सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)
Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary
आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा
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- ९।६ § ७९६ ] नवमोऽध्यायः ३१३
§ ७९२. संवरहेतु¹ष्वादावुद्दिष्टाया गुप्तेः स्वरूपप्रतिपत्त्यर्थमाह—
सम्यग्योगनिग्रहो गुप्तिः ॥४॥
§ ७९३. योगो व्याख्यातः 'कायवाङ्मनःकर्म योगः' इत्यत्र। तस्य स्वेच्छाप्रवृत्तिनिवर्तनं
निग्रहः। विषयसुखाभिलाषार्थं ²प्रवृत्तिनिषेधार्थं सम्यग्विशेषणम्। तस्मात् सम्यग्विशेषणविशिष्टात् ५
संक्लेशाप्रादुर्भावपरात्कायादियोगनिरोधे सति तन्निमित्तं कर्म नास्रवतीति संवरप्रसिद्धिरवगन्तव्या।
सा त्रितयी कायगुप्तिर्वाग्गुप्तिर्मनोगुप्तिरिति।
§ ७९४. तत्राशक्तस्य मुनेर्निरवद्यप्रवृत्तिख्यापनार्थमाह—
ईर्याभाषैषणादाननिक्षेपोत्सर्गाः समितयः ॥५॥
§ ७९५. 'सम्यग्' इत्य³नुवर्तते। तेनेर्यादयो विशेष्यन्ते। सम्यगीर्या सम्यग्भाषा सम्यगेषणा
सम्यगादाननिक्षेपौ सम्यगुत्सर्ग इति। सा एताः पञ्च समितयो विदितजीवस्थानादिविधेर्मुनेः १०
प्राणिपीडापरिहाराभ्युपाया वेदितव्याः। तथा प्रवर्तमानस्यासंयमपरिणामनिमित्तकर्मास्रवात्संवरो
भवति।
§ ७९६. तृतीयस्य संवरहेतोर्धर्मस्य भेदप्रतिपत्त्यर्थमाह—
उत्तमक्षमामार्दवार्जवशौचसत्यसंयमतपस्त्यागाकिंचन्यब्रह्मचर्याणि धर्मः ॥६॥
§ ७९२. गुप्तिका संवरके हेतुओंके प्रारम्भमें निर्देश किया है, अतः उसके स्वरूपका कथन १५
करनेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
योगोंका सम्यक् प्रकारसे निग्रह करना गुप्ति है ॥४॥
§ ७९३. 'कायवाङ्मनःकर्म योगः' इस सूत्रमें योगका व्याख्यान कर आये हैं। उसकी
स्वच्छन्द प्रवृत्तिको रोकना निग्रह है। विषय-सुखकी अभिलाषाके लिए की जानेवाली प्रवृत्तिका
निषेध करनेके लिए 'सम्यक्' विशेषण दिया है। इस सम्यक् विशेषण युक्त संक्लेशको नहीं उत्पन्न २०
होने देने रूप योगनिग्रहसे कायादि योगोंका निरोध होने पर तन्निमित्तक कर्म आस्रव नहीं होता
है इसलिए संवरकी सिद्धि जान लेना चाहिए। वह गुप्ति तीन प्रकारकी है—कायगुप्ति, वचनगुप्ति
और मनोगुप्ति।
§ ७९४. अब गुप्तिके पालन करनेमें अशक्त मुनिके निर्दोष प्रवृत्तिकी प्रसिद्धिके लिए आगेका
सूत्र कहते हैं— २५
ईर्या, भाषा, एषणा, आदाननिक्षेप और उत्सर्ग ये पाँच समितियाँ हैं ॥५॥
§ ७९५. यहाँ 'सम्यक्' इस पदकी अनुवृत्ति होती है। उससे ईर्यादिक विशेष्यपनेको प्राप्त
होते हैं—सम्यगीर्या, सम्यग्भाषा, सम्यगेषणा, सम्यगादाननिक्षेप और सम्यगुत्सर्ग। इस प्रकार कही
गयी ये पाँच समितियाँ जीवस्थानादि विधिको जाननेवाले मुनिके प्राणियोंकी पीडाको दूर करनेके
उपाय जानने चाहिए। इस प्रकारसे प्रवृत्ति करनेवालेके असंयमरूप परिणामोंके निमित्तसे जो ३०
कर्मोंका आस्रव होता है उसका संवर होता है।
§ ७९६. तीसरा संवरका हेतु धर्म है। उसके भेदोंका ज्ञान करानेके लिए आगेका सूत्र
कहते हैं—
उत्तम क्षमा, उत्तम मार्दव, उत्तम आर्जव, उत्तम शौच, उत्तम सत्य, उत्तम संयम, उत्तम
तप, उत्तम त्याग, उत्तम आकिंचन्य और उत्तम ब्रह्मचर्य यह दस प्रकारका धर्म है ॥६॥ ३५
१. –हेतुत्वादा–। २. –पार्थप्रवृत्तिनियमनार्थं सम्य–ता०, ना०। ३. इति वर्तते ता०।
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CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri