सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)
Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary
आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३१६ सर्वार्थसिद्धौ [ ९।७ ६ ८०१-
भवान्तरमनुगच्छन्ति । संविभक्तसुखदुःखः सुहृदोऽपि न मरणकाले परित्रायन्ते । बान्धवाः
समुदिताश्च रुजा परीतं न परिपालयन्ति । अस्ति चेत्सुचरितो धर्मो व्यसनमहार्णवे तरणोपायो
भवति । मृत्युना नीयमानस्य सहस्रनयनादयोऽपि न शरणम् । तस्माद् भवव्यसनसंकटे धर्म एव
शरणं सुहृदर्थोऽप्यनपायी, नान्यत्किञ्चिच्छरणमिति भावना अशरणानुप्रेक्षा । एवं ह्यस्याध्यवस्यतो
नित्यमशरणोऽस्मीति भृशमुद्विग्नस्य सांसारिकेषु भावेषु ममत्वविगमो भवति । भगवदर्हत्सर्वज्ञ-
प्रणीत एव मार्गे प्रयत्नौ भवति ।
§ ८०१. कर्मविपाकवशादात्मनो भवान्तरावाप्तिः संसारः । स पुरस्तात्पञ्चविधपरिवर्तन-
रूपेण व्याख्यातः । तस्मिन्ननेकयोनिकुलकोटिबहुलशतसहस्रसंकटे संसारे परिभ्रमन् जीवः कर्मयन्त्र-
प्रेरितः पिता भूत्वा भ्राता पुत्रः पौत्रश्च भवति । माता भूत्वा भगिनी भार्या दुहिता च भवति ।
स्वामी भूत्वा दासो भवति । दासो भूत्वा स्वाम्यपि भवति । नट इव रङ्गे । अथवा किं बहुना,
स्वयमात्मनः पुत्रो भवतीत्येवमादि संसारस्वभावचिन्तनं संसारानुप्रेक्षा । एवं ह्यस्य भावयतः
संसारदुःखभयादुद्विग्नस्य ततो निर्वेदो भवति । निर्विण्णश्च संसारप्रहाणाय प्रयतते ।
§ ८०२. जन्मजरामरणावृत्ति महादुःखानुभवनं प्रति एक एवाहं न कश्चिन्मे स्वः परो वा
विद्यते । एक एव जायेऽहम् । एक एव म्रिये । न मे कश्चित् स्वजनः परजनो वा व्याधिजरामरणा-
दीनि दुःखान्यपहरति । बन्धुमित्राणि श्मशानं नातिवर्तन्ते । धर्म एव मे सहायः सदा अनपायीति
नहीं जाता । जिन्होंने सुख और दुःखको समान रूपसे बाँट लिया है ऐसे मित्र भी मरणके समय
रक्षा नहीं कर सकते । मिलकर बन्धुजन भी रोगसे व्याप्त इस जीवकी रक्षा करनेमें असमर्थ होते
हैं। यदि सुचरित धर्म हो तो वह ही दुःखरूपी महासमुद्रमें तरनेका उपाय हो सकता है । मृत्युसे ले
जानेवाले इस जीवके सहस्रनयन आदि भी शरण नहीं है, इसलिए संसार विपत्तिरूप स्थानमें धर्म
ही शरण है। वही मित्र है और वही कभी भी न छूटनेवाला अर्थ है, अन्य कुछ शरण नहीं है इस
प्रकारकी भावना करना अशरणानुप्रेक्षा है । इस प्रकार विचार करनेवाले इस जीवके 'मैं सदा
अशरण हूँ' इस तरह अतिशय उद्विग्न होनेके कारण संसारके कारणभूत पदार्थोंमें ममता नहीं
रहती और वह भगवान् अरहंत सर्वज्ञ प्रणीत मार्गमें ही प्रयत्नशील होता है ।
§ ८०१. कर्मके विपाकके वशसे आत्माको भवान्तरकी प्राप्ति होना संसार है । उसका
पहले पाँच प्रकारके परिवर्तन रूपसे व्याख्यान कर आये हैं। अनेक योनि और कुल कोटिलाखसे
व्याप्त उस संसारमें परिभ्रमण करता हुआ यह जीव कर्मयन्त्रसे प्रेरित होकर पिता होकर भाई,
पुत्र और पौत्र होता है। माता होकर भगिनी, भार्या और लड़की होता है। स्वामी होकर दास
होता है तथा दास होकर स्वामी भी होता है । जिस प्रकार रंगस्थलमें नट नाना रूप धारण
करता है उस प्रकार यह होता है। अथवा बहुत कहनेसे क्या प्रयोजन, स्वयं अपना पुत्र होता है।
इत्यादि रूपसे संसारके स्वभावका चिन्तन करना संसारानुप्रेक्षा है । इस प्रकार चिन्तन करते हुए
संसारके दुःखके भयसे उद्विग्न हुए इसके संसारसे निर्वेद होता है और निर्विण्ण होकर संसारका
नाश करनेके लिए प्रयत्न करता है।
§ ८०२. 'जन्म, जरा और मरणकी आवृत्ति रूप महादुःखका अनुभवन करनेके लिए अकेला
ही मैं हूँ, न कोई मेरा स्व है और न पर है, अकेला ही मैं जन्मता हूँ और अकेला ही मरता हूँ।
मेरा कोई स्वजन या परजन व्याधि, जरा और मरण आदि दुःखोंको दूर नहीं करता । बन्धु और
मित्र श्मशानसे आगे नहीं जाते । धर्म ही मेरा कभी साथ न छोड़नेवाला सदा काल सहायक है।
१. ममत्वनिरासो भव-आ०, दि० १, दि० २, मु०, ना० । २. मार्गे प्रतिपन्नो भव-आ०, दि० १,
दि० २, मु० । ३. -यन्त्रानुप्रेरितः । ४. प्रतियतते मु० । ५. - मरणानुवृत्ति-मु० । ६. जायेऽहम् । एक
ता० । ७. श्मशानात् नाति-ता० ।