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सर्वकोश
सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary

आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

पृष्ठ 420, कुल 558 में से

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पृष्ठ 420

३०८ सर्वार्थसिद्धौ [ ८।२६ ६ ७८३ -
द्योतप्रशस्तविहायोगतयस्त्रसबादरपर्याप्तिप्रत्येकशरीरस्थिरशुभसुभगसुस्वरादेययशःकीर्तयो निर्माणं
तीर्थंकरनाम चेति । शुभमेकमुच्चैर्गोत्रं, सद्येद्यमिति । एता द्विचत्वारिंशत्प्रकृतयः 'पुण्य'संज्ञाः ।
अतोऽन्यत्पापम् ॥२६॥
§ ७८३. अस्मात्पुण्यसंज्ञिकर्मप्रकृतिसमूहादन्यत्कर्म 'पापम्' इत्युच्यते । तद् द्वयशीतिविधम् ।
तद्यथा—ज्ञानावरणस्य प्रकृतयः पञ्च दर्शनावरणस्य नव मोहनीयस्य षड्विंशतिः पञ्चान्तरायस्य
नरकगतितिर्यग्गती चतस्रो जातयः पञ्च संस्थानानि पञ्च संहननान्यप्रशस्तवर्णरसगन्धस्पर्शा
नरकगतितिर्यग्गत्यानुपूर्व्यद्वयमुपघातातपाप्रशस्तविहायोगतिस्थावरसूक्ष्मापर्याप्तिसाधारणशरीरास्थिरा-
शुभादुर्भगदुःस्वरानादेयायशःकीर्तयश्चेति नामप्रकृतयश्चतुस्त्रिंशत् । असद्वेद्यं नरकायुनींचैर्गोत्र-
मिति । एवं व्याख्यातः सप्रपञ्चो बन्धपदार्थः । अवधिमनःपर्ययकेवलज्ञानप्रत्यक्षप्रमाणगम्यस्तदुप-
दिष्टागमानुमेयः ।
इति तत्त्वार्थवृत्तौ सर्वार्थसिद्धिसंज्ञिकायामष्टमोऽध्यायः समाप्तः ॥८॥
उद्योत, प्रशस्तविहायोगति, त्रस, बादर, पर्याप्त, प्रत्येकशरीर, स्थिर, शुभ, सुभग, सुस्वर, आदेय,
यशःकीर्ति, निर्माण और तीर्थंकर । एक उच्च गोत्र शुभ है और सातावेदनीय ये बयालीस प्रकृतियाँ
पुण्यसंज्ञक हैं।
विशेषार्थ—यहाँ बयालीस पुण्य प्रकृतियाँ गिनायी हैं। प्रशस्त परिणामोंसे जिनमें अधिक
अनुभाग प्राप्त होता है वे पुण्य प्रकृतियाँ हैं। यह लक्षण इन प्रकृतियोंमें घटित होता है इसलिए ये
पुण्य प्रकृतियाँ मानी गयी हैं। बन्धकी अपेक्षा कुल प्रकृतियाँ १२० परिगणित की जाती हैं। इसी
अपेक्षासे यहाँ बयालीस संख्या निर्दिष्ट की गयी है। यहाँ वर्णादिकके अवान्तर भेद बीस न गिना
कर कुल चार भेद गिनाये हैं। तत्त्वार्थभाष्यकार आचार्य उमास्वातिने सम्यक्त्वप्रकृति, हास्य,
रति और पुरुषवेद इन चारकी भी पुण्यप्रकृतियोंमें परिगणना की है। तथा वीरसेन स्वामीने
जयधवला टीकामें भी इन्हें पुण्यप्रकृतियाँ सिद्ध किया है। इस प्रकार कुल पुण्यप्रकृतियाँ कितनी हैं
इसका निर्देश किया।
इनके सिवा शेष सब प्रकृतियाँ पापरूप हैं ॥२६॥
§ ७८३. इस पुण्यसंज्ञावाले कर्मप्रकृतिसमूहसे जो भिन्न कर्मसमूह है वह पापरूप कहा जाता
है। वह बयासी प्रकारका है। यथा-ज्ञानावरणकी पाँच प्रकृतियाँ, दर्शनावरणकी नौ प्रकृतियाँ,
मोहनीयकी छब्बीस प्रकृतियाँ, अन्तरायकी पाँच प्रकृतियाँ, नरकगति, तिर्यंचगति, चार जाति,
पाँच संस्थान, पाँच संहनन, अप्रशस्त वर्ण, अप्रशस्त रस, अप्रशस्त गन्ध और अप्रशस्त स्पर्श,
नरकगत्यानुपूर्वी और तिर्यग्गत्यानुपूर्वी ये दो, उपघात, अप्रशस्त विहायोगति, स्थावर, सूक्ष्म,
अपर्याप्ति, साधारणशरीर, अस्थिर, अशुभ, दुर्भग, दुस्वर, अनादेय और अयशःकीर्ति ये नामकर्मकी
चौंतीस प्रकृतियाँ, असाता वेदनीय, नरकायु और नीच गोत्र। इस प्रकार विस्तारके साथ बन्ध
पदार्थका व्याख्यान किया। यह अवधिज्ञान, मनःपर्ययज्ञान और केवलज्ञानरूप प्रत्यक्ष प्रमाणगम्य
है और इन ज्ञानवाले जीवों द्वारा उपदिष्ट आगमसे अनुमेय है।
विशेषार्थ-यहाँ पाप प्रकृतियाँ कौन-कौन हैं इनका नाम निर्देश किया गया है। अप्रशस्त
परिणामोंके निमित्तसे जिनमें अधिक अनुभाग प्राप्त होता है वे पाप प्रकृतियाँ हैं। यहाँ पाप प्रकृतियाँ
कुल बयासी गिनायी हैं। पाँच बन्धन और संघात इनका पाँच शरीरोंमें अन्तर्भाव हो जाता है तथा
मिश्रमोहनीय और सम्यक्त्वमोहनीय ये दो बन्ध प्रकृतियाँ नहीं हैं। और वर्णादि बीस प्रशस्त भी
होते हैं और अप्रशस्त भी। यही कारण है कि इन्हें पुण्य प्रकृतियोंमें भी गिनाया है और पाप
प्रकृतियोंमें भी। इस प्रकार कुल ८२ पाप प्रकृतियाँ होती हैं जिनका नामनिर्देश टीकामें किया ही है।
इस प्रकार सर्वार्थसिद्धिसंज्ञक तत्त्वार्थवृत्तिमें आठवाँ अध्याय समाप्त हुआ ॥८॥
CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri