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सर्वकोश
सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary

आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

पृष्ठ 426, कुल 558 में से

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पृष्ठ 426

§ ७९७. किमर्थमिदमुच्यते । आद्यं प्रवृत्तिनिग्रहार्थम्, तत्रासमर्थानां प्रवृत्त्युपायप्रदर्शनार्थं
द्वितीयम् । इदं पुनर्दशविधधर्माख्यानं¹ समितिषु प्रवर्तमानस्य प्रमादपरिहारार्थं वेदितव्यम् । शरीर-
स्थितिहेतुमार्गणार्थं परकुलान्यु²पगच्छतो भिक्षोर्दुष्टजनाक्रोशप्रहसनावज्ञाताडनशरीरव्यापादनादीनां
संनिधाने कालुष्यानुत्पत्तिः क्षमा । जात्यादिमदावेशादभिमानाभावो मार्दवं माननिर्हरणम् ।
योगस्यावक्रता आर्जवम् । प्रकर्षप्राप्तलोभान्निवृत्तिः शौचम् । सत्सु प्रशस्तेषु जनेषु साधु वचनं
सत्यमित्युच्यते । ननु चैतद् भाषासमितावन्तर्भवति । नैष दोषः; समितौ प्रवर्तमानो मुनिः साधुष्व-
साधुषु च भाषाव्यवहारं कुर्वन् हितं मितं च ब्रूयात् अन्यथा रागादनर्थदण्डदोषः स्यादिति वाक्स-
मितिरित्यर्थः । इह पुनः सन्तः प्रव्रजितास्तद्भक्ता वा तेषु साधु सत्यं ज्ञानचारित्र³शिक्षणादिषु
बह्वपि कर्तव्यमित्यनुज्ञायते धर्मोपबृंहणार्थम् । समितिषु वर्तमानस्य प्राणीन्द्रियपरिहारस्संयमः ।
कर्मक्षयार्थं तप्यत इति तपः । तदुत्तरत्र वक्ष्यमाणं द्वादशविकल्पमवसेयम् । संयतस्य योग्यं ज्ञानादि-
दानं त्यागः । उपात्तेष्वपि शरीरादिषु संस्कारापोहाय ममेदमित्यभिसन्धिनिवृत्तिराकिंचन्यम् ।
नास्य⁴ किंचनास्तीत्याकिंचनः तस्य भावः कर्म वा आकिंचन्यम् । अनुभूताङ्गनास्मरणकथा-
श्रवणस्त्रीसंसक्तशयनासनादिवर्जनाद् ब्रह्मचर्यं परिपूर्णमवतिष्ठते । स्वतन्त्रवृत्तिनिवृत्त्यर्थो वा⁵ गुरुकुल-
§ ७९७. शंका—यह किसलिए कहा है ? समाधान—संवरका प्रथम कारण प्रवृत्तिका
निग्रह करनेके लिए कहा है। जो वैसा करनेमें असमर्थ हैं उन्हें प्रवृत्तिका उपाय दिखलानेके लिए
दूसरा कारण कहा है किन्तु यह दश प्रकारके धर्मका कथन समितियोंमें प्रवृत्ति करनेवालेके
प्रमादका परिहार करनेके लिए कहा है। शरीरकी स्थितिके कारणकी खोज करनेके लिए पर
कुलोंमें जाते हुए भिक्षुको दुष्ट जन गाली-गलौज करते हैं, उपहास करते हैं, तिरस्कार करते हैं,
मारते-पीटते हैं और शरीरको तोड़ते-मरोड़ते हैं तो भी उनके कलुषताका उत्पन्न न होना क्षमा
है। जाति आदि मदोंके आवेशवश होनेवाले अभिमानका अभाव करना मार्दव है। मार्दवका अर्थ
मानका नाश करना। योगोंका वक्र न होना आर्जव है। प्रकर्षप्राप्त लोभका त्याग करना शौच
है। अच्छे पुरुषोंके साथ साधु वचन बोलना सत्य है। शंका—इसका भाषासमितिमें अन्तर्भाव
होता है? समाधान—यह कोई दोष नहीं है, क्योंकि समितिके अनुसार प्रवृत्ति करनेवाला मुनि
साधु और असाधु दोनों प्रकारके मनुष्योंमें भाषाव्यवहार करता हुआ हितकारी परिमित वचन
बोले, अन्यथा राग होनेसे अनर्थदण्डका दोष लगता है यह वचनसमितिका अभिप्राय है। किन्तु
सत्य धर्मके अनुसार प्रवृत्ति करनेवाला मुनि सज्जन पुरुष, दीक्षित या उनके भक्तोंमें साधु सत्य
वचन बोलता हुआ भी ज्ञान चारित्रके शिक्षण आदिके निमित्तसे बहुविध कर्तव्योंकी सूचना देता
है और यह सब धर्मकी अभिवृद्धिके अभिप्रायसे करता है, इसलिए सत्य धर्मका भाषासमितिमें
अन्तर्भाव नहीं होता। समितियोंमें प्रवृत्ति करनेवाले मुनिके उनका परिपालन करनेके लिए जो
प्राणियोंका और इन्द्रियोंका परिहार होता है वह संयम है। कर्मक्षयके लिए जो तपा जाता है वह
तप है। वह आगे कहा जानेवाला बारह प्रकारका जानना चाहिए। संयतके योग्य ज्ञानादिका
दान करना त्याग है। जो शरीरादिक उपात्त हैं उनमें भी संस्कारका त्याग करनेके लिए 'यह
मेरा है' इस प्रकारके अभिप्रायका त्याग करना आकिंचन्य है। जिसका कुछ नहीं है वह अकिंचन
है और उसका भाव या कर्म आकिंचन्य है। अनुभूत स्त्रीका स्मरण न करनेसे, स्त्रीविषयक
कथाके सुननेका त्याग करनेसे और स्त्रीसे सटकर सोने व बैठनेका त्याग करनेसे परिपूर्ण ब्रह्मचर्य
१. -ख्यानं प्रवर्त्त-ता० । २. -न्युपयतो भिक्षो ता० । ३. -रित्रलक्षणा-मु० । ४. -नास्ति किंचनास्याकिं-
मु०, दि० १, दि० २ । ५. -कुलावा सो मु०, ता० ।