा
१० शुभानुबन्धा निरनुबन्धा चेति । इत्येवं निर्जराया गुणदोषभावनं निर्जरानुप्रेक्षा । एवं ह्यस्यानुस्मरतः
कर्मनिर्जरायै प्रवृत्तिर्भवति ।
§ ८०८. लोकसंस्थानादिविधिर्व्याख्यातः । समन्तादनन्तस्यालोकाकाशस्य बहुमध्यदेश-
भाविनो लोकस्य संस्थानादिविधिर्व्याख्यातः । तत्स्वभावानुचिन्तनं लोकानुप्रेक्षा । एवं ह्यस्याध्य-
वस्यतस्तत्त्वज्ञानविशुद्धिर्भवति ।
१५ § ८०९. एकस्मिन्निगोतशरीरे जीवाः सिद्धानामनन्तगुणाः। एवं सर्वलोको निरन्तरं निचितः
रूप समुद्रमें अवगाहन कराती हैं। कषाय आदिक भी इस लोकमें वध, अपयश और क्लेशादिक
दुःखोंको उत्पन्न करते हैं, तथा परलोकमें नाना प्रकारके दुःखोंसे प्रज्वलित नाना गतियोंमें परि-
भ्रमण कराते हैं। इस प्रकार आस्रवके दोषोंका चिन्तन करना आस्रवानुप्रेक्षा है । इस प्रकार
चिन्तन करनेवाले इस जीवके क्षमादिकमें कल्याणरूप बुद्धिका त्याग नहीं होता है, तथा कछुएके
२० समान जिसने अपनी आत्माको संवृत कर लिया है उसके ये सब आस्रवके दोष नहीं होते हैं ।
§ ८०६. जिस प्रकार महार्णवमें नावके छिद्रके नहीं ढके रहनेपर क्रमसे झिरे हुए जलसे
व्याप्त होनेपर उसके आश्रयसे बैठे हुए मनुष्योंका विनाश अवश्यम्भावी है और छिद्रके ढँके रहनेपर
निरुपद्रवरूपसे अभिलषित देशान्तरका प्राप्त होना अवश्यम्भावी है उसी प्रकार कर्मागमके द्वारके
ढँके होनेपर कल्याणका प्रतिबन्ध नहीं होता । इस प्रकार संवरके गुणोंका चिन्तन करना संवरानु-
२५ प्रेक्षा है। इस प्रकार चिन्तन करनेवाले इस जीवके संवरमें निरन्तर उद्युक्तता होती है और इससे
मोक्षपदकी प्राप्ति होती है ।
§ ८०७ वेदना विपाकका नाम निर्जरा है यह पहले कह आये हैं। वह दो प्रकारकी है—
अबुद्धिपूर्वा और कुशलमूला। नरकादि गतियोंमें कर्मफलके विपाकसे जायमान जो अबुद्धिपूर्वा
निर्जरा होती है वह अकुशलानुबन्धा है। तथा परीषहके जीतनेपर जो निर्जरा होती है वह कुशल-
३० मूला निर्जरा है। वह शुभानुबन्धा और निरनुबन्धा होती है। इस प्रकार निर्जराके गुणदोषका
चिन्तन करना निर्जरानुप्रेक्षा है। इस प्रकार चिन्तन करने वाले इसकी कर्मनिर्जराके लिए प्रवृत्ति
होती है ।
§ ८०८. लोकसंस्थान आदिकी विधि पहले कह आये हैं। अर्थात् चारों ओरसे अनन्त
अलोकाकाशके बहुमध्यदेशमें स्थित लोकके संस्थान आदिकी विधि पहले कह आये हैं। उसके
३५ स्वभावका अनुचिन्तन करना लोकानुप्रेक्षा है। इस प्रकार विचार करनेवाले इसके तत्त्वज्ञानकी
विशुद्धि होती है।
§ ८०९. एक निगोदशरीरमें सिद्धोंसे अनन्तगुणे जीव हैं। इस प्रकार स्थावर जीवोंसे सब
१. -बन्धपरि-मु०, ता० । २. -तासु भ्रम-मु० । ३. विवरापिधाने सति मु० । ४. -पाकजा इत्यु-मु० ।
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