सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)
Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary
आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा
§ २२२. विशुद्धिः प्रसादः। क्षेत्रं यत्रस्थान्भावान्प्रतिपद्यते। स्वामी प्रयोक्ता। विषयो ज्ञेयः।
तत्रावधेर्मनःपर्ययो विशुद्धतरः। कुतः सूक्ष्मविषयत्वात्। क्षेत्रमुक्तम्¹। विषयो वक्ष्यते। स्वामित्वं
प्रत्युच्यते। प्रकृष्टचारित्रगुणोपेतेषु वर्तते² प्रमत्तादिषु क्षीणकषायान्तेषु। तत्र चोत्पद्यमानः प्रवर्द्ध-
मानचारित्रेषु न हीयमानचारित्रेषु। प्रवर्द्धमानचारित्रेषु चोत्पद्यमानः सप्तविधान्यतमर्द्धिप्राप्तेषूप-
जायते नेतरेषु। ऋद्धिप्राप्तेषु केषुचिन्न सर्वेषु। ³इत्यस्यायं स्वामिविशेषो विशिष्टसंयमग्रहणं वा
वाक्ये प्रकृतम्। अवधिः पुनश्चातुर्गतिकेष्विति स्वामिभेदादप्यनयोर्विशेषः।
§ २२३. इदानीं केवलज्ञानलक्षणाभिधानं प्राप्तकालम्। तदुल्लङ्घ्य ज्ञानानां विषयनिबन्धः
परीक्ष्यते। कुतः। तस्य 'मोहक्षयाज्ज्ञानदर्शनावरणान्तरायक्षयाच्च केवलम्' इत्यत्र वक्ष्यमाणत्वात्।
यद्येवमाद्ययोरेव तावन्मतिश्रुतयोर्विषयनिबन्ध उच्यतामित्यत आह—
मतिश्रुतयोर्निबन्धो द्रव्येष्वसर्वपर्यायेषु ॥२६॥
§ २२४. निबन्धनं निबन्धः। कस्य। विषयस्य। तद्विषयग्रहणं कर्तव्यम्। न कर्तव्यम्।
प्रकृतं विषयग्रहणम्। क्व प्रकृतम्। 'विशुद्धिक्षेत्रस्वामिविषयेभ्यः' ४इत्यत्र। अतस्तस्यार्थवशादिह-
§ २२२. विशुद्धिका अर्थ निर्मलता है। जितने स्थानमें स्थित भावोंको जानता है वह क्षेत्र
है। स्वामीका अर्थ प्रयोक्ता है। विषय ज्ञेयको कहते हैं। सो इन दोनों ज्ञानोंमें अवधिज्ञानसे मनः-
पर्ययज्ञान विशुद्धतर है क्योंकि मनःपर्ययज्ञानका विषय सूक्ष्म है। क्षेत्रका कथन पहले कर आये हैं।
विषयका कथन आगे करेंगे। यहाँ स्वामीका विचार करते हैं—मनःपर्ययज्ञान प्रमत्तसंयतसे लेकर
क्षीणकषाय गुणस्थान तकके उत्कृष्ट चारित्रगुणसे युक्त जीवोंके ही पाया जाता है। वहाँ उत्पन्न
होता हुआ भी वह वर्द्धमान चारित्रवाले जीवोंके ही उत्पन्न होता है घटते हुए चारित्रवाले जीवोंके
नहीं। वर्धमान चारित्रवाले जीवोंमें उत्पन्न होता हुआ भी सात प्रकारकी ऋद्धियोंमें-से किसी एक
ऋद्धिको प्राप्त हुए जीवोंके ही उत्पन्न होता है अन्यके नहीं। ऋद्धिप्राप्त जीवोंमें भी किन्हींके ही
उत्पन्न होता है सबके नहीं, इस प्रकार सूत्रमें इसका स्वामीविशेष या विशिष्ट संयमका ग्रहण
प्रकृत है। परन्तु अवधिज्ञान चारों गतिके जीवोंके होता है, इसलिए स्वामियोंके भेदसे भी इनमें
अन्तर है।
विशेषार्थ—यों तो अवधिज्ञान और मनःपर्ययज्ञानमें मौलिक अन्तर है। अवधिज्ञान सीधे
तौरसे पदार्थोंको जानता है और मनःपर्ययज्ञान मनकी पर्यायरूपसे। फिर भी यहाँ अन्य आधारोंसे
इन दोनों ज्ञानोंमें अन्तर दिखलाया गया है। वे आधार चार हैं—द्रव्य, क्षेत्र, स्वामी और विषय।
§ २२३. अब केवलज्ञानका लक्षण कहनेका अवसर है किन्तु उसका कथन न कर पहले
ज्ञानोंके विषयका विचार करते हैं, क्योंकि केवलज्ञानका लक्षण 'मोहक्षयाज्ज्ञानदर्शनावरणान्त-
रायक्षयाच्च केवलम्' यहाँ कहेंगे। यदि ऐसा है तो सर्वप्रथम आदिमें आये हुए मतिज्ञान और
श्रुतज्ञानके विषयका कथन करना चाहिए। इसी बातको ध्यान में रखकर आगेका सूत्र कहते हैं—
मतिज्ञान और श्रुतज्ञानकी प्रवृत्ति कुछ पर्यायोंसे युक्त सब द्रव्योंमें होती है ॥२६॥
§ २२४. निबन्ध शब्दका व्युत्पत्तिलभ्य अर्थ है—निबन्धनं निबन्धः = जोड़ना, सम्बन्ध
करना। शंका—किसका सम्बन्ध ? समाधान—विषयका। शंका—तो सूत्रमें विषय पदका ग्रहण
करना चाहिए ? समाधान—नहीं करना चाहिए, क्योंकि विषय पदका ग्रहण प्रकरण प्राप्त है।
शंका—कहाँ प्रकरणमें आया है ? समाधान—'विषयक्षेत्रस्वामिविषयेभ्यः' इस सूत्रमें आया है।
१. मुक्तं विशेषो ब-मु० । २. -तेऽप्रम- मु०, दि० १, २ । ३. इत्यस्य स्वामिविशेषविशिष्टसंयमग्रहणं वाक्ये
कृतम् । अव-मु० ता०, ना० । ४. -येभ्य इत्यतस्त-दि० १, दि० २, आ०, मु० ।
- १।२८ § २२७ ] प्रथमोऽध्यायः ९३
भक्तिपरिणामो भवतीति विषयस्य' इत्यभिसंबध्यते । 'द्रव्येषु' इति बहुवचननिर्देशः सर्वेषां
जीवधर्माधर्म १कालाकाशपुद्गलानां संग्रहार्थः । तद्विशेषणार्थं 'असर्वपर्याय' ग्रहणम् । तानि द्रव्याणि
मतिश्रुतयोर्विषयभावमापद्यमानानि कतिपयैरेव पर्यायैर्विषयभावमास्कन्दन्ति न सर्वपर्यायैरनन्तैर-
पीति । अत्राह—धर्मास्तिकायादीन्यतीन्द्रियाणि तेषु मतिज्ञानं न प्रवर्तते । अतः सर्वद्रव्येषु मतिज्ञानं
वर्तत इत्ययुक्तम् । नैष दोषः ; अनिन्द्रियाख्यं करणमस्ति तदालम्बनो नोइन्द्रियावरणक्षयोपशम- ५
लब्धिपूर्वक उपयोगोऽवग्रहादिरूपः प्रागेवोपजायते । ततस्तत्पूर्वं श्रुतज्ञानं तद्विषयेषु स्वयोग्येषु
व्याप्रियते ।
§ २२५. अथ मतिश्रुतयोरनन्तरनिर्देशार्हस्यावधेः को विषयनिबन्ध इत्यत आह—
रूपिष्ववधेः ॥२७॥
§ २२६. 'विषयनिबन्धः' इत्यनुवर्तते । 'रूपिषु' इत्यनेन पुद्गलाः पुद्गलद्रव्यसंबन्धाश्च १०
जीवाः परिगृह्यन्ते । रूपिष्वेवावधेर्विषयनिबन्धो २नारूपिष्विति नियमः क्रियते । रूपिष्वपि भवन्न
सर्वपर्यायेषु, स्वयोग्येष्वेवेत्यवधारणार्थमसर्वपर्यायेष्वित्यभिसंबध्यते ।
§ २२७. अथ तदनन्तरनिर्देशभाजो मनःपर्ययस्य को विषयनिबन्ध इत्यत आह—
तदनन्तभागे मनःपर्ययस्य ॥२८॥
वहांसे 'विषय' पदको ग्रहण कर अर्थके अनुसार उसकी विभक्ति बदल ली गयी है, इसलिए १५
यहाँ षष्ठी विभक्तिके अर्थमें उसका ग्रहण हो जाता है । सूत्रमें 'द्रव्येषु' बहुवचनान्त पदका
निर्देश जीव, पुद्गल, धर्म, अधर्म, आकाश और काल इन सब द्रव्योंका संग्रह करनेके लिए
किया है । और इन सब द्रव्योंके विशेषण रूपसे 'असर्वपर्यायेषु' पदका ग्रहण किया है । वे सब
द्रव्य मतिज्ञान और श्रुतज्ञानके विषय भावको प्राप्त होते हुए कुछ पर्यायोंके द्वारा ही विषय-
भावको प्राप्त होते हैं, सब पर्यायोंके द्वारा नहीं और अनन्त पर्यायोंके द्वारा भी नहीं । २०
शंका—धर्मास्तिकाय आदि अतीन्द्रिय हैं । उनमें मतिज्ञानकी प्रवृत्ति नहीं हो सकती, अतः
'सब द्रव्योंमें मतिज्ञानकी प्रवृत्ति होती है' यह कहना अयुक्त है ? समाधान—यह कोई दोष
नहीं है, क्योंकि अनिन्द्रिय नामका एक करण है । उसके आलम्बनसे नोइन्द्रियावरण कर्मके
क्षयोपशमरूप लब्धिपूर्वक अवग्रह आदिरूप उपयोग पहले ही उत्पन्न हो जाता है, अतः तत्पूर्वक
होनेवाला श्रुतज्ञान अपने योग्य इन विषयोंमें व्यापार करता है । २५
§ २२५. मतिज्ञान और श्रुतज्ञानके अनन्तर निर्देशके योग्य अवधिज्ञानका विषय क्या है
आगे सूत्र द्वारा इसी बातको बतलाते हैं—
अवधिज्ञानकी प्रवृत्ति रूपी पदार्थोंमें होती है ॥२७॥
§ २२६. पिछले सूत्रसे 'विषयनिबन्धः' पदकी अनुवृत्ति होती है । 'रूपिषु' पद-द्वारा पुद्गलों
और पुद्गलोंमें बद्ध जीवोंका ग्रहण होता है । इस सूत्र-द्वारा 'रूपी पदार्थोंमें ही अवधिज्ञानका ३०
विषय सम्बन्ध है अरूपी पदार्थोंमें नहीं' यह नियम किया गया है । रूपी पदार्थोंमें होता हुआ भी
उनकी सब पर्यायोंमें नहीं होता किन्तु स्वयोग्य पर्यायोंमें ही होता है इस प्रकारका निश्चय करनेके
लिए 'असर्वपर्यायेषु' पदका सम्बन्ध होता है ।
§ २२७. अब इसके अनन्तर निर्देशके योग्य मनःपर्ययज्ञानका विषयसम्बन्ध क्या है इस
बातके बतलानेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं— ३५
मनःपर्ययज्ञानकी प्रवृत्ति अवधिज्ञानके विषयके अनन्तवें भागमें होती है ॥ २८ ॥
१. धर्माकाश-मु० । २. नारूपेष्विति मु० ।
९४ सर्वार्थसिद्धौ [ १।२९ § २२८ -
§ २२८. यदेतद्रूपि¹ द्रव्यं सर्वावधिज्ञानविषयत्वेन समर्थितं तस्यानन्तभागीकृतस्यैकस्मिन्भागे
मनःपर्ययः प्रवर्तते ।
§ २२९. अथान्ते यन्निर्द्दिष्टं केवलज्ञानं तस्य को विषयनिबन्ध इत्यत आह—
सर्वद्रव्यपर्यायेषु केवलस्य ॥२९॥
§ २३०. द्रव्याणि च पर्यायाश्च द्रव्यपर्याया इति इतरेतरयोगलक्षणो द्वन्द्वः । तद्विशेषणं
'सर्व'ग्रहणं प्रत्येकमभिसंबध्यते, सर्वेषु द्रव्येषु सर्वेषु पर्यायेष्विति । जीवद्रव्याणि तावदनन्ता-
नन्तानि ततोऽप्यनन्तानन्तानि पुद्गलद्रव्याणि च अणुस्कन्धभेदैर्भिन्नानि, धर्माधर्माकाशानि त्रीणि,
कालश्चासंख्येयस्तेषां पर्यायाश्च त्रिकालभुवः प्रत्येकमनन्तानन्तास्तेषु । द्रव्यं पर्यायजातं वा न
किंचित्केवलज्ञानस्य विषयाभावमतिक्रान्तमस्ति । अपरिमितमाहात्म्यं हि तदिति ज्ञापनार्थं
'सर्वद्रव्यपर्यायेषु' इत्युच्यते ।
§ २३१. आह विषयनिबन्धोऽवधृतो मत्यादीनाम् । इदं तु न निर्ज्ञातमेकस्मिन्नात्मनि स्वनि-
मित्तसंनिधानोपजनितवृत्तीनि ज्ञानानि यौगपद्येन कति भवन्तीत्युच्यते—
§ २२८. जो रूपी द्रव्य सर्वावधिज्ञानका विषय है उसके अनन्त भाग करनेपर उसके एक
भागमें मनःपर्ययज्ञान प्रवृत्त होता है ।
§ २२९. अब अन्तमें जो केवलज्ञान कहा है उसका विषय क्या है यह बतलानेके लिए
आगेका सूत्र कहते हैं—
केवलज्ञानकी प्रवृत्ति सब द्रव्य और उनकी सब पर्यायोंमें होती है ॥ २९ ॥
§ २३०. सूत्रमें आये हुए द्रव्य और पर्याय इन दोनों पदोंका इतरेतरयोग द्वन्द्वसमास है ।
तथा इन दोनोंके विशेषणरूपसे आये हुए 'सर्व' पदको द्रव्य और पर्याय इन दोनोंके साथ जोड़ लेना
चाहिए । यथा—सब द्रव्योंमें और सब पर्यायोंमें । जीव द्रव्य अनन्तानन्त हैं। पुद्गल द्रव्य इनसे
भी अनन्तानन्तगुणे हैं । जिनके अणु और स्कन्ध ये भेद हैं। धर्म, अधर्म और आकाश ये तीन
हैं और काल असंख्यात हैं। इन सब द्रव्योंकी पृथक्-पृथक् तीनों कालोंमें होनेवाली अनन्तानन्त
पर्यायें हैं। इन सबमें केवलज्ञानकी प्रवृत्ति होती है । ऐसा न कोई द्रव्य है और न पर्यायसमूह है
जो केवलज्ञानके विषयके परे हो। केवलज्ञानका माहात्म्य अपरिमित है इसी बातका ज्ञान करानेके
लिए सूत्रमें 'सर्वद्रव्यपर्यायेषु' पद कहा है ।
विशेषार्थ—यहाँ चार सूत्रोंमें पाँचों ज्ञानोंके विषयका निर्देश किया गया है। मतिज्ञान
और श्रुतज्ञान पाँचों इन्द्रियों और मनकी सहायतासे प्रवृत्त होते हैं यह तो स्पष्ट ही है इसलिए
इनका विषय मूर्तिक पदार्थ ही हो सकता है पर मन विकल्प-द्वारा रूपी और अरूपी सभी पदार्थों-
को जानता है इसीसे इन दोनों ज्ञानोंका विषय छहों द्रव्य और उनकी कुछ पर्यायोंको बतलाया है ।
अवधिज्ञान यद्यपि बाह्य सहायताके बिना प्रवृत्त होता है पर वह क्षायोपशमिक होनेसे उसका
विषय मूर्तिक पदार्थ ही हो सकता है। इसी कारणसे अवधिज्ञानका विषय रूपी पदार्थ कहा है ।
मनःपर्यय ज्ञान भी क्षायोपशमिक होता है, इसलिए उसका विषय यद्यपि रूपी पदार्थ ही है पर
यह रूपी पदार्थको मनकी पर्यायों-द्वारा ही ग्रहण करता है इससे इसका विषय अवधिज्ञानके
विषयके अनन्तवें भागप्रमाण कहा है तथा केवलज्ञान निरावरण होता है इसलिए उसका विषय
सब द्रव्य और उनकी सब पर्यायें हैं ऐसा कहा है ।
§ २३१. मत्यादिकके विषयसम्बन्धका निश्चय किया, किन्तु यह न जान सके कि एक
१. यद्रूपि-दि० १, दि० २ । २. भेदेन मि-मु० ।
- १३० ६ २३२ ] प्रथमोऽध्यायः ९५
एकादीनि भाज्यानि युगपदेकस्मिन्ना चतुर्भ्यः ॥३०॥
§ २३२. एकशब्दः संख्यावाची, आदिशब्दोऽवयववचनः । एक आदिर्येषां तानि इमान्येका-
दीनि । भाज्यानि विभक्तव्यानि । यौगपद्येनैकस्मिन्नात्मनि । आ कुतः । आ चतुर्भ्यः । तद्यथा-
एकं तावत्केवलज्ञानं, न तेन सहान्यानि क्षायोपशमिकानि युगपदवतिष्ठन्ते । द्वे मतिश्रुते । त्रीणि
मतिश्रुतावधिज्ञानानि, मतिश्रुतमनःपर्ययज्ञानानि वा । चत्वारि मतिश्रुतावधिमनःपर्ययज्ञानानि । ५
न पञ्च सन्ति, केवलस्यासहायत्वात् ।
आत्मामें एक साथ अपने-अपने निमित्तोंके मिलनेपर कितने ज्ञान उत्पन्न हो सकते हैं, इसी बातका
ज्ञान करानेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं-
एक आत्मामें एक साथ एकसे लेकर चार तक ज्ञान भजनासे होते हैं ॥ ३० ॥
§ २३२. 'एक' शब्द संख्यावाची है और 'आदि' शब्द अवयववाची है । जिनका आदि एक १०
है वे एकादि कहलाते हैं। 'भाज्यानि' का अर्थ 'विभाग करना चाहिए' होता है। तात्पर्य यह है
कि एक आत्मामें एक साथ एक ज्ञानसे लेकर चार ज्ञान तक हो सकते हैं। यथा-यदि एक ज्ञान
होता है तो केवलज्ञान होता है। उसके साथ दूसरे क्षायोपशमिक ज्ञान एक साथ नहीं रह सकते ।
दो होते हैं तो मतिज्ञान और श्रुतज्ञान होते हैं। तीन होते हैं तो मतिज्ञान, श्रुतज्ञान और अवधि-
ज्ञान या मतिज्ञान, श्रुतज्ञान और मनःपर्ययज्ञान होते हैं। तथा चार होते हैं तो मतिज्ञान, श्रुतज्ञान, १५
अवधिज्ञान और मनःपर्ययज्ञान होते हैं। एक साथ पाँच ज्ञान नहीं होते, क्योंकि केवलज्ञान
असहाय है।
विशेषार्थ-यहाँ एक साथ एक आत्मामें कमसे कम कितने और अधिकसे अधिक कितने
ज्ञान हो सकते हैं इस बातका निर्देश किया है। यह तो स्पष्ट है कि ज्ञान एक है अतः उसकी पर्याय
भी एक कालमें एक ही हो सकती है फिर भी यहाँ एक आत्मामें एक साथ कई ज्ञान होनेका निर्देश २०
किया है सो उसका कारण अन्य है। बात यह है कि जब ज्ञान निरावरण होता है तब तो उसमें
किसी प्रकारका भेद नहीं किया जा सकता है, अतएव ऐसो अवस्थामें एक केवलज्ञान पर्यायका ही
प्रकाश माना गया है। किन्तु संसार अवस्थामें जब ज्ञान सावरण होता है तब निमित्त भेदसे उसी
ज्ञानको कई भागोंमें विभक्त कर दिया जाता है। सावरण अवस्थामें जितने भो ज्ञान प्रकट होते हैं
वे सब क्षायोपशमिक ही होते हैं और क्षयोपशम एक साथ कई प्रकारका हो सकता है, इसलिए २५
सावरण अवस्थामें दो, तीन या चार ज्ञानकी सत्ता युगपत् मानो गयी है। पर इसका यह अर्थ
नहीं कि जब दो, तीन या चार ज्ञानकी सत्ता रहती है तब वे सब ज्ञान एक साथ उपयोगरूप हो
सकते हैं। उपयोग तो एक कालमें एक ही ज्ञानका होता है अन्य ज्ञान उस समय लब्धिरूपसे रहते
हैं। आशय यह है कि ऐसा कोई क्षण नहीं जब ज्ञानको कोई पर्याय प्रकट न हो। मतिज्ञान,
श्रुतज्ञान, अवधिज्ञान, मनःपर्ययज्ञान और केवलज्ञान ये सब ज्ञानकी पर्यायें हैं इसलिए इनमेंसे ३०
एक कालमें एक ही पर्यायका उदय रहता है। निरावरण अवस्थामें मात्र केवलज्ञान पर्यायका उदय
रहता है और सावरण अवस्थामें प्रारम्भकी चार पर्यायोंमेंसे एक कालमें किसी एक पर्यायका
उदय रहता है फिर भी तब युगपत् दो, तीन और चार ज्ञानोंकी सत्ताके माननेका कारण एकमात्र
निमित्तभेद है। जब मति और श्रुत इन दो पर्यायोंके प्रकट होनेका निमित्त उपस्थित रहता है तब
युगपत् दो ज्ञानोंका सद्भाव कहा जाता है। जब मति, श्रुत और अवधि या मति, श्रुत और ३५
मनःपर्यय इन तीन पर्यायोंके प्रकट होनेका निमित्त उपस्थित रहता है तब युगपत् तीन ज्ञानोंका
सद्भाव कहा जाता है और जब मति आदि चार पर्यायोंके प्रकट होनेका निमित्त उपस्थित रहता
है तब युगपत् चार ज्ञानोंका सद्भाव माना जाता है। यही कारण है कि प्रकृत सूत्रमें एक साथ
एक आत्माके एक, दो, तीन या चार ज्ञान हो सकते हैं यह कहा है।
९६ सर्वार्थसिद्धौ [ १।३१ § २३३ -
§ २३३. अथ यथोक्तानि मत्यादीनि ज्ञानव्यपदेशमेव लभन्ते उतान्यथापीत्यत आह—
मतिश्रुतावधयो विपर्ययश्च१ ॥ ३१ ॥
§ २३४. विपर्ययो मिथ्येत्यर्थः । कुतः । सम्यगधिकारात् । 'च'शब्दः समुच्चयार्थः ।
विपर्ययश्च सम्यक्चेति । कुतः पुनरेषां विपर्ययः । मिथ्यादर्शनेन सहैकार्थसमवायात् सरजस्क-
कटुकालाबुगतदुग्धवत् । ननु च तत्राधारदोषाद् दुग्धस्य रसविपर्ययो भवति । न च तथा मत्यज्ञा-
नादीनां विषयग्रहणे विपर्ययः । तथा हि, सम्यग्दृष्टिर्यथा चक्षुरादिभी रूपादीनुपलभते तथा
मिथ्यादृष्टिरपि२ मत्यज्ञानेन । यथा च सम्यग्दृष्टिः श्रुतेन रूपादीन् जानाति निरूपयति च तथा
मिथ्यादृष्टिरपि श्रुताज्ञानेन । यथा चावधिज्ञानेन सम्यग्दृष्टिः रूपिणोऽर्थानवगच्छति तथा मिथ्या-
दृष्टिर्विभङ्गज्ञानेनेति ।
§ २३५. अत्रोच्यते—
३सदसतोरविशेषाद्यदृच्छोपलब्धेरुन्मत्तवत् ॥ ३२ ॥
§ २३६. सद्दिद्यमानमसदविद्यमानमित्यर्थः । तयोरविशेषेण यदृच्छया उपलब्धेर्विपर्ययो
भवति । कदाचिद्रूपादि संदप्यसदिति प्रतिपद्यते, असदपि सदिति, कदाचित्सत्सदेव, असदप्यसदेवेति
मिथ्यादर्शनोदयादध्यवस्यति । यथा पित्तोदयाकुलितबुद्धिर्मातरं भार्येति, भार्यामपि मातेति मन्यते ।
§ २३३. अब यथोक्त मत्यादिक ज्ञान व्यपदेशको ही प्राप्त होते हैं या अन्यथा भी होते हैं इस
बातका ज्ञान करानेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
मति, श्रुत और अवधि ये तीन विपर्यय भी हैं ॥ ३१ ॥
§ २३४. विपर्ययका अर्थ मिथ्या है, क्योंकि सम्यग्दर्शनका अधिकार है । 'च' शब्द समु-
च्चयरूप अर्थमें आया है । इससे यह अर्थ होता है कि मति, श्रुत और अवधि विपर्यय भी हैं और
समीचीन भी । शंका—ये विपर्यय क्यों हैं ? —समाधान—क्योंकि मिथ्यादर्शनके साथ एक आत्मामें
इनका समवाय पाया जाता है । जिस प्रकार रज सहित कड़वी तूंबड़ीमें रखा हुआ दूध कड़वा हो
जाता है उसी प्रकार मिथ्यादर्शनके निमित्तसे ये विपर्यय होते हैं । कड़वी तूंबड़ीमें आधारके दोषसे
दूधका रस मीठेसे कड़वा हो जाता है, यह स्पष्ट है किन्तु उस प्रकार मत्यादि ज्ञानोंकी विषयके
ग्रहण करनेमें विपरीतता नहीं मालूम होती । खुलासा इस प्रकार है—जिस प्रकार सम्यग्दृष्टि चक्षु
आदिके द्वारा रूपादिक पदार्थोंको ग्रहण करता है उसी प्रकार मिथ्यादृष्टि भी । जिस प्रकार
सम्यग्दृष्टि श्रुतके द्वारा रूपादि पदार्थोंको जानता है और उनका निरूपण करता है उसी प्रकार
मिथ्यादृष्टि भो श्रुतज्ञानके द्वारा रूपादिक पदार्थोंको जानता है और उनका निरूपण करता है ।
जिस प्रकार सम्यग्दृष्टि अवधिज्ञानके द्वारा रूपी पदार्थोंको जानता है उसी प्रकार मिथ्यादृष्टि भी
विभंग ज्ञानके द्वारा रूपी पदार्थोंको जानता है ।
§ २३५. यह एक प्रश्न है जिसका समाधान करनेके लिए अगला सूत्र कहते हैं ।
वास्तविक और अवास्तविकके अन्तरके बिना यदृच्छोपलब्धि ( जब जैसा जी में आया
उस रूप ग्रहण होने ) के कारण उन्मत्तकी तरह ज्ञान भी अज्ञान ही है ॥ ३२ ॥
§ २३६. प्रकृतमें 'सत्' का अर्थ विद्यमान और 'असत्' का अर्थ अविद्यमान है । इनकी
विशेषता न करके इच्छानुसार ग्रहण करनेसे विपर्यय होता है । कदाचित् रूपादिक विद्यमान हैं तो
१. विपर्ययो मिथ्याज्ञानमतद्रूपप्रतिष्ठम् । पा० यो० सू० १, ८ । २. -रपि । यथा दि० १, दि० २, आ० ।
३. 'सदसदविसेसणाओ भवहेजउदिच्छिओवलम्भाओ । नाणफलाभावाओ मिच्छदिट्ठिस्स अण्णाणं ।'-वि० भा०
गा० ११५ ।
Here is the line-by-line transcription of the Sanskrit text, Hindi translation/commentary, and footnotes from the image:
– १३२ § २३९ ] प्रथमोऽध्यायः ९७
यदृच्छया$^१$ यदापि मातरं मातैवेति भार्यामपि भार्यैवेति च तदापि न तत्सम्यग्ज्ञानम् । एवं
मत्यादीनामपि रूपादिषु विपर्ययो वेदितव्यः। तथा हि, कश्चिन्मिथ्यादर्शनपरिणाम आत्मन्यवस्थितो
रूपाद्युपलब्धौ सत्यामपि कारणविपर्यास भेदाभेदविपर्यास स्वरूपविपर्यास च जनयति ।
§ २३७. कारणविपर्यासस्तावद्—रूपादीनामेकं कारणममूर्त्तं नित्यमिति केचित्प्रकल्पयन्ति ।$^३$
अपरे पृथिव्यादिजातिभिन्नाः परमाणवश्चतुस्त्रिद्व्येकगुणास्तुल्यजातीयानां कार्याणामारम्भका ५
इति । $^४$अन्ये वर्णयन्ति—पृथिव्यादीनि चत्वारि भूतानि, भौतिकधर्मा वर्णगन्धरसस्पर्शाः, एतेषां
समुदायो रूपपरमाणुरष्टक इत्यादि । $^५$इतरे $^६$वर्णयन्ति—पृथिव्यप्तेजोवायवः काठिन्यादिद्रवत्वा-
द्युष्णत्वादीरणत्वादिगुणा$^७$ जातिभिन्नाः परमाणवः कार्यस्यारम्भकाः ।
§ २३८. भेदाभेदविपर्यासः 'कारणात्कार्यमर्थान्तरभूतमेवेति $^८$अनर्थान्तरभूतमेवेति च १०
परिकल्पना ।
§ २३९. स्वरूपविपर्यासौ रूपादयो निर्विकल्पाः$^१$$^०$ सन्ति न सन्त्येव$^१$$^१$ वा। तदाकारपरिणतं
विज्ञानमेव$^१$$^२$। न च तदालम्बनं वस्तु बाह्यमिति । एवमन्यानपि परिकल्पनाभेदान् दृष्टेष्टविरुद्धा-
भी उन्हें अविद्यमान मानता है। और कदाचित् अविद्यमान वस्तुको भी विद्यमान कहता है। कदा-
चित् सत्को सत् और असत्को असत् ही मानता है। यह सब निश्चय मिथ्यादर्शनके उदयसे होता
है। जैसे पित्तके उदयसे आकुलित बुद्धिवाला मनुष्य माताको भार्या और भार्याको माता मानता १५
है। जब अपनी इच्छाकी लहरके अनुसार माताको माता और भार्या भार्याको ही मानता है
तब भी वह ज्ञान सम्यग्ज्ञान नहीं है। इसी प्रकार मत्यादिकका भी रूपादिकमें विपर्यय जानना
चाहिए। खुलासा इस प्रकार है- आत्मामें स्थित कोई मिथ्यादर्शनरूप परिणाम रूपादिककी
उपलब्धि होनेपर भी कारणविपर्यास, भेदाभेदविपर्यास और स्वरूपविपर्यासको उत्पन्न करता
रहता है। २०
§ २३७. कारणविपर्यास यथा-कोई मानते हैं कि रूपादिकका एक कारण है जो अमूर्त्त
और नित्य है। कोई मानते हैं कि पृथिवी जातिके परमाणु अलग हैं जो चार गुणवाले हैं। जल
जातिके परमाणु अलग हैं जो तीन गुणवाले हैं। अग्नि जातिके परमाणु अलग हैं जो दो गुणवाले हैं
और वायु जातिके परमाणु अलग हैं जो एक गुणवाले हैं। तथा ये परमाणु अपने समान जातीय
कार्यको ही उत्पन्न करते हैं। कोई कहते हैं कि पृथिवी आदि चार भूत हैं और इन भूतोंके वर्ण, २५
गन्ध, रस और स्पर्श ये भौतिक धर्म हैं। इन सबके समुदायको एक रूप परमाणु या अष्टक कहते
हैं। कोई कहते हैं कि पृथिवी, जल, अग्नि और वायु ये क्रमसे काठिन्यादि, द्रवत्वादि, उष्णत्वादि
और ईरणत्वादि गुणवाले अलग-अलग जातिके परमाणु होकर कार्यको उत्पन्न करते हैं।
§ २३८. भेदाभेदविपर्यास यथा - कारणसे कार्यको सर्वथा भिन्न या सर्वथा अभिन्न मानना।
§ २३९. स्वरूपविपर्यास यथा-रूपादिक निर्विकल्प हैं, या रूपादिक हैं ही नहीं, या ३०
रूपादिकके आकाररूपसे परिणत हुआ विज्ञान ही है उसका आलम्बनभूत और कोई बाह्य पदार्थ
नहीं है। इसी प्रकार मिथ्यादर्शनके उदयसे ये जीव प्रत्यक्ष और अनुमानके विरुद्ध नाना प्रकारकी
कल्पनाएँ करते हैं और उनमें श्रद्धान उत्पन्न करते हैं। इसलिए इनका यह ज्ञान मत्यज्ञान,
श्रुताज्ञान या विभंग ज्ञान होता है। किन्तु सम्यग्दर्शन तत्त्वार्थ के ज्ञानमें श्रद्धान उत्पन्न करता है
अतः इस प्रकारका ज्ञान मतिज्ञान, श्रुतज्ञान और और अवधिज्ञान होता है। ३५
१. -च्छया मातरं मु०, ता०, ना० । २. सांख्याः । ३. नैयायिकाः । ४. बौद्धाः । ५. लौकायतिकः ।
६. -तरे कल्पयन्ति पथि- आ०, दि० १ । ७. -णत्त्वादिगमनादिगुणा आ०, दि० १, दि० २ । ८. नैयायिकाः ।
९. सांख्याः । १०. बौद्धाः । ११. नैयायिकाः । १२. योगाचाराः ।
१३
९८ सर्वार्थसिद्धौ [ १।३३ § २४० -
न्मिथ्यादर्शनोदयात्कल्पयन्ति तत्र च श्रद्धानमुत्पादयन्ति । ततस्तन्मत्यज्ञानं श्रुताज्ञानं १विभङ्गज्ञानं
च भवति । सम्यग्दर्शनं पुनस्तत्त्वार्थाधिगमे श्रद्धानमुत्पादयति । ततस्तन्मतिज्ञानं श्रुतज्ञान-
मवधिज्ञानं च भवति ।
§ २४०. आह प्रमाणं द्विप्रकारं वर्णितम् । प्रमाणैकदेशाश्च नयास्तदनन्तरोद्देशभाजो निर्दे-
ष्टव्या इत्यत आह—
नैगमसंग्रहव्यवहारर्जुसूत्रशब्दसमभिरूढैवंभूता नयाः ॥ ३३ ॥
§ २४१. एतेषां सामान्यविशेषलक्षणं वक्तव्यम् । सामान्यलक्षणं तावद्वस्तुन्यनेकान्तात्मन्य-
विरोधेन हेत्वर्पणात्साध्यविशेषस्य याथात्म्यप्रापणप्रवणः२ प्रयोगो नयः । स द्वेधा द्रव्यार्थिकः
पर्यायार्थिकश्चेति । द्रव्यं सामान्यमुत्सर्गः अनुवृत्तिरित्यर्थः । तद्विषयो द्रव्यार्थिकः । पर्यायो विशेषो-
ऽपवादो व्यावृत्तिरित्यर्थः । तद्विषयः पर्यायार्थिकः । तयोर्भेदा नैगमादयः ।
§ २४२. तेषां विशेषलक्षणमुच्यते—अनभिनिर्वृत्तार्थसंकल्पमात्रग्राही नैगमः । कंचित्पुरुषं
परिगृहीतपरशुं गच्छन्तमवलोक्य कश्चित्पृच्छति किमर्थं भवान्गच्छतीति । स आह प्रस्थमानेतु-
मिति । नासौ तदा प्रस्थपर्यायः संनिहितः । तदभिनिर्वृत्तये संकल्पमात्रे प्रस्थव्यवहारः । तथा
विशेषार्थ—यहाँपर प्रारम्भके तीन ज्ञान विपर्यय होते हैं यह बतलाकर वे विपर्यय क्यों होते
हैं यह बतलाया गया है । संसारी जीवकी श्रद्धा विपरीत और समीचीनके भेदसे दो प्रकारकी होती
है । विपरीत श्रद्धावाले जीवको विश्वका यथार्थ ज्ञान नहीं होता । वह जगत्में कितने पदार्थ हैं
उनका स्वरूप क्या है यह नहीं जानता । आत्मा और परमात्माके स्वरूप बोधसे तो वह सर्वथा
वंचित रहता है । वह घटको घट और पटको पट ही कहता है पर जिन तत्त्वोंसे इनका निर्माण
होता है उनका इसे यथार्थ बोध नहीं होने पाता । यही कारण है कि जीवकी श्रद्धाके अनुसार ज्ञान
भी समीचीन ज्ञान और मिथ्या ज्ञान इन दो भागोंमें विभक्त हो जाता है । यथार्थ श्रद्धाके होनेपर
जो ज्ञान होते हैं उन्हें समीचीन ज्ञान कहते हैं और यथार्थ श्रद्धाके अभावमें होनेवाले ज्ञानोंका नाम
ही मिथ्या ज्ञान है । ऐसे मिथ्या ज्ञान तीन माने गये हैं—कुमति ज्ञान, कुश्रुत ज्ञान और विभंग
ज्ञान । ये ही तीन ज्ञान मिथ्या होते हैं अन्य नहीं, क्योंकि ये ज्ञान विपरीत श्रद्धावालेके भी पाये
जाते हैं । विपरीत श्रद्धा क्यों होती है इसका निर्देश मूल टीकामें किया ही है ।
§ २४०. दो प्रकारके प्रमाणका वर्णन किया । प्रमाणके एकदेशको नय कहते हैं । इनका
कथन प्रमाणके अनन्तर करना चाहिए, अतः आगेका सूत्र कहते हैं—
नैगम, संग्रह, व्यवहार, ऋजुसूत्र, शब्द, समभिरूढ और एवंभूत ये सात नय हैं ॥३३॥
२४१. इनका सामान्य और विशेष लक्षण कहना चाहिए । सामान्य लक्षण—अनेकान्तात्मक
वस्तुमें विरोधके बिना हेतुकी मुख्यतासे साध्यविशेषकी यथार्थताके प्राप्त करानेमें समर्थ प्रयोगको
नय कहते हैं । इसके दो भेद हैं-द्रव्यार्थिक और पर्यायार्थिक । द्रव्यका अर्थ सामान्य, उत्सर्ग और
अनुवृत्ति है और इसको विषय करनेवाला नय द्रव्यार्थिक नय कहलाता है । तथा पर्यायका अर्थ
विशेष, अपवाद और व्यावृत्ति है और इसको विषय करनेवाला नय पर्यायार्थिक नय कहलाता है ।
इन दोनों नयोंके उत्तर भेद नैगमादिक हैं ।
§ २४२. अब इनका विशेष लक्षण कहते हैं—अनिष्पन्न अर्थमें संकल्पमात्रको ग्रहण करने-
वाला नय नैगम है । यथा–हाथमें फरसा लेकर जाते हुए किसी पुरुषको देखकर कोई अन्य पुरुष
पूछता है आप किस कामके लिए जा रहे हैं । वह कहता है प्रस्थ लानेके लिए जा रहा हूँ । उस
समय वह प्रस्थ पर्याय संनिहित नहीं है, केवल उसके बनानेका संकल्प होनेसे उसमें प्रस्थ व्यवहार
१. -ज्ञानमवध्यज्ञा-मु० । २. -वणप्रयो-मु० ।
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- १३३ § २४४ ] प्रथमोऽध्यायः ९९
एधोदकाद्याहरणे व्यापिप्रमाणं कश्चित्पृच्छति किं करोति भवानिति । स आह ओदनं पचामीति ।
न तदौदनपर्यायः संनिहितः, तदर्थे व्यापारे स प्रयुज्यते । एवं प्रकारो लोकसंव्यवहारः अनभिनि-
वृत्ताऽर्थसंकल्पमात्रविषयो नैगमस्य गोचरः ।
§ २४३. स्वजात्यविरोघेनैकध्यमुपानीय पर्यायानाक्रान्तभेदानविशेषेण समस्तग्रहणात्संग्रहः ।
सत्, द्रव्यं, घट इत्यादि । सदित्युक्ते सदिति वाग्विज्ञानानुवृत्तिलिङ्गाऽनुमितसत्ताधारभूतानाम- ५
विशेषेण सर्वेषां संग्रहः । द्रव्यमित्युक्तेऽपि द्रवति गच्छति तांस्तान्पर्यायानित्युपलक्षितानां जीवाजीव-
तद्भेदप्रभेदानां संग्रहः । तथा घट इत्युक्तेऽपि घटबुद्ध्यभिधानानुगमलिङ्गाऽनुमितसकलार्थसंग्रहः ।
एवं प्रकारोऽन्योऽपि संग्रहनयस्य १विषयः ।
§ २४४. संग्रहनयाक्षिप्तानामर्थानां विधिपूर्वक्रमवहरणं व्यवहारः । को विधिः । यः संग्रह-
गृहीतोऽर्थस्तदानुपूर्येणैव व्यवहारः प्रवर्तत इत्ययं विधिः । तद्यथा—सर्वसंग्रहेण २यत्तत्त्वं गृहीतं १०
तच्चानपेक्षितविशेषं नालं संव्यवहारायेति व्यवहारनय आश्रीयते । यत्सत्तद् द्रव्यं गुणो वेति ।
द्रव्येणापि संग्रहाक्षिप्तेन जीवाजीवविशेषानपेक्षेण न शक्यः संव्यवहार इति जीवद्रव्यममजीवद्रव्य-
मिति वा व्यवहार आश्रीयते । जीवाजीवावपि ३ च संग्रहाक्षिप्तौ नालं संव्यवहारायेति प्रत्येकं
देवनारकादिर्घटादिश्च व्यवहारेणाश्रीयते । एवमयं नयस्तावद्वर्तते यावत्पुनर्नास्ति विभागः ।
किया गया है। तथा ईंधन और जल आदिके लानेमें लगे हुए किसी पुरुषसे कोई पूछता है कि १५
आप क्या कर रहे हैं। उसने कहा भात पका रहा हूँ। उस समय भात पर्याय सन्निहित नहीं है,
केवल भातके लिए किये गये व्यापारमें भातका प्रयोग किया गया है। इस प्रकारका जितना लोक-
व्यवहार अनिष्पन्न अर्थके आलम्बनसे संकल्पमात्रको विषय करता है वह सब नैगम नयका
विषय है।
§ २४३. भेदसहित सब पर्यायोंको अपनी जातिके अविरोध-द्वारा एक मानकर सामान्यसे २०
सबको ग्रहण करनेवाला नय संग्रहनय है। यथा- सत्, द्रव्य और घट आदि। 'सत्' ऐसा कहनेपर
सत् इस प्रकारके वचन और विज्ञानकी अनुवृत्तिरूप लिंगसे अनुमित सत्ताके आधारभूत सब पदार्थों
का सामान्य रूपसे संग्रह हो जाता है। 'द्रव्य' ऐसा कहनेपर भी 'उन-उन पर्यायोंको द्रवता है
अर्थात् प्राप्त होता है' इस प्रकार इस व्युत्पत्तिसे युक्त जीव, अजीव और उनके सब भेद-प्रभेदोंका
संग्रह हो जाता है। तथा 'घट' ऐसा कहनेपर भी घट इस प्रकारकी बुद्धि और घट इस प्रकारके २५
शब्दकी अनुवृत्तिरूप लिंगसे अनुमित सब घट पदार्थोंका संग्रह हो जाता है। इस प्रकार अन्य भी
संग्रह नयका विषय है।
§ २४४. संग्रह नयके द्वारा ग्रहण किये गये पदार्थोंका विधिपूर्वक अवहरण अर्थात् भेद करना
व्यवहार नय है। शंका--विधि क्या है ? समाधान--जो संग्रह नयके द्वारा गृहीत अर्थ है उसीके
आनुपूर्वी क्रमसे व्यवहार प्रवृत्त होता है, यह विधि है। यथा--सर्वसंग्रह नयके द्वारा जो वस्तु ३०
ग्रहण की गयी है वह अपने उत्तर भेदोंके बिना व्यवहार करानेमें असमर्थ है, इसलिए व्यवहार
नयका आश्रय लिया जाता है। यथा--जो सत् है वह या तो द्रव्य है या गुण । इसी प्रकार संग्रह
नयका विषय जो द्रव्य है वह जीव अजीवकी अपेक्षा किये बिना व्यवहार करानेमें असमर्थ है
इसलिए जीव द्रव्य है और अजीव द्रव्य है इस प्रकारके व्यवहारका आश्रय लिया जाता है। जीव
द्रव्य और अजीव द्रव्य भी जब तक संग्रह नयके विषय रहते हैं तब तक वे व्यवहार करानेमें ३५
असमर्थ हैं इसलिए व्यवहारसे जीव द्रव्यके देव, नारकी आदि रूप और अजीव द्रव्यके घटादिरूप
भेदोंका आश्रय लिया जाता है। इस प्रकार इस नयकी प्रवृत्ति वहीं तक होती है जहाँ तक वस्तुमें
फिर कोई विभाग करना सम्भव नहीं रहता।
१. संग्रहनयः ॥२॥ संग्र-मु० । २. यत्संग्र-मु०, दि० १; दि०२, आ० । ३. जीवावपि संग्र-मु० ।
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१०० सर्वार्थसिद्धौ [ १।३३ § २४५ -
§ २४५. ऋजुं प्रगुणं सूत्रयति १ तन्त्रयतीति ऋजुसूत्रः । २पूर्वापरांस्त्रिकालविषयानतिशय्य
वर्तमानकालविषयानादत्ते३ अतीतानागतयोर्विनष्टानुत्पन्नत्वेन व्यवहाराभावात् । तच्च वर्तमानं
समयमात्रम् । तद्विषयपर्यायमात्रग्राह्यमृजुसूत्रः । ननु संव्यवहारलोपप्रसङ्ग इति चेद्४ । न; अस्य
नयस्य विषयमात्रप्रदर्शनं क्रियते । सर्वनयसमूहसाध्यो हि लोकसंव्यवहारः ।
§ २४६. लिङ्गसंख्यासाधनादिव्यभिचारनिवृत्तिपरः शब्दनयः । तत्र लिङ्गव्यभिचारः-
पुष्यस्तारका नक्षत्रमिति । संख्याव्यभिचारः - जलमापः, वर्षा ऋतुः, आम्रा वनम्५, वरणा नगर-
मिति । साधनव्यभिचारः६- सेना७ पर्वतमधिवसति । पुरुषव्यभिचारः - एहि८ मन्ये रथेन यास्यसि,
न हि यास्यसि, यातस्ते पितेति । कालव्यभिचारः - विश्वदृश्वाऽस्य पुत्रो जनिता । ९
- १३३ § २४८ ] प्रथमोऽध्यायः १०१
मन्यते; अन्यार्थस्यान्यार्थेन संबन्धाभावात्। लोकसमयविरोध इति चेत् । विरुध्यताम्। १तत्त्वमिह
मीमांस्यते, न२ भेषज्यमातुरેચ્છानुवर्ति ।
§ २४७. नानार्थसमभिरोहणात्समभिरूढः। यतो नानार्थान्समतीत्यैकमर्थमाभिमुख्येन रूढः
समभिरूढः । गौरित्ययं शब्दो वागादिष्वर्थेषु३ वर्तमानः पशावभिरूढः। अथवा ४अर्थगत्यर्थः
शब्दप्रयोगः । तत्रैकस्यार्थस्यैकेन गतार्थत्वात्पर्यायशब्दप्रयोगोऽनर्थकः । शब्दभेदश्चेदस्ति ५
अर्थभेदेनाप्यवश्यं भवितव्यमिति । नानार्थसमभिरोहणात्समभिरूढः। इन्दनादिन्द्रः शकनाच्छक्रः
पूर्दारणात् पुरंदर इत्येवं सर्वत्र । अथवा यो यत्राभिरूढः स तत्र समेत्याभिमुख्येनारोहणात्समभि-
रूढः । यथा क्व भवानास्ते । आत्मनीति । कुतः । वस्त्वन्तरे वृत्त्यभावात् । ५यद्यन्यस्यान्यत्र वृत्तिः
स्यात्, ज्ञानादीनां रूपादीनां चाकाशे वृत्तिः स्यात् ।
§ २४८. येनात्मना भूतस्तेनैवाध्यवसाययतीति एवंभूतः । स्वाभिप्रेतक्रियापरिणतिक्षणे एव १०
स शब्दो युक्तो नान्यदेति । यदैवेन्दति तदैवेन्द्रो नाभिषेचको न पूजक इति । यदैव गच्छति तदैव
गौर्न स्थितो न शयित इति । अथवा येनात्मना येन ज्ञानेन भूततः परिणतस्तेनैवाध्यवसाययति ।
यथेन्द्राग्निज्ञानपरिणत आत्मैवेन्द्रोऽग्निश्चेति ।
अन्य अर्थके साथ सम्बन्ध नहीं बन सकता । शंका—इससे लोकसमयका (व्याकरण शास्त्रका)
विरोध होता है । समाधान—यदि विरोध होता है तो होने दो, इससे हानि नहीं, क्योकि यहाँ १५
तत्त्वकी मीमांसा की जा रही है । दवाई कुछ पीड़ित पुरुषकी इच्छाका अनुकरण करनेवाली
नहीं होती ।
§ २४७. नाना अर्थोंका समभिरोहण करनेवाला होनेसे समभिरूढ़ नय कहलाता है । चूंकि
जो नाना अर्थोंको 'सम्' अर्थात् छोड़कर प्रधानतासे एक अर्थमें रूढ़ होता है वह समभिरूढ़ नय है ।
उदाहरणार्थ-'गो' इस शब्दके वचन आदि अनेक अर्थ पाये जाते हैं तो भी वह 'पशु' इस अर्थमें २०
रूढ़ है । अथवा अर्थका ज्ञान करानेके लिए शब्दोंका प्रयोग किया जाता है। ऐसी हालतमें एक
अर्थका एक शब्दसे ज्ञान हो जाता है इसलिए पर्यायवाची शब्दोंका प्रयोग करना निष्फल है ।
यदि शब्दोंमें भेद है तो अर्थभेद अवश्य होना चाहिए । इस प्रकार नाना अर्थोंका समभिरोहण
करनेवाला होनेसे समभिरूढ़ नय कहलाता है । जैसे इन्द्र, शक्र और पुरन्दर ये तीन शब्द होनेसे
इनके अर्थ भी तीन हैं। इन्द्रका अर्थ आज्ञा ऐश्वर्यवान् है, शक्रका अर्थ समर्थ है और पुरन्दरका २५
अर्थ नगरका दारण करनेवाला है । इसी प्रकार सर्वत्र जानना चाहिए । अथवा जो जहाँ अभिरूढ़
है वह वहाँ 'सम्' अर्थात् प्राप्त होकर प्रमुखतासे रूढ़ होनेके कारण समभिरूढ़ नय कहलाता है ।
यथा—आप कहाँ रहते हैं ? अपनेमें, क्योंकि अन्य वस्तुकी अन्य वस्तुमें वृत्ति नहीं हो सकती ।
यदि अन्यकी अन्यमें वृत्ति होती है ऐसा माना जाय तो ज्ञानादिककी और रूपादिककी आकाशमें
वृत्ति होने लगे । ३०
§ २४८. जो वस्तु जिस पर्यायको प्राप्त हुई है उसी रूप निश्चय करानेवाले नयको एवंभूत
नय कहते हैं। आशय यह है कि जिस शब्दका जो वाच्य है उस रूप क्रियाके परिणमनके समय ही
उस शब्दका प्रयोग करना युक्त है अन्य समयमें नहीं । जबी आज्ञा ऐश्वर्यवाला हो तभी इन्द्र है
अभिषेक करनेवाला नहीं और न पूजा करनेवाला ही । जब गमन करती हो तभी गाय है बैठी हुई
नहीं और न सोती हुई ही । अथवा जिस रूपसे अर्थात् जिस ज्ञानसे आत्मा परिणत हो उसी रूपसे ३५
१. तत्त्वं मीमां- आ०, दि० १, दि० २ । २. न तु भैष-आ०, ता०, दि० १ । ३. -गादिषु वर्त-ता०,
ना० । ४. 'अर्थगत्यर्थः शब्दप्रयोगः । अर्थं संप्रत्याययिष्यामीति शब्दः प्रयुज्यते । तत्रैकेनोक्तत्वात्तस्यार्थस्य
द्वितीयस्य च तृतीयस्य च प्रयोगेण न भवितव्यम् 'उक्तार्थानामप्रयोगः' इति' पा० म० भा० २।१।१।१ ।
५. यद्यस्यान्यत्र आ० ।
१०२ सर्वार्थसिद्धौ [ १।३३ § २४९ –
§ २४९. उक्ता नैगमादयो नयाः । उत्तरोत्तरसूक्ष्मविषयत्वादेषां क्रमः पूर्वपूर्वहेतुकत्वाच्च ।
एवमेते नयाः पूर्वपूर्वविरुद्धमहाविषया उत्तरोत्तरानुकूलाल्पविषया द्रव्यस्यानन्तशक्तेः प्रतिशक्ति
विभिद्यमाना बहुविकल्पा जायन्ते । त एते गुणप्रधानतया परस्परतन्त्राः सम्यग्दर्शनहेतवः पुरुषार्थ-
क्रियासाधनसामर्थ्यात्तन्तवादय इव यथोपायं विनिवेश्यमानाः पटादिसंज्ञाः स्वतन्त्राश्चासमर्थाः ।
§ २५०. १तन्त्वादय इवेति विषम उपन्यासः । तन्त्वादयो निरपेक्षा अपि कांचिदर्थमात्रां
जनयन्ति । भवति हि कश्चित्प्रत्येकं २तन्तुस्त्वक्त्राणे समर्थः । एकश्च बल्वजो बन्धने समर्थः । इमे
पुनर्नया निरपेक्षाः सन्तो न कांचिदपि सम्यग्दर्शनमात्रां प्रादुर्भावयन्तीति । नैष दोषः, अभिहिता-
नवबोधात् । अभिहितमर्थमनवबुध्य परेणेदमुपालभ्यते । एतदुक्तं, निरपेक्षेषु तन्त्वादिषु पटादिकार्यं
नास्तीति । यत्तु तेनोपदर्शितं न तत्पटादिकार्यम् । किं तर्हि । केवलं तन्त्वादिकार्यम्३ । तन्त्वादि-
कार्यमपि तन्त्वाद्यवयवेषु निरपेक्षेषु नास्त्येव इत्यस्मत्पक्षसिद्धिरव । अथ तन्त्वादिषु पटादिकार्यं
शक्त्यपेक्षया अस्तीत्युच्यते । नयेष्वपि निरपेक्षेषु बुद्धयभिधानरूपेषु कारणवशात्सम्यग्दर्शनहेतु-
त्वविपरिणतिसद्भावात् शक्त्यात्मनास्तित्वमिति साम्यमेवोपन्यासस्य४ ।
इति तत्त्वार्थवृत्तौ सर्वार्थसिद्धिसंज्ञायां प्रथमोऽध्यायः ।
उसका निश्चय करानेवाला नय एवंभूत नय है। यथा—इन्द्ररूप ज्ञानसे परिणत आत्मा इन्द्र है और
अग्निरूप ज्ञानसे परिणत आत्मा अग्नि है।
२४९. ये नैगमादिक नय कहे । उत्तरोत्तर सूक्ष्म विषयवाले होनेके कारण इनका यह क्रम
कहा है । पूर्व-पूर्व नय आगे-आगेके नयका हेतु है इसलिए भी यह क्रम कहा है । इस प्रकार ये नय
पूर्व-पूर्व विरुद्ध महाविषयवाले और उत्तरोत्तर अनुकूल अल्प विषयवाले हैं। द्रव्यकी अनन्त शक्ति
है इसलिए प्रत्येक शक्तिकी अपेक्षा भेदको प्राप्त होकर ये अनेक विकल्पवाले हो जाते हैं। ये सब
नय गौण मुख्यरूपसे एक दूसरेकी अपेक्षा करके ही सम्यग्दर्शनके हेतु हैं। जिस प्रकार पुरुषकी
अर्थक्रिया और साधनोंकी सामर्थ्यवश यथायोग्य निवेशित किये गये तन्तु आदिक पट आदिक
संज्ञाको प्राप्त होते हैं और स्वतन्त्र रहनेपर कार्यकारी नहीं होते उसी प्रकार ये नय समझने चाहिए।
§ २५०. शंका—प्रकृतमें 'तन्त्वादय इव' विषम दृष्टान्त है; क्योंकि तन्तु आदिक निरपेक्ष
रहकर भी किसी-न-किसी कार्यको जन्म देते ही हैं। देखते हैं कि कोई एक तन्तु त्वचाकी रक्षा
करनेमें समर्थ है और एक वल्कल किसी वस्तुको बाँधनेमें समर्थ है। किन्तु ये नय निरपेक्ष रहते
हुए थोड़ा भी सम्यग्दर्शनरूप कार्यको नहीं पैदा कर सकते हैं? समाधान—यह कोई दोष नहीं
है, क्योंकि जो कुछ कहा गया है उसे समझे नहीं। कहे गये अर्थको समझे बिना दूसरेने यह उपालम्भ
दिया है। हमने यह कहा है कि निरपेक्ष तन्तु आदिमें पटादि कार्य नहीं पाया जाता। किन्तु
शंकाकारने जिसका निर्देश किया है वह पटादिका कार्य नहीं है। शंका—तो वह क्या है?
समाधान—केवल तन्तु आदिका कार्य है। तन्तु आदिका कार्य भी सर्वथा निरपेक्ष तन्तु
आदिके अवयवोंमें नहीं पाया जाता, इसलिए इससे हमारे पक्षका ही समर्थन होता है। यदि
यह कहा जाय कि तन्तु आदिमें पटादि कार्य शक्तिकी अपेक्षा है हो तो यह बात बुद्धि और
अभिधान—शब्दरूप निरपेक्ष नयोंके विषयमें भी जानना चाहिए। उनमें भी ऐसी शक्ति पायी
१. तन्त्वादिवदेष विष–आ०, दि० १, दि० २, ता० ना० । २. 'एकस्तन्तुस्त्वक्त्राणेऽसमर्थस्तत्समुदायश्च
कम्बलः समर्थः × ×एकश्च बल्वजो बन्धनेऽसमर्थस्तत्समुदायश्च रज्जु समर्था भवति । विषम उपन्यासः ।
भवति हि तत्र या च यावती चार्थमात्रा । भवति हि कश्चित्प्रत्येकस्तन्तुस्त्वक्त्राणे समर्थः । × ×एकश्च
बल्वजो बन्धने समर्थः ।' पा० म० भा० १।२।२।४५। ३. कार्यम् । तर्हि तन्त्वा–ता०, ना० । ४. न्यायस्य ।
ज्ञानदर्शनयोस्तत्त्वं नयानां चैव लक्षणम् । ज्ञानस्य च प्रमाणत्वमध्यायेऽस्मिन्निरूपितम् ।। इति' प्रतिष्वेवं पाठः ।
जाती है जिससे वे कारणवश सम्यग्दर्शनके हेतु रूपसे परिणमन करनेमें समर्थ हैं। इसलिए दृष्टान्त
का दार्ष्टान्तसे साम्य ही है।
विशेषार्थ—प्रमाणके भेद-प्रभेदोंका कथन करनेके बाद यहाँ नयोंका निर्देश किया गया है।
नय श्रुतज्ञानका एक भेद है यह पहले ही बतला आये हैं। यहाँ आलम्बनकी प्रधानतासे उसके
सात भेद किये गये हैं। मुख्यतः आलम्बनको तीन भागोंमें विभक्त किया जा सकता है, उपचार, ५
अर्थ और शब्द। पहला नैगमनय उपचारनय है। संग्रह, व्यवहार और ऋजुसूत्र अर्थनय हैं और
शेष तीन शब्दनय हैं। आशय यह है कि नैगम नयकी प्रवृत्ति उपचारकी प्रधानतासे होती है
इसलिए इसे उपचार नय कहा है। वैसे तो इसकी परिगणना अर्थनयमें की गयी है। संग्रह,
व्यवहार और ऋजुसूत्रकी प्रवृत्ति अर्थकी प्रधानतासे होती है इसलिए इन्हें अर्थनय कहा है और
शब्द, समभिरूढ़ तथा एवंभूत नयकी प्रवृत्ति शब्दकी प्रधानतासे होती है इसलिए इन्हें शब्द नय १०
कहा है। जैसा कि हमने संकेत किया है कि नैगमनयका समावेश अर्थनयोंमें किया जाता है किन्तु
शेष अर्थनयोंसे नैगमनयको अर्थनय माननेमें मौलिक भेद है। बात यह है कि उपचारकी प्रधानतासे
वस्तुको स्वीकार करना यह नैगमनयका काम है शेष अर्थनयोंका नहीं इसलिए इसे उपचार नय
कहा है। शेष अर्थनय तो भेदाभेद या सामान्य विशेषकी प्रधानतासे सीधा ही वस्तुको विषय करते
हैं वहाँ उपचारको विशेषस्थान नहीं इसलिए हमने अर्थनयोसे नैगमनयको पृथक् बतलाया है। १५
माना कि नैगमनय भी गौण मुख्यभावसे भेदाभेद या सामान्यविशेषको विषय करता है पर इन
सबकी जड़में उपचार काम करता है इसलिए नैगमनय मुख्यतः उपचारनय ही है। सिद्धसेन
दिवाकरने नैगमनयको नय ही नहीं माना है इसका कारण यह उपचार ही है। सम्यग्ज्ञानके
प्रकरणमें उपचारको कहाँ तक स्थान दिया जाय यह एक प्रश्न तो है ही। वस्तुस्पर्शी विकल्प और
वस्तुमें आरोपित विकल्प इनमें बड़ा अन्तर है। वस्तुस्पर्शी विकल्पोंको सम्यग्ज्ञानकी कोटिमें स्थान २०
देना तो अनिवार्य है, किन्तु यदि वस्तुमें आरोपित विकल्पोंको सम्यग्ज्ञानकी कोटिमें स्थान दिया
जाय तो अनवस्थाकी सीमा ही न रहे यह एक भय था जिसके कारण आचार्य सिद्धसेन दिवाकरने
नय प्रकरणमें नैगमका नामोल्लेख तक न किया। किन्तु ऐसा उपचार, जो परम्परासे ही सही मूल
कार्यका ज्ञान करानेमें सहायक हो और जिससे अवास्तविक भ्रम फैलनेका भय न हो या जो
वस्तुका विपरीतरूपसे बोध न कराकर वस्तुके गूढ़तम तत्त्वकी ओर इशारा करता हो, ग्राह्य है २५
ऐसा मानकर उपचार प्रधान नैगमनयको नयप्रकरणमें स्थान दिया गया है। इससे विचार करने-
की परिधि बढ़ जाती है और सम्यग्ज्ञानके जनक समग्र विचारोंका वर्गीकरण करनेमें सहायता
मिलती है। यदि नैगमनयकी श्रेणीमें जो विचार आते हैं उन्हें मिथ्या मानकर सर्वथा छोड़ दिया
जाता है—सम्यग्ज्ञानकी श्रेणीमें स्थान नहीं दिया जाता है तो अभेदकी ओर ले जानेवाले जितने
विचार हैं उनकी भी यही गति होनी चाहिए। यदि उनसे वस्तुके स्वरूपका विश्लेषण करनेमें ३०
सहायता मिलती है इसलिए उनकी नयोंकी श्रेणीमें परिगणना की जाती है तो यही बात नैगमनयके
ऊपर भी लागू करनी चाहिए। इन नयोंका सामान्य और विशेष स्वरूप टीकामें दिया ही है
इसलिए यहाँ इस विषयमें विशेष नहीं लिखा गया है। ऋजुसूत्र नय वर्तमान पर्याय-द्वारा वस्तुको
ग्रहण करता है और शब्दादिक नय शब्दों-द्वारा वर्तमान पर्यायमुखेन वस्तुको ग्रहण करते हैं,
इसलिए इन नयोंका विषय द्वित्व नहीं हो सकता। यही कारण है कि शब्दनयके विषयका निरूपण ३५
करते समय एक साथ प्रयुक्त किये गये एकवचनान्त और द्विवचनान्त आदि शब्दके वाच्य आदि
इसके अविषय बतलाये हैं और समभिरूढ़के विषयका निरूपण करते समय एक शब्दके अनेक अर्थ
या एक अर्थमें अनेक शब्दोंका प्रयोग करना इसका अविषय बतलाया है, क्योंकि एकवचनान्त
शब्दका वाच्य अन्यार्थ है और द्विवचनान्त शब्दका वाच्य अन्यार्थ है, इसलिए शब्द नय इनको
१०४ सर्वार्थसिद्धौ [ १।३३ § २५० -
एक वाच्य रूपसे ग्रहण नहीं कर सकता । इसी प्रकार गो शब्दका गाय अर्थ अन्यार्थ है और वाणी
अर्थ अन्यार्थ है, इसलिए समभिरूढ़ नय इन अर्थोंको एक साथ ग्रहण नहीं कर सकता । इसी प्रकार
सभी नयोंके विषयको समझना चाहिए । नय अंश-द्वारा वस्तुको स्पर्श करनेवाला एक विकल्प है ।
प्रमाण ज्ञानके समान यह समग्र वस्तुको स्पर्श नहीं करता, इसलिए ही निरपेक्ष नयको मिथ्या और
५ सापेखनयको सम्यक् कहा गया है । इस विषयका विशेष खुलासा और सब नयोंकी उत्तरोत्तर
सूक्ष्मताका विचार मूलमें किया ही है। इस प्रकार नय सात हैं और वे द्रव्यार्थिक और पर्यायार्थिक
इन दो भागोंमें बटे हुए हैं यह निश्चित होता है ।
इस प्रकार सर्वार्थसिद्धि नामवाली तत्त्वार्थवृत्तिमें प्रथम अध्याय समाप्त हुआ ।
अथ द्वितीयोऽध्यायः
§ २५१. आह, सम्यग्दर्शनस्य विषयभावेनोपदिष्टेषु जीवादिष्वादावुपन्यस्तस्य जीवस्य किं
स्वतत्त्वमित्युच्यते—
औपशमिकक्षायिकौ भावौ मिश्रश्च जीवस्य स्वतत्त्वमौदयिकपारिणामिकौ च ॥१॥
§ २५२. आत्मनि कर्मणः स्वशक्तेः कारणवशादनुद्भूतिरुपशमः । यथा कतकादिद्रव्य- ५
संबन्धादम्भसि पङ्कस्य उपशमः । क्षय आत्यन्तिकी निवृत्तिः । यथा तस्मिन्नेवाम्भसि शुचिभाजना-
न्तरसंक्रान्ते पङ्कस्यात्यन्ताभाव उभयात्मको मिश्रः । यथा तस्मिन्नेवाम्भसि कतकादिद्रव्यसंबन्ध्या-
त्पङ्कस्य क्षीणाक्षीणवृत्तिः । द्रव्यादिनिमित्तवशात्कर्मणां फलप्राप्तिरुदयः । द्रव्यात्मलाभमात्रहेतुकः
परिणामः । उपशमः प्रयोजनमस्येत्यौपशमिकः । एवं क्षायिकः क्षायोपशमिकः औदयिकः पारिणामि-
कश्च । त एते पञ्च भावा असाधारणा जीवस्य स्वतत्त्वमित्युच्यन्ते । १०
§ २५३. सम्यग्दर्शनस्य प्रकृतत्वात्तस्य त्रिषु विकल्पेषु औपशमिकमादौ लभ्यत इति तस्यादौ
ग्रहणं क्रियते । तदनन्तरं क्षायिकग्रहणम्; तस्य प्रतियोगित्वात् संसार्यपेक्षया द्रव्यतस्ततोऽसंख्येय-
गुणत्वाच्च । तत उत्तरं मिश्रग्रहणम्; तदुभयात्मकत्वात्ततोऽसंख्येयगुणत्वाच्च । तेषां सर्वेषामनन्त-
गुणत्वाद् औदयिकपारिणामिकग्रहणमन्ते क्रियते । अत्र द्वन्द्वनिर्देशः कर्तव्यः-औपशमिकक्षायिक-
§ २५१. सम्यग्दर्शनके विषयरूपसे जीवादि पदार्थोंका कथन किया । उनके आदिमें जो जीव १५
पदार्थ आया है उसका स्वतत्त्व क्या है यह बतलानेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
औपशमिक, क्षायिक, मिश्र, औदयिक और पारिणामिक ये जीवके स्वतत्त्व हैं ॥१॥
§ २५२. जैसे कतक आदि द्रव्यके सम्बन्धसे जलमें कीचड़का उपशम हो जाता है उसी
प्रकार आत्मामें कर्मकी निज शक्तिका कारणवशसे प्रकट न होना उपशम है । जैसे उसी जलको
दूसरे साफ बर्तनमें बदल देनेपर कीचड़का अत्यन्त अभाव हो जाता है वैसे ही कर्मोंका आत्मासे २०
सर्वथा दूर हो जाना क्षय है । जिस प्रकार उसी जलमें कतकादि द्रव्यके सम्बन्धसे कुछ कीचड़का
अभाव हो जाता है और कुछ बना रहता है उसी प्रकार उभयरूप भाव मिश्र है । द्रव्यादि निमित्त-
के वशसे कर्मोंके फलका प्राप्त होना उदय है । और जिसके होनेमें द्रव्यका स्वरूपलाभमात्र कारण
है वह परिणाम है । जिस भावका प्रयोजन अर्थात् कारण उपशम है वह औपशमिक भाव है ।
इसी प्रकार क्षायिक, क्षायोपशमिक, औदयिक और पारिणामिक भावोंकी व्युत्पत्ति कहनी चाहिए । २५
ये पाँच भाव असाधारण हैं इसलिए जीवके स्वतत्त्व कहलाते हैं।
§ २५३. सम्यग्दर्शनका प्रकरण होनेसे उसके तीन भेदोंमेंसे सर्वप्रथम औपशमिक सम्यग्दर्शन
होता है अतएव औपशमिक भावको आदिमें ग्रहण किया है। क्षायिक भाव औपशमिक भावका
प्रतियोगी है और संसारो जीवोंकी अपेक्षा औपशमिक सम्यग्दृष्टियोंसे क्षायिक सम्यग्दृष्टि असंख्यात-
गुणे हैं अतः औपशमिक भावके पश्चात् क्षायिक भावको ग्रहण किया है। मिश्रभाव इन दोनोंरूप ३०
होता है और क्षायोपशमिक सम्यग्दृष्टि जीव औपशमिक और क्षायिक सम्यग्दृष्टियोंसे असंख्यातगुणे
होते हैं अतः तत्पश्चात् मिश्रभावको ग्रहण किया है। इन सबसे अनन्तगुणे होनेके कारण इन सबके
अन्तमें औदयिक और पारिणामिक भावोंको रखी है । शंका-यहाँ 'औपशमिकक्षायिकमिश्रौदयि-
१४
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१०६ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ सर्वार्थसिद्धौ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ [ २।२ § २५४ –
मिश्रौदयिकपारिणामिका इति । तथा सति हिः 'च'शब्दो न कर्तव्यो भवति । नैवं शङ्क्यम्;
अन्यगुणापेक्षया मिश्र इति प्रतीयेत । वाक्ये पुनः सति 'च'शब्देन प्रकृतोभयानुकर्षः कृतो भवति ।
तर्हि क्षायोपशमिकग्रहणमेव कर्तव्यमिति चेत् । न; गौरवात् । मिश्रग्रहणं मध्ये क्रियते उभया-
पेक्षार्थम् । भव्यस्य औपशमिकक्षायिकौ भावौ । मिश्रः पुनरभव्यस्यापि भवति औदयिकपारिणामि-
काभ्यां सह भव्यस्यापीति । भावापेक्षया तल्लिङ्गसंख्याप्रसङ्गः स्वतत्त्वस्येति चेत् । न; उपात्त-
लिङ्गसंख्यत्वात्$^१$ । तद्भावस्तत्त्वम् । स्वं तत्त्वं स्वतत्त्वमिति ।
§ २५४. अत्राह तस्यैकस्यात्मनो ये भावा औपशमिकादयस्ते किं भेदवन्त उताभेदा इति ।
अत्रोच्यते, भेदवन्तः । यद्येवं, भेदा उच्यन्तामित्यत आह—
द्विनवाष्टादशैकविंशतित्रिभेदा यथाक्रमम् ॥२॥
§ २५५. द्वयादीनां संख्याशब्दानां कृतद्वन्द्वानां भेदशब्देन सह स्वपदार्थेऽन्यपदार्थे वा वृत्ति-
र्वेदितव्या । द्वौ च नव च अष्टादश च एकविंशतिश्च त्रयश्च द्विनवाष्टादशैकविंशतित्रयः$^२$ । ते च
कपारिणामिकाः' इस प्रकार द्वन्द्व समास करना चाहिए । ऐसा करनेसे सूत्रमें दो 'च' शब्द नहीं
रखने पड़ते हैं ? समाधान—ऐसी शंका नहीं करनी चाहिए, क्योंकि सूत्रमें यदि 'च' शब्द न रखकर
द्वन्द्व समास करते तो मिश्रकी प्रतीति अन्य गुणकी अपेक्षा होती । किन्तु वाक्यमें 'च' शब्दके
रहनेपर उससे प्रकरणमें आये हुए औपशमिक और क्षायिक भावका अनुकर्षण हो जाता है ।
शंका—तो फिर सूत्रमें 'क्षायोपशमिक' पदका ही ग्रहण करना चाहिए ? समाधान—नहीं, क्योंकि
क्षायोपशमिक पदके ग्रहण करनेमें गौरव है; अतः इस दोषको दूर करनेके लिए क्षायोपशमिक पदका
ग्रहण न करके मिश्र पद रखा है । दोनोंकी अपेक्षासे मिश्र पद मध्यमें रखा है । औपशमिक और
क्षायिकभाव भव्यके ही होते हैं। किन्तु मिश्रभाव अभव्यके भी होता है । तथा औदयिक और
पारिणामिक भावोंके साथ भव्यके भी होता है। शंका—भावोंकी अपेक्षा स्वतत्त्वपदका वही लिंग
और संख्या प्राप्त होती है ? समाधान—नहीं, क्योंकि जिस पदको जो लिंग और संख्या प्राप्त हो
गयी है उसका वही लिंग और वही संख्या बनी रहती है । स्वतत्त्वका व्युत्पत्तिलभ्य अर्थ है—स्वं
तत्त्वं स्वतत्त्वम् = जिस वस्तुका जो भाव है वह तत्त्व है और स्व तत्त्व स्वतत्त्व है।
विशेषार्थ—पांच भावोंमें प्रारम्भके चार भाव निमित्तकी प्रधानतासे कहे गये हैं और
अन्तिम भाव योग्यताकी प्रधानतासे । जगमें जितने कार्य होते हैं उनका विभागीकरण इसी
हिसाबसे किया जाता है । कहीं निमित्तको प्रमुखता दी जाती है और कहीं योग्यताको । पर इससे
अन्य वस्तुका कर्तृत्व अन्यमें मानना उचित नहीं। ऐसे विभागीकरणके दिखलानेका इतना ही
प्रयोजन है कि जहाँ जिस कार्यका जो सुनिश्चित निमित्त हो उसका परिज्ञान हो जावे । यों तो
कार्य अपनी योग्यतासे होता है किन्तु जिसके बिना जो कार्य नहीं होता वह उसका सुनिश्चित
निमित्त कहा जाता है। इस हिसाबसे विचार करनेपर औपशमिक, क्षायिक, क्षायोपशमिक और
औदयिक ये चार नैमित्तिक भाव ठहरते हैं ।
§ २५४. एक आत्माके जो औपशमिक आदि भाव कहे हैं, उनके कोई भेद हैं या नहीं ?
भेद हैं । यदि ऐसा है तो इनके भेदोंका कथन करना चाहिए, इसलिए आगेका सूत्र कहते हैं—
उक्त पाँच भावोंके क्रमसे दो, नौ, अठारह, इक्कीस और तीन भेद हैं ॥२॥
§ २५५. संख्यावाची दो आदि शब्दोंका द्वन्द्व समास करके पश्चात् उनका भेद शब्दके
साथ स्वपदार्थमें या अन्यपदार्थमें समास जानना चाहिए । स्वपदार्थ प्रधान समास यथा—द्वौ च
नव च अष्टादश च एकविंशतिश्च त्रयश्च इति द्विनवाष्टादशैकविंशतित्रयः, ते एव भेदाः इति
१. संख्यात्वात् मु० । २. त्रयः । त एव भेदाः मु० ।
- २।३ § २५८ ] द्वितीयोऽध्यायः १०७
ते भेदाश्च, त एव भेदा येषामिति वा वृत्तिर्द्विनवाष्टादशैकविंशतित्रिभेदा इति । यदा स्वपदार्थे
वृत्तिस्तदा औपशमिकादीनां¹ भावानां द्विनवाष्टादशैकविंशतित्रयो भेदा इत्यभिसंबन्धः क्रियते;
अर्थवशाद्विभक्तिपरिणाम इति । यदान्यपदार्थे वृत्तिस्तदा निर्दिष्टविभक्त्यन्ता एवाभिसंबध्यन्ते,
औपशमिकादयो भावा द्विनवाष्टादशैकविंशतित्रिभेदा इति । 'यथाक्रम'वचनं यथासंख्यप्रति-
पत्त्यर्थम् । औपशमिको द्विभेदः। क्षायिको नवभेदः। मिश्रोऽष्टादशभेदः। औदयिक एकविंशतिभेदः। ५
पारिणामिकस्त्रिभेद इति ।
§ २५६. यद्येवमौपशमिकस्य कौ द्वौ भेदावित्यत आह—
सम्यक्त्वचारित्रे ॥३॥
§ २५७. व्याख्यातलक्षणे सम्यक्त्वचारित्रे । औपशमिकत्वं कथमिति चेदुच्यते । चारित्र-
मोहो द्विविधः कषायवेदनीयो नोकषायवेदनीयश्चेति । तत्र कषायवेदनीयस्य भेदा अनन्तानुबन्धिनः १०
क्रोधमानमायालोभाश्चत्वारः । दर्शनमोहस्य त्रयो भेदाः सम्यक्त्वं मिथ्यात्वं सम्यग्मिथ्यात्वमिति ।
आसां सप्तानां प्रकृतीनामुपशमादौपशमिकं सम्यक्त्वम् ।
§ २५८. अनादिमिथ्यादृष्टेर्भव्यस्य कर्मोदयापादितकालुष्ये सति कुतस्तदुपशमः । काल-
लब्ध्यादिनिमित्तत्वात् । तत्र काललब्धिस्तावत्-कर्माविष्ट आत्मा भव्यः कालेऽर्द्धपुद्गलपरिवर्त्त-
नाख्येऽवशिष्टे प्रथमसम्यक्त्वग्रहणस्य योग्यो भवति नाधिके इति । इयमेका काललब्धिः । अपरा १५
द्विनवाष्टादशैकविंशतित्रिभेदाः । अन्यपदार्थप्रधान समास यथा—द्विनवाष्टादशैकविंशतित्रयो भेदा
येषां ते द्विनवाष्टादशैकविंशतित्रिभेदाः । जब स्वपदार्थमें समास करते हैं तब औपशमिक आदि
भावोंके दो, नौ, अठारह, इक्कीस और तीन भेद हैं ऐसा सम्बन्ध कर लेते हैं । यद्यपि पूर्व सूत्रमें
औपशमिक आदि पदकी षष्ठी विभक्ति नहीं है तो भी अर्थवश विभक्ति बदल जाती है । और जब
अन्य पदार्थमें समास करते हैं तब विभक्ति बदलनेका कोई कारण नहीं रहता । सूत्रमें इनकी २०
विभक्तिका जिस प्रकार निर्देश किया है तदनुसार सम्बन्ध हो जाता है । सूत्रमें 'यथाक्रम' वचन
यथासंख्यके ज्ञान करानेके लिए दिया है । यथा—औपशमिक भावके दो भेद हैं, क्षायिकके नौ भेद हैं,
मिश्रके अठारह भेद हैं, औदयिकके इक्कीस भेद हैं और पारिणामिकके तीन भेद हैं ।
§ २५६. यदि ऐसा है तो औपशमिकके दो भेद कौन-से हैं ? इस बातका ज्ञान करानेके लिए
आगेका सूत्र कहते हैं— २५
औपशमिक भावके दो भेद हैं—औपशमिक सम्यक्त्व और औपशमिक चारित्र ॥३॥
§ २५७. सम्यक्त्व और चारित्रके लक्षणका व्याख्यान पहले कर आये हैं । शंका—इनके
औपशमिकपना किस कारणसे है ? समाधान—चारित्रमोहनीयके दो भेद हैं—कषायवेदनीय और
नोकषायवेदनीय । इनमें-से कषायवेदनीयके अनन्तानुबन्धी, क्रोध, मान, माया और लोभ ये चार
भेद और दर्शनमोहनीयके सम्यक्त्व, मिथ्यात्व और सम्यग्मिथ्यात्व ये तीन भेद इन सातके उपशमसे ३०
औपशमिक सम्यक्त्व होता है ।
§ २५८. शंका—अनादि मिथ्यादृष्टि भव्यके कर्मोंके उदयसे प्राप्त कलुषताके रहते हुए इनका
उपशम कैसे होता है । समाधान—काललब्धि आदिके निमित्तसे इनका उपशम होता है। अब यहाँ
काललब्धिको बतलाते हैं—कर्मयुक्त कोई भी भव्य आत्मा अर्धपुद्गल परिवर्तन नामके कालके
शेष रहनेपर प्रथम सम्यक्त्वके ग्रहण करनेके योग्य होता है इनसे अधिक कालके शेष रहनेपर नहीं ३५
होता यह एक काललब्धि है । दूसरी काललब्धिका सम्बन्ध कर्म स्थितिसे है । उत्कृष्ट स्थितिवाले
१. -दीनां द्वि-मु०
१०८ सर्वार्थसिद्धौ [ २।४ § २५९ -
कर्मस्थितिका काललब्धिः । उत्कृष्टस्थितिकेषु कर्मसु जघन्यस्थितिकेषु च प्रथमसम्यक्त्वलाभो न
भवति । क्व र्तिह भवति । अन्तःकोटीकोटीसागरोपमस्थितिकेषु कर्मसु बन्धमापद्यमानेषु विशुद्ध-
परिणामवशात्सत्कर्मसु च ततः संख्येयसागरोपमसहस्रोनायामन्तःकोटीकोटीसागरोपमस्थितौ
स्थापितेषु प्रथमसम्यक्त्वयोग्यो भवति । अपरा काललब्धिर्भवोपेक्षया । भव्यः पञ्चेन्द्रियः संज्ञी
पर्याप्तकः सर्वविशुद्धः प्रथमसम्यक्त्वमुत्पादयेति । 'आदि'शब्देन जातिस्मरणादिः परिगृह्यते ।
§ २५९. कृत्स्नस्य मोहनीयस्योपशमादौपशमिकं चारित्रम् । तत्र सम्यक्त्वस्यादौ वचनं;
तत्पूर्वकत्वाच्चारित्रस्य ।
§ २६०. यः क्षायिको भावो नवविध उद्दिष्टस्तस्य भेदस्वरूपप्रतिपादनार्थमाह—
ज्ञानदर्शनदानलाभभोगोपभोगवीर्याणि च ॥४॥
§ २६१. 'च'शब्दः सम्यक्त्वचारित्रानुकर्षणार्थः । ज्ञानावरणस्यात्यन्तक्षयात्केवलज्ञानं
कर्मोंके शेष रहनेपर या जघन्य स्थितिवाले कर्मोंके शेष रहनेपर प्रथम सम्यक्त्वका लाभ नहीं
होता । शंका - तो फिर किस अवस्था में होता है ? समाधान - जब बँधनेवाले कर्मोंकी स्थिति अन्तः-
कोड़ाकोड़ी सागर पड़ती है और विशुद्ध परिणामोंके वशसे सत्तामें स्थित कर्मोंकी स्थिति संख्यात
हजारसागर कम अन्तःकोड़ाकोड़ी सागर प्राप्त होती है तब यह जीव प्रथम सम्यक्त्वके योग्य होता
है। एक काललब्धि भवकी अपेक्षा होती है - जो भव्य है, संज्ञी है, पर्याप्तक है और सर्वविशुद्ध है
वह प्रथम सम्यक्त्वको उत्पन्न करता है। 'आदि' शब्दसे जातिस्मरण आदिका ग्रहण करना चाहिए ।
§ २५९. समस्त मोहनीय कर्मके उपशमसे औपशमिक चारित्र होता है। इनमेंसे 'सम्यक्त्व'
पदको आदिमें रखा है क्योंकि चारित्र सम्यक्त्व पूर्वक होता है।
विशेषार्थ - उपशम दो प्रकारका है- करणोपशम और अकरणोपशम । कर्मोंका अन्तरकरण
होकर जो उपशम होता है वह करणोपशम कहलाता है। ऐसा उपशम दर्शनमोहनीय और चारित्र-
मोहनीय इन दोका ही होता है इसलिए उपशम भावके दो ही भेद बतलाये हैं। किन्तु इतनी
विशेषता है कि अनन्तानुबन्धी चतुष्कका अन्तरकरण उपशम नहीं होता, इसलिए जहाँ भी
इसके उपशमका विधान किया गया है वहाँ इसका अकरणोपशम ही लेना चाहिए । औपशमिक
सम्यग्दृष्टिके दर्शनमोहनीयका तो अन्तरकरण उपशम होता है और अनन्तानुबन्धी चतुष्कका
अनुदयरूप उपशम-यह उक्त कथनका भाव है। यद्यपि उपशम सम्यग्दृष्टिके अनन्तानुबन्धी चतुष्क-
का अन्तरकरण उपशम होता है इस मतका उल्लेख सप्ततिकामें देखा जाता है पर मुख्य मत वही
है जिसका यहाँ हमने निर्देश किया है। प्रकृतमें जिस जीवके औपशमिक सम्यक्त्वकी प्राप्ति होती
है उसकी योग्यताका निर्देश करते हुए ऐसी चार योग्यताएँ बतलायी हैं। विशेष इस प्रकार हैं-
पहली योग्यता अर्धपुद्गल परिवर्तन प्रमाण कालकी है जिस जीवके संसारमें रहनेका इतना काल
शेष रहा है उसे ही सर्वप्रथम सम्यग्दर्शनकी प्राप्ति हो सकती है। पर इतने कालके शेष रहनेपर
सम्यग्दर्शनकी प्राप्ति होनी ही चाहिए ऐसा कोई नियम नहीं है। इसके पहले सम्यग्दर्शनकी प्राप्ति
नहीं होती इतना सुनिश्चित है। शेष कथन सुगम है।
§ २६०. जो क्षायिकभाव नौ प्रकारका कहा है उसके भेदोंके स्वरूपका कथन करनेके लिए
आगेका सूत्र कहते हैं-
क्षायिक भावके नौ भेद हैं-क्षायिक ज्ञान, क्षायिक दर्शन, क्षायिक दान, क्षायिक लाभ,
क्षायिक भोग, क्षायिक उपभोग, क्षायिक वीर्य, क्षायिक सम्यक्त्व और क्षायिक चारित्र ॥४॥
§ २६१. सूत्रमें 'च' शब्द सम्यक्त्व और चारित्रके ग्रहण करनेके लिए आया है। ज्ञानावरण
- २४ § २६१ ] द्वितीयोऽध्यायः १०९
क्षायिकं तथा केवलदर्शनम् । दानान्तरायस्यात्यन्तक्षयादनन्तप्राणिगणानुग्रहकरं क्षायिकमभयदानम् ।
लाभान्तरायस्याशेषस्य निरासात् परित्यक्तकवलाहारक्रियाणां केवलिनां यतः शरीरबलाधानहेतवो-
ऽन्यमनुजासाधारणाः परमशुभाः सूक्ष्माः अनन्ताः प्रतिसमयं पुद्गलाः संबन्धमुपयान्ति स क्षायिको
लाभः । कृत्स्नस्य भोगान्तरायस्य १ तिरोभावादाविर्भूतोऽतिशयवाननन्तो भोगः क्षायिकः । यतः
कुसुमवृष्ट्यादयो विशेषाः प्रादुर्भवन्ति । निरवशेषस्योपभोगान्तरायस्य प्रलयात्प्रादुर्भूतोऽनन्त
उपभोगः क्षायिकः । यतः सिंहासनचामरच्छत्रत्रयादयो विभूतयः । वीर्यान्तरायस्य कर्मणोऽत्यन्त-
क्षयादाविर्भूतमनन्तवीर्यं क्षायिकम् । पूर्वोक्तानां सप्तानां प्रकृतीनामत्यन्तक्षयात्क्षायिकं सम्यक्त्वम् ।
चारित्रमपि तथा । यदि क्षायिकदानादिभावकृतमभयदानादि, सिद्धेष्वपि तत्प्रसङ्गः । नैष दोषः;
शरीरनामतीर्थंकरनामकर्मोदयाद्यपेक्षत्वात् । तेषां तदभावे तदप्रसङ्गः । कथं तर्हि तेषां सिद्धेषु
वृत्तिः । २परमानन्दाव्याबाधरूपेणैव तेषां तत्र वृत्तिः । केवलज्ञानरूपेणानन्तवीर्यवृत्तिवत् ।
कर्मके अत्यन्त क्षयसे क्षायिक केवलज्ञान होता है । इसी प्रकार केवलदर्शन भी होता है । दानान्त-
राय कर्मके अत्यन्त क्षयसे अनन्त प्राणियोंके समुदायका उपकार करनेवाला क्षायिक अभयदान
होता है । समस्त लाभान्तराय कर्मके क्षयसे कवलाहार क्रियासे रहित केवलियोंके क्षायिक लाभ
होता है जिससे उनके शरीरको बल प्रदान करनेमें कारणभूत, दूसरे मनुष्योंको असाधारण अर्थात्
कभी न प्राप्त होनेवाले, परम शुभ और सूक्ष्म ऐसे अनन्त परमाणु प्रति समय सम्बन्धको प्राप्त
होते हैं । समस्त भोगान्तराय कर्मके क्षयसे अतिशयवाले क्षायिक अनन्त भोगका प्रादुर्भाव होता
है । जिससे कुसुमवृष्टि आदि आश्चर्य विशेष होते हैं । समस्त उपभोगान्तरायके नष्ट हो जानेसे
अनन्त क्षायिक उपभोग होता है । जिससे सिंहासन, चामर और तीन छत्र आदि विभूतियां होती
हैं । वीर्यान्तराय कर्मके अत्यन्त क्षयसे क्षायिक अनन्त वीर्य प्रकट होता है । पूर्वोक्त सात प्रकृतियोंके
अत्यन्त विनाशसे क्षायिक सम्यक्त्व होता है । इसो प्रकार क्षायिक चारित्रका स्वरूप समझना
चाहिए । शंका—यदि क्षायिक दान आदि भावोंके निमित्तसे अभयदान आदि कार्य होते हैं तो
सिद्धोंमें भी उनका प्रसंग प्राप्त होता है ? समाधान—यह कोई दोष नहीं, क्योंकि इन अभयदान
आदिके होनेमें शरीर नामकर्म और तीर्थंकर नामकर्मके उदयकी अपेक्षा रहती है । परन्तु सिद्धोंके
शरीर नामकर्म और तीर्थंकर नामकर्म नहीं होते अतः उनके अभयदान आदि नहीं प्राप्त होते ।
शंका—तो सिद्धोंके क्षायिक दान आदि भावोंका सद्भाव कैसे माना जाय ? समाधान—जिस प्रकार
सिद्धोंके केवलज्ञान रूपसे अनन्तवीर्यका सद्भाव माना गया है उसी प्रकार परमानन्दके अव्याबाध
रूपसे ही उनका सिद्धोंके सद्भाव है ।
विशेषार्थ-घातिकर्मोके चार भेद हैं-ज्ञानावरण, दर्शनावरण, मोहनीय और अन्तराय । इनमें-
से ज्ञानावरणके अभावसे क्षायिक ज्ञान, दर्शनावरणके अभावसे क्षायिक दर्शन, मोहनीयके अभावसे
क्षायिक सम्यक्त्व और क्षायिक चारित्र तथा अन्तरायके अभावसे क्षायिक दानादि पाँच लब्धियां
होती हैं । इसीसे क्षायिक भावके नौ भेद किये हैं । यद्यपि अघाति कर्मोंके अभावसे जीवके क्षायिक
अगुरुलघु आदि गुण प्रकट होते हैं पर वे अनुजीवी न होनेसे उनका यहाँ ग्रहण नहीं किया है ।
प्रश्न यह है कि टीकामें जो अभयदान आदिको शरीर नामकर्म और तीर्थंकर नामकर्मकी अपेक्षा
रखनेवाले क्षायिक दान आदिके कार्य बतलाये हैं सो ऐसा बतलाना कहां तक उचित है ? बात यह
है कि ऐसा निमित्त-नैमित्तिक सम्बन्ध है कि तीर्थंकरके गर्भमें आनेपर छह महीना पहलेसे भक्तिवश
देव आकर जिस नगरीमें तीर्थंकर जन्म लेते हैं वहाँ रत्न वर्षा करते हैं । छप्पन कुमारिकाएँ
१. –यस्यात्यन्ताभा-मुं० । २. –मानन्तवीर्याव्याबाधसुखरूपे-मु० । —मानन्ताव्याबाधसुखरूप-आ०, दि० १,
दि० २ ।
§ २६२. य उक्तः क्षायोपशमिको भावोऽष्टादशविकल्पस्तद्भेदनिरूपणार्थमाह—
ज्ञानाज्ञानदर्शनलब्धयश्चतुस्त्रित्रिपञ्चभेदाः सम्यक्त्वचारित्रसंयमासंयमाश्च ॥५॥
§ २६३. चत्वारश्च त्रयश्च त्रयश्च पञ्च च चतुस्त्रित्रिपञ्च¹ । ते भेदाः यासां ताश्चतु-
स्त्रित्रिपञ्चभेदाः । यथाक्रममित्यनुवर्तते । तेनाभिसंबन्धाच्चतुरादिभिर्ज्ञानादीन्यभिसंबध्यन्ते ।
चत्वारि ज्ञानानि, त्रीण्यज्ञानानि, त्रीणि दर्शनानि, पञ्च लब्धय इति । सर्वघातिस्पर्द्धकानामुदय-
आकर माताकी सेवा करती हैं, गर्भशोधन करती हैं, रक्षा करती हैं। तीर्थंकरके गर्भमें आनेपर
देव-देवियां उत्सव मनाते हैं। जन्म, तप, केवल और निर्वाणके समय भी ऐसा ही करते हैं।
केवलज्ञान होनेके बाद समवसरणकी रचना करते हैं, कुसुमवृष्टि करते हैं आदि। इसलिए मुख्यतः
ये अभयदानादि देवादिकोंकी भक्ति और धर्मानुरागके कार्य हैं, शरीर नामकर्म और तीर्थंकर
नामकर्मकी अपेक्षा रखनेवाले क्षायिक दान आदिके नहीं। फिर भी इन अभयदानादिको उपचारसे
इनका कार्य कहा है। ऐसा नहीं माननेपर ये तीन दोष आते हैं—१. निर्वाण कल्याणकके समय
शरीर नामकर्म और तीर्थंकर नामकर्म नहीं रहता, इसलिए वह नहीं बन सकेगा। २. गर्भमें
आनेके पहले जो रत्नवर्षा आदि कार्य होते हैं उन्हें अकारण मानना पड़ेगा। ३. गर्भ, जन्म और
तप कल्याणकके समय न तो क्षायिक दान आदि ही पाये जाते हैं और न तीर्थंकर प्रकृतिका उदय
ही रहता है, इसलिए इन कारणोंके अभावमें इन्हें भी अकारण मानना पड़ेगा। इन सब दोषोंसे
बचनेका एक ही उपाय है कि पांच कल्याणकोंको और समवसरण आदि बाह्य विभूतिको देवादिक-
की भक्ति और धर्मानुरागका कार्य मान लिया जाय। जिस प्रकार जिन-प्रतिमाका अभिषेक आदि
महोत्सव भी इसीके कार्य हैं इसी प्रकार प्रकृतमें जानना चाहिए। इसपर यह प्रश्न होता है कि
उक्त कार्य भले ही देवादिककी भक्ति और धर्मानुराग वश होते हों पर जन्मकल्याणकके समय जो
घण्टानाद आदि कार्य विशेष होते हैं उनका कारण तो धर्मानुराग और भक्ति नहीं है। यदि उनका
कारण पुण्यातिशय माना जाता है तो शेष कार्योंका कारण पुण्यातिशय माननेमें क्या आपत्ति है ?
समाधान यह है कि जिस प्रकार एक अवसर्पिणी या उत्सर्पिणीमें चौबीस तीर्थंकर, बारह चक्रवर्ती,
नौ नारायण, नौ प्रतिनारायण और नौ बलभद्र आदिके होनेका नियम है। यह कर्म विशेषका कार्य
नहीं। उस-उस कालके साथ ऐसा ही निमित्तनैमित्तिक सम्बन्ध है कि इस कालमें इतने तीर्थंकर, इतने
चक्रवर्ती आदि ही होंगे न्यूनाधिक नहीं, इसी प्रकार तीर्थंकरके जन्मकालके साथ ऐसा ही निमित्त-
नैमित्तिक सम्बन्ध है कि इस समय अमुक स्थानके अमुक प्रकारके बाजे बजेंगे, इसलिए इसे कर्म
विशेषका कार्य मानना उचित नहीं। कर्मकी अपनी मर्यादाएँ हैं। उन तक ही वह सीमित है।
फिर भी मूलमें जिस स्थितिके रहते हुए ये कार्य होते हैं उस स्थितिको ध्यानमें रखकर उपचारसे
उस स्थितिको इनका कारण कहा है। और हमने कार्यकारणभावका सीधा विचार करके यह
लिखा है। शेष कथन सुगम है।
§ २६२. जो अठारह प्रकारका क्षायोपशमिक भाव कहा है उसके भेदोंका कथन करनेके
लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
क्षायोपशमिक भावके अठारह भेद हैं—चार ज्ञान, तीन अज्ञान, तीन दर्शन, पांच दानादि
लब्धियाँ, सम्यक्त्व, चारित्र और संयमासंयम ॥५॥
§ २६३. जिनके चार, तीन, तीन और पांच भेद हैं वे चार, तीन, तीन और पांच भेदवाले
कहलाते हैं। इस सूत्रमें 'यथाक्रमम्' पदकी अनुवृत्ति होती है, जिससे चार आदि पदोंके साथ ज्ञान
आदि पदोंका क्रमसे सम्बन्ध होता है। यथा—चार ज्ञान, तीन अज्ञान, तीन दर्शन और पाँच
लब्धियाँ। वर्तमान कालमें सर्वघाती स्पर्द्धकोंका उदयाभावी क्षय होनेसे और आगामी कालकी
१. पञ्च भेदा यासां मु० ।
- २१५ § २६३ ] द्वितीयोऽध्यायः १११
क्षयात्तेषामेव सदुपशमाद्देशघातिस्पर्द्धकानामुदये क्षायोपशमिको भावो भवति । तत्र ज्ञानादीनां
वृत्तिः स्वावरणान्तरायक्षयोपशमाद् व्याख्यातव्या । 'सम्यक्त्व'ग्रहणेन वेदकसम्यक्त्वं गृह्यते ।
अनन्तानुबन्धिकषायचतुष्टयस्य मिथ्यात्वसम्यङ्मिथ्यात्वयोश्चोदयक्षयात्सदुपशमाच्च सम्यक्त्वस्य
देशघातिस्पर्द्धकस्योदये तत्त्वार्थश्रद्धानं क्षायोपशमिकं सम्यक्त्वम् । अनन्तानुबन्धप्रत्याख्यानप्रत्या-
ख्यानद्वादशकषायोदयक्षयात्सदुपशमाच्च संज्वलनकषायचतुष्टयान्यतमदेशघातिस्पर्द्धकोदये नोकषाय- ५
नवकस्य यथासंभवोदये च निवृत्तिपरिणाम आत्मनः क्षायोपशमिकं चारित्रम् । अनन्तानुबन्धप्रत्या-
ख्यानकषायाष्टकोदयक्षयात्सदुपशमाच्च प्रत्याख्यानकषायोदये संज्वलनकषायस्य देशघातिस्पर्द्धकोदये
नोकषायनवकस्य यथासंभवोदये च विरताविरतपरिणामः क्षायोपशमिकः संयमासंयम इत्याख्यायते ।
अपेक्षा उन्हींका सदवस्था रूप उपशम होनेसे देशघाती स्पर्द्धकोंका उदय रहते हुए क्षायोपशमिक
भाव होता है । इन उपर्युक्त भावोंमें-से ज्ञान आदि भाव अपने-अपने आवरण और अन्तराय कर्मके १०
क्षयोपशमसे होते हैं ऐसा व्याख्यान यहां कर लेना चाहिए । सूत्रमें आये हुए सम्यक्त्वपदसे वेदक
सम्यक्त्व लेना चाहिए । तात्पर्य यह है कि चार अनन्तानुबन्धी कषाय, मिथ्यात्व और सम्यग्मि-
थ्यात्व इन छह प्रकृतियोंके उदयाभावी क्षय और सदवस्थारूप उपशमसे देशघाती स्पर्धकवाली
सम्यक्त्व प्रकृतिके उदयमें जो तत्त्वार्थश्रद्धान होता है वह क्षायोपशमिक सम्यक्त्व है । अनन्ता-
नुबन्धी, अप्रत्याख्यानावरण और प्रत्याख्यानावरण इन बारह कषायोंके उदयाभावी क्षय होनेसे १५
और इन्हींके सदवस्थारूप उपशम होनेसे तथा चार संज्वलनोंमें-से किसी एक देशघाती प्रकृतिके
उदय होनेपर और नौ नोकषायोंका यथासम्भव उदय होनेपर जो त्यागरूप परिणाम होता है वह
क्षायोपशमिक चारित्र है । अनन्तानुबन्धी और अप्रत्याख्यानावरण इन आठ कषायोंके उदयाभावी
क्षय होनेसे और सदवस्थारूप उपशम होनेसे तथा प्रत्याख्यानावरण कषायके और संज्वलन
कषायके देशघाती स्पर्द्धकोंके उदय होनेपर तथा नौ नोकषायोंका यथासम्भव उदय होनेपर जो २०
विरताविरतरूप परिणाम होता है वह संयमासंयम कहलाता है ।
**विशेषार्थ—**वर्तमान समयमें सर्वघाति स्पर्धकोंका उदयाभावी क्षय, आगामी कालकी अपेक्षा
उन्हींका सदवस्था रूप उपशम और देशघाति स्पर्धकोंका उदय यह क्षयोपशमका लक्षण है । यह
तो सुनिश्चित है कि अधिकतर देशघाति कर्म ऐसे होते हैं जिनमें देशघाति और सर्वघाति दोनों
प्रकारके स्पर्धक पाये जाते हैं । केवल नौ नोकषाय और सम्यक् प्रकृति ये दस प्रकृतियां इसके २५
अपवाद हैं । इनमें मात्र देशघाति स्पर्धक पाये जाते हैं, अतः नौ नोकषायोंके सिवा शेष सब
देशघाति कर्मोंका क्षयोपशम सम्भव है, क्योंकि पूर्वोक्त लक्षणके अनुसार क्षयोपशममें दोनों प्रकारके
कर्म लगते हैं । उसमें भी संयमासंयम भावकी प्राप्तिमें प्रत्याख्यानावरण कर्म अपेक्षा भेदसे देशघाति
मान लिया जाता है और सम्यक् प्रकृति मिथ्यात्व व सम्यग्मिथ्यात्वसे मिलकर क्षायोपशमिक
भावको जन्म देती है, इसलिए क्षायोपशमिक भावके कुल अठारह भेद ही घटित होते हैं । ३०
उदाहरणार्थ-ज्ञानावरणकी देशघाति प्रकृतियाँ चार हैं, अतः इनके क्षंयोपशमसे चार ज्ञान प्रकट
होते हैं, पर मिथ्यादृष्टिके तीन अज्ञान और सम्यग्दृष्टिके चार ज्ञान इस प्रकार क्षायोपशमिक ज्ञानके
कुल भेद सात होते हैं । इसीसे अठारह क्षायोपशमिक भावोंमें इन सात ज्ञानोंकी परिगणना की
जाती है । प्रकृतमें दर्शन तीन और लब्धि पाँच क्षायोपशमिक भाव हैं यह स्पष्ट ही है । शेष रहे
तीन भाव सो ये वेदक सम्यक्त्व, संयमासंयम और संयम लिये गये हैं । इन सब भावोंमें देशघाति ३५
स्पर्धकोंका उदय होता है इसलिए इन्हें वेदक भाव भी कहते हैं । जितने भी क्षायोपशमिक भाव
होते हैं वे देशघाति स्पर्धकोंके उदयसे वेदक भी होते हैं यह उक्त कथनका तात्पर्य है । इसमें सर्व-
घाति स्पर्धकों या सर्वघाति प्रकृतियोंका वर्तमान समयमें अनुदय रहता है, इसलिए इनका उदय
कालके एक समय पहले उदयरूप स्पर्धकों या प्रकृतिमं स्तिवुक संक्रमण हो जाता है । प्रकृतमें इसे