सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary

आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

पृष्ठ 422, कुल 558 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 422

विहायोगतिदुर्भगदुःस्वरानादेयनीचैर्गोत्रसंज्ञिकानां पञ्चविंशतिप्रकृतीनामनन्तानुबन्धिकषायोदयकृता-
संयमप्रधानास्रवाणामेकेन्द्रियादयः सासादनसम्यग्दृष्ट्यन्ता बन्धकाः । तदभावे तासामुत्तरत्र संवरः ।
अप्रत्याख्यानावरणक्रोधमानमायालोभमनुष्यायुर्मनुष्यगत्यौदारिकशरीरतदङ्गोपाङ्गवज्रर्षभनाराच -
संहननमनुष्यगतिप्रायोग्यानुपूर्व्यनाम्नां दशानां प्रकृतीनामप्रत्याख्यानकषायोदयकृतासंयमहेतुका-
नामेकेन्द्रियादयोऽसंयतसम्यग्दृष्ट्यन्ता बन्धकाः । तदभावादूर्ध्वं तासां संवरः । सम्यङ्ममिथ्यात्वगुणे-
नायुर्न बध्यते । प्रत्याख्यानावरणक्रोधमानमायालोभानां चतसृणां प्रकृतीनां प्रत्याख्यानकषायोदय-
कारणासंयमास्रवाणामेकेन्द्रियप्रभृतयः संयतासंयतावसाना बन्धकाः । तदभावादुपरिष्टात्तासां
संवरः । प्रमादोपनीतस्य तदभावे निरोधः । प्रमादेनोपनीतस्य कर्मणः प्रमत्तसंयतादूर्ध्वं तदभावा-
न्निरोधः प्रत्येतव्यः । किं पुनस्तत् । असद्वेद्यारतिशोकास्थिराशुभायशःकीर्तिकल्पम् । देवायु-
र्बन्धस्यारम्भस्य प्रमाद एव हेतुरप्रमादोऽपि तत्प्रत्यासन्नः । तदूर्ध्वं तस्य संवरः । कषाय एवास्रवो यस्य
कर्मणो न प्रमादादिः तस्य तन्निरोधे निरास्रोऽवसेयः । स च कषायः प्रमादादिविरहितस्तीव्रमध्यम-
जघन्यभावेन त्रिषु गुणस्थानेषु व्यवस्थितः । तत्रापूर्वकरणस्यादौ संख्येयभागे द्वे कर्मप्रकृती
निद्राप्रचले बध्येते । तत ऊर्ध्वं संख्येयभागे त्रिंशत् प्रकृतयो देवगतिपञ्चेन्द्रियजातिवैक्रियिकाहार-
कतैजसकार्मणशरीरसमचतुरस्रसंस्थानवैक्रियिकाहारकशरीराङ्गोपाङ्गवर्णगन्धरसस्पर्शदेवगतिप्रायो -
ग्यानुपूर्व्यागुरुलघूपघातपरघातोच्छ्वासप्रशस्तविहायोगतित्रसबादरपर्याप्तप्रत्येकशरीरस्थिरशुभसुभग-
मध्यके चार संस्थान, मध्यके चार संहनन, तिर्यंचगतिप्रायोग्यानुपूर्वी, उद्योत, अप्रशस्त विहायो-
गति, दुर्भग, दुःस्वर, अनादेय और नीचगोत्र इन पचीस प्रकृतियोंका एकेन्द्रियसे लेकर सासादन-
सम्यग्दृष्टि गुणस्थान तकके जीव बन्ध करते हैं, अतः अनन्तानुबन्धीके उदयसे होनेवाले असंयमके
अभावमें आगे इनका सवर होता है । अप्रत्याख्यानावरण कषायके उदयसे होनेवाले असंयमकी
मुख्यतासे आस्रवको प्राप्त होनेवाली अप्रत्याख्यानावरण क्रोध, अप्रत्याख्यानावरण मान, अप्र-
त्याख्यानावरण माया, अप्रत्याख्यानावरण लोभ, मनुष्यायु, मनुष्यगति, औदारिकशरीर, औदारिक
अंगोपांग, वज्रर्षभनाराच संहनन और मनुष्यगतिप्रायोग्यानुपूर्वी इन दश प्रकृतियोंका एकेन्द्रियोंसे
लेकर असंयतसम्यग्दृष्टि गुणस्थान तकके जीव बन्ध करते हैं, अतः अप्रत्याख्यानावरण कषायके
उदयसे होनेवाले असंयमका अभाव होनेपर आगे इनका संवर होता है । सम्यग्मिथ्यात्व गुणके
होनेपर आयुकर्मका बन्ध नहीं होता यहाँ इतनी विशेष बात है । प्रत्याख्यानावरण कषायके उदयसे
होनेवाले असंयमसे आस्रवको प्राप्त होनेवाली प्रत्याख्यानावरण क्रोध, मान, माया और लोभ इन
चार प्रकृतियोंका एकेन्द्रियोंसे लेकर संयतासंयत गुणस्थान तकके जीव बन्ध करते हैं, अतः प्रत्या-
ख्यानावरण कषायके उदयसे होनेवाले असंयमके अभावमें आगे इनका संवर होता है । प्रमादके
निमित्तसे आस्रवको प्राप्त होनेवाले कर्मका उसके अभावमें संवर होता है। जो कर्म प्रमादके
निमित्तसे आस्रवको प्राप्त होता है उसका प्रमत्तसंयत गुणस्थानके आगे प्रमाद न रहनेके कारण
संवर जानना चाहिए। वह कर्म कौन है ? असातावेदनीय, अरति, शोक, अस्थिर, अशुभ और
अयशःकीर्तिरूप प्रकृतियोंके भेदसे वह कर्म छह प्रकारका है । देवायुके बन्धका आरम्भ प्रमादहेतुक
भी होता है और उसके नजदीकका अप्रमादहेतुक भी, अतः इसका अभाव होनेपर आगे उसका
संवर जानना चाहिए । जिस कर्मका मात्र कषायके निमित्तसे आस्रव होता है प्रमादादिकके निमित्त-
से नहीं उसका कषायका अभाव होनेपर संवर जानना चाहिए । प्रमादादिकके अभावमें होनेवाला
वह कषाय तीव्र, मध्यम और जघन्यरूपसे तीन गुणस्थानोंमें अवस्थित है । उनमेंसे अपूर्वकरण
गुणस्थानके प्रारम्भिक संख्येय भागमें निद्रा और प्रचला ये दो कर्मप्रकृतियाँ बन्धको प्राप्त होती
हैं। इससे आगे संख्येय भागमें देवगति, पंचेन्द्रिय जाति, वैक्रियिक शरीर, आहारक शरीर, तैजस
शरीर, कार्मण शरीर, समचतुरस्र संस्थान, वैक्रियिक शरीर अंगोपांग, आहारक शरीर अंगोपांग, वर्ण,