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सर्वकोश
सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary

आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

पृष्ठ 423, कुल 558 में से

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पृष्ठ 423
  • ९।२ § ७८९ ] नवमोऽध्यायः ३११
    सुस्वरादेयनिर्माणतीर्थंकराख्या बध्यन्ते । तस्यैव चरमसमये चतस्रः प्रकृतयो हास्यरतिभयजुगुप्सा-
    संज्ञा बन्धमुपयान्ति । ता एतास्तीव्रकषायास्रवास्तदभावान्निर्दिष्टार्द्धभागादूर्ध्वं संव्रियन्ते । अनिवृत्ति-
    बादरसांपरायस्यादिसमयादारभ्य संख्येयेषु भागेषु पुंवेदक्रोधसंज्वलनौ बध्येते । तत ऊर्ध्वं
    शेषेषु संख्येयेषु भागेषु माने¹संज्वलनमायासंज्वलनौ बन्धमुपगच्छतः । तस्यैव चरमसमये लोभ-
    संज्वलनो बन्धमेति । ता एताः प्रकृतयो मध्यमकषायास्रवास्तदभावे निर्दिष्टस्य भागस्योपरिष्टा- ५
    त्संवरमाप्नुवन्ति । पञ्चानां ज्ञानावरणानां चतुर्णां दर्शनावरणानां यशःकीर्तेरुच्चैर्गोत्रस्य पञ्चा-
    नामन्तरायाणां च मन्दकषायास्रवाणां सूक्ष्मसांपरायो बन्धकः । तदभावादुत्तरत्र² तेषां संवरः ।
    केवलेनैव योगेन सद्धेद्यस्योपशान्तकषायक्षीणकषायसयोगानां बन्धो भवति । तदभावादयोगकेवलि-
    नस्तस्य संवरो भवति ।
    § ७८८. उक्तः संवरस्तद्धेतु³प्रतिपादनार्थमाह— १०
    स गुप्तिसमितिधर्मानुप्रेक्षापरीषहजयचारित्रैः ॥२॥
    § ७८९. यतः संसारकारणादात्मनो गोपनं भवति सा गुप्तिः । प्राणिपीडापरिहारार्थं
    गन्ध, रस, स्पर्श, देवगति प्रायोग्यानुपूर्वी, अगुरुलघु, उपघात, परघात, उच्छ्वास, प्रशस्त विहायो-
    गति, त्रस, बादर, पर्याप्त, प्रत्येकशरीर, स्थिर, शुभ, सुभग, सुस्वर, आदेय, निर्माण और तीर्थंकर
    ये तीस प्रकृतियां बन्धको प्राप्त होती हैं । तथा इसी गुणस्थानके अन्तिम समयमें हास्य, रति, १५
    भय और जुगुप्सा ये चार प्रकृतियां बन्धको प्राप्त होती हैं । ये तीव्र कषायसे आस्रवको प्राप्त होने-
    वाली प्रकृतियां हैं, इसलिए तीव्र कषायका उत्तरोत्तर अभाव होनेसे विवक्षित भागके आगे उनका
    संवर होता है । अनिवृत्ति बादर साम्परायके प्रथम समयसे लेकर उसके संख्यात भागोंमें पुंवेद
    और क्रोध संज्वलनका बन्ध होता है । इससे आगे शेष रहे संख्यात भागोंमें मान संज्वलन और
    माया संज्वलन ये दो प्रकृतियां बन्धको प्राप्त होती हैं और उसीके अन्तिम समयमें लोभ संज्वलन २०
    बन्धको प्राप्त होता है । इन प्रकृतियोंका मध्यम कषायके निमित्तसे आस्रव होता है, अतएव
    मध्यम कषायका उत्तरोत्तर अभाव होनेपर विवक्षित भागके आगे उनका संवर होता है । मन्द
    कषायके निमित्तसे आस्रवको प्राप्त होनेवाली पांच ज्ञानावरण, चार दर्शनावरण, यशःकीर्ति,
    उच्चगोत्र और पांच अन्तराय इन सोलह प्रकृतियोंका सूक्ष्मसाम्पराय जीव बन्ध करता है, अतः
    मन्द कषायका अभाव होनेसे आगे इनका संवर होता है । केवल योगके निमित्तसे आस्रवको प्राप्त २५
    होनेवाली असाता वेदनीयका उपशान्तकषाय, क्षीणकषाय और सयोगकेवली जीवोंके बन्ध होता
    है । योगका अभाव हो जानेसे अयोगकेवलीके उसका संवर होता है ।
    विशेषार्थ—संवर जीवनमें नये दोष और दोषोंके कारण एकत्रित न होने देनेका मार्ग है ।
    संवरके बाद ही संचित हुए दोषों व उनके कारणोंका परिमार्जन किया जा सकता है और तभी
    मुक्ति-लाभ होता है । साधारणतः वे दोष और उनके कारण क्या हैं यहाँ इनकी गुणस्थानक्रमसे ३०
    विस्तृत चर्चा की गयी है । प्राणीमात्रको इन्हें समझकर संवरके मार्गमें लगना चाहिए यह उक्त
    कथनका भाव है।
    § ७८८. संवरका कथन किया । अब उसके हेतुओंका कथन करनेके लिए आगेका सूत्र
    कहते हैं—
    वह संवर गुप्ति, समिति, धर्म, अनुप्रेक्षा, परिषहजय और चारित्रसे होता है ॥२॥ ३५
    § ७८९. जिसके बलसे संसारके कारणोंसे आत्माका गोपन अर्थात् रक्षा होती है वह गुप्ति
    १. मानमाया-मु० । २. -भावात्तु-मु० । ३. तद्भेदप्रति-मु० ।